अंधेरों की महिमा Vijay Erry द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अंधेरों की महिमा

अंधेरों की महिमा लेखक: विजय शर्मा ऐरीपंजाब के एक छोटे से गांव रामपुर में एक लड़का रहता था, जिसका नाम अर्जुन था। वह बारहवीं कक्षा का छात्र था और अपनी बहादुरी तथा जिज्ञासु स्वभाव के लिए पूरे गांव में प्रसिद्ध था। उसे रहस्यमयी जगहों की खोज करना बहुत पसंद था।गांव के बाहर एक पुरानी हवेली थी, जिसे लोग "काली हवेली" कहते थे। उस हवेली के बारे में तरह-तरह की कहानियां प्रचलित थीं। कोई कहता कि वहां भूत रहते हैं, कोई कहता कि वहां कोई पुराना खजाना छिपा है।अर्जुन इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।एक दिन उसके दोस्त मोहित, करण और रेखा उसके पास आए।"अर्जुन, क्या तुमने काली हवेली की कहानी सुनी है?" मोहित ने पूछा।"सुन तो रखी है, लेकिन मुझे लगता है कि यह सब लोगों की कल्पना है।" अर्जुन बोला।रेखा बोली, "मेरी दादी कहती हैं कि वहां अंधेरे का जादू रहता है। जो भी रात को वहां जाता है, वह बदलकर लौटता है।"अर्जुन हंस पड़ा।"अगर ऐसा है तो आज रात चलकर देख लेते हैं।"सभी दोस्त एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।"क्या तुम सच में जाओगे?" करण ने घबराते हुए पूछा।"बिल्कुल!"रात के दस बजे चारों दोस्त टॉर्च लेकर काली हवेली की ओर चल पड़े।हवा तेज चल रही थी। पेड़ों की शाखाएं अजीब आवाजें कर रही थीं।दूर कहीं उल्लू बोल रहा था।पुरानी हवेली चांदनी में और भी डरावनी लग रही थी।मुख्य दरवाजा आधा टूटा हुआ था।"मुझे यह जगह बिल्कुल अच्छी नहीं लग रही।" रेखा बोली।"डरो मत, मैं हूं न।" अर्जुन मुस्कराया।वे अंदर चले गए।हवेली के अंदर चारों ओर धूल जमी हुई थी।दीवारों पर मकड़ी के जाले लटक रहे थे।अचानक उन्हें एक पुराना कमरा दिखाई दिया।कमरे के बीचोंबीच एक बड़ा सा काला शीशा रखा था।उस शीशे पर अजीब निशान बने हुए थे।"यह क्या है?" मोहित ने पूछा।अर्जुन आगे बढ़ा।जैसे ही उसने शीशे को छुआ, पूरा कमरा कांपने लगा।अचानक उनकी टॉर्चें बंद हो गईं।चारों ओर घना अंधेरा छा गया।रेखा चीख उठी।"अर्जुन! कुछ दिखाई नहीं दे रहा!"उसी समय एक भारी आवाज गूंजी—"कौन है जो अंधेरे के जादू को जगाने आया है?"चारों दोस्त डर से कांप उठे।अर्जुन ने हिम्मत करके पूछा—"कौन हो तुम?"आवाज फिर गूंजी—"मैं अंधकार का रक्षक हूं। हजार वर्षों से इस हवेली की रक्षा कर रहा हूं।"अचानक काले शीशे से धुएं जैसी आकृति निकली।उसकी आंखें लाल अंगारों की तरह चमक रही थीं।मोहित डरकर पीछे हट गया।"हमें यहां से भागना चाहिए!"लेकिन तभी हवेली का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।"अब तुम लोग तब तक बाहर नहीं जा सकते जब तक परीक्षा पूरी न हो जाए।""कैसी परीक्षा?" अर्जुन ने पूछा।"अंधेरे का जादू केवल साहसी और सच्चे लोगों को स्वीकार करता है।"अचानक चारों दोस्त अलग-अलग कमरों में पहुंच गए।अर्जुन ने खुद को एक लंबे गलियारे में पाया।चारों ओर घना अंधेरा था।तभी उसे अपने बचपन की आवाजें सुनाई देने लगीं।वह अपने जीवन के डरावने क्षण देखने लगा।उसे वह दिन याद आया जब वह नदी में डूबते-डूबते बचा था।उसकी धड़कन तेज हो गई।फिर एक आवाज आई—"डर से भागोगे या उसका सामना करोगे?"अर्जुन ने आंखें बंद कीं।"मैं डर से नहीं भागूंगा।"इतना कहते ही वह दृश्य गायब हो गया।दूसरी ओर मोहित को सोने और हीरों का पहाड़ दिखाई दिया।आवाज आई—"अगर तुम अपने दोस्तों को छोड़ दो, तो यह सब तुम्हारा हो सकता है।"मोहित लालच में पड़ गया।लेकिन फिर उसे अर्जुन की दोस्ती याद आई।उसने कहा—"मुझे अपने दोस्त चाहिए, यह दौलत नहीं।"तुरंत सोना गायब हो गया।रेखा के सामने उसकी सबसे बड़ी कमजोरी आई।उसे हमेशा असफल होने का डर रहता था।उसके सामने परीक्षा का परिणाम आया जिसमें वह फेल हो गई थी।वह रोने लगी।तभी आवाज आई—"क्या हार मान लोगी?"रेखा ने आंसू पोंछे।"नहीं! असफलता अंत नहीं होती।"दृश्य गायब हो गया।करण के सामने उसके परिवार की झूठी तस्वीरें दिखाई गईं।उसे लगा कि उसके माता-पिता मुसीबत में हैं।लेकिन उसने ध्यान से देखा।कुछ गड़बड़ थी।"यह सच नहीं हो सकता।"जैसे ही उसने सच पहचाना, भ्रम टूट गया।कुछ ही क्षणों बाद चारों दोस्त फिर उसी कमरे में पहुंच गए।काला रक्षक उनके सामने खड़ा था।उसकी आंखों की चमक अब पहले जैसी भयानक नहीं थी।"तुम लोगों ने पहली परीक्षा पार कर ली है।"अर्जुन ने पूछा—"अब क्या होगा?"रक्षक बोला—"अब अंतिम परीक्षा होगी।"अचानक पूरा कमरा काले धुएं से भर गया।धुएं से एक विशाल दैत्य प्रकट हुआ।उसके हाथ तलवारों जैसे बड़े थे।वह गरजा—"मैं अंधेरे का स्वामी हूं!"रेखा डर गई।"हम इसका मुकाबला कैसे करेंगे?"रक्षक बोला—"याद रखो, अंधेरा कभी प्रकाश को नहीं हरा सकता।"अर्जुन ने चारों ओर देखा।उसे कमरे के कोने में एक पुराना दीपक दिखाई दिया।वह दौड़कर दीपक के पास पहुंचा।लेकिन दीपक बुझा हुआ था।"इसे कैसे जलाएं?" उसने पूछा।तभी उसे अपनी दादी की बात याद आई—"सच्चाई, साहस और प्रेम सबसे बड़ा प्रकाश हैं।"अर्जुन ने अपने दोस्तों का हाथ पकड़ लिया।मोहित, रेखा और करण भी उसके साथ खड़े हो गए।चारों ने एक-दूसरे पर विश्वास किया।उसी क्षण दीपक अपने आप जल उठा।उससे निकलने वाला प्रकाश पूरे कमरे में फैल गया।दैत्य दर्द से चिल्लाने लगा।"नहीं! यह असंभव है!"प्रकाश बढ़ता गया।धीरे-धीरे दैत्य धुएं में बदल गया और गायब हो गया।पूरा कमरा चमक उठा।काला शीशा टूट गया।अंधेरे का जादू समाप्त हो चुका था।रक्षक मुस्कराया।अब उसका चेहरा शांत और दयालु दिखाई दे रहा था।"हजार वर्षों से मैं इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था।"अर्जुन ने पूछा—"तुम कौन हो?"रक्षक बोला—"मैं कभी इस हवेली का मालिक था। लालच और अहंकार ने मुझे अंधेरे की शक्ति के पीछे भागने पर मजबूर कर दिया। उसी का परिणाम यह श्राप था।""और अब?""अब तुम लोगों ने मुझे मुक्त कर दिया है।"यह कहते ही उसकी आकृति प्रकाश में बदल गई।कुछ क्षण बाद हवेली कांपने लगी।"भागो!" अर्जुन चिल्लाया।चारों दोस्त बाहर की ओर दौड़ पड़े।जैसे ही वे हवेली से बाहर निकले, पीछे मुड़कर देखा।पुरानी काली हवेली धीरे-धीरे धूल में बदल रही थी।सूरज की पहली किरणें क्षितिज पर दिखाई दे रही थीं।मोहित मुस्कराया।"लगता है रात खत्म हो गई।"रेखा बोली—"और अंधेरे का जादू भी।"अर्जुन आसमान की ओर देखने लगा।उसे महसूस हुआ कि असली जादू अंधेरे में नहीं, बल्कि उस साहस में था जो इंसान को अपने डर, लालच और कमजोरियों से लड़ने की शक्ति देता है।उस दिन के बाद चारों दोस्त गांव के हीरो बन गए।लेकिन उन्होंने किसी को पूरी कहानी नहीं बताई।लोग आज भी काली हवेली की जगह पर बने खाली मैदान को देखकर हैरान होते हैं।और जब कभी रात बहुत अंधेरी होती है, तो कुछ बुजुर्ग मुस्कराकर कहते हैं—"अंधेरे का जादू खत्म हो गया है, क्योंकि कुछ बहादुर बच्चों ने प्रकाश पर विश्वास करना सीख लिया था।"समाप्त.