लखनऊ के चौक मोहल्ले में राधा अपने छोटे से घर में अकेली रहती थी। पापा के जाने के बाद से घर बहुत सूना हो गया था। एक दिन राधा ने सोचा कि बहुत दिनों से अलमारी साफ नहीं की। उसने पुराने कपड़े, किताबें, और फोटो निकालने शुरू किए।
अचानक एक पीली पड़ चुकी डायरी के पीछे से एक लिफाफा गिरा। लिफाफा बहुत पुराना था और उस पर लाल स्याही से लिखा था – “मेरी प्यारी राधा के लिए”। राधा ने लिफाफा उठाया। उसकी लिखावट देखकर दिल जोर से धड़कने लगा। ये उसके पापा की लिखावट थी।
राधा कांपते हाथों से लिफाफा खोला। अंदर एक खत था, तारीख थी 12 साल पहले की। खत में लिखा था:
“मेरी प्यारी बिटिया राधा,
जब तुम ये खत पढ़ोगी तब शायद मैं तुम्हारे पास न रहूं। मैं जानता हूं मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हूं, पर एक बात हमेशा याद रखना – मेहनत से बड़ा कोई धन नहीं। तुम्हारी अम्मा चली गई, अब मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी तुम हो। तुम पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी होना। कभी किसी के आगे हाथ मत फैलाना।
और हां, अलमारी के सबसे निचले खाने में एक छोटा सा डिब्बा रखा है। उसमें तुम्हारे लिए कुछ रखा है। उसे तब खोलना जब तुम्हें लगे कि अब तुम अकेली हो।
तुम्हारा पापा”
राधा की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने जल्दी से अलमारी का सबसे निचला खाना खोला। वहां एक छोटा लोहे का डिब्बा रखा था। डिब्बे में एक सोने की पतली चेन और एक बैंक की पासबुक थी। पासबुक पर राधा का नाम था और उसमें बीस हजार रुपये जमा थे। पापा ने चुपचाप उसके नाम से पैसे जमा किए थे।
उस दिन राधा को समझ आया कि पापा हमेशा उसके साथ थे। उन्होंने मरने से पहले भी उसका भविष्य सुरक्षित कर दिया था। राधा ने तय किया कि वो उन पैसों से सिलाई मशीन खरीदेगी। उसे बचपन से कपड़े सिलने का शौक था।
अगले महीने राधा ने घर के एक कोने में छोटी सी सिलाई की दुकान खोल ली। धीरे-धीरे मोहल्ले की औरतें उसके पास कपड़े सिलवाने आने लगीं। राधा दिन-रात मेहनत करती।
छह महीने बाद राधा के पास इतने पैसे हो गए कि उसने पापा के टीलिए मंदिर में पूजा करवाई। उसने मन ही मन कहा – “पापा, आपका खत मेरी ताकत बन गया। आपने मुझे सिखाया कि अकेले भी खड़े हुआ जा सकता है।”
आज राधा उस पुराने खत को फ्रेम करवाकर दीवार पर टांगती है। जब भी हिम्मत टूटने लगती है, वो उस खत को पढ़ लेती है। उसे लगता है जैसे पापा फिर से कह रहे हों – “बिटिया, डरना मत। मेहनत करती रहो।”
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। राधा अब मोहल्ले की दूसरी लड़कियों को भी सिलाई सिखाती है। वो कहती है – “अगर मेरे पापा जैसा कोई तुम्हारे पास न हो, तो खुद अपने पापा बन जाओ। खुद पर भरोसा रखो।”
और उस पुराने पीले खत ने एक टूटी हुई लड़की को फिर से जोड़ दिया।
आज राधा हर रोज सुबह उठकर पहले उसे खत को छुट्टी है उसे लगता है जैसे पापा का आशीर्वाद उसके साथ हैं मोहल्ले की लड़कियों की अब उसे सीखने आते हैं राधा मुस्कुराकर रहती है
मेहनत करो ,डरो मत, सफलता खुद चल कर आएगी"
--