बर्बाद इश्क
एपिसोड 3 — पहली मुलाकात... पहली मुसीबत!
सुबह के दस बज रहे थे।
मुंबई की सड़कें अपनी रफ़्तार में थीं। गाड़ियों का शोर, लोगों की भागदौड़ — सब कुछ वैसा ही था जैसा हमेशा होता है।
लेकिन आज कुछ अलग होने वाला था।
💥 रणवीर और नायरा — पहली टक्कर!
रणवीर की काली BMW सड़क पर दौड़ रही थी।
वह अकेला था। आगे एक ज़रूरी मीटिंग थी। दिमाग़ में ज़ाफ़र का नाम था। चेहरे पर वही ठंडा भाव।
तभी—
धड़ाम!
एक स्कूटी सीधे उसकी गाड़ी के आगे आ गई।
रणवीर ने ब्रेक मारा। गाड़ी रुकी। उसकी आँखें तन गईं।
"यह किसकी हिम्मत है?"
वह गाड़ी से बाहर निकला। गुस्से से दरवाज़ा बंद किया।
और सामने जो दिखा — उसने उसे एक पल के लिए रोक दिया।
एक लड़की।
पीले रंग का कुर्ता। बाल खुले हुए। हाथ में एक बड़ा सा थैला जिसमें से आधी सब्ज़ियाँ सड़क पर बिखरी पड़ी थीं। और वह लड़की — घुटनों पर बैठकर सब्ज़ियाँ उठा रही थी।
बिल्कुल बेफ़िक्र।
जैसे उसने कुछ किया ही नहीं।
रणवीर आगे बढ़ा। "ऐ!"
नायरा ने ऊपर देखा। एक नज़र रणवीर पर डाली। फिर वापस सब्ज़ियाँ उठाने लगी।
"हाँ हाँ आया एक मिनट।"
रणवीर रुक गया।
क्या?
पूरी मुंबई में कोई उसकी तरफ आँख उठाकर नहीं देखता था। और यह लड़की — "एक मिनट" कह रही है?
"तुम्हें पता है तुमने क्या किया?" रणवीर ने सख़्त आवाज़ में कहा।
"हाँ पता है।" नायरा ने टमाटर उठाते हुए कहा। "आपकी गाड़ी के आगे आ गई। सॉरी। लेकिन पहले यह टमाटर उठाने दीजिए — तीस रुपये किलो हैं, बर्बाद नहीं करने।"
रणवीर की आँखें फैल गईं।
उसके पीछे खड़े दो गार्ड एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।
"तुम्हें पता है मैं कौन हूँ?" रणवीर ने कहा।
नायरा ने उठकर उसे ऊपर से नीचे देखा। गंभीरता से। फिर बोली —
"कोई बड़े घर का बच्चा लग रहे हो। महँगी गाड़ी है, महँगे कपड़े हैं — लेकिन मैनर्स नहीं हैं। एक लड़की सड़क पर गिर गई और आप खड़े डाँट रहे हो — उठाने में मदद करने की बजाय।"
सन्नाटा।
पूरी सड़क पर सन्नाटा।
गार्डों की साँसें रुक गईं।
रणवीर — जिसे देखकर बड़े-बड़े आदमी काँपते थे — वह इस लड़की को घूरता रहा।
और नायरा? वह अपना थैला उठाकर स्कूटी पर बैठ गई।
"अच्छा सुनिए।" उसने मुड़कर कहा। "गाड़ी में खरोंच आई हो तो बताइए — मेरे पास अभी पैसे नहीं हैं लेकिन किस्तों में दे दूँगी।"
और वह चली गई।
रणवीर वहीं खड़ा रहा।
पहली बार उसकी समझ नहीं आया कि क्या करे।
उसके गार्ड ने धीरे से पूछा — "भाई... पीछा करें?"
रणवीर ने उसे घूरा।
गार्ड चुप हो गया।
रणवीर गाड़ी में बैठ गया। दरवाज़ा बंद किया।
लेकिन दिमाग़ में वह पीले कुर्ते वाली लड़की अटकी रही।
"किस्तों में दे दूँगी।"
रणवीर के चेहरे पर — बहुत मुश्किल से — एक हल्की सी मुस्कान आई।
और उसी पल चली गई।
💔 आदित्य और रिया — पहली नज़र... पहला दर्द!
आदित्य अस्पताल में था।
विक्रम मेहता की तबियत कुछ दिनों से ठीक नहीं थी। आदित्य उन्हें डॉक्टर के पास लेकर आया था। बाहर इंतज़ार कर रहा था।
वह अपने फ़ोन पर था — ज़ाफ़र की फ़ाइल देख रहा था। दिमाग़ चल रहा था।
तभी एक आवाज़ आई —
"एक्सक्यूज़ मी।"
आदित्य ने ऊपर देखा।
एक लड़की सामने खड़ी थी। थकी हुई आँखें। सादा कपड़े। हाथ में दवाइयों का थैला।
लेकिन चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी।
"यह सीट खाली है?" उसने पूछा।
आदित्य ने एक पल देखा। फिर बाजू में रखा अपना कोट उठाया।
लड़की बैठ गई। थैला गोद में रखा। आँखें बंद कीं।
आदित्य वापस फ़ोन पर आ गया।
दो मिनट।
फिर उसकी नज़र अपने आप उस लड़की पर गई।
वह सो नहीं रही थी — बस आँखें बंद किए थीं। होंठ हल्के से हिल रहे थे — जैसे मन में कुछ गिन रही हो। या शायद दुआ माँग रही हो।
आदित्य ने नज़र हटाई।
लेकिन फिर गई।
"यह कौन है?"
तभी अंदर से एक नर्स निकली — "रिया जी! माँ की दवाई बदली है — डॉक्टर साहब बुला रहे हैं।"
लड़की उठी। थैला उठाया। और अंदर चली गई।
रिया।
आदित्य के दिमाग़ में नाम अटक गया।
वह उठा। पानी लेने गया। वापस आया।
अंदर से आवाज़ें आ रही थीं —
"माँ, डरो मत। मैं हूँ ना। सब ठीक हो जाएगा।"
आदित्य दरवाज़े के पास रुक गया।
रिया अपनी माँ का हाथ थामे बैठी थी। माँ की आँखों में आँसू थे। रिया मुस्कुरा रही थी — ताकि माँ न रोए।
आदित्य को नहीं पता था कि वह वहाँ क्यों रुका।
बस रुक गया।
और उसके सीने में कुछ हुआ — जो पहले कभी नहीं हुआ था।
फिर रिया की नज़र दरवाज़े पर पड़ी।
आदित्य और रिया की आँखें मिलीं।
एक पल।
बस एक पल।
रिया ने नज़र फेर ली।
आदित्य वापस अपनी सीट पर आ गया।
लेकिन दिल — दिल वहीं रह गया।
😏 दानिश और ईशानी — पहली मुठभेड़!
रात के नौ बज रहे थे।
दानिश एक बड़े होटल की लॉबी में था। एक बिज़नेस डील के बाद वह बार में आ गया था। हमेशा की तरह — बेफ़िक्र, मुस्कुराता हुआ।
उसने बार में नज़र दौड़ाई।
और एक कोने में एक औरत दिखी।
इकतीस-बत्तीस साल की। साड़ी पहनी हुई। बाल बँधे हुए। सामने व्हिस्की का गिलास।
अकेली।
दानिश ने मुस्कुराते हुए बारटेंडर को इशारा किया — "उन मैडम को जो पी रही हैं — वही भेजो। मेरी तरफ से।"
बारटेंडर ने गिलास उस औरत के पास भेजा।
औरत ने गिलास देखा। बारटेंडर से पूछा — "किसने भेजा?"
बारटेंडर ने दानिश की तरफ इशारा किया।
दानिश ने हल्के से सिर हिलाया। मुस्कुराया।
औरत ने एक पल देखा।
फिर उसने वह गिलास उठाया — और वापस बारटेंडर को दे दिया।
"इन्हें वापस कर दो।"
दानिश की मुस्कान हल्की सी फीकी पड़ी।
ओह।
वह उठा और उस औरत के पास आ गया।
"नापसंद किया?" उसने हल्के अंदाज़ में कहा।
औरत ने उसकी तरफ देखा। ऊपर से नीचे। फिर वापस अपने गिलास पर नज़र की।
"मुझे किसी के पैसों से पीने की आदत नहीं है।"
"आदत डाल सकते हैं।" दानिश ने बाजू की कुर्सी खींची और बैठ गया।
"यह सीट किसी ने नहीं दी।" उसने ठंडे स्वर में कहा।
"मैंने ले ली।" दानिश ने बेफ़िक्री से कहा।
औरत ने उसे घूरा।
दानिश मुस्कुराता रहा।
"आप यहाँ अकेली हैं।" दानिश ने कहा।
"हाँ। जानबूझकर।"
"अकेले पीना अच्छा नहीं होता।"
"और अनजान लड़के के साथ पीना अच्छा होता है?"
दानिश ने हाथ आगे बढ़ाया — "दानिश। अब अनजान नहीं रहे।"
औरत ने उसका हाथ नहीं थामा।
"ईशानी।" बस इतना कहा। "और सुनो दानिश — मैं तुम्हारी उम्र की नहीं हूँ। यह जो भी तुम कर रहे हो — यह मुझ पर काम नहीं करेगा।"
दानिश ने एक पल उसे देखा।
फिर बोला — "मैं बस बात करने आया था।"
"झूठ।"
दानिश हँसा — "ठीक है। झूठ। लेकिन अब सच में बात करने का मन है।"
ईशानी ने एक लंबी साँस ली।
"देखो।" उसने सीधे उसकी आँखों में देखकर कहा। "मेरी एक बार शादी हो चुकी है। तलाक हो चुका है। मुझे प्यार-व्यार में कोई दिलचस्पी नहीं। और तुम जैसे लड़कों को मैं दूर से पहचान लेती हूँ।"
"कैसे लड़के?" दानिश ने पूछा।
"जो हर लड़की को एक रात के लिए चाहते हैं।"
दानिश चुप हो गया।
पहली बार।
किसी ने उसे इतने सीधे शब्दों में पढ़ा था।
ईशानी ने अपना गिलास ख़त्म किया। पर्स उठाया। उठने लगी।
"रुकिए।" दानिश की आवाज़ में कुछ अलग था।
ईशानी रुकी। मुड़ी।
दानिश ने कहा — "आपने सही पहचाना। मैं वैसा ही हूँ। लेकिन—" उसने एक पल रुककर कहा — "आज पहली बार किसी ने मुझे इतने सच से देखा।"
ईशानी ने कुछ नहीं कहा।
और चली गई।
दानिश वहीं बैठा रहा।
हाथ में ख़ाली गिलास था।
और दिल में — पहली बार — एक अजीब सी बेचैनी।
तीन मुलाकातें।
तीन अलग दुनियाएँ।
और एक कहानी जो अभी शुरू हुई थी।
बर्बाद इश्क — जारी है।
(एपिसोड 4 जल्द आएगा...)