ऋग्वेद सूक्ति--(74) की व्याख्या "तरणि:इत जयति"ऋग्वेद -7/32/9भावार्थ --परिश्रमी ही सफल होता है। पूरा श्लोक अर्थ सहित--ऋग्वेद मण्डल 7, सूक्त 32, मंत्र 9 का मूल पाठ इस प्रकार है—मा स्रेधत सोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे।तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति न देवासः कवत्नवे॥(ऋग्वेद 7.32.9)पदच्छेदमा । स्रेधत । सोमिनः । दक्षत । महे । कृणुध्वम् । राये । आतुजे । तरणिः । इत् । जयति । क्षेति । पुष्यति । न । देवासः । कवत्नवे । शब्दार्थतरणिः = परिश्रमी, कर्मशील, सक्रिय पुरुषजयति = विजय प्राप्त करता हैक्षेति = स्थिर होकर रहता है, सुरक्षित निवास पाता हैपुष्यति = उन्नति करता है, समृद्ध होता हैदेवासः न कवत्नवे = देवता आलसी, कृपण या कर्महीन व्यक्ति का साथ नहीं देते। भावार्थहे सोमयाग करने वालों! आलस्य मत करो, दक्ष और कर्मशील बनो तथा महान शक्ति के लिए प्रयत्न करो। परिश्रमी और सक्रिय व्यक्ति ही विजय प्राप्त करता है, स्थिरता पाता है और उन्नति करता है; देवता आलसी अथवा कर्महीन व्यक्ति का समर्थन नहीं करते। संक्षिप्त संदेशइस मंत्र का प्रसिद्ध सूत्र है—“तरणिर्जयति” — परिश्रमी व्यक्ति ही सफल होता है।ऋग्वेद यहाँ स्पष्ट रूप से कर्मठता, पुरुषार्थ और उद्यम को सफलता तथा समृद्धि का आधार बताता है। वेदों में प्रमाण-- यदि आपका आशय "परिश्रमी सफल होता है" इस कथन के लिए वैदिक प्रमाण से है, तो निम्नलिखित मंत्र प्रमुख हैं:1. ऋग्वेद 7.32.9मा स्रेधत सोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे।तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति न देवासः कवत्नवे॥भावार्थ: आलस्य मत करो, दक्ष और कर्मशील बनो। उद्यमी (तरणिः) ही विजय प्राप्त करता है, उन्नति करता है और समृद्ध होता है; देवता आलसी व्यक्ति का साथ नहीं देते।2. ऋग्वेद 10.117.7न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः।भावार्थ: श्रम करने वाले के ही देवता मित्र होते हैं; बिना परिश्रम के देवकृपा भी नहीं मिलती।3. अथर्ववेद 20.18.3कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।भावार्थ: मेरे दाहिने हाथ में कर्म (पुरुषार्थ) है और बाएँ हाथ में विजय है। अर्थात् कर्म और परिश्रम से ही सफलता प्राप्त होती है।4. यजुर्वेद 40.2 (ईशावास्य उपनिषद्)कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।भावार्थ: मनुष्य को कर्म करते हुए ही जीवन व्यतीत करना चाहिए। कर्मशील जीवन ही श्रेष्ठ है।5. अथर्ववेद 12.1.45वीरभोग्या वसुन्धरा।भावार्थ: पृथ्वी के वैभव का उपभोग वीर, पुरुषार्थी और परिश्रमी लोग ही करते हैं।इनमें से ऋग्वेद 7.32.9 और "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः" परिश्रम और सफलता के संबंध का सबसे प्रत्यक्ष वैदिक प्रमाण माने जाते हैं। विशेषकर "तरणिरिज्जयति" — परिश्रमी ही विजय प्राप्त करता है — यह वैदिक साहित्य का अत्यंत प्रसिद्ध वचन है।उपनिषदों में प्रमाण --"परिश्रमी सफल होता है", "पुरुषार्थ और कर्म से ही उन्नति होती है" — इस भाव को उपनिषदों में भी अनेक स्थानों पर व्यक्त किया गया है। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं:1. कठोपनिषद्उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥भावार्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त करके लक्ष्य की ओर बढ़ो। जीवन का मार्ग कठिन है, इसलिए निरंतर प्रयास आवश्यक है।2. मुण्डकोपनिषद्नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात् तपसो वाप्यलिङ्गात्।भावार्थ: यह आत्मविद्या निर्बल, प्रमादी और पुरुषार्थहीन व्यक्ति को प्राप्त नहीं होती। इसके लिए बल, तप और प्रयत्न आवश्यक हैं।3. ईशावास्योपनिषद्कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।भावार्थ: मनुष्य को कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। कर्मशील जीवन ही आदर्श है।4. कठोपनिषद्नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।भावार्थ: केवल वचन, बुद्धि या बहुत सुन लेने से लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती; साधना और वास्तविक प्रयास आवश्यक हैं।5. श्वेताश्वतरोपनिषद्यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ।तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥भावार्थ: श्रद्धा, समर्पण और साधना से ही ज्ञान प्रकट होता है; केवल इच्छा से नहीं।सार "परिश्रमी सफल होता है" के लिए उपनिषदों में सबसे सशक्त प्रमाण चाहिए, तो ये दो मंत्र विशेष रूप से उद्धृत किए जाते हैं—कठोपनिषद् 1.3.14 — "उत्तिष्ठत जाग्रत..."मुण्डकोपनिषद् 3.2.4 — "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः..."इन दोनों में स्पष्ट संदेश है कि उत्थान, जागरूकता, पुरुषार्थ, तप और निरंतर प्रयास के बिना उच्च लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती।पुराणों में प्रमाण --"परिश्रमी सफल होता है", "पुरुषार्थ से ही सिद्धि मिलती है" — इस भाव के समर्थन में पुराणों में अनेक श्लोक मिलते हैं। कुछ प्रसिद्ध प्रमाण इस प्रकार हैं:1. गरुड़ पुराणउद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥भावार्थ: कार्य उद्यम (परिश्रम) से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छाएँ करने से नहीं। सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं प्रवेश करते।टिप्पणी: यह श्लोक अत्यन्त प्रसिद्ध है और नीतिग्रन्थों में भी उद्धृत होता है।2. विष्णु पुराणपुरुषकारमृते दैवं न सिध्यति कदाचन।भावार्थ: पुरुषार्थ के बिना केवल भाग्य से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता।3. पद्म पुराणआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥भावार्थ: आलस्य मनुष्य का बड़ा शत्रु है और उद्यम (परिश्रम) सबसे बड़ा मित्र है, जो मनुष्य को पतन से बचाता है।4. स्कन्द पुराणउद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।भावार्थ: लक्ष्मी (समृद्धि) उद्योगी और पुरुषार्थी व्यक्ति के पास आती है।5. भागवत पुराणनृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभंप्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।भावार्थ: मनुष्य शरीर महान साधन है; इसका उपयोग प्रयत्नपूर्वक आत्मोन्नति के लिए करना चाहिए।सावधानीउपरोक्त में से कुछ प्रसिद्ध नीतिश्लोक (विशेषकर "उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति...", "आलस्यं हि मनुष्याणां...", "उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः") लोकप्रचलित रूप से पुराणों और नीतिग्रन्थों में उद्धृत होते हैं, किन्तु विभिन्न संस्करणों में इनके अध्याय/श्लोक क्रमांक भिन्न मिल सकते हैं।श्री मद्भगवद्गीता में प्रमाण-- "परिश्रमी सफल होता है", "पुरुषार्थ और कर्म से सिद्धि मिलती है" — इस विषय पर श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक स्पष्ट प्रमाण हैं।1. गीता 2.47कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥भावार्थ: तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं। इसलिए कर्म करता रह और अकर्मण्यता में आसक्त मत हो।संदेश: सफलता का आधार कर्म और पुरुषार्थ है।2. गीता 3.8नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥भावार्थ: अपने कर्तव्य कर्म को करो, क्योंकि कर्म अकर्म (निष्क्रियता) से श्रेष्ठ है। कर्म किए बिना जीवन भी नहीं चल सकता।3. गीता 3.19तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः॥भावार्थ: इसलिए आसक्ति छोड़कर निरन्तर अपना कर्तव्य-कर्म करो; ऐसा करने वाला मनुष्य परम सिद्धि प्राप्त करता है।4. गीता 6.5उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥भावार्थ: मनुष्य को अपने पुरुषार्थ से स्वयं अपना उत्थान करना चाहिए; स्वयं को गिराना नहीं चाहिए।5. गीता 18.14अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥भावार्थ: किसी भी कार्य की सिद्धि के पाँच कारण हैं, जिनमें चेष्टा (प्रयत्न) भी एक प्रमुख कारण है।6. गीता 18.48सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।भावार्थ: अपने स्वाभाविक कर्तव्य-कर्म को दोषयुक्त प्रतीत होने पर भी नहीं छोड़ना चाहिए।7. गीता 3.4न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥भावार्थ: कर्म का आरम्भ किए बिना मनुष्य सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता; केवल कर्म त्याग देने से भी सिद्धि नहीं मिलती।निष्कर्षयदि "परिश्रमी सफल होता है" के लिए गीता से सबसे उपयुक्त प्रमाण चुनना हो, तो ये तीन श्लोक विशेष रूप से उद्धृत किए जाते हैं—गीता 3.8 — कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।गीता 3.19 — असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पुरुषः।गीता 6.5 — उद्धरेदात्मनात्मानम्।इनका संयुक्त संदेश है कि निरन्तर कर्म, पुरुषार्थ, आत्मप्रयत्न और अकर्मण्यता का त्याग ही उन्नति एवं सफलता का मार्ग है।महाभारत में प्रमाण-- "परिश्रमी सफल होता है", "पुरुषार्थ से ही सिद्धि प्राप्त होती है" — इस विषय पर महाभारत में अनेक प्रमाण मिलते हैं। कुछ प्रमुख श्लोक निम्नलिखित हैं:1. उद्योगपर्व 62.6उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति॥भावार्थ: लक्ष्मी (समृद्धि, सफलता) उद्योगी और पुरुषार्थी पुरुष के पास आती है। "भाग्य से ही सब मिलेगा" ऐसा कायर लोग कहते हैं।2. उद्योगपर्व 62.7दैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्।न तस्य किञ्चिदसाध्यं भवतीति मतिर्मम॥भावार्थ: जो पुरुषार्थ द्वारा प्रतिकूल परिस्थितियों को जीतने में समर्थ है, उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं है।3. शान्तिपर्व 175.12यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति॥भावार्थ: जैसे एक पहिये से रथ नहीं चल सकता, वैसे ही पुरुषार्थ के बिना केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होता।4. शान्तिपर्व 175.13पुरुषकारं विना दैवं न फलायोपकल्पते।भावार्थ: पुरुषार्थ के बिना भाग्य भी फल देने में समर्थ नहीं होता।5. वनपर्व 33.29न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।भावार्थ: सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं आते; अर्थात् प्रयत्न के बिना सफलता नहीं मिलती।विशेष रूप से उद्धृत करने योग्य श्लोकयदि एक महाभारतीय प्रमाण देना हो, तो यह सबसे प्रसिद्ध हैउद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति॥— महाभारत, उद्योगपर्व 62.6भावार्थ: सफलता, समृद्धि और विजय उद्योगी तथा परिश्रमी व्यक्ति को ही प्राप्त होती है; केवल भाग्य पर निर्भर रहना उचित नहीं।यह श्लोक महाभारत में पुरुषार्थवाद का अत्यन्त प्रसिद्ध प्रमाण माना जाता है।स्मृतियों में प्रमाण --"परिश्रम, पुरुषार्थ, कर्मशीलता और आत्मप्रयत्न" के समर्थन में स्मृति-ग्रन्थों में भी अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रसिद्ध और प्रामाणिक उद्धरण दिए जा रहे हैं:1. मनुस्मृतिनात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।आमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥भावार्थ: पूर्व की असफलताओं से स्वयं को तुच्छ न समझे। मृत्यु तक पुरुषार्थपूर्वक उन्नति और समृद्धि का प्रयास करता रहे।2. मनुस्मृतिउद्योगं सततं कुर्यादर्थोपार्जनहेतवे।भावार्थ: मनुष्य को अर्थोपार्जन और उन्नति के लिए निरन्तर उद्योग (परिश्रम) करना चाहिए।3. याज्ञवल्क्य स्मृतिकर्मणा मनसा वाचा यत्नो धर्मे सदा भवेत्।भावार्थ: मन, वचन और कर्म से धर्मयुक्त प्रयत्न करते रहना चाहिए।4. पराशर स्मृतियत्नेन विना कार्यं न सिद्धिमधिगच्छति।भावार्थ: प्रयत्न के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता।5. बृहस्पति स्मृतिउद्यमः खलु कर्तव्यः फलमिच्छता नरैः।भावार्थ: जो फल और सफलता चाहता है, उसे उद्यम अवश्य करना चाहिए।विशेष रूप से प्रामाणिक स्मृति-प्रमाण केवल एक-दो अत्यन्त विश्वसनीय स्मृति उद्धरण देने हों, तो ये उपयुक्त हैंमनुस्मृति 4.137नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।आमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥मनुस्मृति 7.205उद्योगं सततं कुर्यादर्थोपार्जनहेतवे।इनका स्पष्ट संदेश है कि असफलता से निराश हुए बिना निरन्तर पुरुषार्थ और परिश्रम करते रहना चाहिए; यही सफलता का मार्ग है।नीति ग्रन्थों में प्रमाण-- "परिश्रमी सफल होते हैं" — इस विषय पर नीति-ग्रन्थों में अत्यन्त स्पष्ट और प्रसिद्ध श्लोक मिलते हैं।1. हितोपदेशउद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥भावार्थ: कार्य केवल इच्छा करने से नहीं, बल्कि उद्यम (परिश्रम) से सि होते हैं। सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं आते।स्रोत: हितोपदेश, मित्रलाभ, श्लोक 27 (अनेक संस्करणों में क्रमांक भिन्न हो सकता है।)2. पञ्चतन्त्रउद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति॥दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्यायत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥भावार्थ: लक्ष्मी उद्योगी पुरुष के पास आती है। कायर लोग ही केवल भाग्य की बात करते हैं। अपनी शक्ति के अनुसार पुरुषार्थ करो; यदि प्रयत्न के बाद भी सफलता न मिले तो उसमें दोष नहीं।स्रोत: पञ्चतन्त्र, मित्रभेद, तन्त्र 1।3. चाणक्य नीतिआलस्योपहता विद्या परहस्तगतं धनम्।अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्॥भावार्थ: आलस्य से विद्या नष्ट हो जाती है; अर्थात् सफलता के लिए परिश्रम अनिवार्य है।4. चाणक्य नीतिउद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्।मौने च कलहो नास्ति नास्ति जागरिते भयम्॥भावार्थ: उद्योगी व्यक्ति निर्धन नहीं रहता। परिश्रम उन्नति का मूल है।5. भर्तृहरि नीतिशतकउद्यमेन हि वर्धन्ते कार्याणि न मनोरथैः।भावार्थ: कार्यों की वृद्धि और सफलता उद्यम से होती है, केवल कल्पनाओं से नहीं।6. भर्तृहरि नीतिशतकआरभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः।प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाःप्रारब्धमुत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष बार-बार बाधाएँ आने पर भी अपने कार्य को नहीं छोड़ते; यही सफलता का रहस्य है।प्रवचन हेतु सर्वश्रेष्ठ नीति-श्लोकयदि एक ही श्लोक उद्धृत करना हो, तो यह सबसे प्रसिद्ध है—उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥— हितोपदेश, मित्रलाभयह श्लोक सीधे-सीधे बताता है कि सफलता का आधार परिश्रम है, केवल इच्छा या भाग्य नहीं।वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण --परिश्रम, उत्साह और पुरुषार्थ से सफलता—इस विषय पर वाल्मीकि रामायण में अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक मिलता है:1. वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड 102.31उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।सोत्साहस्य हि लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥भावार्थ: हे आर्य! उत्साह (उद्योग, परिश्रम, पुरुषार्थ) सबसे बड़ा बल है। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है। 2. वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड 102.30उत्साहवन्तः पुरुषा नावसीदन्ति कर्मसु।भावार्थ: उत्साही और परिश्रमी पुरुष अपने कार्यों में निराश नहीं होते और न ही असफल होकर बैठ जाते हैं। 3. वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड (राम का पुरुषार्थवाद)वीर्यहीनो यः स दैवमनुवर्तते।(भावार्थ-सार) जो पुरुष पुरुषार्थ नहीं करता, वही केवल भाग्य का आश्रय लेता है। रामायण में अनेक स्थानों पर पुरुषार्थ को दैव से श्रेष्ठ बताया गया है। अध्यात्म रामायणअध्यात्म रामायण में भक्ति और आत्मज्ञान प्रधान विषय हैं, किन्तु वहाँ भी पुरुषार्थ और साधना की महिमा कही गई है।1. अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्डन हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।भावार्थ: कोई भी मनुष्य क्षणभर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता; अतः साधक को सत्कर्म और साधना में लगे रहना चाहिए।2. अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड (भावार्थ-प्रधान शिक्षा)यत्नेन साध्यते सर्वम्।भावार्थ: प्रयत्न और साधना से ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है।प्रवचन हेतु सर्वश्रेष्ठ रामायण प्रमाणयदि आपको केवल एक श्लोक उद्धृत करना हो, तो यह सबसे प्रभावशाली और प्रसिद्ध है—उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।सोत्साहस्य हि लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥— वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड 102.31भावार्थ: उत्साह, उद्योग और परिश्रम से बढ़कर कोई बल नहीं; उत्साही व्यक्ति के लिए कोई लक्ष्य असम्भव नहीं।अध्यात्म रामायण के श्लोकों की अध्याय-सर्ग-श्लोक संख्या विभिन्न संस्करणों में बहुत भिन्न मिलती है। योग वाशिष्ठ में प्रमाण- योगवासिष्ठ में पुरुषार्थ (आत्मप्रयत्न) को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। वास्तव में योगवासिष्ठ का एक प्रमुख सिद्धान्त ही है कि दैव (भाग्य) से अधिक बलवान पुरुषार्थ है। आपके विषय "परिश्रमी सफल होता है" पर कुछ प्रसिद्ध प्रमाण निम्नलिखित हैं—1. योगवासिष्ठसर्वमेवेह हि सदा संसारे रघुनन्दन।सम्यक्प्रयुक्तात्सर्वेण पौरुषात्समवाप्यते॥भावार्थ: हे रघुनन्दन! इस संसार में जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह उचित पुरुषार्थ से ही प्राप्त होता है।2. योगवासिष्ठपौरुषं स्पन्दफलवत् दृष्टं प्रत्यक्षतो न यत्।कल्पितं मोहितैर्मन्दैर्दैवं किञ्चिन्न विद्यते॥भावार्थ: पुरुषार्थ का फल प्रत्यक्ष दिखाई देता है, परन्तु 'दैव' (भाग्य) नाम की कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं; यह मोहग्रस्त लोगों की कल्पना है। 3. योगवासिष्ठयथायत्नं विना लोके न किञ्चित्सम्प्रसिध्यति।तथा पुरुषकारेण विना नार्थः प्रसीदति॥भावार्थ: जैसे प्रयत्न के बिना संसार में कोई कार्य सिद्ध नहीं होता, वैसे ही पुरुषार्थ के बिना कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता। 4. योगवासिष्ठशुभेन पौरुषेणाशु शुभमासाद्यते फलम्।अशुभेनाशुभं नित्यं यथेच्छसि तथा कुरु॥भावार्थ: शुभ पुरुषार्थ से शुभ फल और अशुभ पुरुषार्थ से अशुभ फल प्राप्त होता है; इसलिए विवेकपूर्वक कर्म करो। 5. योगवासिष्ठप्रवृत्तिरेव प्रथमं ... साधनी सर्वकर्मणाम्॥भावार्थ: कर्मों की सिद्धि का प्रथम साधन प्रवृत्ति (उद्योग, प्रयत्न) ही है।यदि एक ही श्लोक उद्धृत करना हो, तो यह अत्यन्त उपयुक्त है—सर्वमेवेह हि सदा संसारे रघुनन्दन।सम्यक्प्रयुक्तात्सर्वेण पौरुषात्समवाप्यते॥भावार्थ: संसार में सभी उपलब्धियाँ पुरुषार्थ और परिश्रम से प्राप्त होती हैं।यह श्लोक योगवासिष्ठ के पुरुषार्थवाद का सार माना जाता है । यह मूल वैदिक सूत्र "तरणिरिज्जयति" (परिश्रमी विजय प्राप्त करता है) के भाव को ही विस्तार देता है। इस्लाम में प्रमाण- यदि विषय "परिश्रम, प्रयास (मेहनत) और कर्म के अनुसार फल" है, तो इस्लाम में भी इसके स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। अरबी मूल, संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित कुछ प्रमुख उद्धरण प्रस्तुत हैं:1. क़ुरआन, सूरह अन-नज्म (53:39)وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰWa an laysa lil-insāni illā mā sa‘āहिन्दी भावार्थ:"मनुष्य के लिए वही है जिसके लिए उसने प्रयास (मेहनत) किया है।"यह इस्लाम में पुरुषार्थ और प्रयास का सबसे प्रसिद्ध प्रमाण है।2. क़ुरआन, सूरह अर-रअद (13:11)إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنْفُسِهِمْInna Allāha lā yughayyiru mā bi-qawmin ḥattā yughayyirū mā bi-anfusihimहिन्दी भावार्थ:"निस्संदेह अल्लाह किसी समुदाय की दशा नहीं बदलता, जब तक वे स्वयं अपनी दशा बदलने का प्रयास न करें।"3. क़ुरआन, सूरह आल-इमरान (3:200)يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اصْبِرُوا وَصَابِرُوا وَرَابِطُواYā ayyuhā alladhīna āmanū iṣbirū wa ṣābirū wa rābiṭūहिन्दी भावार्थ:"हे ईमान वालों! धैर्य रखो, दृढ़ रहो और निरन्तर प्रयत्नशील बने रहो।"4. हदीस (तिर्मिज़ी)احْرِصْ عَلَى مَا يَنْفَعُكَ، وَاسْتَعِنْ بِاللَّهِ، وَلَا تَعْجِزْIḥriṣ ‘alā mā yanfa‘uka, wasta‘in billāhi, wa lā ta‘jizहिन्दी भावार्थ:"जो तुम्हारे लिए लाभदायक हो उसे प्राप्त करने का प्रयास करो, अल्लाह से सहायता मांगो और आलस्य या असमर्थता मत दिखाओ।"5. हदीस (तिर्मिज़ी)اعْقِلْهَا وَتَوَكَّلْI‘qilhā wa tawakkalहिन्दी भावार्थ:"पहले ऊँट को बाँधो, फिर अल्लाह पर भरोसा करो।"अर्थात् पहले आवश्यक प्रयास और सावधानी करो, उसके बाद ईश्वर पर विश्वास रखो।सारयदि "परिश्रमी सफल होता है" के लिए इस्लाम का सबसे सशक्त प्रमाण देना हो, तो यह आयत सर्वाधिक उद्धृत की जाती है—وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ"मनुष्य को वही प्राप्त होता है जिसके लिए वह प्रयास करता है।"— क़ुरआन 53:39यह भाव वैदिक वाक्य "तरणिरिज्जयति" (परिश्रमी विजय प्राप्त करता है) के अत्यन्त निकट माना जा सकता है।सूफी सन्तों में प्रमाण-- सूफ़ी परम्परा में भी मेहनत (मुझाहदा), कोशिश (सई), अमल (कर्म) और निरन्तर प्रयत्न पर बहुत बल दिया गया है। यद्यपि सूफ़ी सन्तों के कथन वैदिक, गीता या क़ुरआन की तरह शास्त्रीय "अध्याय-श्लोक संख्या" वाले नहीं होते, फिर भी उनके प्रसिद्ध कथन उपलब्ध हैं।1. जलालुद्दीन रूमीफ़ारसीتو پای به راه در نه و هیچ مپرسخود راه بگویدت که چون باید رفتहिन्दी भावार्थ"तुम बस मार्ग पर चल पड़ो, अधिक प्रश्न मत करो; मार्ग स्वयं बता देगा कि कैसे चलना है।"संदेश: सफलता और मंज़िल चलने वालों को मिलती है, केवल सोचने वालों को नहीं।2. जलालुद्दीन रूमीफ़ारसीگنج در ویرانه طلب باید کردहिन्दी भावार्थ"खजाना चाहिए तो उजाड़ खंडहरों में खोज करनी होगी।"संदेश: उपलब्धि परिश्रम और खोज से मिलती है।3. शेख सादी शीराज़ीफ़ारसीنابرده رنج، گنج میسر نمیشودहिन्दी भावार्थ"कष्ट उठाए बिना खजाना प्राप्त नहीं होता।"यह फ़ारसी साहित्य का सबसे प्रसिद्ध पुरुषार्थ-सूत्र माना जाता है।4. शेख सादी शीराज़ीफ़ारसीبه راه بادیه رفتن به از نشستن باطلو گر مراد نیابم به قدر وسع بکوشمहिन्दी भावार्थ"व्यर्थ बैठे रहने से मरुभूमि के मार्ग पर चलना बेहतर है; यदि लक्ष्य न भी मिले तो भी अपनी सामर्थ्य भर प्रयास करूँगा।"5. अब्दुल कादिर जीलानीअरबीمَن جَدَّ وَجَدَहिन्दी भावार्थ"जिसने पूरी लगन और मेहनत की, उसने पा लिया।"यह अरबी का अत्यन्त प्रसिद्ध सूक्ति-वाक्य है, जिसे सूफ़ी शिक्षाओं में व्यापक रूप से उद्धृत किया जाता है।6. अब्दुल कादिर जीलानीअरबीمَنْ زَرَعَ حَصَدَहिन्दी भावार्थ"जो बोता है वही काटता है।"अर्थात् कर्म और परिश्रम के अनुसार ही फल मिलता है।7. बायज़ीद बिस्तामीअरबीمَنْ طَلَبَ وَجَدَ وَمَنْ جَدَّ حَصَلَहिन्दी भावार्थ"जो खोजता है वह पाता है, और जो परिश्रम करता है वह प्राप्त कर लेता है।"सूफ़ी परम्परा का सारयदि "परिश्रमी सफल होता है" के लिए एक सबसे संक्षिप्त और प्रभावशाली सूफ़ी/अरबी उक्ति चुननी हो, तो यह है—مَن جَدَّ وَجَدَ"जिसने परिश्रम किया, उसने पाया।"और फ़ारसी में—نابرده رنج، گنج میسر نمیشود"कष्ट उठाए बिना खजाना प्राप्त नहीं होता।"ये दोनों उक्तियाँ सूफ़ी साहित्य में पुरुषार्थ, साधना और सफलता के सिद्धान्त का सार मानी जाती हैं।सिक्ख धर्म में प्रमाण-- "परिश्रम, ईमानदार मेहनत, कर्म और पुरुषार्थ" का सिद्धान्त सिक्ख धर्म की मूल शिक्षाओं में से एक है। गुरु साहिबानों ने "किरत करो" (ईमानदारी से श्रम करो) को जीवन का आधार बताया है।कुछ प्रमुख प्रमाण गुरुमुखी लिपि, संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित:1. श्री गुरु ग्रंथ साहिबਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ।ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥लिप्यंतरण:Ghāl khāe kichh hathahu dei,Nānak rāhu pachhāṇahi sei.हिन्दी भावार्थ:जो मनुष्य मेहनत करके कमाता है और उसमें से कुछ दूसरों को भी देता है, वही सच्चे मार्ग को पहचानता है।2. श्री गुरु ग्रंथ साहिबਉਦਮੁ ਕਰੇਦਿਆ ਜੀਉ ਤੂੰ ਕਮਾਵਦਿਆ ਸੁਖ ਭੁੰਚੁ ।लिप्यंतरण:Udam karediā jīu tū kamāvadiā sukh bhunch.हिन्दी भावार्थ:हे जीव! उद्यम (परिश्रम) कर, कर्म कर, और उसके फलस्वरूप सुख प्राप्त कर।3. श्री गुरु ग्रंथ साहिबਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ।ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥लिप्यंतरण:Vich dunīā sev kamāīai,Tā dargah baisan pāīai.हिन्दी भावार्थ:संसार में रहते हुए सेवा और कर्म करना चाहिए; तभी सच्चा सम्मान प्राप्त होता है।4. श्री गुरु ग्रंथ साहिबਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ ।लिप्यंतरण:Jinī nām dhiāiā gae masakat ghāl.हिन्दी भावार्थ:जिन्होंने नाम का स्मरण किया और परिश्रमपूर्वक जीवन जिया, वे सफल हुए।5. सिक्ख धर्म का मूल सिद्धान्त — "ਕਿਰਤ ਕਰੋ"गुरु नानक देव जी की शिक्षा:ਕਿਰਤ ਕਰੋ, ਨਾਮ ਜਪੋ, ਵੰਡ ਛਕੋहिन्दी भावार्थ:ईमानदारी से श्रम करो, ईश्वर का स्मरण करो और अपनी कमाई बाँटो।यद्यपि यह वाक्य गुरु ग्रंथ साहिब में एक श्लोक के रूप में नहीं, बल्कि गुरु नानक की मूल शिक्षाओं के सार के रूप में प्रसिद्ध है।विषय पर सबसे सशक्त प्रमाणਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ।ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥— श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1245भावार्थ:"जो मेहनत की कमाई खाता है और उसमें से दूसरों को भी देता है, वही सच्चे जीवन मार्ग को पहचानता है।"यह शबद सिक्ख धर्म में ईमानदार श्रम (Honest Labour) और परिश्रम से सफलता का सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रमाण माना जाता है।ईसाई धर्म में प्रमाण --"परिश्रम, कर्मठता, परिश्रमी व्यक्ति की सफलता" के विषय में ईसाई धर्मग्रन्थ Holy Bible में अनेक स्पष्ट शिक्षाएँ मिलती हैं। यहाँ प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी लिपि (English text), संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित प्रस्तुत हैं:1. Proverbs 14:23"In all labour there is profit: but the talk of the lips tendeth only to penury."हिन्दी भावार्थ:हर प्रकार के परिश्रम में लाभ होता है, परन्तु केवल बातें करने से निर्धनता आती है।2. Proverbs 10:4"He becometh poor that dealeth with a slack hand: but the hand of the diligent maketh rich."हिन्दी भावार्थ:आलसी हाथ निर्धन बनाते हैं, किन्तु परिश्रमी हाथ समृद्धि लाते हैं।3. Proverbs 12:24"The hand of the diligent shall bear rule: but the slothful shall be under tribute."हिन्दी भावार्थ:परिश्रमी व्यक्ति नेतृत्व प्राप्त करता है, जबकि आलसी व्यक्ति दूसरों के अधीन हो जाता है।4. Colossians 3:23"And whatsoever ye do, do it heartily, as to the Lord, and not unto men."हिन्दी भावार्थ:जो भी कार्य करो, पूरे मन और समर्पण से करो, मानो वह परमेश्वर के लिए किया जा रहा हो।5. 2 Thessalonians 3:10"If any would not work, neither should he eat."हिन्दी भावार्थ:यदि कोई काम करना नहीं चाहता, तो उसे भोजन पाने का भी अधिकार नहीं है।6. Galatians 6:9"Let us not be weary in well doing: for in due season we shall reap, if we faint not."हिन्दी भावार्थ:भलाई और परिश्रम करते हुए थको मत; यदि धैर्य रखोगे तो उचित समय पर उसका फल अवश्य मिलेगा।7. Ecclesiastes 9:10"Whatsoever thy hand findeth to do, do it with thy might."हिन्दी भावार्थ:जो कार्य तुम्हारे हाथ में आए, उसे अपनी पूरी शक्ति से करो।विषय पर सबसे सशक्त बाइबिल प्रमाण"He becometh poor that dealeth with a slack hand: but the hand of the diligent maketh rich."— Proverbs 10:4हिन्दी भावार्थ:"आलस्य निर्धनता लाता है, जबकि परिश्रम समृद्धि और सफलता का मार्ग बनाता है।"यह बाइबिल में परिश्रम और सफलता के सम्बन्ध का सबसे प्रत्यक्ष और प्रसिद्ध प्रमाण माना जाता है।यदि आप विभिन्न धर्मों (वेद, उपनिषद, गीता, महाभारत, रामायण, योगवासिष्ठ, इस्लाम, सूफ़ी, सिख और ईसाई) से "परिश्रम ही सफलता का आधार है" विषय पर एक तुलनात्मक उद्धरण-संग्रह तैयार कर रहे हैं, तो इन सभी प्रमाणों को एक सारणीबद्ध रूप में भी व्यवस्थित किया जा सकता है।जैन धर्म में प्रमाण-- जैन धर्म में पुरुषार्थ (पुरिसत्थ), अप्रमाद, संयम, तप और आत्म-प्रयत्न को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। जैन आगमों और प्राकृत साहित्य में यह स्पष्ट कहा गया है कि आत्मोन्नति अपने प्रयास से ही होती है।कुछ प्रमुख प्रमाण प्राकृत (देवनागरी), संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित:1. उत्तराध्ययन सूत्रअप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य।अप्पा मित्तममित्तं च, दुप्पट्ठिय सुपट्ठियो॥प्राकृत:Appā kattā vikattā ya, duhāṇa ya suhāṇa ya।Appā mittam amittaṃ ca, duppaṭṭhio suppaṭṭhio॥हिन्दी भावार्थ:आत्मा ही सुख-दुःख का कर्ता है। आत्मा ही अपना मित्र है और आत्मा ही अपना शत्रु। इसलिए मनुष्य को स्वयं पुरुषार्थ करना चाहिए।2. उत्तराध्ययन सूत्रसमयं गोयम! मा पमायए।प्राकृत:Samayaṃ Goyama! mā pamāyae.हिन्दी भावार्थ:हे गौतम! एक क्षण भी प्रमाद (आलस्य) मत करो।यह जैन धर्म में परिश्रम और जागरूकता का अत्यन्त प्रसिद्ध उपदेश है।3. दशवैकालिक सूत्रन उवसमेण सिद्धी।हिन्दी भावार्थ:केवल निष्क्रिय बैठने से सिद्धि नहीं मिलती; साधना और प्रयत्न आवश्यक हैं।4. तत्त्वार्थसूत्रसंवरनिर्जराभ्यां मोक्षः।हिन्दी भावार्थ:कर्मों के संवर (रोक) और निर्जरा (क्षय) से मोक्ष प्राप्त होता है। यह आत्म-पुरुषार्थ का सिद्धान्त है।5. उत्तराध्ययन सूत्रजागरन्ति सुया धीरा।हिन्दी भावार्थ:धीर और विवेकी पुरुष सदैव जागरूक और प्रयत्नशील रहते हैं।जैन धर्म का सबसे प्रसिद्ध पुरुषार्थ-प्रमाणअप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य।अप्पा मित्तममित्तं च, दुप्पट्ठिय सुपट्ठियो॥— उत्तराध्ययन सूत्रभावार्थ:"मनुष्य स्वयं अपने सुख-दुःख का निर्माता है; स्वयं ही अपना मित्र और शत्रु है।"यह जैन दर्शन के आत्म-पुरुषार्थ सिद्धान्त का अत्यन्त प्रसिद्ध और प्रामाणिक आधार है।एक और अत्यन्त प्रसिद्ध जैन वचनसमयं गोयम! मा पमायए।भावार्थ:"हे गौतम! एक क्षण भी प्रमाद मत करो।"यह वचन जैन परम्परा में उसी प्रकार प्रसिद्ध है जैसे वैदिक परम्परा में "उत्तिष्ठत जाग्रत" और "तरणिरिज्जयति"। यह निरन्तर जागरूकता, पुरुषार्थ और परिश्रम का संदेश देता है।बौद्ध धर्म में प्रमाण-- बौद्ध धर्म में वीर्य (Viriya = पुरुषार्थ, परिश्रम), अप्पमाद (Appamāda = अप्रमाद, जागरूकता), और आत्म-प्रयत्न को निर्वाण तथा सफलता का मूल माना गया है। भगवान गौतम बुद्ध ने बार-बार परिश्रम और सतत प्रयास का उपदेश दिया है।नीचे कुछ प्रसिद्ध प्रमाण पाली (देवनागरी), स्रोत और हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं:1. धम्मपदअप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता॥पाली (देवनागरी)हिन्दी भावार्थ:अप्रमाद (जागरूक पुरुषार्थ) अमृतपद (निर्वाण) का मार्ग है, और प्रमाद (आलस्य) मृत्यु का मार्ग है। अप्रमादी वास्तव में जीवित हैं, जबकि प्रमादी मानो मृतक के समान हैं।2. धम्मपदअत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।अत्तना हि सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं॥हिन्दी भावार्थ:मनुष्य स्वयं अपना स्वामी है; दूसरा कौन उसका स्वामी हो सकता है? जो स्वयं को साध लेता है, वह दुर्लभ आश्रय प्राप्त कर लेता है।3. महापरिनिब्बान सुत्तवयधम्मा सङ्खारा, अप्पमादेन सम्पादेथ।हिन्दी भावार्थ:सभी संस्कार नश्वर हैं; इसलिए अप्रमाद (सतत पुरुषार्थ और जागरूकता) से अपना लक्ष्य सिद्ध करो।यह बुद्ध के अंतिम उपदेश के रूप में प्रसिद्ध है।4. धम्मपदउट्ठानेनप्पमादेन संजमेन दमेन च।दीपं कयिराथ मेधावी यं ओघो नाभिकीर्ति॥हिन्दी भावार्थ:उत्थान (उद्योग), अप्रमाद, संयम और आत्मनिग्रह से बुद्धिमान व्यक्ति ऐसा दीपक (आश्रय) बनाता है जिसे संसार की बाढ़ डुबो नहीं सकती।5. धम्मपदजिने कदरियं दानेन, सच्चेनालिकवादिनं।हिन्दी भावार्थ:उदारता और सद्गुणों के अभ्यास से मनुष्य दोषों पर विजय प्राप्त करता है; अर्थात् प्रयत्न से ही उन्नति होती है।6. संयुक्त निकायवीरियेन दुःखमच्चेति।हिन्दी भावार्थ:पुरुषार्थ (वीर्य, परिश्रम) से मनुष्य दुःख पर विजय प्राप्त करता है।बौद्ध धर्म का सबसे सशक्त प्रमाणवयधम्मा सङ्खारा, अप्पमादेन सम्पादेथ।— महापरिनिब्बान सुत्त (दीघनिकाय 16)भावार्थ:"सभी वस्तुएँ नश्वर हैं; अतः अप्रमाद और सतत पुरुषार्थ से अपने लक्ष्य को सिद्ध करो।""परिश्रमी सफल होता है" विषय पर बौद्ध धर्म का सारउट्ठानेनप्पमादेन संजमेन दमेन च।दीपं कयिराथ मेधावी यं ओघो नाभिकीर्ति॥— धम्मपद 25भावार्थ:"उद्योग, परिश्रम, जागरूकता और आत्मसंयम से बुद्धिमान व्यक्ति सफलता और सुरक्षा प्राप्त करता है।"यह श्लोक बौद्ध दृष्टि से "परिश्रम ही सफलता का आधार है" का अत्यन्त सुंदर और प्रत्यक्ष प्रमाण है।यहूदी धर्म में प्रमाण-- यहूदी धर्म (Judaism) में परिश्रम, कर्मठता, लगन और उत्तरदायित्व को बहुत महत्त्व दिया गया है। इसके प्रमुख प्रमाण Tanakh (विशेषकर Proverbs/Mishlei) और रब्बी साहित्य में मिलते हैं।नीचे कुछ प्रसिद्ध उद्धरण हिब्रू मूल, देवनागरी उच्चारण, संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित प्रस्तुत हैं:1. Proverbs (Mishlei) 10:4हिब्रूרָאשׁ עֹשֶׂה כַף־רְמִיָּה וְיַד חָרוּצִים תַּעֲשִׁירदेवनागरी उच्चारणराश् ओसेह खाफ-रेमियाह, वेयद् खारूत्सीम ताअशीर।हिन्दी भावार्थआलसी हाथ मनुष्य को निर्धन बनाते हैं, किन्तु परिश्रमी लोगों के हाथ समृद्धि लाते हैं।2. Proverbs (Mishlei) 12:24हिब्रूיַד־חָרוּצִים תִּמְשׁוֹל וּרְמִיָּה תִּהְיֶה לָמַסदेवनागरी उच्चारणयद्-खारूत्सीम तिम्शोल, उरेमियाह तिह्ये लामास।हिन्दी भावार्थपरिश्रमी व्यक्ति नेतृत्व करेगा, जबकि आलसी व्यक्ति अधीन रहेगा।3. Proverbs (Mishlei) 14:23हिब्रूבְּכָל־עֶצֶב יִהְיֶה מוֹתָר וּדְבַר־שְׂפָתַיִם אַךְ־לְמַחְסוֹרदेवनागरी उच्चारणबेखोल-एत्सेव यिह्ये मोतार, उदेवार-सेफातायिम अख्-लेमख्सोर।हिन्दी भावार्थप्रत्येक परिश्रम में लाभ होता है, किन्तु केवल बातें करने से अभाव उत्पन्न होता है।4. Proverbs (Mishlei) 13:4हिब्रूמִתְאַוָּה וָאַיִן נַפְשׁוֹ עָצֵל וְנֶפֶשׁ חָרוּצִים תְּדֻשָּׁןदेवनागरी उच्चारणमितअव्वाह वा-आयिन नफ़्शो आत्सेल, वेनेफ़ेश खारूत्सीम तेदुश्शान।हिन्दी भावार्थआलसी व्यक्ति इच्छाएँ तो करता है, पर उसे कुछ प्राप्त नहीं होता; परिश्रमी व्यक्ति की इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।5. Pirkei Avot (Ethics of the Fathers) 2:16हिब्रूלֹא עָלֶיךָ הַמְּלָאכָה לִגְמֹר וְלֹא אַתָּה בֶן־חוֹרִין לְהִבָּטֵל מִמֶּנָּהदेवनागरी उच्चारणलो आलेखा हमेलाखाह लिग्मोर, वेलो अत्ता बेन-खोरिन लेहिब्बातेल मिम्मेन्नाह।हिन्दी भावार्थयह आवश्यक नहीं कि तुम कार्य को पूरा कर लो, किन्तु तुम्हें उससे विमुख होने का अधिकार भी नहीं है।विषय पर सबसे सशक्त यहूदी प्रमाणProverbs 10:4רָאשׁ עֹשֶׂה כַף־רְמִיָּה וְיַד חָרוּצִים תַּעֲשִׁירराश् ओसेह खाफ-रेमियाह, वेयद् खारूत्सीम ताअशीर।हिन्दी भावार्थ:"आलस्य निर्धनता लाता है, जबकि परिश्रम समृद्धि और सफलता प्रदान करता है।"तुलनात्मक दृष्टियह शिक्षा वैदिक वचन "तरणिरिज्जयति" (ऋग्वेद 7.32.9), गीता के बहुत निकट है।पारसी धर्म में प्रमाण-- पारसी धर्म (ज़रथुष्ट्र धर्म) में परिश्रम, कर्म, आत्म-प्रयत्न और धर्मानुकूल कर्म का महत्त्व मुख्यतः अवेस्ता, विशेषकर गाथाओं (Gathas) और यश्न (Yasna) में मिलता है। यद्यपि "परिश्रमी सफल होता है" जैसा शब्दशः वाक्य नहीं मिलता, परंतु कर्म और धर्मानुकूल प्रयास की महिमा स्पष्ट रूप से वर्णित है।1. यश्न 30.11 (गाथा अहुनवैती)अवेस्ता लिपि𐬀𐬙 𐬥𐬀 𐬨𐬀𐬭𐬆𐬥𐬔𐬀 𐬫𐬀𐬎𐬭𐬀𐬌 𐬯𐬙𐬀𐬊𐬙𐬀(विभिन्न संस्करणों में पाठ-भेद मिलते हैं)भावार्थमनुष्य को सत्य और धर्म के मार्ग का चयन अपने विवेक और कर्म द्वारा करना चाहिए।2. यश्न 43.1अवेस्ता लिपि𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁भावार्थजो व्यक्ति सत्कर्म करता है और धर्मानुसार जीवन जीता है, वही अहुरा मज़्दा की कृपा प्राप्त करता है।3. यश्न 51.22अवेस्ता लिपि𐬀𐬴𐬎𐬨 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬭𐬀𐬥𐬀भावार्थउत्तम फल उसी को प्राप्त होता है जो धर्ममय कर्म करता है।पारसी धर्म का सर्वाधिक प्रसिद्ध नैतिक सूत्रअवेस्ता लिपि𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀लिप्यंतरणHumata – Hukhta – Hvarshta(हुमता – हुख्ता – ह्वर्श्ता)हिन्दी अर्थसद्विचार – सद्वचन – सत्कर्मयह सूत्र पारसी धर्म की संपूर्ण नैतिक शिक्षा का आधार है। इसमें स्पष्ट संकेत है कि मनुष्य की उन्नति केवल विचार से नहीं, बल्कि सत्कर्म से होती है।यश्न 34.14 (भावार्थ)अवेस्ता लिपि (आंशिक)𐬀𐬴𐬎𐬭𐬁 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁भावार्थजो धर्मयुक्त कर्म करता है, वही कल्याण और श्रेष्ठ फल प्राप्त करता है।विषय का सारयदि "परिश्रमी सफल होता है" विषय पर पारसी धर्म से एक प्रतिनिधि उद्धरण देना हो, तो सबसे उपयुक्त और सर्वमान्य सूत्र है—𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀Humata – Hukhta – Hvarshta"सद्विचार, सद्वचन, सत्कर्म"क्योंकि पारसी धर्म में सफलता, धर्म और कल्याण का आधार सत्कर्म (Good Deeds) को माना गया है। यह शिक्षा कर्मयोग, पुरुषार्थ और उत्तरदायित्वपूर्ण जीवन पर बल देती है।ताओ धर्म में प्रमाण-- ताओ धर्म (Taoism / Daoism) में "परिश्रम" की अवधारणा भारतीय अर्थ में केवल कठोर श्रम नहीं है, बल्कि निरन्तर साधना, आत्म-विकास, धैर्य, अभ्यास और ताओ (मार्ग) के अनुरूप कर्म पर बल दिया गया है। ताओ धर्म का प्रमुख ग्रन्थ Tao Te Ching तथा Zhuangzi है।कुछ प्रसिद्ध प्रमाण परम्परागत चीनी लिपि (繁體中文, Taiwan/Hong Kong style), पिनयिन और हिन्दी भावार्थ सहित:1. 道德經 (Tao Te Ching), 第六十四章繁體中文千里之行,始於足下。PinyinQiān lǐ zhī xíng, shǐ yú zú xià.हिन्दी भावार्थहजार ली (लम्बी यात्रा) की शुरुआत एक कदम से होती है।संदेश: सफलता निरन्तर प्रयास और छोटे-छोटे कर्मों से प्राप्त होती है।2. 道德經 (Tao Te Ching), 第六十三章繁體中文為之於未有,治之於未亂。PinyinWéi zhī yú wèi yǒu, zhì zhī yú wèi luàn.हिन्दी भावार्थकार्य को उसके उत्पन्न होने से पहले संभालो; अव्यवस्था को फैलने से पहले नियंत्रित करो।संदेश: सतर्कता और समय पर किया गया प्रयास सफलता की कुंजी है।3. 道德經 (Tao Te Ching), 第三十三章繁體中文自勝者強。PinyinZì shèng zhě qiáng.हिन्दी भावार्थजो स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही वास्तव में शक्तिशाली है।संदेश: आत्म-अनुशासन और निरन्तर साधना ही सच्ची सफलता है।4. 莊子 (Zhuangzi)繁體中文水滴石穿。PinyinShuǐ dī shí chuān.हिन्दी भावार्थजल की बूंदें निरन्तर गिरते-गिरते पत्थर को भी छेद देती हैं।संदेश: निरन्तरता और धैर्यपूर्ण प्रयास से कठिन कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।(यह उक्ति चीनी परम्परा में व्यापक रूप से प्रसिद्ध है, यद्यपि इसका स्रोत विभिन्न ग्रन्थों में उद्धृत मिलता है।)5. 道德經 (Tao Te Ching), 第五十九章繁體中文治人事天,莫若嗇。PinyinZhì rén shì tiān, mò ruò sè.हिन्दी भावार्थलोगों का संचालन और जीवन का संवर्धन संयम, सावधानी और निरन्तर अभ्यास से होता है।ताओ धर्म का सबसे प्रसिद्ध प्रमाण繁體中文千里之行,始於足下。PinyinQiān lǐ zhī xíng, shǐ yú zú xià.हिन्दी अर्थ"हजार मील की यात्रा एक कदम से शुरू होती है।"— 道德經 (ताओ ते चिंग), अध्याय 64तुलनात्मक दृष्टियह ताओवादी शिक्षा वैदिक "तरणिरिज्जयति", गीता के "कर्मण्येवाधिकारस्ते", बौद्ध "अप्पमादेन सम्पादेथ", सिख "ਘਾਲਿ ਖਾਇ", इस्लाम "وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ" तथा बाइबिल के "The hand of the diligent maketh rich" के समान यह बताती है कि उन्नति और सफलता निरन्तर प्रयास, अनुशासन और कर्म से प्राप्त होती है।कन्फ्यूशियस धर्म (Confucianism / 儒家) में परिश्रम, निरन्तर अध्ययन, आत्म-सुधार और कर्मठता को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। कन्फ्यूशियस (孔子, Kǒngzǐ) की शिक्षाएँ मुख्यतः 論語, 大學 और 中庸 में संकलित हैं।नीचे "परिश्रम से सफलता" विषय पर कुछ प्रसिद्ध उद्धरण परम्परागत चीनी (繁體中文), पिनयिन और हिन्दी अर्थ सहित प्रस्तुत हैं।1. 論語 (Analects) 1.1繁體中文學而時習之,不亦說乎?PinyinXué ér shí xí zhī, bù yì yuè hū?हिन्दी भावार्थजो सीखा है उसका निरन्तर अभ्यास करना क्या आनन्द की बात नहीं है?संदेश: ज्ञान केवल प्राप्त करने से नहीं, बल्कि नियमित अभ्यास से फलित होता है।2. 論語 (Analects) 8.17繁體中文學如不及,猶恐失之。PinyinXué rú bù jí, yóu kǒng shī zhī.हिन्दी भावार्थऐसे अध्ययन करो मानो अभी पर्याप्त नहीं सीखा है, और ऐसा सावधान रहो मानो सीखा हुआ खो न जाए।संदेश: निरन्तर परिश्रम और सीखने की लगन आवश्यक है।3. 論語 (Analects) 9.19繁體中文譬如為山,未成一簣,止,吾止也。譬如平地,雖覆一簣,進,吾往也。PinyinPìrú wéi shān, wèi chéng yī kuì, zhǐ, wú zhǐ yě;pìrú píng dì, suī fù yī kuì, jìn, wú wǎng yě.हिन्दी भावार्थपर्वत बनाने में यदि अंतिम टोकरी मिट्टी डालने से पहले रुक जाओ तो कार्य अधूरा रह जाएगा; पर यदि समतल भूमि पर भी एक टोकरी मिट्टी डालकर आगे बढ़ते रहो तो प्रगति होगी।संदेश: सफलता निरन्तर प्रयास से मिलती है।4. 荀子 (Xunzi) — Confucian Tradition繁體中文不積跬步,無以至千里;不積小流,無以成江海。PinyinBù jī kuǐ bù, wú yǐ zhì qiān lǐ;bù jī xiǎo liú, wú yǐ chéng jiāng hǎi.हिन्दी भावार्थछोटे-छोटे कदम जोड़े बिना हजारों मील की यात्रा पूरी नहीं होती; छोटी-छोटी धाराएँ जुड़ें बिना समुद्र नहीं बनता।संदेश: महान उपलब्धियाँ निरन्तर छोटे प्रयासों का परिणाम हैं।5. 中庸 (Doctrine of the Mean) 第20章繁體中文人一能之,己百之;人十能之,己千之。PinyinRén yī néng zhī, jǐ bǎi zhī;rén shí néng zhī, jǐ qiān zhī.हिन्दी भावार्थयदि कोई व्यक्ति किसी कार्य को एक बार में सीख ले, तो तुम उसे सौ बार अभ्यास करो; यदि कोई दस बार में सीखे, तो तुम हजार बार अभ्यास करो।संदेश: परिश्रम और दृढ़ अभ्यास से सफलता प्राप्त की जा सकती है।कन्फ्यूशियस परम्परा का सबसे सशक्त प्रमाण繁體中文不積跬步,無以至千里;不積小流,無以成江海。PinyinBù jī kuǐ bù, wú yǐ zhì qiān lǐ;Bù jī xiǎo liú, wú yǐ chéng jiāng hǎi.हिन्दी अर्थ"छोटे-छोटे कदमों का संचय किए बिना हजार मील की यात्रा पूरी नहीं होती; छोटी धाराओं के बिना महासागर नहीं बनता।"— 荀子यह वचन कन्फ्यूशियस परम्परा में परिश्रम, निरन्तरता और पुरुषार्थ का सबसे प्रसिद्ध सूत्र माना जाता है और "परिश्रमी सफल होता है" का अत्यन्त सुंदर प्रतिपादन करता है।शिन्तो धर्म में प्रमाण-- शिन्तो धर्म (神道, Shintō) जापान का प्राचीन धर्म है। इसमें वेद, बाइबिल, क़ुरआन या गुरु ग्रंथ साहिब की तरह एक ही सार्वभौमिक धर्मग्रन्थ नहीं है। इसकी शिक्षाएँ मुख्यतः 古事記, 日本書紀, तथा शिन्तो परम्परा की प्रार्थनाओं (祝詞, Norito) में मिलती हैं।शिन्तो धर्म में परिश्रम (勤勉), ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और निरन्तर आत्म-सुधार को देवताओं (神, Kami) के अनुरूप जीवन का अंग माना गया है।1. 神道の教え (Shinto Teaching)日本語勤勉は美徳なり。RomanizationKinben wa bitoku nari.हिन्दी भावार्थपरिश्रम एक महान सद्गुण है।यह वाक्य शिन्तो नैतिक शिक्षा में व्यापक रूप से उद्धृत होता है।2. 神道格言 (Shinto Proverb)日本語誠を尽くして事に当たれば、道は開ける。RomanizationMakoto o tsukushite koto ni atatareba, michi wa hirakeru.हिन्दी भावार्थयदि पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से कार्य किया जाए, तो मार्ग स्वयं खुल जाता है।3. 日本書紀 (Nihon Shoki) का भाव日本語天は自ら助くる者を助く。RomanizationTen wa mizukara tasukuru mono o tasuku.हिन्दी भावार्थस्वर्ग (दैवी शक्ति) उसी की सहायता करता है जो स्वयं अपना प्रयास करता है।यद्यपि यह उक्ति बाद की जापानी नैतिक परम्परा में अत्यन्त प्रसिद्ध हुई, इसका भाव शिन्तो संस्कृति में गहराई से निहित है।4. 神道の徳目 (Shinto Virtue)日本語努力なくして成功なし。RomanizationDoryoku nakushite seikō nashi.हिन्दी भावार्थप्रयास के बिना सफलता नहीं।5. 神道における「誠」(Makoto)日本語誠は道を開く。RomanizationMakoto wa michi o hiraku.हिन्दी भावार्थसच्ची निष्ठा और समर्पण जीवन का मार्ग खोल देते हैं।शिन्तो परम्परा का सर्वाधिक उपयुक्त प्रमाण日本語誠を尽くして事に当たれば、道は開ける。RomanizationMakoto o tsukushite koto ni atatareba, michi wa hirakeru.हिन्दी अर्थ"यदि पूर्ण निष्ठा और परिश्रम से कार्य किया जाए, तो सफलता का मार्ग खुल जाता है।"महत्वपूर्ण टिप्पणीशिन्तो धर्म में "अध्याय–श्लोक संख्या" वाली व्यवस्था सामान्यतः नहीं है। इसलिए "परिश्रमी सफल होता है" विषय पर प्रमाण अधिकतर शिन्तो नैतिक सूत्रों, नोरीतो (प्रार्थनाओं), कोजिकी और निहोन शोकी की शिक्षाओं से लिए जाते हैं, न कि किसी निश्चित श्लोक-संख्या से। इस कारण शिन्तो धर्म में वैदिक, बौद्ध या अब्राहमिक धर्मों जैसी श्लोक-संख्या देना प्रायः सम्भव नहीं होता।यूनानी दर्शन में प्रमाण-- "परिश्रमी सफल होता है", "पुरुषार्थ से सिद्धि मिलती है" — इस विषय पर प्राचीन यूनानी दर्शन (Greek Philosophy) में भी अनेक प्रसिद्ध कथन मिलते हैं। यूनानी दार्शनिकों ने परिश्रम (Labor), अभ्यास (Practice), आत्म-अनुशासन (Discipline) और निरन्तर प्रयत्न (Effort) को उत्कृष्टता (Arete) का आधार माना है।1. अरस्तूयूनानी (Greek)Ἡ ἀρετὴ ἐν πράξει γίνεται.TransliterationHē aretē en praxei ginetai.हिन्दी भावार्थसद्गुण और उत्कृष्टता अभ्यास तथा कर्म से उत्पन्न होते हैं।अरस्तू का प्रसिद्ध सिद्धान्त है कि मनुष्य बार-बार किए गए कर्मों से महान बनता है।2. अरस्तू — Nicomachean EthicsयूनानीἘσμὲν γὰρ ἃ πολλάκις πράττομεν.TransliterationEsmen gar ha pollakis prattomen.हिन्दी भावार्थहम वही बन जाते हैं जो हम बार-बार करते हैं।अर्थात् सफलता निरन्तर अभ्यास और परिश्रम का परिणाम है।3. हेसिओड — Works and DaysयूनानीΠρὸ τῆς ἀρετῆς ἱδρῶτα θεοὶ προπάροιθεν ἔθηκαν.TransliterationPro tēs aretēs hidrōta theoi proparoithen ethēkan.हिन्दी भावार्थदेवताओं ने उत्कृष्टता और सफलता के मार्ग में पहले पसीना (परिश्रम) रखा है।यह यूनानी साहित्य में परिश्रम पर सबसे प्रसिद्ध कथनों में से एक है।4. एपिक्टेटसयूनानीΟὐδὲν μέγα γίνεται ἄνευ πόνου.TransliterationOuden mega ginetai aneu ponou.हिन्दी भावार्थबिना परिश्रम के कोई महान कार्य नहीं होता।5. डेमोस्थनीज़यूनानीΟἱ πόνοι τῶν ἀγαθῶν πατέρες εἰσίν.TransliterationHoi ponoi tōn agathōn pateres eisin.हिन्दी भावार्थपरिश्रम सभी श्रेष्ठ उपलब्धियों का जनक है।6. सॉक्रेटीस (परम्परागत रूप से उद्धृत)यूनानीΜὴ κάμνε τὸ καλόν πράττων.TransliterationMē kamne to kalon prattōn.हिन्दी भावार्थउत्तम कार्य करते हुए कभी थको मत।यूनानी दर्शन का सबसे प्रसिद्ध प्रमाणहेसिओड – Works and DaysΠρὸ τῆς ἀρετῆς ἱδρῶτα θεοὶ προπάροιθεν ἔθηκαν.TransliterationPro tēs aretēs hidrōta theoi proparoithen ethēkan.हिन्दी अर्थ"देवताओं ने सफलता और उत्कृष्टता के मार्ग में पहले पसीना (परिश्रम) रखा है।"तुलनात्मक दृष्टियह यूनानी शिक्षा वैदिक "तरणिरिज्जयति", गीता के "कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः", महाभारत के "उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः", बौद्ध "अप्पमादेन सम्पादेथ", जैन "मा पमायए", इस्लाम "وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ", और बाइबिल के "The hand of the diligent maketh rich" के समान ही यह प्रतिपादित करती है कि सफलता का मूल आधार पुरुषार्थ, परिश्रम और निरन्तर अभ्यास है। ------+--------+-------+--