जैसे ही सात मिनट की गिनती पूरी हुई, विक्रम के चेहरे पर एक मुस्कान आ गई। वह बिना एक पल गंवाए, जंगल के रास्तों पर बच्चों को ढूंढने के लिए निकल पड़ा।
वह अपनी गहरी और शांत नज़रों से एक-एक झाड़ी, एक-एक पेड़ के पीछे देख रहा था। चलते-चलते वह मन ही मन खुद से बात कर रहा था।
"ये बच्चे भी कितने बेवकूफ हैं... इन्हें सच में ऐसा लगता है कि जो आखिर में दो बचेंगे, मैं उन्हें आराम से जाने दूँगा?
मैं उनमें से भी किसी को नहीं छोड़ूँगा।"आख़िर उन सबके मम्मी-पापा को भी तो पता चलना चाहिए... कि किसी अपने को खोने का दर्द कैसा होता है!"
जंगल का एक बरसों पुराना, बहुत विशाल पेड़ था, जिसका तना किसी दीवार जितना चौड़ा था। कोई और रास्ता न देखकर रिद्धि ने अंजली का हाथ पकड़ा और दोनों उस मोटे तने के पीछे जाकर छिप गईं।
तभी अचानक अंजलि की नज़र अपनी स्मार्टवॉच पर पड़ी। उसने देखा कि स्क्रीन पर नेटवर्क की एक डंडी धीरे-धीरे टिमटिमा रही है।
यह देखते ही उसकी डूबती हुई उम्मीदों को जैसे सहारा मिल गया।उसने खुशी और घबराहट के मिक्स चेहरे के साथ फुसफुसाते हुए कहा, "रिद्धि! देखो, लगता है इस जगह पर सिग्नल आ रहा है!"
अंजलि ने अपने हाथ को थोड़ा ऊपर-नीचे और इधर-उधर घुमाकर नेटवर्क पकड़ने की कोशिश की।
सिग्नल आते ही उसने बिना वक़्त गंवाए अपनी माँ वैदेही को फ़ोन लगा दिया। घंटी तो जा रही थी, पर दूसरी तरफ से आवाज़ बिल्कुल साफ़ नहीं आ रही थी।
ज़्यादा सिग्नल पाने के लिये वह थोड़ा सा आगे निकल आई।यह देखकर रिद्धि का कलेजा मुंह को आ गया। उसने डरते हुए दबी आवाज़ में डांटा, "अंजलि! ये क्या कर रही हो? कहाँ जा रही हो तुम? अगर वो इस वक़्त यहाँ आ गया और उसने हमें देख लिया, तो हम पकड़े जाएंगे!"
अंजलि ने पीछे मुड़कर देखा और कहा, "देखो रिद्धि, अभी मौका है। अगर मैंने इस वक़्त कॉल करके माँ को सब बता दिया, तो वो पुलिस को जल्दी ले आएंगी।"
यह कहते हुए वो थोड़ा और आगे बढ़ी और नेटवर्क पकड़ते ही अपनी मम्मी को दोबारा कॉल किया। इस बार कॉल कनेक्ट हो गया।
दूसरी तरफ से उसकी माँ ने जैसे ही फ़ोन उठाया, वो रोते हुए भर्राई आवाज़ में बोलीं, "अंजलि! बेटा कहाँ हो तुम? तुम ठीक तो हो ना?"अंजलि ने हांफते हुए जल्दी-जल्दी कहा, "माँ! हम जंगल में हैं, यहाँ..."
विक्रम सीधे रास्ते पर आगे बढ़ रहा था लेकिन तभी अचानक, उसे बाईं ओर से किसी के फुसफुसाने की बहुत हल्की सी आवाज़ सुनाई दी।
अंजलि अपनी बात पूरी कर पाती, उससे पहले ही —बैटरी खत्म होने की वजह से वॉच स्विच ऑफ हो चुकी थी।
हेलो? माँ? हेलो!" अंजलि ने बौखलाकर वॉच को देखा,तभी अचानक रिद्धि की चीख पूरे जंगल में गूंज उठी, "अंजलि! जल्दी वापस आओ!!!"
अंजलि ने चौंककर सामने देखा। झाड़ियों के पार, कुछ ही दूरी पर विक्रम खड़ा था। विक्रम लंबे-लंबे कदम बढ़ाता हुआ अंजलि की तरफ झपटा।
अंजलि डर के मारे अपनी जगह पर जम चुकी थी, उसका पूरा शरीर कांप रहा था। विक्रम ने उसकी तरफ देखा और बोला, "अब तुम्हारी बारी है... मरने के लिए तैयार हो जाओ। पर चिंता मत करो गुड़िया, मैं तुम्हें प्यार से ही मारूँगा।
"तभी रिद्धि पागलों की तरह भागती हुई उन दोनों के बीच में आ गई। उसने रोते हुए अपने हाथ जोड़ दिए और गिड़गिड़ाकर बोली, "पापा नहीं! प्लीज... अंजलि को छोड़ दो!
प्लीज उसे मत मारो!"'पापा' शब्द सुनते ही विक्रम के चेहरे की वो शांत मुस्कान गायब हो गई। उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया उसने बेहद गुस्से से रिद्धि की तरफ देखा और चिल्लाते हुए कहा, "मैंने तुम्हें कितनी बार समझाया था कि मुझे पापा मत बोलना!"