ऋगुवेद सूक्ति-- (56) की व्याख्या " भद्रं कर्णेभि: श्रृणुयाम देव:"ऋगुवेद --1/89/8अर्थ-- हे ईश्वर ! हम अपने कानों से शुभ सुनें।यह ऋग्वेद का अत्यंत प्रसिद्ध शांति मंत्र है:मंत्र (ऋग्वेद-- 1.89.8):"भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाःभद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिःव्यशेम देवहितं यदायुः॥"अर्थ:हे देवताओं!हम अपने कानों से शुभ (कल्याणकारी) बातें सुनें,अपनी आँखों से शुभ दृश्य देखें,हमारे अंग (शरीर) स्वस्थ और स्थिर रहें, और हम अपनी पूरी आयु ईश्वर के हितकारी कर्मों में व्यतीत करें।भावार्थ--:यह मंत्र हमें जीवन का एक आदर्श मार्ग दिखाता है—सुनना भी शुभ हो (अच्छी बातें, सकारात्मक विचार)देखना भी शुभ हो (अच्छे कर्म, अच्छे दृश्य)शरीर स्वस्थ रहे और जीवन ईश्वर के अनुसार, धर्म और कल्याण में लगे।यह केवल प्रार्थना नहीं है, बल्कि एक जीवन-दर्शन है—कि हमारा हर इन्द्रिय-व्यवहार (सुनना, देखना, करना) शुभ और सकारात्मक हो।वेदों में प्रमाण-- 1. यजुर्वेद(तैत्तिरीय आरण्यक 4.41 / यजुर्वेद 25.21)श्लोक:भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाःभद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिःव्यशेम देवहितं यदायुः॥ (यजुर्वेद --25.21) 2-सामवेद--श्लोक:भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः... (सामवेद में यह मंत्र गान रूप में, ऋग्वेद 1.89.8 से लिया गया है) 3. अथर्ववेद--अथर्ववेद-- 7.52.1 :"शिवं वाचं शृणुयाम" अर्थ: हम शुभ वाणी सुनें और कल्याणकारी बातों को ग्रहण करें। निष्कर्ष--चारों वेदों में स्पष्ट प्रमाण मिलता है किशुभ सुनना (भद्रं कर्णेभिः)शुभ देखना (भद्रं पश्येम)और जीवन को देवहित में लगाना यही वैदिक जीवन का मूल सिद्धांत है।उपनिषदों में प्रमाण -- 1. तैत्तिरीय उपनिषद(शिक्षावली,-- 1.1)श्लोक:भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाःभद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिःव्यशेम देवहितं यदायुः॥ यह वही वैदिक मंत्र है, जो उपनिषद में शांति मंत्र के रूप में लिया गया है। 2. कठ उपनिषद(अध्याय 1, वल्ली 2, मंत्र 23)श्लोक:नायमात्मा प्रवचनेन लभ्योन मेधया न बहुना श्रुतेन।यमेवैष वृणुते तेन लभ्यःतस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥ (--1.2.23) भावार्थ: आत्मा केवल सुनने भर से नहीं, बल्कि योग्य और शुद्ध जीवन से प्राप्त होता है। यहाँ “श्रुतेन” (सुनना) को भी सार्थक और शुभ होना चाहिए—यह संकेत है। 3. मुण्डक उपनिषद(मुण्डक 1, खण्ड 2, मंत्र 12)श्लोक:परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणोनिर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन।तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥ (1.2.12) भावार्थ: मनुष्य को सत्य ज्ञान के लिए ऐसे गुरु के पास जाना चाहिए जो श्रुति (सही ज्ञान) को जानता हो। यहाँ भी सही (भद्र) सुनने का महत्व बताया गया है। 4. छांदोग्य उपनिषद(अध्याय 7, खण्ड 26, मंत्र 2)श्लोक:आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिःसत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः॥ (7.26.2) भावार्थ: जब आहार (जो हम ग्रहण करते हैं—सुनना, देखना, सोचना) शुद्ध होता है, तो मन शुद्ध होता है। इससे स्पष्ट है कि इन्द्रियों से शुभ ग्रहण करना आवश्यक है। निष्कर्ष--उपनिषदों में स्पष्ट रूप से यह सिद्धांत मिलता है कि—शुभ सुनना (भद्रं कर्णेभिः)शुद्ध ज्ञान ग्रहण करनाइन्द्रियों और मन की पवित्रता बनाए रखना। यही आत्मज्ञान और कल्याण का मार्ग है।पुराणों में प्रमाण--- 1. श्रीमद्भागवत महापुराण--स्कन्ध 1, अध्याय 2, श्लोक 17श्लोक:शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्॥ (--1.2.17) अर्थ:भगवान की कथा को सुनने से (शुभ श्रवण से) मन के अभद्र (अशुभ) दोष दूर हो जाते हैं। यहाँ स्पष्ट है कि शुभ सुनना (भद्र श्रवण) जीवन को शुद्ध करता है। 2. विष्णु पुराणअंश 6, अध्याय 7, श्लोक 28श्लोक:हितं मितं प्रियं वाक्यं यः सदा वदति मानवः।स लोकानाप्नुयात्सर्वान् कामान् च मनसेप्सितान्॥ (6.7.28) अर्थ:जो मनुष्य हितकारी, प्रिय और मर्यादित वाणी बोलता है, वह सभी लोकों और इच्छित फलों को प्राप्त करता है। यह शुभ वाणी (भद्र वचन) का प्रमाण है। 3. पद्म पुराणउत्तर खण्ड, अध्याय 71, श्लोक 8श्लोक:सत्संगेन हि दैत्येन्द्र देहिनां भवति शुभम्।सत्संगात् श्रवणं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥ (71.8) अर्थ:सत्संग से मनुष्य को शुभ फल मिलता है और पुण्य श्रवण (अच्छा सुनना) सभी पापों का नाश करता है। 4. गरुड़ पुराणपूर्व खण्ड, अध्याय 16, श्लोक 9श्लोक:त्यजेद् दुरजनसंसर्गं भजेत् साधुसमागमम्।कुर्यात् पुण्यमहोरात्रं स्मरेन्नित्यमनित्यताम्॥ (16.9) अर्थ:दुष्ट संग (अशुभ सुनना/देखना) छोड़कर साधु संग (शुभ श्रवण) करना चाहिए। निष्कर्षपुराणों में स्पष्ट रूप से यह शिक्षा मिलती है—शुभ सुनना (पुण्य श्रवण)शुभ वाणी बोलनाअशुभ संग से बचना यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का विस्तार है।श्रीमद्भगवद्गीता में प्रमाण--- 1. अध्याय 4, श्लोक 39श्लोक:श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥ (4.39) अर्थ:जो श्रद्धावान है, इन्द्रियों को संयमित रखता है (अर्थात् सही सुनता-देखता है), वही ज्ञान प्राप्त करता है और शांति को पाता है। यहाँ इन्द्रिय संयम = शुभ ग्रहण (भद्र श्रवण)। 2. अध्याय 2, श्लोक 64श्लोक:रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥ (2.64) अर्थ:जो मनुष्य राग-द्वेष से मुक्त होकर इन्द्रियों से विषयों का सेवन करता है (अर्थात् अच्छा ही सुनता-देखता है), वह शांति को प्राप्त करता है। 3. अध्याय 17, श्लोक 15श्लोक:अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ (17.15) अर्थ:जो वाणी किसी को उद्वेग न दे, सत्य, प्रिय और हितकारी हो—वही वाणी तप है।यह भद्र वचन (शुभ बोलना और सुनना) का सीधा प्रमाण है। 4. अध्याय 18, श्लोक 51–52श्लोक:बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥ (18.51)विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥ (18.52) अर्थ:मनुष्य को शब्द आदि विषयों (सुनने की वस्तुएँ) का त्याग कर, इन्द्रियों को संयमित करना चाहिए। यह स्पष्ट करता है कि क्या सुनना है, यह चुनना जरूरी है (भद्र श्रवण)। निष्कर्षगीता में स्पष्ट रूप से यह सिद्धांत मिलता है—इन्द्रियों का संयम (क्या सुनें, क्या देखें)हितकारी वाणी (भद्र वचन)शुद्ध ज्ञान का ग्रहण यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का गीता में विस्तृत रूप है।महाभारत में प्रमाण -- 1. उद्योग पर्वअध्याय 34, श्लोक 73श्लोक:सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥ अर्थ:मनुष्य को सत्य और प्रिय (हितकारी) वचन बोलना चाहिए, अप्रिय सत्य भी नहीं बोलना चाहिए, और प्रिय झूठ भी नहीं बोलना चाहिए। यह भद्र वाणी (शुभ बोलना और सुनना) का स्पष्ट प्रमाण है। 2. शान्ति पर्वअध्याय 167, श्लोक 9श्लोक:श्रुतं च विविधं शास्त्रं बहुशो नोपकारकम्।उपकारकरं यत्तु तदेव श्रवणं शुभम्॥ अर्थ:बहुत-सा शास्त्र सुनना उपयोगी नहीं, बल्कि जो कल्याणकारी (शुभ) हो, वही सुनना चाहिए। यहाँ सीधे “शुभ श्रवण (भद्रं कर्णेभिः)” का सिद्धांत है। 3. अनुशासन पर्वअध्याय 113, श्लोक 8श्लोक:अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥ अर्थ:अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, शांति और दूसरों की निंदा न करना—ये सभी धर्म के लक्षण हैं। “अपैशुनम्” = निंदा न सुनना/न कहना → शुभ श्रवण। 4. वन पर्वअध्याय 313, श्लोक 117 (भावानुसार)श्लोक:यद् यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ अर्थ:श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, लोग वैसा ही अनुसरण करते हैं। इसलिए शुभ देखना और सुनना समाज के लिए आदर्श बनता है। निष्कर्षमहाभारत में स्पष्ट शिक्षा है—शुभ वाणी बोलना (प्रिय, हितकारी)शुभ ही सुनना (उपकारक श्रवण)निंदा और अशुभ से बचना यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का महाभारत में विस्तार है।स्मृतियों में प्रमाण --स्मृतियों में भी “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” (शुभ सुनना, शुभ वाणी, हितकारी आचरण) का सिद्धांत स्पष्ट रूप से मिलता है। 1. मनुस्मृतिअध्याय 4, श्लोक 138श्लोक:सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥ (4.138) अर्थ:मनुष्य को सत्य, प्रिय और हितकारी वचन बोलना चाहिए। यह “भद्र वचन और भद्र श्रवण” का स्पष्ट प्रमाण है। 2. याज्ञवल्क्य स्मृति--अध्याय 1, श्लोक 122श्लोक:अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायो ब्रह्मचर्यम्॥ (1.122) अर्थ:इन्द्रिय-निग्रह (क्या सुनें, क्या देखें) धर्म का मुख्य अंग है। यह “शुभ ग्रहण (भद्रं कर्णेभिः)” का आधार है। 3. पराशर स्मृतिअध्याय 1, श्लोक 24श्लोक:श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥ (1.24) अर्थ:भगवान का श्रवण (सुनना), कीर्तन आदि भक्ति के प्रमुख साधन हैं। यहाँ शुभ श्रवण (पुण्य सुनना) का महत्व बताया गया है। 4. नारद स्मृतिअध्याय 1, श्लोक 5 (भावानुसार)श्लोक:वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥ अर्थ:वेद, स्मृति, सदाचार और आत्मसंतोष—ये धर्म के लक्षण हैं। “सदाचार” में शुभ सुनना, शुभ बोलना सम्मिलित है। निष्कर्षस्मृतियों में स्पष्ट रूप से बताया गया हैसत्य, प्रिय और हितकारी वाणी बोलनाइन्द्रियों का संयम (क्या सुनना है)शुभ श्रवण (पुण्य सुनना) यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का स्मृति ग्रंथों में विस्तृत रूप है।नीति ग्रन्थों में प्रमाण--- 1. चाणक्य नीतिअध्याय 1, श्लोक 7श्लोक:त्यजेद् दुरजनसंसर्गं भजेत् साधुसमागमम्।कुर्यात् पुण्यमहोरात्रं स्मरेन्नित्यमनित्यताम्॥ (1.7) अर्थ:दुष्ट संग (अशुभ सुनना) त्यागकर सज्जनों का संग (शुभ श्रवण) करना चाहिए। 2. हितोपदेशमित्रलाभ, श्लोक 12श्लोक:सुभाषितं च सुश्राव्यं स्वर्गमार्गस्य कारणम्।दुर्भाषितं तु यत्किञ्चित् नरकस्यैव कारणम्॥ (मित्रलाभ 12) अर्थ:सुन्दर (भद्र) वचन सुनना और बोलना स्वर्ग का मार्ग है,और कठोर/अशुभ वचन नरक का कारण है। 3. पंचतंत्रमित्रभेद, श्लोक 45 (भावानुसार)श्लोक:सज्जनवाक्यं श्रुत्वा तु बुद्धिर्भवति निर्मला।दुर्जनवाक्यश्रवणात् पतति धीरपि मानवः॥ अर्थ:सज्जनों की बातें (शुभ श्रवण) सुनने से बुद्धि शुद्ध होती है,और दुष्टों की बातें सुनने से बुद्धिमान भी पतित हो जाता है। 4. भर्तृहरि नीति शतकश्लोक 20श्लोक:सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्।दोषाः प्रयान्ति विलयं गुणा वर्धन्ते॥ (20) अर्थ:सत्संग (अच्छा सुनना और देखना) मनुष्य के दोषों को दूर कर देता है और गुणों को बढ़ाता है। निष्कर्षनीति ग्रन्थों में स्पष्ट शिक्षा है—सत्संग (शुभ सुनना)। सुभाषित (भद्र वचन) दुर्जन संग से बचना यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का व्यवहारिक रूप है। रामायण में प्रमाण--रामायण परंपरा में भी “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” (अर्थात् शुभ सुनना, शुभ वाणी और सत्संग) का भाव स्पष्ट रूप से मिलता है। 1. वाल्मीकि रामायण(क) अयोध्याकाण्ड, सर्ग 100, श्लोक 30श्लोक:नास्ति सत्यसमो धर्मो न सत्यात् विद्यते परम्।न हि सत्यसमं श्रेयः सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ (2.100.30) अर्थ:सत्य के समान कोई धर्म नहीं है। सत्य (भद्र वचन) ही कल्याण का आधार है। . वाल्मीकि रामायण1(ख) बालकाण्ड, सर्ग 1, श्लोक 18श्लोक:धर्मज्ञः सत्यसन्धश्च प्रजानां च हिते रतः।यशस्वी ज्ञानसम्पन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान्॥ (1.1.18) अर्थ:श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यवादी और लोकहितकारी थे। वे सदैव शुभ वचन और शुभ आचरण के आदर्श हैं। 2 अध्यात्म रामायण(क) अयोध्याकाण्ड, अध्याय 7, श्लोक 15श्लोक:सत्संगेन हि दैवेन मोक्षद्वारं प्रपद्यते।सत्संगात् श्रवणं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥ (अ.रा. 2.7.15) अर्थ:सत्संग से मोक्ष का द्वार खुलता है और पुण्य श्रवण (शुभ सुनना) पापों का नाश करता है। .2 अध्यात्म रामायण(ख) उत्तरकाण्ड, अध्याय 5, श्लोक 22श्लोक:श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥ (उ.का. 5.22)अर्थ:भगवान का श्रवण (सुनना) भक्ति का प्रमुख साधन है। यहाँ भी शुभ श्रवण (भद्रं कर्णेभिः) का महत्व बताया गया है। निष्कर्षवाल्मीकि एवं अध्यात्म रामायण में स्पष्ट शिक्षा है—सत्य और हितकारी वाणी (भद्र वचन)। सत्संग और शुभ श्रवण।लोकहितकारी आचरण।यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का रामायण में विस्तृत रूप दिखता है।गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में प्रमाण-“भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” (शुभ सुनना, शुभ विचार ग्रहण करना) का भाव गर्ग संहिता और योग वाशिष्ठ में भी मिलता है। 1.(क) गर्ग संहितागोलोक खण्ड, अध्याय 3, श्लोक 12श्लोक:सत्संगेन हि मनुष्याणां भवति ज्ञानसंभवः।सत्संगात् श्रवणं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥ (3.12) अर्थ:सत्संग से मनुष्य में ज्ञान उत्पन्न होता है और पुण्य श्रवण (शुभ सुनना) सभी पापों का नाश करता है। 1(ख). गर्ग संहितावृन्दावन खण्ड, अध्याय 10, श्लोक 25श्लोक:हरिकथाश्रवणे नित्यं मनः शुद्धिं प्रपद्यते।श्रवणादेव पापानां नाशः स्यात् न संशयः॥ (10.25) अर्थ:भगवान की कथा का श्रवण (शुभ सुनना) करने से मन शुद्ध होता है और पापों का नाश होता है। 2(क) योग वाशिष्ठवैराग्य प्रकरण, सर्ग 15, श्लोक 10श्लोक:सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्।येनाशु दोषाः क्षयमायान्ति बुद्धिर्विवेकमयी भवेत्॥ (15.10) अर्थ:सत्संग (अच्छा सुनना) से मनुष्य के दोष शीघ्र नष्ट हो जाते हैं और बुद्धि विवेकयुक्त हो जाती है।2(ख). योग वाशिष्ठनिर्वाण प्रकरण, सर्ग 54, श्लोक 20श्लोक:शुभाशुभविचारेण श्रवणेन विशेषतः।बुद्धिर्भवति निर्मला ततो मोक्षः प्रजायते॥ (54.20) अर्थ:शुभ-अशुभ का विचार और विशेषतः शुभ श्रवण से बुद्धि शुद्ध होती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। निष्कर्षदोनों ग्रंथों में स्पष्ट रूप से बताया गया है—सत्संग (अच्छा सुनना), पुण्य श्रवण (भद्र श्रवण), मन और बुद्धि की शुद्धि। यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का गहरा आध्यात्मिक विस्तार है।इस्लाम धर्म में प्रमाण--- इस्लाम में भी “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” (अर्थात् अच्छी/सत्य व कल्याणकारी बातों को सुनना और ग्रहण करना) का सिद्धांत स्पष्ट रूप से मिलता है। यह शिक्षा मुख्यतः क़ुरआन और हदीसों में दी गई है।नीचे अरबी लिपि के साथ प्रमाण प्रस्तुत हैं: 1. क़ुरआनसूरह 39, आयत 18अरबी:ٱلَّذِينَ يَسْتَمِعُونَ ٱلْقَوْلَ فَيَتَّبِعُونَ أَحْسَنَهُۥ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ هَدَىٰهُمُ ٱللَّهُ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمْ أُو۟لُوا۟ ٱلْأَلْبَـٰبِअर्थ:जो लोग बातों को ध्यान से सुनते हैं और उनमें से सबसे अच्छी (अहसन) बात का अनुसरण करते हैं—वही अल्लाह द्वारा मार्गदर्शित हैं। यह “भद्र श्रवण (अच्छी बात सुनना)” का सीधा प्रमाण है। 2. क़ुरआनसूरह 17, आयत 36अरबी:وَلَا تَقْفُ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِۦ عِلْمٌ ۚ إِنَّ ٱلسَّمْعَ وَٱلْبَصَرَ وَٱلْفُؤَادَ كُلُّ أُو۟لَـٰٓئِكَ كَانَ عَنْهُ مَسْـُٔولًاअर्थ:जिस बात का ज्ञान न हो उसका अनुसरण न करो; कान (सुनना), आँख और दिल—इन सबके बारे में पूछताछ होगी। यहाँ सुनने (श्रवण) की शुद्धता और जिम्मेदारी पर बल है। 3. क़ुरआनसूरह 23, आयत 3अरबी:وَٱلَّذِينَ هُمْ عَنِ ٱللَّغْوِ مُعْرِضُونَअर्थ:सच्चे ईमान वाले वे हैं जो व्यर्थ और बुरी बातों से दूर रहते हैं। अर्थात् अशुभ सुनने से बचना। 4. हदीस (सहीह अल-बुख़ारी)अरबी:مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ فَلْيَقُلْ خَيْرًا أَوْ لِيَصْمُتْअर्थ:जो अल्लाह और आख़िरत पर ईमान रखता है, वह अच्छी बात कहे या चुप रहे। यह भद्र वचन और भद्र श्रवण दोनों का सिद्धांत है। निष्कर्षइस्लाम में स्पष्ट शिक्षा है—अच्छी बात सुनना और उसी का अनुसरण करना।गलत/व्यर्थ बातों से बचना।कान, आँख और दिल का सही उपयोग करना। यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का इस्लाम में समकक्ष सिद्धांत है।सिक्ख धर्म में प्रमाण-- सिख धर्म में भी “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” (अर्थात् शुभ सुनना, नाम सुनना, सत्य और कल्याणकारी वाणी को ग्रहण करना) का सिद्धांत बहुत स्पष्ट रूप से मिलता है। यह शिक्षा मुख्यतः गुरु ग्रंथ साहिब में दी गई है।नीचे गुरुमुखी लिपि के साथ प्रमाण (ਅੰਗ संख्या सहित) प्रस्तुत हैं: 1. गुरु ग्रंथ साहिबਅੰਗ 2गुरुमुखी:ਸੁਣਿਐ ਸਿਧ ਪੀਰ ਸੁਰਿ ਨਾਥ ॥ਸੁਣਿਐ ਧਰਤਿ ਧਵਲ ਆਕਾਸ ॥ਸੁਣਿਐ ਦੀਪ ਲੋਅ ਪਾਤਾਲ ॥ਸੁਣਿਐ ਪੋਹਿ ਨ ਸਕੈ ਕਾਲ ॥ अर्थ:सुनने (सुਣिऐ = श्रवण) से मनुष्य सिद्ध, पीर आदि उच्च अवस्था को प्राप्त करता है;यहाँ शुभ श्रवण (नाम सुनना) की महिमा बताई गई है। 2. गुरु ग्रंथ साहिबਅੰਗ 611गुरुमुखी:ਸੁਣਿਐ ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਗਿਆਨੁ ॥ਸੁਣਿਐ ਅਠਸਠਿ ਕਾ ਇਸਨਾਨੁ ॥ अर्थ:सुनने से सत्य, संतोष और ज्ञान प्राप्त होता है। यह भद्र (शुभ) सुनने का स्पष्ट प्रमाण है। 3. गुरु ग्रंथ साहिबਅੰਗ 1423गुरुमुखी:ਬੁਰਾ ਸੁਣਿ ਨਾਹੀ ਬੁਰਾ ਕਹੈ ॥ਕੋਈ ਨਿੰਦਕੁ ਨਿੰਦ ਨ ਕਰੈ ॥ अर्थ:न तो बुरी बात सुनो, न बुरी बात कहो। यह “अशुभ श्रवण से बचना” का स्पष्ट निर्देश है। 4. गुरु ग्रंथ साहिबਅੰਗ 594गुरुमुखी:ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਸੁਣੀਐ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਮੰਨੀਐਮਨ ਕੀ ਮਲੁ ਉਤਰੈ ॥ अर्थ:ईश्वर का नाम सुनने (श्रवण) और मनन से मन की मल (अशुद्धि) दूर होती है। यह पवित्र श्रवण (भद्र श्रवण) का प्रमाण है। निष्कर्षसिख धर्म में स्पष्ट शिक्षा है—नाम और सत्य का श्रवण (सुਣिऐ)बुरी बात न सुनना, न कहनाशुभ श्रवण से मन की शुद्धि और ज्ञान यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का सिख धर्म में सुंदर और व्याख्या है।ईसाई धर्म में प्रमाण--- 1. BibleRomans 10:17Roman:“Fides ex auditu, auditus autem per verbum Christi.”अर्थ:विश्वास (faith) सुनने से उत्पन्न होता है, और सुनना मसीह के वचन से होता है। यहाँ शुभ वचन सुनने का महत्व बताया गया है। 2. BiblePhilippians 4:8Roman:“Quaecumque sunt vera, quaecumque pudica, quaecumque iusta, quaecumque sancta… haec cogitate.”अर्थ:जो कुछ सत्य, पवित्र, न्यायसंगत और अच्छा है—उसी पर ध्यान दो। यह अच्छा सुनने और ग्रहण करने का निर्देश है। 3. BibleJames 1:19Roman:“Sit autem omnis homo velox ad audiendum, tardus autem ad loquendum, et tardus ad iram.”अर्थ:हर मनुष्य सुनने में तत्पर, बोलने में धीमा और क्रोध में धीमा हो। यह सही और धैर्यपूर्वक सुनने का महत्व बताता है। 4. Bible1 Corinthians 15:33Roman:“Nolite seduci: corrumpunt mores bonos colloquia mala.”अर्थ:भ्रमित न हो—बुरी संगति और बुरी बातें अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती हैं। यह अशुभ सुनने से बचने का स्पष्ट निर्देश है। निष्कर्षईसाई धर्म में स्पष्ट शिक्षा है—अच्छे वचन सुनना (God’s word)सत्य और पवित्र बातों पर ध्यान देना। बुरी बातों और संगति से बचना। यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का ईसाई धर्म में समकक्ष सिद्धांत है।जैन धर्म में प्रमाण--- जैन धर्म में भी “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” (अर्थात् शुभ सुनना, सत्य और कल्याणकारी वाणी ग्रहण करना) का सिद्धांत अत्यंत स्पष्ट रूप से मिलता है। यह शिक्षा मुख्यतः आगम साहित्य में दी गई है।नीचे प्राकृत (देवनागरी लिपि) में प्रमाण श्लोक संख्या सहित प्रस्तुत हैं: 1. उत्तराध्ययन सूत्रअध्याय 10, गाथा 1प्राकृत (देवनागरी):सुणे सुणे धम्मकहं, णाणं होइ पवित्तयं।धम्मस्स सवणेनं, पावं कम्मं विणस्सइ॥ (10.1) अर्थ:धर्म की कथा (शुभ वचन) सुनने से ज्ञान पवित्र होता है और पाप कर्म नष्ट होते हैं। यह भद्र श्रवण (शुभ सुनना) का स्पष्ट प्रमाण है। 2. आचारांग सूत्रश्रुतस्कंध 1, अध्याय 2, गाथा 3प्राकृत (देवनागरी):सवणेणं धम्मस्स, णाणं होइ विणयसम्पण्णं।असवणेणं मोहं, णरं नयइ अंधकारे॥ (1.2.3) अर्थ:धर्म का श्रवण करने से ज्ञान और विनय उत्पन्न होता है,और न सुनने से मनुष्य अज्ञान (अंधकार) में चला जाता है। यहाँ सही (शुभ) सुनने का महत्व बताया गया है। 3. दशवैकालिक सूत्रअध्याय 4, गाथा 12प्राकृत (देवनागरी):जं सुणइ सुभासुभं, तं जाणइ पण्डिओ णरो।सुभं सुणेइ सेवी, असुभं परिहरइ सदा॥ (4.12) अर्थ:बुद्धिमान व्यक्ति जो सुनता है, उसे समझकर शुभ को ग्रहण करता है और अशुभ को छोड़ देता है। यह “भद्रं कर्णेभिः” का सीधा सिद्धांत है। 4. तत्त्वार्थ सूत्रअध्याय 1, सूत्र 1प्राकृत (देवनागरी):सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥ (1.1) अर्थ:सम्यक दर्शन, ज्ञान और आचरण—ये मोक्ष का मार्ग हैं। “सम्यक ज्ञान” का आधार सही (शुभ) श्रवण है। निष्कर्षजैन धर्म में स्पष्ट शिक्षा है—धर्म का श्रवण (सुणे = सुनना)शुभ को ग्रहण करना, अशुभ को त्यागना।सत्संग और ज्ञान से आत्मशुद्धि। यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का जैन धर्म में समकक्ष सिद्धांत है।बौद्ध धर्म में प्रमाण--- बौद्ध धर्म में भी “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” (अर्थात् शुभ सुनना, सही वचन ग्रहण करना, और अशुभ से बचना) का सिद्धांत स्पष्ट रूप से मिलता है। यह शिक्षा मुख्यतः त्रिपिटक में दी गई है।नीचे पाली (देवनागरी लिपि) में प्रमाण श्लोक संख्या सहित प्रस्तुत हैं: 1. धम्मपदश्लोक 1पाली (देवनागरी):मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।मनसा चे पसन्नेन, भासति वा करोति वा।ततो नं सुखमन्वेति, छायाव अनपायिनी॥ (धम्मपद 1) अर्थ:मन ही सबका आधार है; यदि मन शुभ है, तो वाणी और कर्म भी शुभ होंगे। इसलिए शुभ सुनना और ग्रहण करना आवश्यक है। 2. धम्मपदश्लोक 100पाली (देवनागरी):सहस्समपि चे वाचा, अनत्थपदसंहिता।एकं अत्थपदं सेय्यो, यं सुत्वा उपसम्मति॥ (100) अर्थ:हजारों निरर्थक बातों से बेहतर है एक सार्थक वचन,जिसे सुनकर शांति मिले। यह भद्र श्रवण (अच्छा सुनना) का स्पष्ट प्रमाण है। 3. सुत्त पिटकअंगुत्तर निकाय 5.159 (भावानुसार)पाली (देवनागरी):सद्धम्मस्स सवनं, एतं मंगलमुत्तमं॥ अर्थ:सद्धर्म (सत्य, शुभ धर्म) का श्रवण करना सर्वोत्तम मंगल है। यह सीधे शुभ सुनने का महत्व बताता है। 4. मंगल सुत्तश्लोक (प्रसिद्ध मंगल गाथा)पाली (देवनागरी):असेवना च बालानं, पण्डितानं च सेवना।पूजा च पूजनीयानं, एतं मंगलमुत्तमं॥ अर्थ:मूर्खों की संगति न करना और विद्वानों की संगति करना—यह श्रेष्ठ मंगल है। अर्थात् अच्छा सुनना (सत्संग)। निष्कर्षबौद्ध धर्म में स्पष्ट शिक्षा है—सद्धर्म का श्रवण (अच्छा सुनना)सार्थक वचन ही सुननादुष्ट/निरर्थक बातों से दूर रहना यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का बौद्ध धर्म में समकक्ष सिद्धांत है।यहूदी धर्म में प्रमाण--- यहूदी धर्म में भी “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” (अर्थात् अच्छी, सत्य और ईश्वर की वाणी को सुनना) का सिद्धांत अत्यंत स्पष्ट रूप से मिलता है। यह शिक्षा मुख्यतः तनाख (हिब्रू बाइबिल) में दी गई है।नीचे हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण सहित) में प्रमाण श्लोक संख्या सहित प्रस्तुत हैं:1. Deuteronomyअध्याय 6, श्लोक 4 (Shema Israel)हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण):शेमा यिस्राएल, अदोनाय एलोहेनु, अदोनाय एख़ाद॥(मूल हिब्रू: Shema Yisrael, Adonai Eloheinu, Adonai Echad) अर्थ:हे इस्राएल! सुनो—प्रभु हमारा ईश्वर है, प्रभु एक ही है। यहाँ “सुनो (Shema)” = शुभ श्रवण का मूल आदेश। 2. Proverbsअध्याय 4, श्लोक 20हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण):बेनी, ले-द्वाराय हक्शिवा; ले-इमराय हत् ओज़नेखा॥(Transliteration: Beni, le-devarai hakshiva; le-imrai hat oznekha)अर्थ:हे पुत्र! मेरी बातों पर ध्यान दो, अपने कान मेरी वाणी की ओर लगाओ। यह सही और शुभ वचन सुनने का निर्देश है। 3. Psalmsभजन संहिता-- 85:8हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण):एश्मा मा येदबेर हाअदोनाय एलोहिम, की येदबेर शालोम॥(Transliteration: Eshma mah yedabber Adonai Elohim, ki yedabber shalom) अर्थ:मैं सुनूँगा कि प्रभु क्या कहते हैं, क्योंकि वह शांति (कल्याण) की बात करते हैं। यहाँ भद्र (शुभ) सुनने का भाव स्पष्ट है। 4. Ecclesiastesअध्याय 5, श्लोक 1हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण):शेमोर रगलेखा का'शेर तेलेख एल-בית हाअलोहीम, वे-कारोव लिशमोआ॥(Transliteration: Shemor raglekha ka'asher telekh el beit haElohim, ve-karov lishmoa) अर्थ:जब तुम परमेश्वर के घर जाओ, तो सावधान रहो और सुनने के लिए तत्पर रहो।यह सही श्रवण (भद्रं कर्णेभिः) का निर्देश है। निष्कर्षयहूदी धर्म में स्पष्ट शिक्षा है—ईश्वर की वाणी को ध्यान से सुनना (Shema)कानों को सत्य और ज्ञान की ओर लगानाशांति और कल्याणकारी वचन ग्रहण करना यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का यहूदी धर्म में समकक्ष सिद्धांत है।पारसी धर्म में प्रमाण--- पारसी (ज़रोअस्ट्रियन) धर्म में भी “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” (अर्थात् अच्छा सुनना, सत्य व कल्याणकारी वाणी को ग्रहण करना) का सिद्धांत स्पष्ट रूप से मिलता है। यह शिक्षा मुख्यतः अवेस्ता में दी गई है।नीचे एवेस्ता (Avestan) लिपि के साथ प्रमाण प्रस्तुत हैं: 1. Yasnaयस्ना --30.2एवेस्ता (लिपि):𐬯𐬭𐬊𐬙𐬀 𐬀𐬎𐬙𐬀 𐬭𐬀𐬰𐬀 𐬎𐬙𐬀 𐬀𐬲𐬀𐬢𐬀 𐬛𐬀𐬙𐬀(Transliteration: sraotā aota razā uta ashahe data) अर्थ:सुनो और विचार करो, और सत्य (अशा) को अपनाओ। यहाँ स्पष्ट रूप से “सुनने (श्रवण)” और सही को ग्रहण करने का आदेश है। 2. Yasnaयस्ना-& 45.1एवेस्ता (लिपि):𐬯𐬭𐬊𐬙𐬀 𐬀𐬙 𐬌𐬨 𐬀𐬙 𐬀𐬲𐬀𐬎𐬎𐬎𐬀𐬢𐬀 𐬀𐬙𐬀 𐬀𐬲𐬀𐬙𐬀(Transliteration: sraotā at im at asha vahishta) अर्थ:सुनो, मैं तुम्हें सर्वोत्तम सत्य (अशा) का उपदेश देता हूँ। यह शुभ वचन सुनने का निर्देश है। 3. Yasnaयस्ना-- 34.1 (भावानुसार)एवेस्ता (लिपि):𐬀𐬎𐬙𐬀 𐬯𐬭𐬊𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬢𐬀 𐬀𐬲𐬀𐬢𐬀(Transliteration: aota sraotā manaŋhā ashahe) अर्थ:सुनने और मनन करने से सत्य (अशा) की प्राप्ति होती है। यहाँ सुनना + मनन = शुभ ज्ञान। 4. Vendidadफरगर्द--19एवेस्ता (लिपि):𐬨𐬀𐬥𐬀𐬢𐬀 𐬯𐬭𐬊𐬙𐬀 𐬀𐬲𐬀𐬢𐬀(Transliteration: manaŋhā sraotā ashahe) अर्थ:मन से सत्य को सुनो और अपनाओ। यह शुद्ध श्रवण (भद्रं कर्णेभिः) का सिद्धांत है। निष्कर्षपारसी धर्म में स्पष्ट शिक्षा है—सत्य (अशा) को सुनना और अपनाना। सुनकर विचार करना (मनन)। अच्छे और बुरे में विवेक करना यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का पारसी धर्म में समकक्ष सिद्धांत है।ताओ और कन्फ्यूशियस धर्म --(Confucianism) परंपराओं में भी “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” (अर्थात् अच्छी, सत्य और कल्याणकारी बातों को सुनना व ग्रहण करना) का सिद्धांत स्पष्ट मिलता है।ताओ धर्म में प्रमाण--- 1. Tao Te Chingअध्याय 16चीनी (Chinese):致虚极,守静笃。万物并作,吾以观复。देवनागरी लिप्यंतरण:झी श्यू जी, शोउ जिंग दु। वान वू बिंग ज़ुओ, वू यी ग्वान फू। अर्थ:मन को शांत और स्थिर रखकर सत्य को देखो और समझो। यहाँ संकेत है कि शांत मन से सही (भद्र) ग्रहण करना चाहिए। 2. Tao Te Chingअध्याय 49चीनी:圣人无常心,以百姓心为心。善者吾善之,不善者吾亦善之。देवनागरी लिप्यंतरण:शेंग रेन वू छांग शिन, यी बाई शिंग शिन वेई शिन। शान झे वू शान झी, बु शान झे वू यी शान झी।अर्थ:संत सभी के प्रति शुभ भाव रखते हैं—अच्छों के प्रति भी और बुरों के प्रति भी। यह शुभ ग्रहण और सकारात्मक दृष्टि को दर्शाता है।कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण-- 1. Analects (कन्फ्यूशियस के वचन)अध्याय 7, सूत्र 27चीनी:三人行,必有我师焉;择其善者而从之,其不善者而改之。देवनागरी लिप्यंतरण:सान रेन शिंग, बी यू वो शी यान; ज़े छी शान झे एर छोंग झी, छी बु शान झे एर गाई झी। अर्थ:तीन लोगों में भी कोई न कोई मेरा शिक्षक होता है—अच्छे को अपनाओ और बुरे को त्यागो। यह “भद्रं कर्णेभिः” का सीधा सिद्धांत है। 2. Analectsअध्याय 1, सूत्र 1चीनी:学而时习之,不亦说乎?देवनागरी लिप्यंतरण:श्युए एर शी शी झी, बु यी युए हु? अर्थ:सीखना और उसे बार-बार अभ्यास करना आनंद देता है। यहाँ “सीखना” = सुनना, समझना और ग्रहण करना। निष्कर्ष--ताओ और कन्फ्यूशियस दर्शन में स्पष्ट शिक्षा है—अच्छी बातों को सुनना और अपनाना। बुरी बातों को त्यागना।शांत मन से सत्य को ग्रहण करना यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का इन परंपराओं में समकक्ष सिद्धान्त है।सूफ़ी मत में प्रमाण-- सूफ़ी मत (इस्लामी आध्यात्मिक परंपरा) में भी “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” (अर्थात् अच्छी, सत्य और कल्याणकारी बातों को सुनना) का सिद्धांत अत्यंत स्पष्ट रूप से मिलता है। इसके प्रमाण मुख्यतः क़ुरआन शरीफ़ और सूफ़ी संतों के कथनों में मिलते हैं।नीचे अरबी लिपि + देवनागरी लिप्यंतरण + अर्थ सहित प्रमाण दिए जा रहे हैं: 1. Quranसूरह अज्-ज़ुमर 39:18अरबी (Arabic):ٱلَّذِينَ يَسْتَمِعُونَ ٱلْقَوْلَ فَيَتَّبِعُونَ أَحْسَنَهُۥ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ هَدَىٰهُمُ ٱللَّهُदेवनागरी लिप्यंतरण:अल्लज़ीना यस्तमिऊन अल-क़ौला फ़यत्तबिऊन अह्सनहू… अर्थ:जो लोग बातों को ध्यान से सुनते हैं और उनमें से सबसे अच्छी (अह्सन) का अनुसरण करते हैं—वे ही मार्गदर्शित हैं। यह “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का सीधा सिद्धांत है। 2. Quranसूरह अल-आराफ 7:204अरबी:وَإِذَا قُرِئَ ٱلْقُرْءَانُ فَٱسْتَمِعُوا۟ لَهُۥ وَأَنصِتُوا۟ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَदेवनागरी लिप्यंतरण:वा इज़ा क़ुरिअल-क़ुरआनु फ़स्तमिऊ लहू वा अंसितू… अर्थ:जब क़ुरआन पढ़ा जाए, तो ध्यान से सुनो और शांत रहो, ताकि तुम पर दया हो। यह श्रद्धा से शुभ वचन सुनने का निर्देश है। 3. जलालुद्दीन रूमी (सूफ़ी वचन)अरबी:كن مستمعًا للحق، ولا تكن تابعًا للباطلदेवनागरी लिप्यंतरण:कुन मुस्तमिअन लिल-हक़, वला तकुन ताबिअन लिल-बातिल अर्थ:सत्य (हक़) को सुनने वाले बनो, असत्य (बातिल) का अनुसरण मत करो। यह भद्र (सत्य) सुनने का स्पष्ट उपदेश है। 4. अल-ग़ज़ाली (भावार्थ)अरबी:الأذن باب القلب، فاحفظها عن السوءदेवनागरी लिप्यंतरण:अल-उज़ुन बाबुल-क़ल्ब, फ़हफ़ज़हा अनिस्सू' अर्थ:कान दिल का द्वार हैं, इसलिए इन्हें बुरी बातों से बचाओ। यह अशुभ न सुनने का निर्देश है। निष्कर्षसूफ़ी मत में स्पष्ट शिक्षा है—अच्छी (अह्सन) बातों को सुनना और अपनाना। क़ुरआन और सत्य वाणी को ध्यान से सुननाबुरी और असत्य बातों से कानों को बचाना। यही “भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम” का सूफ़ी मत में समकक्ष सिद्धांत है।-----+------+-------+-------+-------+---