बेचैन Rakhi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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बेचैन

                                                                         सुबह - सुबह जल्दी उठकर सीता
 कॉलेज जाने के लिए तैयार हो रही थी , अपना टिफिन बनाया, सभी को नाश्ता दे वो कॉलेज के लिए निकल गई, रास्ते में सीता अपनी प्रेजेंटेशन के बारे में सोच रही थी, क्या बोलना है, कैसे बोलना है, क्या - क्या उदाहरण लेगी कैसे ' नीतीश ने उस वैश्या के साथ अपना बदला लिया केवल इसलिए ,क्योंकि उसकी बहन को कुछ दरिंदे उठा ले गए थे,और वह वैश्या केवल उस धर्म से संबंधित थी , तो उसने अपनी बहन का बदला उससे ले लिया और उसके पैसे भी नहीं दिए !

, सीता सोच रही थी, “मेरा टॉपिक एक दम सही “
है,”
“लज्जा उपन्यास की समीक्षा” इस समीक्षा में वो 2020 के दंगों , और शांति बनाए रखने की बात भी कहेगी तो उसकी प्रेजेंटेशन और भी अच्छी होगी।
जैसे ही वो कॉलेज पहुंची तो पता चलता है कि आज क्लास नहीं होगी ! वो जाकर अपनी सीट पर बैठ गई और अपना फ़ोन चलाने लगी तभी उसने पढ़ा की एक 30 साल की लड़की का 7,8 लोगो ने रेप किया , उसके साथ 25 बार से अधिक रेप किया गया उसका मुंह दबाया, उसके हाथ पैर सब बुरी तरह से नोच दिए गए थे गर्दन की हड्डी तोड़ दी गई थी, पैर चीर दिए गए थे। “वी वांट जस्टिस,” “नो मींस नो “और भी न जाने कितने शब्द एक साथ उसके दिमाक में घूमने लगे, कॉलेज में भी उन्हीं सब मुद्दों पर चर्चा हो रही थी।
सीता का कॉलेज में मन नहीं लग रहा था ।
वो क्लास में रहकर भी क्लास में न थी , उसका मन बैचेन था। रास्ते में भी खुद को छुपाती - सकुचाती सी, घर की ओर ही जाती मन में एक अजीब से बेचैनी लिए बस वो चलती जाती है । स्टेशन पहुंची तो बहुत तेज बारिश हो रही थी , वो रुक नहीं सकती थी ,
  “पर बारिश में कैसे जाऊं?, लेट हो गई तो मम्मी बोलेंगी की इतना लेट कैसे हो गई ? चलो बारिश में ही चलती हूं” , वो तेज़ - तेज़ कदमों के साथ , अपने चारों और देखती हुई घर की ओर चल देती है ।
 रास्ते में पहुंचते ही वह पुरी तरह से गीली हो गई थी, बारिश और भी तेज हो जाती है,उसने अपना बैग थामा और चुपचाप सुनसान रास्ते पर चली जा रही थी बारिश की वजह से रास्ता खाली था , कुछ साफ़ साफ़ दिख भी नहीं रहा था, तभी उसे रोड़ के दायें तरफ़ से , हंसने और चिल्लाने की आवाज़ आई,वो डर गई, उसे लगा जैसे कोई उसी की तरफ इशारे करके चिल्ला रहे हो , उसके कदम और भी तेज़ तेज़ उठने लगे , उसे रास्ते पर कुछ साफ़ दिखाई नही , पर हल्का हल्का सुनाई जरूर दे रहा था , “कहां जा रही हो इतनी तेज बारिश में? ,यहां भी आ जाओ ना “
और भी न जाने कैसी - कैसी बाते, पर उसे कुछ नहीं समझ आ रहा था, उसे बस अपना घर दिख रहा था जहां उसे जल्द से जल्द पहुंचना था, पता नहीं क्यों!
तभी उसके मन में उसकी टीचर द्वारा कही गई बात याद आई जो उन्होंने क्लास में पढ़ाते वक्त बोली थी, कि “लड़कियों के लिए एक सड़क अपने घर पहुंचने का रास्ता होती और पुरुषों के लिए मौज………..!”
ये सोचते - सोचते उसे एहसास हुआ कि वो घर पहुंच चुकी है।

 जब वो घर आई तो चुप- चाप बाथरूम में जाकर अपने कपड़े बदले और आकर सो गई , उसकी मम्मी ने बोला क्या हुआ खाना तो खा लेती बेटा फिर सो जाना ,सीता ने रूंधे हुए स्वर में बोला मेरे सिर में सर्द है, मुझे थोड़ा सो लेने दीजिए । “अच्छा ठीक थोड़ा आराम कर लो फिर खा लेना” ।
रात को सीता जब रसोई में खाना बना रही थी तो उसे कॉलेज में पढ़ी वो बाते याद आने लगीं “नो मींस नो “
वी वांट जस्टिस “, स्टॉप ब्लेमिंग विक्टिम्स” उसे लगा इतनी बड़ी बात हो गई है ,तो उसके घर में भी सभी को पता ही होगा , आखिर वो लोग भी सोशल मीडिया यूज करते हैं। पर उसने देखा कोई भी उस विषय पर बात नहीं कर रहा था , सबको खाना देकर सीता भी सोने चली गई। सोने से पहले उसे फ़ोन चलाने की आदत थी, पर आज उसके हाथ कांप रहे थे, उसे लगा अगर वो फोन चालू करेगी तो फिर से वही बाते, वही शब्द !
वो बैचेन होने लगी, उसे नींद नही आ रही थी, उसने फ़ोन ऑन कर ही लिया , जैसे ही उसने उस लड़की का चेहरा देखा , लोग उसके के लिए मोर्चे निकाल रहे, उसे न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे हैं।उसमे लड़के और लड़की सभी थे, जैसे ही सीता न उसके रोते हुए मां- बाप को देखा उससे रहा नहीं गया वो रोने लगी, रात हो गई थी तो वो ज्यादा तेज़ रो भी नहीं सकती थी वरना सब पूछेंगे क्यों रो रही है?, “रात में अचानक लड़की का रोना घर वालो के लिए चिंता का विषय बन सकता था।”
उसने बढ़ी मुश्किल से ख़ुद को शांत किया, और सोचते - सोचते सो गई।
सुबह उठी तो पता चला आज तो 78 वाँ स्वतंत्रता दिवस था, तब अचानक ही उसे कल की सारी घटना फिर याद आ गई, सारा काम समाप्त करके वह अपने कमरे में बैठी अपना फोन देखने लगी , सभी 15 अगस्त की शुभकामनाएं दे रहे थे , स्टेटस लगा रहे थे पर उसका मन नहीं किया वो सोच रही थी ,कैसी आजादी!


उस दिन चारो तरफ स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा था, 78 वाँ स्वतंत्रता दिवस था, पर सीता बेचैन थी , वो सोच रही थी की,” गांधी जी ने कहा था जिस दिन हमारे देश की लड़की रात के समय भी पूरी आज़ादी से चल सके समझ लेना वो दिन ही हमारी आजादी का दिन है”

 हमे अंग्रजों से तो आज़ादी मिल गई थी, पर पुरुषों की हवस , समाज की मर्यादाओं, लोग क्या कहेंगे, न जाने कितने ख्यालों के हम आज भी गुलाम थे।

सीता सारा दिन चुपचाप बस अपनी नोबेल पढ़ रही थी, बीच - बीच में उसके भाई आकर उसे हंसाने की कोशिश करते, उनकी मुस्कान साथ सीता भी अपनी एक मुस्कान जोड़ देती थी।
रात हो चुकी सभी खाना खाकर एक कमरे में बैठे थे पर सीता बाहर बालकिनी में जाकर कुर्सी पर बैठ गई और गली में देखने लगी, सभी ऑलमोस्ट सो चुके थे। सीता कभी गली में देखती कभी चांद को , फिर उसे अपने साथ और उस लड़की के साथ हुई घटनाएं याद आने लगी थी, वही शब्द” वी वांट जस्टिस,” नो मींस नो “
स्टॉप ब्लेमिंग विक्टिम्स,वो फिर बेचैन हो उठी , इसी के साथ साथ सीता को 2012 में हुआ निर्भया रेप हत्याकांड याद आ गया, जिसके बारे में उसने कुछ दिन पहले ही पढ़ा था, जब यह घटना हुई थी, तब सीता बहुत छोटी थी, उसे इन सबके बारे में इतना पता नहीं था, पर अब वो बड़ी हो चुकी थी, वो सब जानती थी। एक - एक करके सीता के सामने अनगिनत रेप, गैंगरेप, हाथरस,मृत शरीर के साथ रेप,3 साल की बच्ची के साथ रेप, और भी न जाने कितने चित्र उभरने लगे । तभी अचानक उसे गली से किसी के बात करने की आवाज सुनाई दी, वो लोग उसी घटना के बारे में बाते कर रहे थे।
एक बोला “अरे हमने तो सुना था आजकल लड़कियां तो लड़कों के बराबर हो गईं हैं तो उसने अपनी रक्षा क्यों नहीं की” , “वो खुद को क्यों नहीं बचा पाई””?
दूसरा बोला , अरे! वो 7,8 थे।
तीसरा बोला उनमें से एक मैं भी होता। “आज कल सारी लड़कियों को मॉडर्न बनना है, अपने पैरों पर खड़ा होना, कपड़े तो देखो उनको , इन्ही सब की वजह से ऐसे किस्से आए दिन सुनने को मिलते रहते है”, पहला बोला “अरे मैने तो उस लड़की का सोशल मीडिया अकाउंट भी देखा , "लड़को के साथ भी घूमना फिरना रहता था ,क्या पता उन्हीं में से कोई हो ?
“सही कहते है लोग, लड़का और लडकी कभी दोस्त नहीं हो सकते। 
दूसरा बोला हमारे दादा भी कहते हैं "लड़का लोहा होता है, और लड़की सोना, और सोने को तो घर में ही रखा जाता तिजोरी के अंदर, और लोहे को घर बाहर भी डाल दो कोई फर्क नहीं पड़ता" 

सीता ये सुनकर दंग रह गई , उसके कानों में बार - बार उन्हीं तीनों की आवाज़ गूंजती रहती है,वो बालकनी हटकर अपने कमरे में आ जाती है, अंदर जो कुछ उलझा सा था वो और भी टूट सा जाता है -
“वो सब ये इसलिए बोल पा रहे थे, क्योंकि उनके घर की इज़्ज़त घर के अंदर चार दिवारी में कैद थी!
इनकी बाते सुन उसे एक महिला नेता का बयान याद आ गया वो कह रही थी " आज - कल रेप का मुख्य कारण लड़का और लड़की इतना ज्यादा मेल जोल है “
वो रोना चाहती थी बहुत तेज !
सीता सोच रही थी एक ये लोग हैं दूसरी तरफ वो लड़के जो उसके लिए लड़ रहे थे," सिर्फ परवरिश का फर्क था।"

यही सब सोचते सोचते उसकी आंखो से आंसू बहने लगे और वो बोलती गई, The fight has changed but emotion have not!
“नो हैप्पी इंडिपेंडेंस डे, ईट इज ए ब्लैक डे”!


राखी