गैंगस्टर अर्जुन - 1 Sonu Rj द्वारा रोमांचक कहानियाँ में हिंदी पीडीएफ

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गैंगस्टर अर्जुन - 1

रात का समय था। 30 साल का गैंगस्टर अर्जुन पाँच साल बाद अपनी पुरानी सिटी लौट रहा था। उसने इन पाँच सालों में बहुत कुछ देखा था—दुश्मनी, भागदौड़ और छुपकर जीना। अब वह अपने घर वापस जाना चाहता था।
एयरपोर्ट से बाहर निकलकर उसने एक टैक्सी पकड़ी।
"पुराना शहर चलोगे?" अर्जुन ने पूछा।
"हाँ साहब, बैठिए," ड्राइवर बोला।
टैक्सी सुनसान सड़कों से गुजर रही थी। आधी रात हो चुकी थी। अर्जुन खिड़की से बाहर देखते हुए पुराने दिनों को याद कर रहा था।
अचानक पीछे से पुलिस की जीप आई। सायरन बजा और टैक्सी रुकवा दी गई।
दो पुलिसवाले बाहर निकले।
"सब नीचे उतरो!" एक पुलिसवाला गरजा।
ड्राइवर घबरा गया। अर्जुन भी नीचे उतर गया।
पुलिसवालों ने उसकी जेब की तलाशी ली। उसके पास जो नकद पैसे थे, वे छीन लिए।
"ये क्या कर रहे हो?" अर्जुन ने गुस्से में पूछा।
"ज्यादा सवाल मत पूछ," पुलिसवाले ने कहा।
फिर उसे जबरदस्ती पुलिस जीप में बैठा लिया गया।
जीप शहर से दूर सुनसान इलाके की तरफ चल पड़ी। करीब आधे घंटे बाद जीप एक अंधेरी सड़क पर रुकी।
"उतर!" पुलिसवाले ने आदेश दिया।
अर्जुन नीचे उतरा। तभी पुलिसवालों ने उसे धक्का दिया और जीप तेजी से वहाँ से निकल गई।
अर्जुन अकेला खड़ा रह गया। जेब खाली थी, फोन भी नहीं था। चारों तरफ अंधेरा और सन्नाटा था।
उसने दूर जाती जीप को देखा और हल्की मुस्कान दी।
"लगता है इस शहर में कुछ भी नहीं बदला..." उसने खुद से कहा।
लेकिन पुलिसवालों को नहीं पता था कि उन्होंने जिस आदमी को सड़क पर छोड़ा है, वह कोई आम इंसान नहीं, बल्कि वही अर्जुन है जिसका नाम कभी पूरे शहर में डर से लिया जाता था।
अर्जुन ने अंधेरी सड़क पर कदम बढ़ाया। उसकी असली वापसी अब शुरू होने वाली थी...।                                     अंधेरी सड़क पर कई किलोमीटर पैदल चलने के बाद अर्जुन आखिर अपने पुराने मोहल्ले के पास पहुँच गया। रात के लगभग दो बजे थे। गलियाँ शांत थीं, लेकिन हर कोना उसे पुराने दिनों की याद दिला रहा था।
तभी पीछे से एक बाइक की आवाज़ आई।
बाइक उसके पास आकर रुकी।
"अरे... अर्जुन?"
अर्जुन ने मुड़कर देखा। सामने उसका बचपन का दोस्त रवि खड़ा था।
रवि की आँखें हैरानी से फैल गईं।
"तू... तू ज़िंदा है? पाँच साल से सबको लगा था कि तू शहर छोड़कर कहीं गायब हो गया!"
अर्जुन हल्का सा मुस्कुराया।
"ज़िंदगी ने मौका दिया, तो वापस आ गया।"
रवि बाइक से उतरा और उसे गले लगा लिया।
"भाई, तुझे देखकर यकीन नहीं हो रहा।"
दोनों बातें कर ही रहे थे कि गली के दूसरे छोर से एक काली एसयूवी आकर रुकी।
उसमें से एक लंबा-चौड़ा आदमी बाहर निकला।
अर्जुन उसे देखते ही पहचान गया।
"विक्रम..."
विक्रम कभी अर्जुन के गैंग का सबसे भरोसेमंद सदस्य था।
विक्रम कुछ पल अर्जुन को देखता रहा, फिर मुस्कुराया।
"बॉस... आखिर आप वापस आ ही गए।"
अर्जुन ने गौर किया कि विक्रम अब पहले से ज्यादा ताकतवर और अमीर दिख रहा था।
"लगता है पाँच साल में बहुत कुछ बदल गया," अर्जुन बोला।
विक्रम ने गहरी साँस ली।
"हाँ बॉस, शहर भी बदल गया... और लोग भी।"
"और हमारा गैंग?"
विक्रम का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
"गैंग अब पहले जैसा नहीं रहा। कुछ लोग दुश्मनों के साथ मिल गए, कुछ मारे गए... और कुछ ने आपका इंतज़ार कभी छोड़ा ही नहीं।"
अर्जुन की आँखों में एक अलग चमक आ गई।
उसे महसूस हो गया कि उसकी वापसी की खबर फैलते ही शहर में फिर से हलचल मचने वाली है।
लेकिन उसे अभी नहीं पता था कि उसके सबसे बड़े दुश्मन को उसकी वापसी की खबर मिल चुकी है...                        अगली सुबह अर्जुन और विक्रम गैंग के पुराने अड्डे पर पहुँचे। वहाँ अर्जुन के तीन पुराने दोस्त मौजूद थे।
राकेश, समीर और नेहा।
पाँच साल बाद अर्जुन को देखकर तीनों खुश हो गए। कुछ देर तक पुराने दिनों की बातें होती रहीं।
लेकिन फिर समीर और नेहा के बीच बहस शुरू हो गई।
"जब गैंग को तुम्हारी ज़रूरत थी, तब तुम कहाँ थी?" समीर ने गुस्से में कहा।
नेहा भी भड़क गई।
"मैंने अपनी जान बचाई थी। हर किसी की तरह बेवकूफी नहीं की थी!"
दोनों की आवाज़ ऊँची होने लगी।
अर्जुन बीच में आ गया।
"बस करो दोनों! हम यहाँ लड़ने नहीं, साथ आने आए हैं।"
कुछ देर बाद दोनों शांत हो गए।
नेहा बोली, "मुझे कुछ काम है, मैं चलती हूँ।"
वह वहाँ से चली गई।
उसके जाने के बाद अर्जुन, विक्रम, राकेश और समीर पुराने गोदाम में बैठकर गैंग की हालत और शहर के हालात पर बात करने लगे।
करीब आधे घंटे बाद अचानक बाहर कई गाड़ियों के ब्रेक की आवाज़ आई।
चीईईं...!
विक्रम खिड़की की तरफ भागा।
"मुसीबत है... दुश्मन गैंग!"
बाहर दर्जनों लोग उतर रहे थे।
अचानक गोदाम के दरवाज़े पर गोलियाँ चलने लगीं।
धड़ाम! धड़ाम!
"पीछे के रास्ते से निकलो!" अर्जुन चिल्लाया।
सब लोग गोदाम के पीछे की तरफ भागे।
दुश्मन अंदर घुस चुके थे।
अर्जुन, विक्रम, राकेश और समीर भागकर अलग-अलग गलियों में निकल गए ताकि दुश्मन उनका पीछा न कर सकें।
कुछ देर बाद अर्जुन और विक्रम एक सुनसान गली में छिप गए।
दोनों साँस ले रहे थे।
तभी अर्जुन बोला,
"ये हमला संयोग नहीं था। किसी को हमारे मिलने की खबर थी।"
विक्रम का चेहरा गंभीर हो गया।
"मतलब... हमारे बीच कोई गद्दार है।"
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।                                              अगले दिन सुबह समीर अर्जुन के घर पहुँचा।
"अर्जुन, हालात खराब हो रहे हैं," समीर बोला।
"क्या हुआ?"
"दुश्मन गैंग के लोग हमारे इलाके और बिज़नेस में घुस रहे हैं। दुकानदारों को धमका रहे हैं और पैसा वसूल रहे हैं।"
अर्जुन खड़ा हो गया।
"चलो, उनसे बात करते हैं।"
कुछ देर बाद दोनों दुश्मन गैंग के अड्डे पर पहुँचे।
वहाँ गैंग का लीडर नहीं था, लेकिन उसका सबसे भरोसेमंद आदमी और राइट-हैंड रॉकी मौजूद था।
रॉकी कुर्सी पर बैठा मुस्कुरा रहा था।
"तो अर्जुन वापस आ गया।"
अर्जुन बोला, "अपने लोगों को हमारे इलाके से दूर रखो।"
रॉकी हँस पड़ा।
"अब वो इलाका तुम्हारा नहीं रहा।"
समीर गुस्से में आगे बढ़ा।
"जुबान संभाल कर बात कर!"
रॉकी भी खड़ा हो गया।
दोनों तरफ के लोग एक-दूसरे को घूरने लगे।
बहस शुरू हुई और माहौल गर्म हो गया।
अचानक रॉकी के एक आदमी ने समीर को धक्का दे दिया।
समीर ने भी उसे धक्का वापस दे दिया।
कुछ ही सेकंड में दोनों गैंग के लोग भिड़ गए।
गोदाम में जोरदार मारपीट शुरू हो गई।
दुश्मन गैंग के लोग बेसबॉल बैट लेकर हमला करने लगे। अर्जुन और समीर ने खुद को बचाने की कोशिश की, लेकिन सामने वालों की संख्या ज्यादा थी।
एक बैट समीर के कंधे पर लगा और वह पीछे गिर पड़ा।
अर्जुन उसे उठाने दौड़ा।
"समीर! उठो!"
इसी बीच दूसरे आदमी ने बैट घुमाया। अर्जुन झुक गया और वार बच गया।
हालात बिगड़ते देख अर्जुन चिल्लाया,
"पीछे हटो! अभी नहीं!"
अर्जुन और समीर किसी तरह वहाँ से निकल गए और अपनी गाड़ी तक पहुँचे।
गाड़ी में बैठते ही समीर ने गुस्से में कहा,
"अब बात से कुछ नहीं होगा!"
अर्जुन खिड़की से बाहर देखते हुए बोला,
"जल्दबाज़ी नहीं। पहले पता लगाना होगा कि इनके पीछे असली लीडर क्या खेल खेल रहा है।"
उसी समय अर्जुन के फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया—
"अगर जिंदा रहना है, तो पुराने बंदरगाह पर अकेले आओ।"
अर्जुन मैसेज पढ़कर चुप हो गया.                                       अगली शाम अर्जुन, समीर, विक्रम और राकेश थोड़ा समय साथ बिताने के लिए बाहर निकले। कई दिनों से तनाव चल रहा था, इसलिए वे एक पिज़्ज़ा रेस्टोरेंट में गए।
खाना खाते समय भी उनकी बातचीत दुश्मन गैंग और शहर के हालात पर ही होती रही।
करीब एक घंटे बाद चारों अपनी कार में वापस लौट रहे थे।
समीर आगे वाली सीट पर बैठा था। अचानक उसकी नज़र सड़क के दूसरी तरफ खड़ी एक काली कार पर पड़ी।
वह तुरंत सतर्क हो गया।
"अर्जुन, वो कार देख। मुझे लगता है ये दुश्मन गैंग के लोग हैं।"
विक्रम ने भी ध्यान से देखा।
"हाँ, मैंने इनमें से एक आदमी को रॉकी के अड्डे पर देखा था।"
अर्जुन ने फैसला किया।
"दूरी बनाकर पीछे चलो। देखते हैं ये कहाँ जा रहे हैं।"
दोनों कारें शहर की सुनसान सड़कों से गुजरने लगीं।
कुछ मिनट बाद सामने वाली कार के लोगों को शक हो गया कि उनका पीछा किया जा रहा है।
उन्होंने अचानक तेज़ी से गाड़ी मोड़ दी।
"इन्हें पता चल गया!" राकेश बोला।
तभी सामने वाली कार से कुछ लोगों ने हमला करने की कोशिश की।
सड़क पर अफरा-तफरी मच गई।
अर्जुन ने विक्रम से कहा, "शांत रहो, पहले यहाँ से निकलना है!"
कुछ देर तक पीछा चलता रहा। आखिर दुश्मन गैंग की कार एक पुराने गोदाम के पास रुक गई।
लेकिन जब अर्जुन और उसके दोस्त वहाँ पहुँचे, तब तक ज़्यादातर लोग भाग चुके थे।
उन्हें सिर्फ एक बैग मिला, जिसमें कुछ कागज़ात और नक्शे थे।
राकेश ने बैग खोला।
"अर्जुन, ये देखो!"
कागज़ों में शहर के कई इलाकों के नाम लिखे थे, जिन पर दुश्मन गैंग कब्ज़ा करने की योजना बना रहा था।
लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात आखिरी पन्ने पर लिखी थी—
"अंदर का आदमी काम कर रहा है।"
चारों एक-दूसरे को देखने लगे।
अर्जुन धीरे से बोला,
"मतलब गद्दार अभी भी हमारे बीच है..."
और अब यह रहस्य पहले से भी गहरा हो चुका था।