बर्बाद इश्क
एपिसोड 4 — जब दिल ने पहली बार महसूस किया
मुंबई की सुबह।
सूरज अभी पूरी तरह निकला नहीं था। आसमान में नारंगी और गुलाबी रंग घुले हुए थे। सड़कों पर अभी भीड़ कम थी। चाय की दुकानें खुल रही थीं। अख़बार वाले साइकिल पर निकले हुए थे।
लेकिन तीन घरों में — तीन लोग रात भर सो नहीं पाए थे।
💥 रणवीर — वह लड़की कौन थी?
रणवीर सुबह चार बजे से उठा हुआ था।
यह उसकी आदत नहीं थी। वह आमतौर पर रात को देर से सोता था और सुबह देर से उठता था। लेकिन आज नींद आई ही नहीं।
वह अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ा था। नीचे मुंबई की सड़कें थीं। ऊपर अभी तारे थे।
दिमाग़ में एक चेहरा था।
पीले कुर्ते वाली लड़की।
"किस्तों में दे दूँगी।"
रणवीर के होंठ एक पल के लिए मुड़े। फिर उसने खुद को रोका।
"क्या हो रहा है मुझे?"
उसने खिड़की से हटकर अपना फ़ोन उठाया। अपने आदमी को कॉल किया।
"हाँ भाई?" दूसरी तरफ से नींद भरी आवाज़ आई।
"कल सुबह बांद्रा में जो एक्सीडेंट हुआ — उस स्कूटी का नंबर था तुम्हारे पास?"
"भाई वो तो मैंने—"
"नंबर था या नहीं?"
"था भाई। MH02 PQ—"
"पता लगाओ। उस लड़की का नाम, पता — सब कुछ। कल शाम तक चाहिए।"
फ़ोन बंद।
रणवीर वापस खिड़की के पास आ गया।
उसे खुद नहीं पता था वह यह क्यों कर रहा है।
लेकिन वह पीला कुर्ता — वह बेफ़िक्री — वह जवाब देने का अंदाज़ — किसी ने पहले उससे ऐसे बात नहीं की थी।
कोई उससे डरता नहीं था? कोई उसे "एक मिनट" कहता था?
रणवीर को अजीब लग रहा था।
और जो चीज़ उसे अजीब लगे — वह उसे समझनी होती है।
बस इसीलिए।
कम से कम यही उसने खुद से कहा।
उसी सुबह।
नायरा अपने छोटे से घर की रसोई में थी।
वह गाना गुनगुनाते हुए चाय बना रही थी। उसकी माँ बाहर अख़बार पढ़ रही थीं।
"नायरा!" माँ ने आवाज़ दी। "कल क्या हुआ था? पड़ोसन बोल रही थी कि तेरी स्कूटी किसी बड़ी गाड़ी से टकराई?"
"अरे माँ वो कुछ नहीं था।" नायरा ने चाय का कप लाते हुए कहा। "बस थोड़ा सा आगे निकल गई। गाड़ी वाले को लगा जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया।"
"गाड़ी वाला कैसा था?"
नायरा ने एक पल रुककर सोचा।
लंबा। काली आँखें। चेहरे पर ज़ख्म का निशान। और वह ठंडी नज़र जो—
"बोरिंग था।" नायरा ने कहा। "बिल्कुल बोरिंग। अमीर लोग होते ही ऐसे हैं माँ — पैसा बहुत, मज़ा ज़ीरो।"
माँ हँस दीं।
नायरा भी हँसी।
लेकिन उसका दिमाग़ एक पल के लिए उस ज़ख्म के निशान पर रुका।
"यह निशान कहाँ से आया होगा?"
फिर उसने सिर झटका।
"क्या ज़रूरत है सोचने की।"
💔 आदित्य — दिल की पहली धड़कन
आदित्य ऑफ़िस में था।
सामने फ़ाइलों का ढेर था। ज़ाफ़र के बारे में नई जानकारी आई थी। पोर्ट पर माल पहुँचने वाला था। दस काम एक साथ थे।
लेकिन दिमाग़ अस्पताल के उस दरवाज़े पर अटका हुआ था।
वह थकी हुई आँखें। वह हाथ जो माँ का हाथ थामे था। वह मुस्कान जो अपने दर्द को छुपा रही थी।
"रिया।"
आदित्य ने फ़ाइल बंद की।
उसने अपने लैपटॉप पर उँगलियाँ रखीं। फिर हटा लीं।
"क्या कर रहा हूँ मैं?"
वह उठा। पानी पिया। वापस बैठा।
लेकिन काम में मन नहीं लगा।
उसने अपने एक ख़ास आदमी को बुलाया — शम्मी। जो भी जानकारी चाहिए होती थी — शम्मी लाता था।
"शम्मी।"
"हाँ भाई?"
"कल सिटी अस्पताल में एक लड़की थी। रिया नाम था। माँ को दिखाने आई थी। पता लगाओ — पूरा नाम क्या है, कहाँ रहती है।"
शम्मी ने एक पल आदित्य को देखा।
आदित्य ने आँखें तरेरीं।
शम्मी चला गया।
आदित्य वापस फ़ाइल पर झुक गया।
लेकिन कलम नहीं चली।
"पहली बार किसी लड़की के बारे में इस तरह सोच रहा हूँ।"
उसे यह अहसास अजीब लगा।
और अजीब बात यह थी कि — अजीब नहीं लगा।
उसी वक़्त।
रिया एक छोटी सी किराने की दुकान पर थी।
घर का सामान ले रही थी। हाथ में लिस्ट थी। आँखें थकी थीं — रात को माँ को दर्द हुआ था, सो नहीं पाई।
"भैया यह वाला आटा दे दो। और हाँ — तेल भी।"
दुकानदार ने सामान रखा।
रिया ने पैसे गिने।
"कितने हुए?"
"छह सौ पचास।"
रिया के हाथ रुक गए।
उसने दोबारा पैसे गिने।
पाँच सौ अस्सी थे।
"भैया — यह तेल वाला छोड़ दो। बाद में लेंगे।"
दुकानदार ने तेल हटाया।
रिया ने सामान उठाया और चल दी।
उसके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी। कोई परेशानी नहीं। बस एक शांत स्वीकृति।
यही थी रिया।
ज़िंदगी ने जो दिया — उठाया और चल दी।
लेकिन आज एक बात उसके दिमाग़ में थी।
अस्पताल के उस दरवाज़े पर खड़ा वह लड़का।
काले कपड़े। गहरी आँखें। और वह नज़र — जो उसने एक पल के लिए उस पर डाली थी।
"कौन था वह?"
रिया ने सिर झटका।
"जो भी था — मुझे क्या।"
लेकिन दिल को कौन समझाए।
😏 दानिश — पहली बार कुछ अलग लगा
दानिश सुबह दस बजे उठा।
वह बिस्तर पर लेटा छत देखता रहा।
कमरा बड़ा था। महँगा था। सब कुछ परफेक्ट था।
लेकिन आज कुछ था जो उसे चैन नहीं दे रहा था।
ईशानी।
वह औरत जिसने उसका गिलास वापस कर दिया। जिसने उसे एक लाइन में पढ़ लिया। जिसने बिना डरे — बिना लजाए — सच बोल दिया।
"तुम जैसे लड़कों को मैं दूर से पहचान लेती हूँ।"
दानिश उठकर बैठ गया।
उसने खुद से पूछा — "कितनी लड़कियों से मिला हूँ मैं? सैकड़ों। लेकिन किसी ने यह नहीं कहा जो उसने कहा।"
सब उसके पैसे देखती थीं। उसकी शक्ल देखती थीं। उसका नाम सुनती थीं और पिघल जाती थीं।
लेकिन ईशानी ने उसे देखकर — पहचान लिया।
और यही बात दानिश को अंदर से हिला गई थी।
उसने फ़ोन उठाया। होटल का नंबर डायल किया।
"हाँ — कल रात आपके बार में एक मैडम थीं। ईशानी नाम था। क्या आप—"
"सर हम गेस्ट की जानकारी नहीं दे सकते।"
फ़ोन बंद।
दानिश ने फ़ोन मेज़ पर पटका।
फिर सोचा।
फिर मुस्कुराया।
"ठीक है। दूसरा तरीका निकालते हैं।"
शाम को तीनों भाई एक साथ बैठे थे।
रणवीर चाय पी रहा था। आदित्य फ़ाइल देख रहा था। दानिश कुर्सी पर टाँगें फैलाए बैठा था।
तभी रणवीर ने कहा — "आदित्य — ज़ाफ़र वाला काम।"
"हो जाएगा।" आदित्य ने कहा। "उसके दो आदमी हमारे हाथ लगे हैं। कल तक पूरी जानकारी मिल जाएगी।"
"अच्छा।"
ख़ामोशी।
फिर दानिश ने अचानक कहा — "भाइयों — कभी कोई ऐसी लड़की मिली है जो तुम्हें बिल्कुल नज़रअंदाज़ कर दे?"
रणवीर ने चाय का कप रखा। आदित्य ने फ़ाइल से नज़र हटाई।
दोनों ने दानिश को देखा।
"क्यों?" रणवीर ने पूछा।
"बस ऐसे।" दानिश ने बेफ़िक्री से कहा।
लेकिन उसकी आँखों में कुछ और था।
आदित्य ने एक पल सोचा। फिर धीरे से बोला — "हाँ। मिली है।"
रणवीर ने आदित्य को देखा।
आदित्य ने नज़र हटाई।
रणवीर ने चाय का एक घूँट लिया।
और कुछ नहीं बोला।
लेकिन उसके दिमाग़ में भी एक चेहरा था।
पीले कुर्ते वाली।
तीनों भाई अपनी-अपनी ख़ामोशी में थे।
तीनों के दिल में पहली बार कुछ हिला था।
और तीनों को यह मंज़ूर नहीं था।
अगले दिन सुबह।
रणवीर के आदमी ने जानकारी लाई —
"भाई — लड़की का नाम नायरा शर्मा है। बांद्रा में रहती है। एक छोटी सी बेकरी में काम करती है।"
रणवीर ने काग़ज़ देखा।
बेकरी।
उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आई।
"ठीक है।"
"भाई — कुछ करना है उसके साथ?"
रणवीर ने उस आदमी को एक नज़र देखा।
वह आदमी सिकुड़ गया।
"माफ़ करना भाई — मेरा मतलब—"
"जाओ।" रणवीर ने कहा।
वह चला गया।
रणवीर ने काग़ज़ दोबारा देखा।
नायरा शर्मा। बेकरी। बांद्रा।
उसने काग़ज़ मोड़ा। जेब में रखा।
"कल देखते हैं।"
उसी शाम।
शम्मी ने आदित्य को जानकारी दी —
"भाई — रिया मेहरा नाम है। धारावी के पास एक छोटे से घर में रहती है। माँ बीमार हैं — पैरों से चल नहीं सकतीं। बाप को दिल की बीमारी है। एक छोटा भाई है जो कॉलेज में पढ़ता है। रिया अकेली पूरे घर को चलाती है। तीन जगह काम करती है।"
आदित्य चुप रहा।
शम्मी ने आगे कहा — "और भाई — एक बात और है।"
"क्या?"
"वो — मतलब — उसकी एक दोस्त है। मेघा। रिया उससे बहुत करीब है। लोग कहते हैं कि—" शम्मी रुक गया।
"बोलो।"
"लोग कहते हैं कि रिया को मेघा से — मतलब — दोनों एक-दूसरे को पसंद करती हैं।"
आदित्य के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया।
लेकिन अंदर — कुछ ऐसा हुआ जो दर्द जैसा था।
उसने शम्मी को जाने का इशारा किया।
अकेले में उसने एक लंबी साँस ली।
"तो यह है।"
उसने खिड़की से बाहर देखा। मुंबई की रोशनियाँ थीं।
"क्या करूँ अब?"
दिल ने कहा — "जाओ।"
दिमाग़ ने कहा — "रुको।"
आदित्य ने आँखें बंद कीं।
पहली बार ज़िंदगी में उसे किसी के लिए कुछ महसूस हुआ था।
और पहली बार ज़िंदगी में — राह आसान नहीं थी।
और दानिश?
दानिश ने अपने तरीके से पता लगाया।
होटल का मैनेजर उसका पुराना जानकार था। एक काम आया।
ईशानी कपूर। इकतीस साल। तलाकशुदा। एक बड़ी कंपनी में HR मैनेजर।
दानिश ने यह पढ़ा।
HR मैनेजर।
उसने मुस्कुराते हुए फ़ोन रखा।
और उसके दिमाग़ में एक plan आया।
तीन भाई।
तीन रास्ते।
और तीन ऐसी लड़कियाँ जो उनकी ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदलने वाली थीं।
बर्बाद इश्क — जारी है।
(एपिसोड 5 जल्द आएगा...)
कैसा लगा एपिसोड 4?