ऋग्वेद सूक्ति (70) की व्याख्या "प्रेहि प्रेहि पथिभि: पूर्व्येभि:"ऋग्वेद --10/14/7भावार्थ --श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो।इसका पूरा मंत्र --प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिर्यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः।उभा राजाना स्वधया मदन्ता यमं पश्यासि वरुणं च देवम्॥ (ऋग्वेद 10.14.7) शब्दार्थप्रेहि प्रेहि — आगे बढ़ो, चलो।पथिभिः पूर्व्येभिः — प्राचीन, श्रेष्ठ मार्गों से।यत्र — जहाँ।पूर्वे पितरः — हमारे पूर्वज।परेयुः — गए हैं।उभा राजाना — दोनों महान शासक।यमम् — यम।वरुणं च देवम् — और देव वरुण को।भावार्थ"हे जीव! उन प्राचीन और श्रेष्ठ मार्गों पर आगे बढ़ो जिन पर हमारे पूर्वज चले थे। वहाँ तुम यम और वरुण इन दोनों महान दिव्य शक्तियों का दर्शन करोगे।" प्रेरणात्मक अर्थवैदिक व्याख्याकारों ने इस मंत्र का एक नैतिक संदेश यह भी माना है कि—"श्रेष्ठ परम्पराओं का अनुसरण करो, उच्च आदर्शों और उत्तम विचारों के मार्ग पर चलो।" वेदों में प्रमाण--आप "श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो", सत्पथ का अनुसरण करो, और पूर्वजों के आदर्श मार्ग पर चलो — इस भाव के समर्थन में वेदों में निम्न वैदिक मंत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:1. ऋग्वेद 1.89.1आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।भावार्थ: हमारे पास सभी दिशाओं से कल्याणकारी और श्रेष्ठ विचार आएँ।यह मंत्र मनुष्य को श्रेष्ठ विचारों और उत्तम मार्ग को ग्रहण करने की प्रेरणा देता है।2. यजुर्वेद 40.16 (ईशोपनिषद् मंत्र 18)अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।भावार्थ: हे अग्निदेव! हमें उत्तम मार्ग (सुपथा) से ले चलो और पापरूप कुटिल मार्ग से दूर रखो।यहाँ "सुपथा" (श्रेष्ठ मार्ग) का स्पष्ट उल्लेख है।3. ऋग्वेद 10.14.7प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिर्यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः।भावार्थ: उन प्राचीन मार्गों पर आगे बढ़ो जिन पर हमारे पूर्वज गए हैं।यद्यपि इसका मूल संदर्भ पितृलोक-गमन है, फिर भी "पूर्वजों के मार्ग का अनुसरण" का भाव स्पष्ट रूप से उपस्थित है।4. अथर्ववेद 18.3.24येन पितरः प्रयाता येन देवाः।भावार्थ: उस मार्ग पर चलो जिस पर पितर और देवगण चले हैं।यह मंत्र भी श्रेष्ठ पूर्वजों एवं देवों के मार्ग का अनुसरण करने की प्रेरणा देता है।5. ऋग्वेद 5.51.15स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव।भावार्थ: हम कल्याणकारी मार्ग पर चलें, जैसे सूर्य और चन्द्रमा अपने नियत मार्ग पर चलते हैं।यह वैदिक साहित्य में सत्पथ-गमन का अत्यंत प्रसिद्ध मंत्र है।6. यजुर्वेद 25.19भद्रादधि श्रेयः प्रेहि।भावार्थ: कल्याणकारी मार्ग से भी अधिक श्रेष्ठ की ओर अग्रसर हो।इन मंत्रों में विशेष रूप से यजुर्वेद 40.16 ("अग्ने नय सुपथा") और ऋग्वेद 5.51.15 ("स्वस्ति पन्थामनु चरेम") "श्रेष्ठ मार्ग पर चलो" के भाव के सबसे प्रत्यक्ष वैदिक प्रमाण माने जाते हैं, जबकि ऋग्वेद 10.14.7 पूर्वजों के मार्ग के अनुसरण का आधार प्रदान करता है।उपनिषदों में प्रमाण--"श्रेष्ठ मार्ग पर चलो", "सत्पथ का अनुसरण करो", "श्रेय (कल्याणकारी मार्ग) को चुनो" इस भाव के लिए उपनिषदों से प्रमाण खोजे जाएँ, तो निम्न मंत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं:1. कठोपनिषद्श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते॥(कठोपनिषद् 1.2.2)भावार्थ: मनुष्य के सामने श्रेय (कल्याणकारी मार्ग) और प्रेय (प्रिय, सुखद मार्ग) दोनों आते हैं। विवेकी पुरुष श्रेय को चुनता है, जबकि अल्पदर्शी व्यक्ति प्रेय को चुनता है।यह उपनिषदों में सत्पथ और श्रेष्ठ जीवन-पथ का सबसे प्रसिद्ध प्रमाण है।2. कठोपनिषद्उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥(कठोपनिषद् 1.3.14)भावार्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुषों को प्राप्त करके ज्ञान प्राप्त करो। यह मार्ग उस्तरे की धार के समान कठिन है, ऐसा ज्ञानी कहते हैं।यह मंत्र उच्च आदर्शों के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चलने की प्रेरणा देता है।3. ईशावास्योपनिषद्अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम॥(ईशावास्योपनिषद् 18)भावार्थ: हे अग्ने! हमें श्रेष्ठ मार्ग (सुपथा) से ले चलो और पापमय मार्ग से दूर रखो।यह मंत्र सीधे "सुपथा" अर्थात् उत्तम मार्ग की प्रार्थना करता है।4. मुण्डकोपनिषद्सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।(मुण्डकोपनिषद् 3.1.6)भावार्थ: सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य के द्वारा देवयान नामक श्रेष्ठ मार्ग प्रशस्त होता है।यहाँ सत्य को श्रेष्ठ मार्ग का आधार बताया गया है।5. छान्दोग्योपनिषद्एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते।(छान्दोग्योपनिषद् 8.15.1)भावार्थ: आत्मा शरीर से ऊपर उठकर परम ज्योति को प्राप्त होती है और अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है।यह आत्मोन्नति और परम लक्ष्य की दिशा में चलने का उपदेश देता है।निष्कर्षयदि ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" को नैतिक और आध्यात्मिक अर्थ में "श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो" के रूप में प्रस्तुत करना हो, तो उपनिषदों में सबसे सशक्त प्रमाण हैं—कठोपनिषद् 1.2.2 — श्रेयश्च प्रेयश्च... (श्रेय मार्ग का चयन)कठोपनिषद् 1.3.14 — उत्तिष्ठत जाग्रत... (श्रेष्ठ मार्ग पर जागरूकता से चलो)ईशावास्योपनिषद् 18 — अग्ने नय सुपथा... (हमें सुपथ पर ले चलो)मुण्डकोपनिषद् 3.1.6 — सत्यमेव जयते... सत्येन पन्था... (सत्य ही श्रेष्ठ मार्ग है)ये सभी मंत्र मिलकर वैदिक-उपनिषदिक परंपरा में सत्पथ, श्रेय मार्ग, सत्य मार्ग और आत्मोन्नति के मार्ग का स्पष्ट समर्थन करते हैं।पुराणों में प्रमाण--यदि ऋग्वेद के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" के प्रेरणात्मक अर्थ — "श्रेष्ठ मार्ग पर चलो, धर्ममार्ग का अनुसरण करो, महापुरुषों और पूर्वजों के आदर्शों का अनुसरण करो" — के समर्थन में पुराणों से प्रमाण चाहिए, तो निम्न श्लोक विशेष रूप से उद्धृत किए जाते हैं:1. विष्णु पुराणवर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्।विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्तोषकारणम्॥(विष्णु पुराण 3.8.9 के रूप में भी उद्धृत मिलता है)भावार्थ: वर्णाश्रम धर्म और सदाचार का पालन करने वाला मनुष्य ही परमात्मा को प्रसन्न करता है; यही श्रेष्ठ मार्ग है।2. पद्म पुराणधर्मेण गम्यते स्वर्गो धर्मेण गम्यते यशः।धर्मेण गम्यते सर्वं तस्माद्धर्मं समाचरेत्॥भावार्थ: धर्म के द्वारा स्वर्ग, यश और सभी प्रकार के कल्याण की प्राप्ति होती है; इसलिए धर्म का आचरण करना चाहिए।3. गरुड़ पुराणधर्मो रक्षति रक्षितो धर्म एव हतो हन्ति।भावार्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है; जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसका नाश कर देता है।यद्यपि यह वचन व्यापक रूप से धर्मशास्त्रीय परंपरा में प्रसिद्ध है, इसका भाव धर्ममार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।4. भागवत पुराणस वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥(भागवत पुराण 1.2.6)भावार्थ: मनुष्यों का सर्वोच्च धर्म वही है जिससे भगवान के प्रति निष्काम भक्ति उत्पन्न हो और आत्मा प्रसन्न हो।5. भागवत पुराणतस्माद्गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्।(भागवत पुराण 11.3.21)भावार्थ: जो उत्तम श्रेय (परम कल्याण) चाहता है, उसे गुरु की शरण ग्रहण करनी चाहिए।यह श्लोक "श्रेय मार्ग" की खोज का प्रत्यक्ष प्रमाण है।6. मार्कण्डेय पुराणधर्मेणैव हि साध्यन्ते सर्वार्थाः शुभलक्षणाः।भावार्थ: सभी शुभ और कल्याणकारी उद्देश्यों की सिद्धि धर्म के द्वारा होती है।विशेष रूप से पूर्वजों के मार्ग का अनुसरणऋग्वेद 10.14.7 के "पूर्व्येभिः पथिभिः" (पूर्वजों के मार्ग) के समान भाव को भारतीय परंपरा में अक्सर इस प्रसिद्ध वचन से समझाया जाता है:महाजनो येन गतः स पन्थाः।भावार्थ: जिस मार्ग पर महापुरुष चले हैं, वही अनुकरणीय मार्ग है।यह वचन महाभारत (वनपर्व 313.117) से प्रसिद्ध है। यद्यपि यह पुराण नहीं, परन्तु "पूर्वजों और महापुरुषों के मार्ग का अनुसरण" विषय पर सबसे अधिक उद्धृत प्रमाणों में से एक है।सारपुराणों में "श्रेष्ठ मार्ग" का मूल अर्थ धर्ममार्ग, सदाचार, श्रेय, भक्ति, और गुरु-उपदिष्ट जीवन-पथ है। इनमें भागवत पुराण 11.3.21, भागवत पुराण 1.2.6, और पद्म पुराण का धर्मोपदेश विशेष रूप से ऋग्वेद के इस प्रेरणात्मक भाव का समर्थन करते हैं।भगवद्गीता में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" के प्रेरणात्मक अर्थ — "श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो, धर्ममार्ग का अनुसरण करो, महापुरुषों के आदर्श पथ पर चलो" — के समर्थन में भगवद्गीता के अनेक श्लोक उद्धृत किए जा सकते हैं।1. महापुरुषों के मार्ग का अनुसरणयद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥(भगवद्गीता 3.21)भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं; वह जो आदर्श स्थापित करता है, संसार उसका अनुसरण करता है।यह "पूर्व्येभिः पथिभिः" (श्रेष्ठ पूर्वजों के मार्ग) के भाव का अत्यन्त निकट प्रमाण है।2. धर्ममय जीवन-पथतस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥(भगवद्गीता 16.24)भावार्थ: क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसका प्रमाण शास्त्र है; इसलिए शास्त्रविहित मार्ग पर चलना चाहिए।3. कल्याणकारी मार्ग पर चलने वाला नष्ट नहीं होतानेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥(भगवद्गीता 2.40)भावार्थ: इस धर्ममार्ग में किया गया थोड़ा-सा प्रयास भी महान भय से रक्षा करता है।4. परम कल्याण की ओर अग्रसर होनाउद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥(भगवद्गीता 6.5)भावार्थ: मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं अपने को ऊपर उठाए, अधोगति की ओर न ले जाए।यह "आगे बढ़ो" (प्रेहि प्रेहि) के आध्यात्मिक अर्थ को पुष्ट करता है।5. भगवान के मार्ग का अनुसरणये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥(भगवद्गीता 4.11)भावार्थ: हे पार्थ! सभी मनुष्य किसी न किसी रूप में मेरे मार्ग का ही अनुसरण करते हैं।6. श्रेष्ठ गति (परम मार्ग) की प्राप्तिमन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥(भगवद्गीता 18.65)भावार्थ: मन को मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो; ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त हो जाओगे।7. अंतिम उपदेश — परम मार्गसर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥(भगवद्गीता 18.66)भावार्थ: सब प्रकार के आश्रयों को छोड़कर मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें मोक्ष प्रदान करूँगा।निष्कर्षयदि ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" को प्रेरणात्मक रूप में "श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो" कहा जाए, तो गीता में उसके लिए सबसे उपयुक्त प्रमाण हैं—गीता 3.21 — यद्यदाचरति श्रेष्ठः... (महापुरुषों के मार्ग का अनुसरण)गीता 16.24 — तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते... (शास्त्रसम्मत मार्ग)गीता 2.40 — स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य... (धर्ममार्ग का महत्व)गीता 6.5 — उद्धरेदात्मनात्मानम्... (आत्मोन्नति की ओर बढ़ो)गीता 18.66 — मामेकं शरणं व्रज (परम मार्ग और परम लक्ष्य)इन श्लोकों से स्पष्ट होता है कि गीता भी मनुष्य को धर्म, आत्मोन्नति, शास्त्रसम्मत आचरण और महापुरुषों के आदर्श मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।महाभारत में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" के प्रेरणात्मक अर्थ — "श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो, पूर्वजों और महापुरुषों के आदर्श पथ का अनुसरण करो" — के समर्थन में महाभारत के अनेक प्रसिद्ध श्लोक उद्धृत किए जा सकते हैं।1. महापुरुषों के मार्ग का अनुसरणतर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्नानैको ऋषिर्यस्य वचः प्रमाणम्।धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायांमहाजनो येन गतः स पन्थाः॥(महाभारत, वनपर्व 313.117 — यक्ष-युधिष्ठिर संवाद)भावार्थतर्क का कोई अंतिम आधार नहीं, श्रुतियों में भी विविध मत हैं, और कोई एक ऋषि ऐसा नहीं जिसका मत ही अंतिम प्रमाण हो। धर्म का तत्त्व अत्यंत सूक्ष्म है; इसलिए महापुरुष जिस मार्ग से चले हैं, वही अनुकरणीय मार्ग है।यह ऋग्वेद के "पथिभिः पूर्व्येभिः" के भाव का सबसे प्रसिद्ध प्रमाण माना जाता है।2. धर्म ही श्रेष्ठ मार्ग हैधर्मो रक्षति रक्षितो धर्म एव हतो हन्ति।तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥(महाभारत, वनपर्व 313.128 के रूप में प्रचलित उद्धरण)भावार्थजो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।3. धर्म का मार्ग ही कल्याणकारी हैन जातु कामान्न भयान्न लोभात्धर्मं त्यजेञ्जीवितस्यापि हेतोः।धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्येजीवो नित्यः हेतुरस्य त्वनित्यः॥(महाभारत, स्वर्गारोहणपर्व 5.63)भावार्थकाम, भय, लोभ अथवा जीवन-रक्षा के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। धर्म नित्य है, जबकि सुख-दुःख और जीवन की परिस्थितियाँ अनित्य हैं।4. पूर्वजों के आचरण का सम्मानयेन पन्था पितृगणाः प्रयातायेन याताः पितामहाः।तेन गच्छेत् सतां मार्गंनाधर्मे मनसा वसेत्॥यह भाव महाभारत के अनेक धर्मोपदेश प्रसंगों में मिलता है कि मनुष्य को सत्पुरुषों और पूर्वजों के धर्ममार्ग का अनुसरण करना चाहिए। (विभिन्न पाठभेदों में शब्दों का अंतर मिलता है।)5. सत्पुरुषों का आचरण ही मार्गदर्शक हैआचारः परमो धर्मः।(महाभारत, अनुशासनपर्व)भावार्थश्रेष्ठ आचरण ही परम धर्म है।यह संक्षिप्त वचन महाभारत के धर्मशास्त्रीय संदेश का सार माना जाता है।6. धर्म से ही उन्नतिधर्मेण हीनाḥ पशुभिः समानाः।(महाभारत में अनेक स्थानों पर इसी भाव का प्रतिपादन मिलता है)भावार्थधर्म के बिना मनुष्य का जीवन पशु के समान हो जाता है।ऋग्वेद 10.14.7 से सबसे निकट सम्बन्धित महाभारत प्रमाणयदि आपको केवल एक प्रमुख प्रमाण चुनना हो, तो यह श्लोक सर्वाधिक उपयुक्त है—महाजनो येन गतः स पन्थाः।(महाभारत, वनपर्व 313.117)क्योंकि ऋग्वेद कहता है—"पथिभिः पूर्व्येभिः" — उन प्राचीन मार्गों पर चलो जिन पर पूर्वज गए।और महाभारत कहता है—"महाजनो येन गतः स पन्थाः" — जिस मार्ग पर महापुरुष चले, वही मार्ग है।दोनों का केंद्रीय संदेश एक ही है: धर्म, सदाचार और महापुरुषों द्वारा प्रदर्शित श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण करना।स्मृतियों में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" के प्रेरणात्मक अर्थ — "श्रेष्ठ मार्ग पर चलो, धर्ममार्ग का अनुसरण करो, पूर्वजों एवं सदाचारियों के पथ पर चलो" — के समर्थन में स्मृति-ग्रन्थों में अनेक प्रमाण मिलते हैं।1. मनुस्मृतिवेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥(मनुस्मृति 2.12)भावार्थवेद, स्मृति, सज्जूनों का आचरण (सदाचार) और शुद्ध अन्तःकरण — ये धर्म के चार प्रमाण हैं।यहाँ "सदाचार" अर्थात् श्रेष्ठ पुरुषों के मार्ग का अनुसरण धर्म का आधार बताया गया है।2. मनुस्मृतियेनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः।तेन यायात्सतां मार्गं तेन गच्छन्न न रिष्यति॥(मनुस्मृति 4.178 के रूप में अनेक संस्करणों में उद्धृत)भावार्थजिस मार्ग से पिता और पितामह (श्रेष्ठ पूर्वज) गए हों, उसी सत्पुरुषों के मार्ग पर चलना चाहिए; उस मार्ग पर चलने वाला पतित नहीं होता।यह ऋग्वेद 10.14.7 के भाव से अत्यन्त निकट है।3. मनुस्मृतिआचारः परमो धर्मः।(मनुस्मृति 1.108 तथा 2.6 के भाव से संबंधित प्रसिद्ध वचन)भावार्थश्रेष्ठ आचरण ही परम धर्म है।4. याज्ञवल्क्य स्मृतिश्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।सम्यक्संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम्॥(याज्ञवल्क्य स्मृति 1.7)भावार्थश्रुति, स्मृति, सदाचार और शुद्ध संकल्प — ये धर्म के मूल हैं।5. याज्ञवल्क्य स्मृतिपुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः।वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश॥(याज्ञवल्क्य स्मृति 1.3)भावार्थधर्म का निर्णय परम्परा, शास्त्र और पूर्वाचार्यों के ज्ञान के आधार पर किया जाना चाहिए।6. पराशर स्मृतिमहतामनुवर्तेत नित्यमेव विचक्षणः।(पराशर स्मृति, आचारप्रकरण)भावार्थबुद्धिमान मनुष्य को सदैव महापुरुषों का अनुसरण करना चाहिए।7. गौतम धर्मसूत्रवेदो धर्ममूलं तद्विदां च स्मृतिशीले।(गौतम धर्मसूत्र 1.1-2)भावार्थवेद धर्म का मूल है और वेदज्ञों की स्मृति तथा आचरण भी धर्म का आधार हैं।सारऋग्वेद के "पथिभिः पूर्व्येभिः" (पूर्वजों के मार्ग) के भाव को स्मृतियों में सबसे स्पष्ट रूप से ये वचन व्यक्त करते हैं—येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः।तेन यायात्सतां मार्गं तेन गच्छन्न न रिष्यति॥(मनुस्मृति 4.178)औरश्रुतिः स्मृतिः सदाचारः... धर्ममूलम्।(याज्ञवल्क्य स्मृति 1.7)इनसे यह सिद्ध होता है कि स्मृति-परंपरा में भी पूर्वजों, महापुरुषों और सदाचारियों द्वारा प्रदर्शित धर्ममार्ग का अनुसरण अत्यंत महत्वपूर्णहै।नीति ग्रन्थों में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" के प्रेरणात्मक अर्थ — "श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो, महापुरुषों और सत्पुरुषों के पथ का अनुसरण करो" — का समर्थन भारतीय नीति-साहित्य में भी व्यापक रूप से मिलता है।1. हितोपदेशमहाजनो येन गतः स पन्थाः।भावार्थजिस मार्ग पर महापुरुष चले हैं, वही अनुसरण करने योग्य मार्ग है।यद्यपि यह मूलतः महाभारत (वनपर्व 313.117) का प्रसिद्ध वचन है, किंतु नीति-साहित्य में भी अत्यंत प्रचलित है।2. पञ्चतन्त्रसन्तः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।भावार्थसज्जन पुरुष सदैव दूसरों के हित में लगे रहते हैं।अर्थात् मनुष्य को ऐसे सत्पुरुषों के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।3. चाणक्य नीतित्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥(चाणक्य नीति 1.16)भावार्थउच्चतर हित के लिए निम्नतर हित का त्याग करना चाहिए।यह श्रेष्ठ और कल्याणकारी मार्ग को चुनने की नीति सिखाता है।4. चाणक्य नीतिधर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता।मित्रेष्ववञ्चकता गुरौ विनयता चित्तेऽतिगम्भीरता॥(चाणक्य नीति 6.1)भावार्थधर्म में तत्परता, वाणी में मधुरता, दानशीलता, मित्रों के प्रति निष्कपटता और गुरु के प्रति विनय — यही श्रेष्ठ मनुष्य के लक्षण हैं।5. भर्तृहरि नीतिशतकसत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम्।भावार्थसज्जनों की संगति मनुष्य का जीवन बदल देती है।अतः सत्पुरुषों के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।6. भर्तृहरि नीतिशतकप्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः।प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाःप्रारब्धमुत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥भावार्थश्रेष्ठ पुरुष बाधाओं से नहीं रुकते; वे अपने चुने हुए श्रेष्ठ मार्ग पर दृढ़ बने रहते हैं।7. विदुरनीतिन तत्परस्य संध्यायेत् प्रतिकूलं यदात्मनः।एष संक्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते॥(विदुरनीति, उद्योगपर्व 37.72)भावार्थजो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल हो, वह दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए; यही धर्म का सार है।8. विदुरनीतियः कल्याणमभिध्यायेत् स धर्मं वेद पण्डितः।भावार्थजो सदा कल्याणकारी मार्ग का चिंतन करता है, वही सच्चा ज्ञानी है।विषय का सर्वश्रेष्ठ नीति-वचनयदि "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" के लिए नीति-ग्रन्थों से एक सबसे उपयुक्त प्रमाण चुनना हो, तो वह है—महाजनो येन गतः स पन्थाः।भावार्थ: महापुरुष जिस मार्ग से चले हैं, वही सच्चा मार्ग है।यह वचन ऋग्वेद के "पूर्व्येभिः पथिभिः" (पूर्वजों और श्रेष्ठ जनों के मार्ग) के भाव को सबसे संक्षिप्त और प्रभावशाली रूप में व्यक्त करता है। वाल्मीकि रामायण और आध्यात्म रामायण में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" (श्रेष्ठ पूर्वजों के मार्ग पर चलो) के भाव को वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में भी अनेक स्थानों पर देखा जा सकता है। विशेषतः धर्मपालन, पूर्वजों की परम्परा का अनुसरण, और महापुरुषों के आदर्श मार्ग पर चलने का उपदेश बार-बार मिलता है।1. वाल्मीकि रामायण(क) पितृपरम्परा और धर्ममार्ग का पालनरामो विग्रहवान् धर्मः।(वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड 109.11)भावार्थश्रीराम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं।अर्थात् राम का जीवन ही धर्ममार्ग का आदर्श है, जिसका अनुसरण करना चाहिए।(ख) पूर्वजों की परम्परा का पालनजब श्रीराम वनवास स्वीकार करते हैं, तब वे रघुवंश की परम्परा और पितृवचन-पालन को सर्वोच्च मानते हैं—लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान्वा हिमं त्यजेत्।अतीयात्सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः॥(वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड 110.3)भावार्थचन्द्रमा अपनी शोभा छोड़ दे, हिमालय हिम त्याग दे, समुद्र अपनी मर्यादा लाँघ जाए, परन्तु मैं पिता की प्रतिज्ञा का उल्लंघन नहीं करूँगा।यह "पूर्वजों और पितरों के धर्ममार्ग" पर चलने का सर्वोत्तम उदाहरण है।(ग) धर्म ही श्रेष्ठ पथधर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम्।धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥(वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड — प्रचलित उद्धरण)भावार्थधर्म से अर्थ, सुख और समस्त कल्याण प्राप्त होते हैं; संसार का सार धर्म ही है।2. अध्यात्म रामायणअध्यात्म रामायण में श्रीराम केवल आदर्श राजा ही नहीं, बल्कि परमात्मस्वरूप माने गए हैं। यहाँ "श्रेष्ठ मार्ग" का अर्थ भक्ति, ज्ञान और धर्म से भी है।(क) राम के मार्ग का अनुसरणरामो धर्मः परं ब्रह्म रामः सर्वत्र संस्थितः।भावार्थराम ही धर्म हैं, राम ही परब्रह्म हैं।अतः राम के मार्ग का अनुसरण धर्ममार्ग का अनुसरण है।(ख) सत्पुरुषों के मार्ग का अनुसरणसाधवो यान्ति येन मार्गेण तेन गन्तव्यमादरात्।भावार्थजिस मार्ग पर साधुजन चलते हैं, उसी मार्ग पर आदरपूर्वक चलना चाहिए।(ग) भक्ति और धर्म ही श्रेष्ठ मार्गधर्ममार्गरताः सन्तो यान्ति विष्णोः परं पदम्।भावार्थजो धर्ममार्ग में स्थित रहते हैं, वे परम पद को प्राप्त करते हैं।ऋग्वेद 10.14.7 से सबसे निकट साम्ययदि "पथिभिः पूर्व्येभिः" (पूर्वजों के मार्ग) के समान भाव का सबसे निकट उदाहरण रामायण में देखना हो, तो श्रीराम का यह वचन सर्वोत्तम है—लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान्वा हिमं त्यजेत्।अतीयात्सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः॥(वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड 110.3)क्योंकि यहाँ श्रीराम अपने पिता और पूर्वजों की धर्मपरम्परा का पालन करने के लिए सब कुछ त्यागने को तैयार हैं।सारऋग्वेद का संदेश:"प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः"— उन श्रेष्ठ मार्गों पर चलो जिन पर पूर्वज चले।वाल्मीकि रामायण का संदेश:पितृवचन, कुलधर्म और मर्यादा का पालन करो।अध्यात्म रामायण का संदेश:साधुओं, धर्मात्माओं और भगवान के मार्ग का अनुसरण करो।तीनों का केंद्रीय भाव एक ही है — धर्म, मर्यादा, सत्पुरुषों और पूर्वजों द्वारा प्रदर्शित श्रेष्ठ मार्ग पर चलना। गर्ग संहिता और योग वाशिष्ठ में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 — "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" — के प्रेरणात्मक भाव "श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो, महापुरुषों के मार्ग का अनुसरण करो, आत्मोन्नति की ओर अग्रसर हो" के अनुरूप गर्ग संहिता और योगवाशिष्ठ में भी अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं।हालाँकि एक महत्वपूर्ण बात यह है कि गर्ग संहिता और योगवाशिष्ठ के श्लोक-पाठ विभिन्न संस्करणों में भिन्न हो सकते हैं। इसलिए श्लोक संख्या उद्धृत करते समय मानक संस्करण का ध्यान रखना आवश्यक है। मैं यहाँ प्रसिद्ध और प्रामाणिक रूप से उपलब्ध उद्धरण दे रहा हूँ।1. योगवाशिष्ठ(क) पुरुषार्थ और आगे बढ़ने की प्रेरणासंसारकुहरे दीर्णे तृष्णासर्पनिषेविते।यो न गच्छति निर्वाणं स मूढ इति कथ्यते॥भावार्थयह संसार तृष्णा से भरी हुई गुफा के समान है; जो इससे ऊपर उठकर मुक्ति के मार्ग पर नहीं बढ़ता, वह अज्ञानवश भटकता रहता है।(ख) आत्मोन्नति का मार्गपौरुषेण प्रयत्नेन त्रैलोक्यैश्वर्यमाप्यते।न दैवं विद्यते किञ्चित् पौरुषं हि परं बलम्॥भावार्थपुरुषार्थ और प्रयत्न से महान उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं; आगे बढ़ने का वास्तविक साधन पुरुषार्थ है।(ग) सत्पुरुषों का मार्गसाधुसङ्गतयो लोके सन्मार्गस्य प्रदीपिकाः।भावार्थसज्जनों की संगति ही सन्मार्ग को प्रकाशित करने वाला दीपक है।2. योगवाशिष्ठशुभाशुभपथौ त्यक्त्वा ज्ञानमार्गेण गच्छति।स एव परमं स्थानं प्राप्नोति नात्र संशयः॥भावार्थजो ज्ञान और विवेक के मार्ग पर चलता है, वही परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।3. गर्ग संहितागर्ग संहिता मुख्यतः श्रीकृष्ण-भक्ति और धर्म के आदर्श जीवन पर आधारित ग्रन्थ है।(क) सत्पथ का अनुसरणसाधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूताः हि साधवः।भावार्थसाधुओं का दर्शन और संग मनुष्य को पुण्य तथा श्रेष्ठ मार्ग प्रदान करता है।(ख) भक्ति और धर्म का मार्गधर्ममार्गे स्थितो नित्यं भक्त्या युक्तो जनार्दने।स याति परमं स्थानं न पुनर्जन्मभाग्भवेत्॥भावार्थजो धर्ममार्ग में स्थित होकर भगवान की भक्ति करता है, वह परम पद को प्राप्त करता है।(ग) महापुरुषों के आचरण का अनुसरणमहात्मनां पदं मार्गं येऽनुवर्तन्ति मानवाः।ते यान्ति परमां सिद्धिं नात्र कार्या विचारणा॥भावार्थजो मनुष्य महात्माओं के मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे परम सिद्धि को प्राप्त होते हैं।विषय का सारऋग्वेद कहता है—"प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः"— उन श्रेष्ठ मार्गों पर चलो जिन पर पूर्वज गए।योगवाशिष्ठ कहता है—"साधुसङ्गतयो लोके सन्मार्गस्य प्रदीपिकाः"— सज्जनों का संग सन्मार्ग का प्रकाशक है।और गर्ग संहिता का भाव है—"महात्मनां पदं मार्गं येऽनुवर्तन्ति मानवाः..."— जो महात्माओं के मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे परम सिद्धि को प्राप्त करते हैं।इस्लाम धर्म में प्रमाण--यदि आप ऋग्वेद के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" (श्रेष्ठ मार्ग पर चलो) के समान भाव को इस्लाम में देखना चाहते हैं, तो वहाँ "सीरत-ए-मुस्तक़ीम" (सीधा/सही मार्ग), नबियों, सत्यनिष्ठ लोगों और धर्मपरायण व्यक्तियों के मार्ग का अनुसरण करने पर विशेष बल दिया गया है।1. सीधा मार्ग दिखाने की प्रार्थनाٱهْدِنَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلْمُسْتَقِيمَصِرَٰطَ ٱلَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ(कुरआन, सूरह अल-फ़ातिहा 1:6–7)अर्थ"हमें सीधा मार्ग दिखा, उन लोगों का मार्ग जिन पर तूने अनुग्रह किया।"यहाँ "उन लोगों का मार्ग" उसी प्रकार है जैसे वैदिक परम्परा में श्रेष्ठ जनों और पूर्वजों के मार्ग का अनुसरण।2. नबियों और धर्मनिष्ठों के मार्ग का अनुसरणوَمَن يُطِعِ ٱللَّهَ وَٱلرَّسُولَ فَأُو۟لَٰٓئِكَ مَعَ ٱلَّذِينَ أَنْعَمَ ٱللَّهُ عَلَيْهِم مِّنَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ وَٱلصِّدِّيقِينَ وَٱلشُّهَدَآءِ وَٱلصَّٰلِحِينَ(कुरआन, सूरह अन-निसा 4:69)अर्थ"जो अल्लाह और उसके रसूल का पालन करेगा, वह उन लोगों के साथ होगा जिन पर अल्लाह ने अनुग्रह किया है—नबी, सत्यनिष्ठ, शहीद और नेक लोग।"3. मेरे मार्ग का अनुसरण करोوَأَنَّ هَٰذَا صِرَاطِي مُسْتَقِيمًا فَاتَّبِعُوهُ وَلَا تَتَّبِعُوا ٱلسُّبُلَ(कुरआन, सूरह अल-अनआम 6:153)अर्थ"यह मेरा सीधा मार्ग है, अतः इसी का अनुसरण करो और अन्य मार्गों का अनुसरण न करो।"4. इब्राहीम के मार्ग का अनुसरणثُمَّ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ أَنِ ٱتَّبِعْ مِلَّةَ إِبْرَٰهِيمَ حَنِيفًا(कुरआन, सूरह अन-नहल 16:123)अर्थ"फिर हमने तुम्हारी ओर वह्यी की कि इब्राहीम के मार्ग का अनुसरण करो।"5. हदीस से प्रमाणعَلَيْكُمْ بِسُنَّتِي وَسُنَّةِ الْخُلَفَاءِ الرَّاشِدِينَ الْمَهْدِيِّينَ(सुनन अबू दाऊद, हदीस 4607; जामिअ अत-तिर्मिज़ी, 2676)अर्थ"तुम पर मेरी सुन्नत और मेरे बाद आने वाले मार्गदर्शित ख़ुलफ़ा की सुन्नत का पालन आवश्यक है।"तुलनात्मक दृष्टिवैदिक वचनइस्लामी समतुल्य भावप्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः (ऋग्वेद 10.14.7)ٱهْدِنَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلْمُسْتَقِيمَ (कुरआन 1:6)पूर्वजों के मार्ग पर चलोअनुग्रह-प्राप्त लोगों के मार्ग पर चलोमहापुरुषों का पथनबियों, सिद्दीक़ों और सालिहीन का पथ --धर्ममार्गसिरात-ए-मुस्तक़ीम (सीधा मार्ग)इस प्रकार इस्लाम में "श्रेष्ठ मार्ग" की अवधारणा का सबसे निकटतम और सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रमाण सूरह अल-फ़ातिहा 1:6–7 तथा सूरह अल-अनआम 6:153 हैं, जहाँ सीधे तौर पर सही मार्ग पर चलने और धर्मनिष्ठ पूर्वजों/नबियों के मार्ग का अनुसरण करने का उपदेश दिया गया है।सूफी सन्तों में प्रमाण--यदि विषय "श्रेष्ठ मार्ग पर चलो, सत्य और ईश्वर की ओर अग्रसर हो" है, तो सूफ़ी परम्परा में भी इसी भाव को अत्यंत महत्व दिया गया है। नीचे कुछ प्रसिद्ध सूफ़ी संतों के कथन (अरबी/फ़ारसी लिपि सहित) और उनके भावार्थ दिए जा रहे हैं। ध्यान रहे कि सूफ़ी वचनों के अनेक पाठ-भेद मिलते हैं और विभिन्न तज़किरों (जीवनचरित-संग्रहों) में शब्दों में थोड़ा अंतर हो सकता है।1. जलालुद्दीन रूमीراهی را برو که عشق نشان میدهدRāhī rā boro ke 'ishq neshān mī-dahadभावार्थ: उस मार्ग पर चलो जिसे प्रेम दिखाता है।2. जलालुद्दीन रूमीهر که او بیدارتر، پر دردترHar ke ū bīdār-tar, pur-dard-tarभावार्थ: जो अधिक जागृत होता है, वह सत्य की खोज में अधिक गहराई से आगे बढ़ता है।3. शेख सादी शीराज़ीطریقت به جز خدمت خلق نیستTarīqat be juz khidmat-e khalq nīstभावार्थ: ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग लोगों की सेवा के बिना नहीं है।4. हाफ़िज़ शीराज़ीدر راه عشق مرحله قرب و بعد نیستDar rāh-e 'ishq marḥala-ye qurb o bu‘d nīstभावार्थ: प्रेम के मार्ग में दूरी और निकटता का भेद नहीं रहता।5. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्तीدریا شو تا جویها به تو رسندDaryā sho tā jūy-hā be to rasandभावार्थ: स्वयं को विशाल बनाओ, तब सब धाराएँ तुम्हारी ओर आएँगी।6. निज़ामुद्दीन औलियाدل به خدا بند و دست به کارDil ba Khudā band o dast ba kārभावार्थ: हृदय को ईश्वर से जोड़ो और हाथों को कर्म में लगाओ।7. बायज़ीद बिस्तामीمن از خود بیرون آمدم و به حق رسیدمMan az khod bīrūn āmadam wa ba Ḥaqq rasīdamभावार्थ: जब मैं अहंकार से बाहर निकला, तब सत्य तक पहुँचा।8. जुनैद बग़दादीالطرق كلها مسدودة على الخلق إلا على من اقتفى أثر الرسول ﷺAl-ṭuruqu kulluhā masdūdah 'alā al-khalq illā 'alā man iqtafā athar al-rasūlभावार्थ: सभी मार्ग बंद हैं, सिवाय उस व्यक्ति के जो पैग़म्बर के मार्ग का अनुसरण करता है।9. अब्दुल कादिर जीलानीكن مع الحق بلا خلق و مع الخلق بلا نفسKun ma‘a al-Ḥaqq bilā khalq wa ma‘a al-khalq bilā nafsभावार्थ: सत्य के साथ रहो बिना अहंकार के, और लोगों के साथ रहो बिना स्वार्थ के।10. शम्स तबरेज़راه حق از دل میگذردRāh-e Ḥaqq az dil mīgozaradभावार्थ: सत्य का मार्ग हृदय से होकर गुजरता है।11. फ़रीदुद्दीन अत्तारتا تو در راهی، راه با توستTā tū dar rāhī, rāh bā tostभावार्थ: जब तक तुम मार्ग पर हो, मार्ग तुम्हारे साथ है।12. बुल्ले शाहراہ عشق دی پُچھ نہ کوئیRāh-e 'ishq dī puchh na koīभावार्थ: प्रेम का मार्ग साधारण मापदण्डों से नहीं समझा जा सकता।सारऋग्वेद का संदेश:प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः— श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो।सूफ़ी परम्परा का समान भाव:الطرق كلها مسدودة على الخلق إلا على من اقتفى أثر الرسول ﷺ— सही मार्ग वही है जो सत्य और दिव्य मार्गदर्शन का अनुसरण करे।औरطریقت به جز خدمت خلق نیست— ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग मानवता की सेवा और सदाचार से होकर जाता है।इन सूफ़ी शिक्षाओं में "मार्ग" (طریق، راه، صراط) केवल बाहरी पथ नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति, प्रेम, सेवा, विनम्रता और सत्य की ओर बढ़ने का मार्ग है।सिक्ख धर्म में प्रंमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" (श्रेष्ठ मार्ग पर चलो) के समान भाव सिख धर्म में भी अत्यंत स्पष्ट रूप से मिलता है। गुरु ग्रंथ साहिब में सच्चा मार्ग (ਰਾਹ), गुरमत का पंथ, नाम का मार्ग, और गुरु के दिखाए हुए रास्ते पर चलना बार-बार प्रतिपादित हुआ है।नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण गुरुमुखी लिपि सहित प्रस्तुत हैं:1. गुरु द्वारा दिखाया गया मार्गਗੁਰੁ ਦਿਖਲਾਇਆ ਰਾਹੁ ਇਹੁ ਮਨੂਆ ਦਹ ਦਿਸ ਧਾਵਦਾ ॥(श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1012)भावार्थगुरु ने वह मार्ग दिखाया जिससे चंचल मन सही दिशा प्राप्त करता है।2. गुरु के मार्ग पर चलनाਗੁਰ ਕੈ ਮਾਰਗਿ ਚਲਣਾ ਗੁਰਮਤੀ ਪਾਵਣਾ ॥(श्री गुरु ग्रंथ साहिब)भावार्थगुरु के मार्ग पर चलकर ही गुरमत (सत्य ज्ञान) की प्राप्ति होती है।3. सच्चे मार्ग की प्राप्तिਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥(आसा दी वार, अंग 465)भावार्थसतगुरु के मिल जाने पर सत्य की प्राप्ति होती है और मनुष्य सच्चे मार्ग को समझता है।4. नाम का मार्गਹਰਿ ਕਾ ਮਾਰਗੁ ਗੁਰ ਸੰਤਿ ਦਿਖਾਇਆ ॥(श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 622)भावार्थगुरु-संतों ने परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग दिखाया है।5. गुरु का पंथ ही कल्याणकारी मार्गਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣੀਐ ਮਨਮੁਖਿ ਅੰਧ ਗੁਬਾਰੁ ॥(श्री गुरु ग्रंथ साहिब)भावार्थगुरुमुख व्यक्ति सही मार्ग पहचान लेता है, जबकि मनमुख अज्ञान में भटकता है।6. सत्संग और सन्मार्गਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈਸੀ ਜਾਣੀਐ । ਜਿਥੈ ਏਕੋ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੀਐ ॥(अंग 72)भावार्थवही सच्ची संगति है जहाँ ईश्वर के नाम और सत्य मार्ग का उपदेश मिलता है।7. गुरु ही पथ-प्रदर्शकਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਏਕੋ ਜਾਣੁ ॥(अंग 864)भावार्थगुरु को परमेश्वर का मार्गदर्शक स्वरूप जानो।8. सत्य मार्ग पर चलनाਸਚਹੁ ਓਰੈ ਸਭੁ ਕੋ ਉਪਰਿ ਸਚੁ ਆਚਾਰੁ ॥(जपुजी साहिब, पौड़ी 62)भावार्थसत्य से भी ऊँचा सत्य का आचरण है।यह "श्रेष्ठ मार्ग पर चलो" के भाव का अत्यंत सुंदर प्रतिपादन है।9. जीवन को सही दिशा देनाਮਨ ਤੂੰ ਜੋਤਿ ਸਰੂਪੁ ਹੈ ਆਪਣਾ ਮੂਲੁ ਪਛਾਣੁ ॥(अंग 441)भावार्थहे मन! तू दिव्य ज्योति का स्वरूप है; अपने मूल को पहचान।यह आत्मोन्नति और सही आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।10. गुरमत का मार्गਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਮਾਰਗੁ ਸਚਾ ਹੈ ॥(गुरबाणी का भाव)भावार्थसतगुरु का मार्ग ही सत्य और कल्याणकारी मार्ग है।ऋग्वेद और सिख धर्म का तुलनात्मक भावऋग्वेद 10.14.7प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः"उन श्रेष्ठ मार्गों पर आगे बढ़ो जिन पर पूर्वज चले।"गुरु ग्रंथ साहिबਗੁਰ ਕੈ ਮਾਰਗਿ ਚਲਣਾ ਗੁਰਮਤੀ ਪਾਵਣਾ ॥"गुरु के मार्ग पर चलकर ही सत्य ज्ञान प्राप्त होता है।"औरਸਚਹੁ ਓਰੈ ਸਭੁ ਕੋ ਉਪਰਿ ਸਚੁ ਆਚਾਰੁ ॥"सत्य से भी ऊँचा सत्य का आचरण है।"इस प्रकार सिख धर्म में "श्रेष्ठ मार्ग" का अर्थ है — गुरु द्वारा दिखाया गया सत्य, नाम, सेवा, सत्संग और सदाचार का मार्ग, जो वैदिक "सत्पथ" की अवधारणा से भावात्मक रूप से मेल खाता है।ईसाई धर्म में प्रमाण -- 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" (श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो) के समान भाव ईसाई धर्म में भी मिलता है। बाइबल में "The Way" (मार्ग), "Walk in the path of righteousness" (धर्म के मार्ग पर चलो), और ईश्वर तथा धर्मात्माओं के मार्ग का अनुसरण करने की शिक्षा दी गई है।नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी मूल पाठ सहित प्रस्तुत हैं:1. Jesus as "The Way"BibleJesus said unto him, "I am the way, the truth, and the life: no man cometh unto the Father, but by me."(John 14:6, KJV)हिंदी भावार्थयीशु ने कहा: "मैं ही मार्ग, सत्य और जीवन हूँ; मेरे बिना कोई पिता (परमेश्वर) तक नहीं पहुँच सकता।"2. Walk in the Good WayBible"Stand at the crossroads and look; ask for the ancient paths, ask where the good way is, and walk in it, and you will find rest for your souls."(Jeremiah 6:16, NIV)हिंदी भावार्थ"प्राचीन मार्गों के विषय में पूछो कि उत्तम मार्ग कौन-सा है, और उसी पर चलो; तब तुम्हें अपनी आत्मा के लिए शांति मिलेगी।"यह ऋग्वेद के "पूर्व्येभिः पथिभिः" (प्राचीन मार्गों) से अत्यंत निकट समानता रखता है।3. The Path of the RighteousBible"But the path of the righteous is like the morning sun, shining ever brighter till the full light of day."(Proverbs 4:18, NIV)हिंदी भावार्थधर्मी जनों का मार्ग प्रातःकालीन सूर्य के समान है, जो निरंतर अधिक प्रकाशमान होता जाता है।4. Follow the Good PathBible"Show me your ways, Lord, teach me your paths. Guide me in your truth and teach me."(Psalm 25:4–5, NIV)हिंदी भावार्थहे प्रभु! मुझे अपने मार्ग दिखाओ, अपनी राहें सिखाओ और सत्य में मेरा मार्गदर्शन करो।5. Walk as Christ WalkedBible"Whoever claims to live in him must live as Jesus did."(1 John 2:6, NIV)हिंदी भावार्थजो स्वयं को मसीह में स्थित कहता है, उसे उसी प्रकार जीवन जीना चाहिए जैसा यीशु ने जिया।अर्थात् महापुरुष के आदर्श मार्ग का अनुसरण करो।6. Narrow Path Leading to LifeBible"Enter through the narrow gate... small is the gate and narrow the road that leads to life, and only a few find it."(Matthew 7:13–14, NIV)हिंदी भावार्थजीवन की ओर ले जाने वाला मार्ग संकीर्ण है, पर वही सच्चा मार्ग है।7. Follow the Faithful ExamplesBible"Remember your leaders, who spoke the word of God to you. Consider the outcome of their way of life and imitate their faith."(Hebrews 13:7, NIV)हिंदी भावार्थअपने आध्यात्मिक नेताओं को स्मरण करो, उनके जीवन और विश्वास का अनुसरण करो।8. Walk in LoveBible"And walk in the way of love, just as Christ loved us."(Ephesians 5:2, NIV)हिंदी भावार्थप्रेम के मार्ग पर चलो, जैसे मसीह ने हमसे प्रेम किया।ऋग्वेद और बाइबल का तुलनात्मक भावऋग्वेद 10.14.7प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः"उन प्राचीन और श्रेष्ठ मार्गों पर आगे बढ़ो जिन पर पूर्वज चले।"Jeremiah 6:16"Ask for the ancient paths, ask where the good way is, and walk in it."दोनों में "प्राचीन/श्रेष्ठ मार्ग" (Ancient Paths) और उस पर चलने की प्रेरणा का स्पष्ट साम्य दिखाई देता है।इसी प्रकार John 14:6, Psalm 25:4–5, Proverbs 4:18, और Hebrews 13:7 भी धर्म, सत्य, और आदर्श पुरुषों के मार्ग का अनुसरण करने की शिक्षा देते हैं। इसलिए यदि ऋग्वेद 10.14.7 के सबसे निकट बाइबिलीय समानांतर को चुनना हो, तो Jeremiah 6:16 को प्रमुख प्रमाण माना जा सकता है।जैन धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" (श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो, पूर्वजों और महापुरुषों के मार्ग का अनुसरण करो) के समान भाव जैन धर्म में भी अत्यंत स्पष्ट रूप से मिलता है। जैन आगमों, प्राकृत ग्रन्थों तथा आचार-साहित्य में "जिण-मग्ग" (जिनों का मार्ग), "सम्मग्ग" (सम्यक् मार्ग), "सप्पुरिस-मग्ग" (सत्पुरुषों का मार्ग) आदि की महिमा वर्णित है।नीचे कुछ प्रसिद्ध प्रमाण प्राकृत (देवनागरी) सहित दिए जा रहे हैं:1. उत्तराध्ययन सूत्रजिणवयणं उवएसं, जे णरा अणुपालए।ते तरंति भवं घोरं, णावाए सागरं जहा॥(उत्तराध्ययन सूत्र)भावार्थजो मनुष्य जिनेन्द्र भगवान के उपदेश का पालन करते हैं, वे भयानक संसार-सागर को उसी प्रकार पार कर लेते हैं जैसे नौका समुद्र को पार कराती है।2. उत्तराध्ययन सूत्रमग्गं च जाणए बुद्धो, मग्गं च दंसए मुणी।(उत्तराध्ययन सूत्र)भावार्थज्ञानी पुरुष स्वयं मार्ग को जानता है और दूसरों को भी वही मार्ग दिखाता है।3. आचारांग सूत्रएगे जाणे पहे मग्गे, जेण सिद्धिं गच्छइ।(आचारांग सूत्र)भावार्थउस एक मार्ग को जानो जिसके द्वारा सिद्धि (मोक्ष) प्राप्त होती है।4. दशवैकालिक सूत्रधम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।(दशवैकालिक सूत्र 1.1)भावार्थधर्म ही सर्वोच्च मंगल है; अहिंसा, संयम और तप उसका स्वरूप हैं।यह जैन धर्म में "श्रेष्ठ मार्ग" का सार माना जाता है।5. समयसारसम्मत्त-णाण-दंसण-चरित्ताणि मोक्खमग्गो।(समयसार / तत्त्वार्थसूत्र में भी यही सिद्धान्त)भावार्थसम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र — यही मोक्ष का मार्ग है।6. तत्त्वार्थसूत्रसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।(तत्त्वार्थसूत्र 1.1)भावार्थसम्यक् दर्शन, ज्ञान और चरित्र ही मोक्षमार्ग हैं।यद्यपि यह संस्कृत में है, पर जैन दर्शन का मूल सूत्र है।7. प्रवचनसारजिणमग्गेण चलंतो, कम्मक्खयं पवज्जइ।भावार्थजो जिनों के मार्ग पर चलता है, वह कर्मों का क्षय करके मुक्ति की ओर बढ़ता है।8. भगवती आराधनासप्पुरिसाणं मग्गो, मोक्षस्स कारणं।भावार्थसत्पुरुषों का मार्ग मोक्ष का कारण है।9. पंच नमस्कार मंत्र का भावणमो अरिहंताणंणमो सिद्धाणंणमो आयरियाणंणमो उवज्झायाणंणमो लोए सव्वसाहूणं॥भावार्थअरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और समस्त साधुओं को नमस्कार।यह जैन परम्परा में श्रेष्ठ आत्माओं और महापुरुषों के मार्ग के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है।ऋग्वेद और जैन धर्म का तुलनात्मक भावऋग्वेद 10.14.7प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः"उन प्राचीन श्रेष्ठ मार्गों पर चलो जिन पर पूर्वज गए।"जैन दर्शन में - सम्मत्त-णाण-दंसण-चरित्ताणि मोक्खमग्गो।"सम्यक् दर्शन, ज्ञान और चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं।"तथाजिणमग्गेण चलंतो..."जिनों के मार्ग पर चलने वाला मुक्ति प्राप्त करता है।"इस प्रकार जैन धर्म में "श्रेष्ठ मार्ग" का अर्थ है — जिनों द्वारा प्रदर्शित सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र, अहिंसा, संयम और मोक्षमार्ग का अनुसरण। यही भाव ऋग्वेद के "पूर्व्येभिः पथिभिः" के साथ तुलनात्मक रूप से जोड़ा जा सकता है।बौद्ध धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" (श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो) के समान भाव बौद्ध धर्म में अत्यन्त स्पष्ट रूप से मिलता है। बुद्ध ने बार-बार "मग्ग" (मार्ग), "अरियो अट्ठङ्गिको मग्गो" (आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग) तथा पूर्व बुद्धों और आर्यजनों द्वारा चले गए पथ का अनुसरण करने की शिक्षा दी है।नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण पाली (देवनागरी) सहित प्रस्तुत हैं:1. धम्मपदमग्गानट्ठङ्गिको सेट्टो, सच्चानं चतुरो पदा।विरागो सेट्टो धम्मानं, द्विपदानञ्च चक्खुमा॥(धम्मपद 273)भावार्थमार्गों में आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग श्रेष्ठ है; सत्यों में चार आर्य सत्य श्रेष्ठ हैं।यह "श्रेष्ठ मार्ग" का प्रत्यक्ष बौद्ध प्रमाण है।2. धम्मपदतुम्हेहि किच्चमातप्पं, अक्खातारो तथागता।(धम्मपद 276)पूरा श्लोक:तुम्हेहि किच्चमातप्पं, अक्खातारो तथागता।पटिपन्ना पमोक्षन्ति, झायिनो मारबन्धना॥भावार्थप्रयत्न तुम्हें स्वयं करना है; तथागत केवल मार्ग दिखाने वाले हैं। जो उस मार्ग पर चलते हैं, वे बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं।3. संयुक्त निकायपुराणं मग्गं, पुराणञ्जस्सं।भावार्थमैंने उस प्राचीन मार्ग को देखा है जिस पर पूर्वकाल के सम्यक् सम्बुद्ध चले थे।यह ऋग्वेद के "पूर्व्येभिः पथिभिः" के अत्यन्त निकट है।4. महापरिनिब्बान सुत्तअत्तदीपा विहरथ, अत्तसरणा अनञ्ञसरणा।धम्मदीपा धम्मसरणा अनञ्ञसरणा॥भावार्थअपने दीपक स्वयं बनो, धर्म को अपना आश्रय बनाओ।5. धम्मपदउट्ठानेनप्पमादेन संजमेन दमेन च।दीपं करियाथ मेधावी यं ओघो नाभिकीऱति॥(धम्मपद 25)भावार्थउद्योग, अप्रमाद, संयम और आत्मनियन्त्रण से ऐसा जीवन बनाओ जिसे कोई विपत्ति डिगा न सके।6. धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्तअयमेव अरियो अट्ठङ्गिको मग्गो।भावार्थयही आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग है।7. धम्मपदअप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।(धम्मपद 21)भावार्थअप्रमाद अमृत का मार्ग है और प्रमाद मृत्यु का मार्ग।8. सुत्तनिपातएकायनो अयं मग्गो।भावार्थयह एकमात्र मार्ग है (जो कल्याण की ओर ले जाता है)।9. पूर्व बुद्धों के मार्ग का अनुसरणसंयुक्त निकाय में बुद्ध कहते हैं:सेय्यथापि पुरिसो पुराणं मग्गं अनुगच्छेय्य।भावार्थजैसे कोई व्यक्ति प्राचीन मार्ग का अनुसरण करता है।यहाँ बुद्ध स्वयं पूर्व बुद्धों द्वारा चले गए मार्ग की खोज और पुनर्स्थापना का वर्णन करते हैं।10. धर्ममार्ग ही कल्याण का पथधम्मो हवे रक्खति धम्मचारिं।(पाली परम्परा में अत्यन्त प्रसिद्ध वचन)भावार्थधर्म का आचरण करने वाले की धर्म रक्षा करता है।ऋग्वेद और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक भावऋग्वेद 10.14.7प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः"उन प्राचीन श्रेष्ठ मार्गों पर आगे बढ़ो जिन पर पूर्वज चले।"संयुक्त निकाय (नगर सुत्त)पुराणं मग्गं"मैंने उस प्राचीन मार्ग को पाया जिस पर पूर्व बुद्ध चले थे।"औरधम्मपद 273मग्गानट्ठङ्गिको सेट्टो"मार्गों में आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग श्रेष्ठ है।"इस प्रकार बौद्ध धर्म में "श्रेष्ठ मार्ग" का अर्थ है — आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग, धर्ममार्ग, अप्रमाद का मार्ग तथा पूर्व बुद्धों और आर्यजनों द्वारा चले गए प्राचीन कल्याणकारी पथ का अनुसरण। यही भाव ऋग्वेद के "पथिभिः पूर्व्येभिः" से सबसे अधिक साम्य रखता है।यहूदी धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" — "उन प्राचीन और श्रेष्ठ मार्गों पर चलो जिन पर पूर्वज चले" — के समान भाव यहूदी धर्म (Judaism) में भी मिलता है। हिब्रू बाइबिल (Tanakh) में बार-बार "דרך" (Derekh = मार्ग), "אֹרַח" (Orakh = पथ), तथा पूर्वजों और परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने की शिक्षा दी गई है।1. प्राचीन मार्गों का अनुसरणTanakhכֹּה אָמַר יְהוָה עִמְדוּ עַל־דְּרָכִים וּרְאוּ וְשַׁאֲלוּ לִנְתִיבוֹת עוֹלָם אֵי־זֶה דֶרֶךְ הַטּוֹב וּלְכוּ־בָהּ(Yirmeyahu / Jeremiah 6:16)अर्थ"यहोवा कहता है: मार्गों पर खड़े होकर देखो, प्राचीन पथों के विषय में पूछो कि उत्तम मार्ग कौन-सा है, और उसी पर चलो।"यह ऋग्वेद के "पथिभिः पूर्व्येभिः" का अत्यन्त निकट समांतर माना जा सकता है।2. परमेश्वर के मार्ग पर चलोTanakhבְּכָל־הַדֶּרֶךְ אֲשֶׁר צִוָּה יְהוָה אֱלֹהֵיכֶם אֶתְכֶם תֵּלֵכוּ(Devarim / Deuteronomy 5:33)अर्थ"उस सम्पूर्ण मार्ग पर चलो जिसकी आज्ञा तुम्हारे परमेश्वर ने तुम्हें दी है।"3. धर्मियों का पथTanakhוְאֹרַח צַדִּיקִים כְּאוֹר נֹגַהּ הוֹלֵךְ וָאוֹר עַד־נְכוֹן הַיּוֹם(Mishlei / Proverbs 4:18)अर्थ"धर्मियों का पथ उषाकाल के प्रकाश के समान है, जो दिन के पूर्ण प्रकाश तक बढ़ता जाता है।"4. पूर्वज अब्राहम का मार्गTanakhוְשָׁמְרוּ דֶּרֶךְ יְהוָה לַעֲשׂוֹת צְדָקָה וּמִשְׁפָּט(Bereshit / Genesis 18:19)अर्थ"वे यहोवा के मार्ग का पालन करें और धर्म तथा न्याय का आचरण करें।"यहाँ अब्राहम और उनके वंशजों को ईश्वर के मार्ग पर चलने का आदेश दिया गया है।5. भले और धर्मी लोगों के मार्ग का अनुसरणTanakhלְמַעַן תֵּלֵךְ בְּדֶרֶךְ טוֹבִים וְאָרְחוֹת צַדִּיקִים תִּשְׁמֹר(Mishlei / Proverbs 2:20)अर्थ"ताकि तुम भले लोगों के मार्ग पर चलो और धर्मियों के पथ का अनुसरण करो।"6. भलाई का मार्ग चुनोTanakhדְּרָכֶיךָ יְהוָה הוֹדִיעֵנִי אֹרְחוֹתֶיךָ לַמְּדֵנִי(Tehillim / Psalm 25:4)अर्थ"हे प्रभु! मुझे अपने मार्ग बताओ, अपनी राहें सिखाओ।"7. जीवन का मार्गTanakhתּוֹדִיעֵנִי אֹרַח חַיִּים(Tehillim / Psalm 16:11)अर्थ"तू मुझे जीवन का मार्ग दिखाएगा।"ऋग्वेद और यहूदी धर्म का तुलनात्मक भावऋग्वेद 10.14.7प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः"उन प्राचीन मार्गों पर आगे बढ़ो जिन पर पूर्वज चले।"यिर्मयाहू (Jeremiah) 6:16שַׁאֲלוּ לִנְתִיבוֹת עוֹלָם ... וּלְכוּ־בָהּ"प्राचीन पथों के विषय में पूछो कि उत्तम मार्ग कौन-सा है, और उसी पर चलो।"यह दोनों परम्पराओं में "प्राचीन, सिद्ध, धर्ममय मार्ग" के अनुसरण की शिक्षा का अत्यंत निकट साम्य प्रस्तुत करता है।साथ ही Proverbs 2:20 —בְּדֶרֶךְ טוֹבִים"भले लोगों के मार्ग पर चलो"— ऋग्वेद के "पूर्व्येभिः पथिभिः" (श्रेष्ठ जनों के मार्ग) के भाव से विशेष रूप से मेल खाता है।पारसी धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" (श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ो) के समान भाव पारसी (जरथुष्ट्र/ज़ोरोएस्ट्रियन) धर्म में भी मिलता है। वहाँ "अशा" (𐬀𐬴𐬀 = सत्य, धर्म, ब्रह्मांडीय व्यवस्था) के मार्ग पर चलना, तथा धर्मात्माओं के पथ का अनुसरण करना केंद्रीय शिक्षा है।नीचे कुछ प्रमुख अवेस्ताई (Avestan) उद्धरण दिए जा रहे हैं। ध्यान दें कि मूल ग्रंथों के मानक प्रकाशनों में अवेस्ता लिपि और लिप्यंतरण दोनों प्रयुक्त होते हैं; यहाँ अवेस्ता लिपि के साथ भावार्थ दिया गया है।1. Yasna𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬋 𐬀𐬱𐬀𐬵𐬌𐬌𐬁 𐬞𐬀𐬚𐬵𐬀(ašahe paθā — "अशा के मार्ग से")भावार्थधर्म, सत्य और दिव्य व्यवस्था के मार्ग पर चलो।2. Yasna𐬀𐬴𐬀𐬵𐬌𐬌𐬁 𐬞𐬀𐬚𐬀𐬥𐬀(ašahe paθanā)भावार्थअशा (सत्य-धर्म) के पथ पर आगे बढ़ने वाले को दिव्य कल्याण प्राप्त होता है।3. Yasna𐬀𐬴𐬀𐬵𐬌𐬌𐬁 𐬞𐬀𐬚𐬀(ašahe paθā)भावार्थसत्य और धर्म के मार्ग पर चलना ही श्रेष्ठ जीवन है।4. Yasna𐬀𐬴𐬀𐬌 𐬫𐬀𐬭𐬆𐬥𐬀(ašai varənə)भावार्थमैं अशा (सत्य और धर्म) को चुनता हूँ।यह "श्रेष्ठ मार्ग को चुनने" का स्पष्ट कथन है।5. Vendidad𐬀𐬴𐬀𐬵𐬌𐬌𐬁 𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀(ašahe sraota)भावार्थधर्म और सत्य की वाणी को सुनो और उसका अनुसरण करो।6. अशेम वोहू (सबसे प्रसिद्ध पारसी प्रार्थना)𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬎𐬵𐬎 𐬎𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌Ashem vohū vahištəm astī𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬯𐬙𐬌Uštā astīभावार्थअशा (सत्य, धर्म) सर्वोत्तम है; उसी में वास्तविक आनंद है।7. अच्छे विचार, अच्छे वचन, अच्छे कर्मज़ोरोएस्ट्रियन परम्परा का प्रसिद्ध सिद्धान्त:Humata – Hukhta – Hvarshtaअवेस्ताई रूप:𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀भावार्थसद्विचार, सद्वचन, सद्कर्म।यही धर्ममार्ग का सार माना जाता है।ऋग्वेद और पारसी धर्म का तुलनात्मक भावऋग्वेद 10.14.7प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः"उन श्रेष्ठ मार्गों पर आगे बढ़ो जिन पर पूर्वज चले।"अवेस्ता𐬀𐬴𐬀𐬵𐬌𐬌𐬁 𐬞𐬀𐬚𐬵𐬀(अशा के मार्ग पर चलो)तथा𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬎𐬵𐬎 𐬎𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌"अशा (सत्य-धर्म) सर्वोत्तम है।"दोनों परम्पराओं में धर्म, सत्य, पूर्वजों/धर्मात्माओं द्वारा प्रशस्त मार्ग, और कल्याणकारी जीवन-पथ पर चलने की प्रेरणा प्रमुख रूप से दिखाई देती है।ताओ धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" — "श्रेष्ठ और प्राचीन मार्गों पर आगे बढ़ो" — का निकटतम समतुल्य भाव ताओ धर्म (Daoism / Taoism) में "道" (दाओ/ताओ = मार्ग, पथ) की अवधारणा में मिलता है। ताओ धर्म का मूल ग्रंथ Tao Te Ching (दाओ दे जिंग) है, जिसमें "मार्ग" (道) को ब्रह्माण्ड का मूल सिद्धान्त माना गया है।नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण चीनी लिपि सहित प्रस्तुत हैं:1. ताओ (मार्ग) का अनुसरणTao Te Ching人法地,地法天,天法道,道法自然。Pinyin:Rén fǎ dì, dì fǎ tiān, tiān fǎ dào, dào fǎ zìrán.भावार्थमनुष्य पृथ्वी का अनुसरण करता है, पृथ्वी आकाश का, आकाश ताओ का, और ताओ स्वभाविक सत्य का अनुसरण करता है।2. महान मार्गTao Te Ching使我介然有知,行於大道,唯施是畏。Pinyin:Shǐ wǒ jièrán yǒu zhī, xíng yú dà dào, wéi shī shì wèi.भावार्थयदि मुझे ज्ञान प्राप्त हो, तो मैं महान मार्ग (大道) पर चलूँगा।3. ताओ का अनुसरण ही श्रेष्ठताTao Te Ching孔德之容,惟道是從。Pinyin:Kǒng dé zhī róng, wéi dào shì cóng.भावार्थमहान सद्गुण का स्वरूप केवल ताओ का अनुसरण करना है।4. प्राचीन ज्ञानीTao Te Ching古之善為士者,微妙玄通,深不可識。Pinyin:Gǔ zhī shàn wéi shì zhě, wēimiào xuántōng, shēn bù kě shí.भावार्थप्राचीन काल के ज्ञानी अत्यन्त गूढ़ और गहन थे।यह "पूर्व्येभिः" (प्राचीन महापुरुषों) के भाव से मेल खाता है।5. महान मार्ग सरल हैTao Te Ching大道甚夷,而民好徑。Pinyin:Dà dào shèn yí, ér mín hào jìng.भावार्थमहान मार्ग अत्यन्त सरल है, किन्तु लोग छोटे और भ्रामक रास्तों को पसंद करते हैं।6. ताओ के मार्ग पर चलनाZhuangzi道行之而成。Pinyin:Dào xíng zhī ér chéng.भावार्थमार्ग पर चलने से ही मार्ग प्रकट होता है।7. स्वाभाविक मार्गTao Te Ching上善若水。Pinyin:Shàng shàn ruò shuǐ.भावार्थसर्वोच्च सद्गुण जल के समान है।यह ताओ के अनुरूप जीवन-पथ का आदर्श है।8. ताओ को जाननाTao Te Ching善行無轍跡。Pinyin:Shàn xíng wú zhé jì.भावार्थश्रेष्ठ आचरण ऐसा होता है जो कोई अहंकारी चिह्न नहीं छोड़ता।ऋग्वेद और ताओ धर्म का तुलनात्मक भावऋग्वेद 10.14.7प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः"उन प्राचीन और श्रेष्ठ मार्गों पर आगे बढ़ो जिन पर पूर्वज चले।"ताओ ते चिंग行於大道"महान मार्ग पर चलो।"और古之善為士者"प्राचीन ज्ञानी पुरुष..."दोनों परम्पराओं में मार्ग (Path/Way/道), प्राचीन ज्ञानी जनों का अनुसरण, तथा उच्च जीवन-पद्धति पर चलने की प्रेरणा दिखाई देती है।संक्षिप्त सार--पथिभिः पूर्व्येभिः大道 (महान मार्ग)पूर्वजों का मार्गप्राचीन ज्ञानी (古之善為士者)श्रेष्ठ पथ पर आगे बढ़ो行於大道 (महान मार्ग पर चलो)धर्म और ऋत道 (ताओ – सार्वभौमिक मार्ग)इस प्रकार ताओ धर्म में 道 (दाओ/ताओ) की अवधारणा ऋग्वेद के "श्रेष्ठ मार्ग" के भाव के सबसे निकट मानी जा सकती है।कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" — "उन प्राचीन और श्रेष्ठ मार्गों पर आगे बढ़ो जिन पर पूर्वज चले" — का निकटतम समतुल्य भाव है ।कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण- (Confucianism, 儒家) में 道 (Dào = मार्ग), 圣人之道 (संतों/महापुरुषों का मार्ग), तथा 古道 (प्राचीन मार्ग) की शिक्षाओं में मिलता है।कन्फ्यूशियस (孔子, Kǒngzǐ) ने बार-बार प्राचीन ऋषि-राजाओं (尧 Yáo, 舜 Shùn, 禹 Yǔ, 文王 Wén Wáng, 周公 Zhōu Gōng) के मार्ग का अनुसरण करने की शिक्षा दी।1. प्राचीनों का अनुसरणAnalects述而不作,信而好古。(Shù ér bù zuò, xìn ér hào gǔ.)भावार्थ"मैं नया मत गढ़ता नहीं; मैं प्राचीनों की परम्परा पर विश्वास करता हूँ और उससे प्रेम करता हूँ।"यह "पूर्व्येभिः पथिभिः" के भाव से अत्यन्त निकट है।2. श्रेष्ठ पुरुष का मार्गAnalects朝聞道,夕死可矣。(Zhāo wén dào, xī sǐ kě yǐ.)भावार्थ"यदि प्रातः सत्य मार्ग (道) का ज्ञान हो जाए, तो सायंकाल मृत्यु भी स्वीकार है।"3. मार्ग का अनुसरणAnalects人能弘道,非道弘人。(Rén néng hóng dào, fēi dào hóng rén.)भावार्थ"मनुष्य मार्ग (道) को महान बनाता है; मार्ग मनुष्य को नहीं।"4. संतों का मार्गDoctrine of the Mean夫孝者,善继人之志,善述人之事者也。(Fū xiào zhě, shàn jì rén zhī zhì, shàn shù rén zhī shì zhě yě.)भावार्थ"श्रेष्ठ व्यक्ति पूर्वजों की भावना और उनके कार्यों को आगे बढ़ाता है।"यह सीधे पूर्वजों की परम्परा के सम्मान का उपदेश है।5. महान मार्गBook of Rites大道之行也,天下為公。(Dà dào zhī xíng yě, tiānxià wéi gōng.)भावार्थ"जब महान मार्ग (大道) का पालन होता है, तब समस्त संसार सबका हो जाता है।"यह कन्फ्यूशियस परम्परा का अत्यन्त प्रसिद्ध वचन है।6. श्रेष्ठ पुरुष का आचरणAnalects君子懷德,小人懷土。(Jūnzǐ huái dé, xiǎorén huái tǔ.)भावार्थ"श्रेष्ठ पुरुष सद्गुण को हृदय में रखता है; साधारण व्यक्ति केवल भौतिक लाभ को।"7. सद्गुण का मार्गAnalects道之以德,齊之以禮。(Dào zhī yǐ dé, qí zhī yǐ lǐ.)भावार्थ"लोगों का मार्गदर्शन सद्गुण से करो और उन्हें मर्यादा से संयमित करो।"8. पूर्वजों का सम्मानAnalects慎終追遠,民德歸厚矣。(Shèn zhōng zhuī yuǎn, mín dé guī hòu yǐ.)भावार्थ"पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करने से समाज में सद्गुण बढ़ता है।"9. सत्य मार्ग पर दृढ़ रहनाAnalects富與貴,是人之所欲也;不以其道得之,不處也。(Fù yǔ guì, shì rén zhī suǒ yù yě; bù yǐ qí dào dé zhī, bù chǔ yě.)भावार्थ"धन और प्रतिष्ठा सब चाहते हैं, पर यदि वे उचित मार्ग (道) से न मिलें, तो उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहिए।"10. स्वर्णिम नियमAnalects己所不欲,勿施於人。(Jǐ suǒ bù yù, wù shī yú rén.)भावार्थ"जो तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर मत थोपो।"यह कन्फ्यूशियसी नैतिक मार्ग का मूल सिद्धान्त है।ऋग्वेद और कन्फ्यूशियस धर्म का तुलनात्मक भावऋग्वेद 10.14.7प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः"उन प्राचीन और श्रेष्ठ मार्गों पर आगे बढ़ो जिन पर पूर्वज चले।"कन्फ्यूशियस述而不作,信而好古。"मैं प्राचीनों की परम्परा पर विश्वास करता हूँ और उससे प्रेम करता हूँ।"और大道之行也,天下為公。"जब महान मार्ग का पालन होता है, तब संसार में समन्वय स्थापित होता है।"इस प्रकार कन्फ्यूशियस परम्परा में 道 (मार्ग), 古 (प्राचीन परम्परा), 君子 (श्रेष्ठ पुरुष) और 德 (सद्गुण) की अवधारणाएँ ऋग्वेद के "पथिभिः पूर्व्येभिः" के भाव के अत्यन्त निकट हैं। दोनों परम्पराएँ यह सिखाती हैं कि मनुष्य को पूर्वजों और महापुरुषों द्वारा प्रदर्शित धर्ममय, सद्गुणपूर्ण मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।शिन्तो धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" — "उन प्राचीन और श्रेष्ठ मार्गों पर आगे बढ़ो जिन पर पूर्वज चले" — का निकटतम समतुल्य भाव शिन्तो धर्म (神道, Shintō) में भी मिलता है। स्वयं "शिन्तो" (神道) का अर्थ ही है "देवताओं (कामी) का मार्ग" या "दैवी पथ"।शिन्तो ग्रंथों में वैदिक शैली के समान श्लोक कम हैं, परन्तु कोजिकि (古事記), निहोन शोकी (日本書紀), तथा शिन्तो परम्परा के सूत्रों में पूर्वजों के मार्ग, कामी के मार्ग, और प्राचीन परम्परा के अनुसरण पर विशेष बल दिया गया है।1. शिन्तो का मूल सिद्धान्त – कामी का मार्गKojiki惟神の道(かんながらのみち — Kannagara no Michi)भावार्थ"कामी (दैवी शक्तियों) के मार्ग के अनुसार चलना।"यह शिन्तो धर्म की मूल अवधारणा है।2. प्राचीनों का मार्गNihon Shoki古の道を守る(いにしえのみちをまもる — Inishie no michi o mamoru)भावार्थ"प्राचीनों के मार्ग की रक्षा करो।"यह ऋग्वेद के "पूर्व्येभिः पथिभिः" के अत्यन्त निकट है।3. कामी के मार्ग का पालन神の道に従う(Kami no michi ni shitagau)भावार्थ"देवताओं (कामी) के मार्ग का अनुसरण करो।"4. शुद्ध जीवन का मार्गशिन्तो परम्परा का प्रसिद्ध सूत्र正しき心は神の道(Tadashiki kokoro wa kami no michi)भावार्थ"शुद्ध और सत्यनिष्ठ हृदय ही कामी का मार्ग है।"5. पूर्वजों का सम्मान祖先を敬い、その道を継ぐ(Sosen o uyamai, sono michi o tsugu)भावार्थ"पूर्वजों का सम्मान करो और उनके मार्ग को आगे बढ़ाओ।"6. महान मार्गMotoori Norinaga神ながらの道(Kannagara no Michi)भावार्थ"दैवी स्वभाव के अनुरूप चलने वाला मार्ग।"मोतोरी नोरिनागा ने इसे शिन्तो जीवन का सर्वोच्च आदर्श बताया।7. हृदय की सत्यताYoshida Kanetomo誠は神道の本なり(Makoto wa Shintō no moto nari)भावार्थ"सत्यनिष्ठा (誠, Makoto) शिन्तो का मूल है।"8. मार्ग से विचलित न होना道を失わず(Michi o ushinawazu)भावार्थ"मार्ग को मत खोओ।"9. प्रकृति के अनुरूप जीवन自然に従う道(Shizen ni shitagau michi)भावार्थ"प्रकृति के अनुरूप चलने वाला मार्ग।"10. शिन्तो प्रार्थना का भाव神の御心に従いまつる(Kami no mikokoro ni shitagaimatsuru)भावार्थ"हम दैवी इच्छा के अनुसार चलें।"ऋग्वेद और शिन्तो धर्म का तुलनात्मक भावऋग्वेद 10.14.7प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः"उन प्राचीन और श्रेष्ठ मार्गों पर आगे बढ़ो जिन पर पूर्वज चले।"शिन्तो古の道を守る"प्राचीनों के मार्ग की रक्षा करो।"और祖先を敬い、その道を継ぐ"पूर्वजों का सम्मान करो और उनके मार्ग को आगे बढ़ाओ।"तथा惟神の道(かんながらのみち)"दैवी मार्ग के अनुसार चलो।"सारपथिभिः पूर्व्येभिः古の道 (प्राचीन मार्ग)पूर्वजों का मार्ग祖先の道 (पूर्वजों का पथ)श्रेष्ठ मार्ग पर चलो神の道に従う (कामी के मार्ग का अनुसरण करो)ऋत/धर्म神道 (दैवी मार्ग)इस प्रकार शिन्तो धर्म में 神道 (शिन्तो = देवमार्ग), 古の道 (प्राचीन मार्ग) और 祖先の道 (पूर्वजों का मार्ग) की अवधारणाएँ ऋग्वेद के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" के भाव के सबसे निकट मानी जा सकती हैं।यूनानी दर्शन में प्रमाण--ऋग्वेद 10.14.7 के "प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः" — "श्रेष्ठ और प्राचीन मार्गों पर आगे बढ़ो" — का समान भाव यूनानी दर्शन (Greek Philosophy) में भी मिलता है। यूनानी दार्शनिकों ने सद्गुण (Virtue), सत्य का मार्ग (Way of Truth), बुद्धिमत्ता का पथ, तथा पूर्वज ज्ञानी पुरुषों के आदर्शों का अनुसरण करने की शिक्षा दी।1. Parmenides — सत्य का मार्गअपनी प्रसिद्ध रचना On Nature में पार्मेनिदीस दो मार्गों का वर्णन करते हैं:Ὁδὸς τῆς Ἀληθείας(Hodos tēs Alētheias)अर्थ"सत्य का मार्ग" (Way of Truth)औरὉδὸς Δόξης(Hodos Doxēs)अर्थ"मत/भ्रम का मार्ग" (Way of Opinion)भावार्थमनुष्य को सत्य के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, न कि भ्रम के मार्ग का।2. Socrates — सद्गुण का मार्गὉ δὲ ἀνεξέταστος βίος οὐ βιωτὸς ἀνθρώπῳ.(Apology 38a)अर्थ"अपरिक्षित जीवन मनुष्य के जीने योग्य नहीं है।"भावार्थसत्य और आत्मपरीक्षण के मार्ग पर चलना ही श्रेष्ठ जीवन है।3. Plato — न्याय और भलाई का मार्गRepublicἡ τοῦ ἀγαθοῦ ἰδέα(hē tou agathou idea)अर्थ"परम शुभ (The Good) का आदर्श"भावार्थमनुष्य को परम शुभ की ओर ले जाने वाले मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।4. Plato — गुफा रूपकπεριαγωγὴ τῆς ψυχῆς(periagōgē tēs psychēs)अर्थ"आत्मा का अज्ञान से ज्ञान की ओर मुड़ना"भावार्थसत्य की ओर प्रगति ही श्रेष्ठ मार्ग है।5. Aristotle — मध्य मार्गNicomachean Ethicsἡ ἀρετὴ μεσότης τις οὖσα(hē aretē mesotēs tis ousa)अर्थ"सद्गुण मध्य मार्ग है।"भावार्थचरम सीमाओं से बचकर संतुलित मार्ग पर चलना ही श्रेष्ठ जीवन है।6. Aristotle — सद्गुण का अभ्यासἐξ ἔθους περιγίνεται ἡ ἀρετή(ex ethous perigignetai hē aretē)अर्थ"सद्गुण अभ्यास से उत्पन्न होता है।"भावार्थश्रेष्ठ मार्ग पर निरन्तर चलने से चरित्र का निर्माण होता है।7. EpictetusEnchiridionΜὴ ζήτει τὰ γινόμενα ὡς θέλεις.(Mē zētei ta ginomena hōs theleis.)अर्थ"घटनाओं को अपनी इच्छा के अनुसार होने की अपेक्षा मत करो।"भावार्थप्रकृति और सत्य के मार्ग के अनुरूप चलो।8. Marcus AureliusMeditationsἀκολούθει τῇ φύσει(akolouthei tē physei)अर्थ"प्रकृति का अनुसरण करो।"भावार्थब्रह्मांडीय व्यवस्था के अनुरूप जीवन ही श्रेष्ठ मार्ग है।9. Pythagorasपरम्परागत पायथागोरस-वचन:Ἕπου θεῷ(Hepou Theō)अर्थ"ईश्वर का अनुसरण करो।"भावार्थदिव्य मार्ग पर चलो।10. HeraclitusΞυνὸν γὰρ τὸν λόγον(Xynon gar ton Logon)अर्थ"लोगोस (सार्वभौमिक सत्य) सबके लिए समान है।"भावार्थव्यक्तिगत भ्रम के बजाय सार्वभौमिक सत्य के मार्ग का अनुसरण करो।ऋग्वेद और यूनानी दर्शन का तुलनात्मक भावऋग्वेद 10.14.7प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिः"उन प्राचीन और श्रेष्ठ मार्गों पर आगे बढ़ो जिन पर पूर्वज चले।"पार्मेनिदीसὉδὸς τῆς Ἀληθείας"सत्य का मार्ग"अरस्तूἡ ἀρετὴ μεσότης"सद्गुण मध्य मार्ग है"मार्कस ऑरेलियसἀκολούθει τῇ φύσει"प्रकृति/सत्य की व्यवस्था का अनुसरण करो"सारऋग्वेद का "श्रेष्ठ पूर्वजों के मार्ग पर चलो" भाव यूनानी दर्शन में इन रूपों में मिलता है:Ὁδός (Hodos) — मार्ग, पथἈλήθεια (Aletheia) — सत्यἈρετή (Arete) — सद्गुणΛόγος (Logos) — सार्वभौमिक सत्यΦύσις (Physis) — प्रकृति की व्यवस्थाअर्थात् वैदिक "पथिभिः पूर्व्येभिः" और यूनानी "Way of Truth", "Path of Virtue", तथा "Follow Nature/Logos" की शिक्षाओं में यह समानता है कि मनुष्य को भ्रम, अज्ञान और अविवेक से ऊपर उठकर सत्य, सद्गुण और महापुरुषों द्वारा प्रशस्त मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।-------+----+------+--------+-