राई- भर मरहम Deepak sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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राई- भर मरहम

 

                बिजली की तार बेचने वाली अपनी दुकान की सीढ़ियों पर उस छोटे बच्चे को देख कर पहले तो मैं हैरान हुआ।

                मेरी दुकान पर उस का क्या काम हो सकता था?

                फिर जैसे ही उस ने तिरछी नज़र से पीछे मुड़कर देखा तो पाया सड़क के उस पार अरूणा बैठी थी। एक होल्ड- औल व बड़े सूटकेस के साथ। 

                जब तक अरूणा अकेली यात्रा करती रही थी, दिसंबर के इन दिनों में भी एक ही कंबल से सर्दी का मुकाबला कर लिया करती। किंतु जैसे ही टीपू को साथ लाने लगी तो कितना सामान बढ़ गया था उस के पास! 

                जभी वह छोटा बच्चा पहचान में आ गया।

                “टीपू , ” अपनी दोनों बाहें पसार कर मैं अपनी कुर्सी से उछल पड़ा।

                 “बा..,” टीपू मेरी बाहों में समा गया।

                 उसे गोदी में लिए लिए मैं ने सड़क पार की।

                 “बताया नहीं?”  अरूणा की तरफ़ पड़ने वाली पटरी पर मैं जा खड़ा हुआ,        “मोबाइल चार्ज नहीं?”

                 “नहीं। मां का आपरेशन?” अरूणा की आवाज़ भर्रायी रही। जब से उस ने शादी की है, बात- बात पर आंसू टपकाने की उसे आदत सी पड़ गई है।

                 “मामूली आपरेशन था। आंख में उतर आए मोतियाबिंद को निकाल बाहर करना भी कोई बड़ी बात है क्या? तुम ने क्यों कष्ट उठाया? इतनी लंबी यात्रा है!”

                 “था?” अरूणा चौंकी, “आपरेशन करा भी लिया? कब?”

                 “कल करवाया था,” मैं हंस पड़ा, “दो दिन बाद नर्सिंग होम से छुट्टी भी मिल जाएगी….”

                  “डा. मनोहर लाल से?” हमारे कस्बापुर में आंखों के मामले में डा. मनोहर लाल को सर्वश्रेष्ठ माना जाता था।

                  “हां,” मैं ने कहा,“उन्हीं के नर्सिंग होम में?”

                   “मां उधर अकेली हैं?” अरूणा रो पड़ी, “राकेश या रमेश में से कोई नहीं आया?”

                   “उन्हें हम ने बताया ही नहीं,” मैं फिर हंस दिया, “राकेश अपने यूथ फ़ैस्टिवल के सिलसिले में निकला है और रमेश अपने एम.बी.ए. के एडमिशन टेस्ट की तैयारी में जुटा है….”

                    बेटों में राकेश छोटा है और लुधियाना के क्रिश्चियन मेडिकल कालेज में दूसरे साल की पढ़ाई कर रहा है और बड़ा रमेश चंडीगढ़ के पंजाब इंजीनियरिंग कालेज के चौथे साल की।

                    “पहले मैं मां को देखूंगी,” अरूणा ने कहा, “घर बाद में….”

                     घर हमारा है भी यहां से लगभग सात किलोमीटर । जब कि डा.मनोहर लाल का नर्सिंग होम तीन ही किलोमीटर पर है।

                    “माल रोड ले चलो,” मैं ने तुरंत हामी भर दी और रिक्शे वाले को आदेश दे दिया, “तुम्हारे पीछे मैं अपना स्कूटर लिए आ रहा हूं।”

                    रिक्शे का पीछा करने की बजाय मेरा स्कूटर फिर अगली ही सड़क पर पड़ रही बेकरी पर जा रुका।

                   “आधा लोफ़ चाहिए था,” स्कूटर ही से मैं ने आर्डर किया, “सौ ग्राम मक्खन साथ ही लगवा दीजिए। और छः पाइन ऐपल पेस्ट्रीज़….”

                   “बच्चे आए हैं?” बेकरी वाला और मैं बेशक एक दूसरे का नाम तक नहीं जानते थे, लेकिन हमारे बीच एक गर्माहट रही, एक हार्दिकता रही। अपनी प्रमिला की नौकरी की वजह से जब- जब बच्चों के लिए मुझे सुबह या शाम के नाश्ते का अनुकल्प ढूंढना होता तो मैं यहीं से सामान खरीदता और हमारा काम बढ़िया चल जाता।

                  “बेटी आई है,” तपाक से मैं हंसने लगा, “उस का अढ़ाई साल का बेटा भी….”

                  “दामाद आप के कम ही आते हैं,” बेकरी वाला बोला।

                   “उधर दूर कलकत्ते में नौकरी करते हैं,” मैं हंसा, “इधर आना आसान है भला?”

                  “कलकत्ता तो वाकई बहुत दूर है,” बेकरी वाला लोफ़ में तेज़ छुरी से स्लाइस तराशने लगा, “हमारे एक मुहल्लेदार हैं। उन के बेटे को उधर अच्छी नौकरी मिल रही थी, लेकिन उन्होंने उसे वहां जाने से रोक दिया। बोले, इतनी दूर नहीं भेजेंगे। बेगानी ज़ुबान बोलने वाली, बेगानी जगह….”

                  मैं हंस पड़ा। बेकरी ज़रूर इस आदमी की बड़ी थी। लेकिन दुनिया बहुत छोटी। अरूणा की दुनिया विस्तृत थी। सोच विस्तृत थी। पति का प्रांत, उस का अपना प्रांत।

                 “आप को डर नहीं लगा ? बेटी को इतनी दूर भेज दिया?”

                  लोफ़ की कटाई पूरी हो चुकी थी। तेज़ छुरी नीचे धर कर उस ने मक्खन लगाने वाली चपटी छुरी हाथ में ले ली।

                 “डर कैसा?” मैं फिर हंस पड़ा, “मेरा दामाद मेरा देखा- भाला है। बेटी का देखा- भाला है।”

                 “आप की बेटी ने लव- मैरिज की?” उस ने अपना स्वर धीमा कर लिया मानो वह मेरे संग किसी लज्जाजनक संदर्भ का उल्लेख कर रहा हो।

                 “दामाद मेरा खूब अच्छा है,” उस के प्रश्न का उत्तर मैं टाल गया, “मेरी बेटी ने मुझ से उस की कभी कोई शिकायत नहीं की।”

                 “आप सौभाग्यशाली हैं,” बेकरी वाले ने पेस्ट्री का डिब्बा और लोफ़ का लिफ़ाफ़ा मेरे हवाले कर दिया, “बहुत सौभाग्यशाली….”

                  “जी, जनाब,” स्कूटर में पहले मैं ने पेस्ट्री का डिब्बा टिकाया। सीधा और समतल। फिर लोफ़ का लिफ़ाफ़ा।

 

                   “बेड नम्बर पांच की विज़िटर पहुंच गईं क्या?” नर्सिंग होम पहुंचते ही मैं ने ड्यूटी वाली नर्स से पूछा। 

                   “नहीं सर,” उस ने सिर हिला दिया, “प्रमिला देवी पहले जैसी अकेली हैं।”

                   अपने काम में नर्स बेचारी ज़रूर बेध्यानी और लापरवाही बरतती रही….

                   अपने डिब्बे और लिफ़ाफ़े के साथ मैं मरीज़ों की डौर्मिटरी में पहुंच लिया।

                    बेड नम्बर पांच पर प्रमिला अकेली लेटी थी।

                   आपरेशन वाली उस की दांयी आंख पर तो पट्टी बंधी ही रही, बांयी आंख भी उसी के बहनापे में बंद रही।

                   या शायद वह सो रही थी….

                   उसे जगाना ठीक रहेगा क्या?

अरूणा ज़रूर टीपू के साथ पहले घर चली गई होगी। शायद टीपू ने कोई ज़िद की हो और अरूणा ने अपना इरादा बदल लिया हो….

                  खाने के अपने सामान मैं ने स्कूटर में वापस टिका दिए और घर की ओर चल निकला।

 

                   घर पर ताला ज्यों का त्यों पड़ा था। ताले की स्थिति में अरूणा हमेशा बांयी पड़ोस में चली जाया करती।

                  मैं ने उन्हीं के घर का दरवाज़ा जा खटखटाया।

                  “नमस्कार, भाई साहब,” दरवाज़ा खोलने पड़ोसिन ही आयीं, “भाभी कैसी हैं?”

                  “ठीक हैं,” अपने आने का कारण मैं छिपा ले गया, “आप आज वहां जांएगी?”

                  वह हैरान हुई। प्रमिला और अरूणा को छोड़कर हमारे परिवार से उन के घर पर कोई न जाया करता।

                  “माल रोड वाले नर्सिंग होम में हैं न?” उस ने पूछा।

                  “हां,” मैं स्कूटर पर लौट आया।    

 

                   इधर घर मैं नर्सिंग होम के रास्ते आया था। मुझे अपनी दुकान का रास्ता देखना चाहिए था।

                   अरूणा की रिक्शा ज़रूर उधर ही की किसी सड़क की भीड़ की वजह से रुक गई थी!

                  घर से मैं अपनी दुकान पर सहज ही पहुंच लिया। रास्ते में कहीं कोई भीड़, कोई हादसा कुछ न रहा। बड़ी बात हुई जो अरूणा से हुई अपनी भेंट का उल्लेख मैं ने प्रमिला से नहीं किया….वर्ना असहाय उस अवस्था में चिंता उस का मन अलग हुलाने लगती….

                  अजीब असमंजस की उस मनस्थिति में मैं अपनी दुकान पर पहुंचा और उस में आन दाखिल हुआ। 

                 अब मुझे कलकत्ते की लैंडलाइन पर फ़ोन करना था।

                 “हलो,”अरूणा का नंबर मिलाने पर उधर से अरूणा ही ने जवाब दिया।

                  “मैं हूं,” पल भर के लिए मेरा दिमाग घूमा तो, मगर तत्काल मैं ने उसे संभाल भी लिया।

                  “इस समय?” उस की आवाज़ भीग गई। साधारणतः हम शाम सात बजे के लगभग आपस में बात किया करते थे।

                  “आप सब लोग ठीक हो?” गला मेरा भी रुंध लिया।

                  “एकदम…”

                  “प्रमिला की आंख का आपरेशन करवा लिया है,” मैं ने कहा, “सफल रहा है….”

                  “मुझे बताया नहीं,” अरूणा रो पड़ी, “मुझे बुलाया नहीं….”

                  “राकेश और रमेश को भी नहीं बताया। न ही  बुलाया। मामूली सा आपरेशन था। पहले से बताने या बुलाने की कोई बात ही न रही….”

                 “मां को मैं फ़ोन करूंगी….”

                 “ज़रूर करना। मगर दो दिन बाद। अभी उसे आराम की ज़रूरत है….”

मैं ने फ़ोन काट दिया।

                  मन मेरा हल्का होना चाहिए था। नत- नस्तक हो कर मुझे ईश्वर को शत- शत प्रणाम करना चाहिए था….

                  अरूणा अपने घर पर थी….

                  सपरिवार सकुशल थी….

                  लेकिन मेरा मन बेचैन क्यों था?

 

                  प्रकृतिस्थ होते ही मैं नर्सिंग होम की तरफ़ निकल लिया।

                  वहां पहुंचते ही पेस्ट्री का डिब्बा डा. मनोहर लाल के कमरे में पहुंचा कर अपने कदम प्रमिला की डौर्मिटरी की दिशा में बढ़ा ले आया।

                 “आप?” प्रमिला के बिस्तर की बगल में रखी कुर्सी पर जैसे ही मैं ने स्थान ग्रहण किया, वह बोल उठी।

                 “अपने दोनों के नाश्ते के लिए लोफ़ लाया हूं,” मैं ने कहा, “जब कहोगी सामने से इस के साथ के लिए दूध पकड़ लाऊंगा….”

                  “उन दोनों को नाश्ता करा दिया?”  प्रमिला ने अपनी आंखें बंद ही रखीं।

                  “किन्हें?”

                  “अरुणा और टीपू को….”

                  “वे यहां कहां हैं?” एक नया अचरज मुझ पर टूट पड़ा। यह कैसा संयोग था?

                  “तुम ने उन्हें देखा?” मैं ने पूछा, “साक्षात देखा?”

                  “अब ऐसे तो नहीं देखा,” प्रमिला दुविधा में पड़ गई, “लेकिन उन से मुलाकात तो हुई ही रही….”

                   “तुम ने उन्हें ज़रूर नींद में देखा होगा,” प्रमिला का हाथ मैं ने थपथपा दिया, “अरूणा से तो अभी मेरी पंद्रह ही मिनट पहले बात हुई है। वह कलकत्ते में है।”

                  “यह कैसे हो सकता है?” प्रमिला अपना हाथ अपने तकिए के नीचे ले गई, “मैं ने उसे यहां से घर की चाभी निकाल कर दी है….”

                  “चाभी तुम्हारी यहीं रखी है,” प्रमिला के तकिए के नीचे चाभी अपनी जगह पर निरापद रखी रही, “देखो….”

                  चाभी का गुच्छा उठा कर मैं ने प्रमिला के हाथ में ला थमाया।

                  “माया मोह का कैसा जाल है?” प्रमिला की आवाज़ थर्रायी, “बेचारी सशरीर मेरे पास नहीं आ पाई तो बीच की दूरी धकिया कर मुझे देखने चली आयी….”

                 “यों कैसे?” अपने संग सुबह की बीती अपने मन में मुझे अभी दबाए ही रखनी थी।

                 “जैसे कोई हवा!या लहर! कोई टपकन!या तरंग! कोई अटकल या जादू….”

                  सुखद एक नई संभावना ने मुझे आ घेरा। जिस आदिमज़ोर की तहत अरूणा हमें टीपू के साथ मिली थी, उसे दोबारा नहीं आज़माया जा सकता था क्या?