एक नगर में जाने किस बात पर दंगा भड़का कि दंगाई खून की होली खेलने लगे। वहां देखते-ही-देखते रक्तरंजित लाशें बिछ गईं। जबरदस्त आगजनी हुई। घर-के-घर फूंक डाले गए। मोटरगाड़ियां धू-धू कर जल उठीं। लाठियां भांजी गई। तलवारें लहराए गए। जमकर पत्थरबाजियां हुई।
प्रशासन ने बेकाबू दंगे को काबू में करने के लिए कर्फ्यू लगा दिया और पूरी ताकत से दबा दिया। कहीं गोली चलाया, कहीं लाठी-डंडे बरसाया, तो कहीं अश्रुगैस के गोले छोड़ दिया।
दंगा शांत होने के बाद एक अर्द्ध विक्षिप्त व्यक्ति नगर घूमने के लिए निकला। वह यह देखकर दंग रह गया कि आज यहां भारी मात्रा में पुलिस और अर्द्ध सैनिक बल हथियार सहित तैनात है। रहवासी इधर-उधर दुबके और सहमे-से हैं।
जो चौराहा कभी गुलजार रहा करता था, वहां सन्नाटा पसरा हुआ है। सब दूर अजीब-सी खामोशी, खौफ व मुर्दनी छाई हुई है।
वह डरते-सहमते व छुपते-छुपाते अल्पसंख्यक इलाके से गुजरने लगा, तो आवाज सुनकर ठिठका। अल्पसंख्यकों के छुटभैये आग-बबूला हुए जा रहे थे। उनका खून खौल रहा था, जो जुबां पर उतर आया था।
उनमें-से एक अंगारे उगल रहा था,‘‘यह चोरी और सीनाजोरी हुई, ककाजान। गलती उन्होंने की। परेशान हो रहे हैं हम। हमने भी चूड़ियां नहीं पहन रखी है। हम ईंट का जवाब पत्थर से देना जानते हैं!’’
नेतानुमा उस मुंछमुंडे के सुर-में-सुर मिलाते हुए सबने समवेत स्वर में कहा,‘‘हम तैयार हैं, भाईजान! अबकी लाश-पर-लाश बिछाकर दम लेंगे।’’
पगला सहम गया और वहां से पतली गली से खिसक लिया। जब वह आगे बड़ा, तब उसे बहुसंख्यकों का इलाका मिला। वहां भी एक गली में जमघट लगा हुआ था और सबके सब गुस्से से उबाल खा रहे थे।
‘‘शुरूआत उन्होंने की; खत्म हम करेंगे। स्सालों को छठी का दूध याद न दिला दिया, तो कहना। ये तो अच्छा हुआ कि प्रशासन बीच-बचाव में आया, वरना आज ही हिसाब नक्की कर देते।’’ एक तिलक-चंदनधारी दांत पीसता लाल-पीला हुआ जा रहा था।
बाप-रे-बाप!! यहां भी वही ज्वाला और शोले! वही चिंगारी और आग के गोले!! वह पगला होने के बावजूद समझ गया कि दंगा क्यों भड़का? क्यों लोग एक-दूसरे के जान के प्यासे हुए?
वह सोचा, ‘अरे, जिस शहर के रहवासियों में सद्भाव, आदरभाव और प्रेमभाव नहीं रहेगा, वहां लोग जरा-जरा सी बात पर आपे से बाहर नहीं होंगे, तो और क्या होगा? वहां मरने-मारने पर उतारू होना, आम बात ही होगा।’
यह सत्य सहोदर भाइयों पर भी लागू होता है। उनमें भी भ्रातृभाव और प्रेमभाव नहीं रहेगा, तो लड़ाई-झगड़ा होगा ही। यही अटल और अकाट्य सत्य है।
सदभावना, सहानुभूति और सामंजस्य के अभाव में एक छत के नीचे रहते हुए भी पति-पत्नी आपस में लड़ते-झगड़ते हैं। कई बार लड़ाइयां तलाक की वजहें बन जाती हैं। अलगाव व विलगाव इसी का नतीजा है।-पागल यही सोचते हुए वहां से तेजी से खिसकने लगा।
सवाल यही कि यह तो एक पागल की सोच है। क्या आम लोगों की सोच भी ऐसी होती है? यदि होती है, तो ठीक है। मेरा मानना है कि दंगे के पीछे उन कट्टरियों का हाथ-बात होता है, जो दोनों ओर और सब दूर हैं।
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