गुरूजी के मार्गदर्शन में - 1 H.k Bhardwaj द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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गुरूजी के मार्गदर्शन में - 1

▪️💀गुरुजी के मार्गदर्शन में💀▪️

(श्मशान साधना का महाविस्फोट)

Written by H.K.Bharadwaj)

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अध्याय 01:-

 (कालरात्रि की दस्तक और गुरु की शरण)

 वह कोई सामान्य रात नहीं थी। 

       विक्रमी संवत् के अनुसार, कार्तिक मास की वह कृष्ण पक्ष की अमावस्या थी।—जो तांत्रिकों, अघोरियों और पिशाचों की सिद्ध रात्रि कही जाती है। उस रात आसमान में काले, घने बादलों ने जैसे चंद्रमा को निगल लिया था। हवा में एक अजीब सा भारीपन था, जैसे कोई अदृश्य शक्ति वातावरण की ऑक्सीजन को सोख रही हो। 

          बदायूं जिले के एक छोटे से गाँव आसफपुर की गलियां सुनसान थीं।   

         आवारा कुत्ते भी अपनी दुम दबाए किसी कोने में छिपकर अजीब, रोती हुई आवाजें निकाल रहे थे।

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मैं—यानी हरेन—अत्यंत व्याकुल, उन्मादी और अर्ध-पागल सा होकर अपने गुरुजी, पंडित हरीशंकर के चरणों में गिर पड़ा था। मेरी आँखों से अविरल बहती अश्रुधारा में केवल लाचारी नहीं, बल्कि एक गहरा खौफ था। जिसका कारण मेरी प्रेमिका, मधु थी, जिसके साथ मैंने जीवन जीने के सपने देखे थे। वह पिछले सात दिनों से एक जिंदा लाश बन चुकी थी। उसका शरीर पीला पड़ चुका था, आँखें उलट चुकी थीं और उसके मुंह से इंसानी भाषा नहीं, बल्कि किसी भयानक जानवर की गुर्राहट निकलती थी।​"गुरुजी ! उसे बचाइए। वह तड़प रही है... वह हर पल मर रही है !" मैंने सिसकते हुए अपने गुरुजी के पैर पकड़ लिए।​पंडित हरीशंकर जी, जिनकी जटाएं उनके कंधों पर बिखरी हुई थीं और माथे पर भस्म का त्रिपुंड चमक रहा था, ने अपनी तेजस्वी, अंगारे जैसी लाल आँखों से मेरी ओर देखा। उन्होंने अपने दाहिने हाथ में पकड़ी रुद्राक्ष की माला को थामा और बेहद गंभीर, गूंजती हुई आवाज में बोले, "उठो हरेन! भय को अपनी कमजोरी नहीं, अपनी तलवार बनाओ। मधु किसी सामान्य बीमारी की शिकार नहीं है। उस पर 'कूष्मांड' का साया है। यह वह उच्च कोटि का तामसिक पिशाच है जो इंसानी मांस और आत्मा की गंध पाकर जागता है। वह उसकी आत्मा को पूरी तरह सोखने से बस कुछ ही कदम दूर है। यदि आज की रात हम चूके, तो कल की भोर मधु की चिता की भोर होगी।"​मैंने कांपते हुए पूछा।"गुरुजी, हमें क्या करना होगा ?"​गुरुजी ने एक गहरी सांस ली, जिससे कुटिया में रखा दीया फड़फड़ा उठा, 

             "हमें तंत्र के सबसे वीभत्स और खतरनाक मार्ग पर चलना होगा।''शव साधना'' और इसके लिए हमें आसफपुर के उस श्मशान में जाना होगा जहाँ आज ही एक अकाल मृत्यु मरे व्यक्ति की चिता जलाई गई है।"​अध्याय 02:- (आसफपुर का भयानक श्मशान और वर्जित भूमि) स्थान: गाँव आसफपुर का श्मशान, निकट विकास क्षेत्र आसफपुर, शहर जनपद बदायूं (उत्तर प्रदेश)​ 

        रात के ठीक 11:45 बजे थे। हम दोनों गाँव की सीमा लांघकर विकास क्षेत्र आसफपुर के उस बदनाम श्मशान की ओर बढ़ रहे थे। बदायूं के इस इलाके में इस श्मशान को लेकर सैकड़ों डरावनी कहानियाँ मशहूर थीं। कहा जाता था कि यहाँ की मिट्टी कभी सूखती नहीं थी, वह हमेशा इंसानी चर्बी और खून से गीली रहती थी।​ 

        जैसे ही हमने श्मशान की सीमा में पैर रखा, हवा का तापमान अचानक शून्य से नीचे गिरता हुआ महसूस हुआ।          मेरी सांसें जमने लगीं। सूखी झाड़ियों और बबूल के पेड़ों के बीच से ऐसी आवाजें आ रही थीं जैसे कोई सूखी हड्डियों को चबा रहा हो। दूर, श्मशान के केंद्र में एक चिता धधक रही थी। वह आज ही आई एक लाश थी। उस प्रज्वालित शव दाह की लपटें हवा के झोंकों के साथ अजीब, डरावनी आकृतियाँ बना रही थीं।​"सावधान हरेन,।" गुरुजी ने फुसफुसाते हुए कहा।,

 "यहाँ की हवा में भी अतृप्त आत्माएं तैर रही हैं। पैर संभलकर रखना।"​ 

         गुरुजी ने चिता से लगभग दस फीट की दूरी पर अपनी झोली से काली मिट्टी और सिंदूर निकाला। उन्होंने जमीन पर एक विशाल, जटिल तांत्रिक यंत्र खींचा। यह तंत्र क्रिया के सबसे उग्र और गुप्त रूप ''पञ्च मकार'' की तैयारी थी।

पञ्च मकार साधना में निम्न पाँच वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। 

01- मद्य (मदिरा): गुरुजी ने मिट्टी के एक पात्र में तीखी, सिद्ध की हुई मदिरा डाली, जिसकी गंध से ही सिर घूमने लगा।​

02- मांस: काले बकरे के कच्चे मांस के टुकड़े वेदी के चारों कोनों पर रखे गए।

​03- मत्स्य (मछली): सूखी श्मशानी मछली को त्रिशूल पर पिरोया गया।​

04- मुद्रा: विशेष रूप से भूने हुए अनाज और तांत्रिक प्रतीकों को जमीन पर बिखेरा गया।​

05- मैथुन (प्रतीकात्मक): शिव और शक्ति की चरम संहारक ऊर्जा का आवाहन करने के लिए गुरुजी ने अपने आसन को चिता की दिशा के समानांतर स्थापित किया। 

      गुरुजी ने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी रीढ़ को सीधा करके बैठ गए। उन्होंने अपनी जीभ पर थोड़ा सिंदूर रखा और मंत्रोच्चार शुरू किया।​अध्याय 03:- (जाग्रत वेदी और प्रेत-नृत्य) ​शुरुआत में गुरुजी की आवाज़ धीमी और गंभीर थी, जैसे पाताल की गहराइयों से कोई गूंज उठ रही हो।                लेकिन जैसे-जैसे 'पञ्च मकार' की वेदी पर स्थापित की गई सामग्रियां अपनी ऊर्जा छोड़ने लगीं, श्मशान का वातावरण बदलने लगा। गुरुजी के हाथ में रखी रुद्राक्ष की माला हवा में स्वतः ही तीव्र गति से घूमने लगी।मेरे पैर डर के मारे कांप रहे थे। 

                 अचानक, चिता के पास रखी मिट्टी की कुल्हड़ में रखी 'मद्य' (मदिरा) बिना किसी आग के उबलने लगी, और उसकी तीखी, नशीली गंध हवा में इतनी गाढ़ी हो गई कि मेरा सिर चकराने लगा। वेदी के चारों कोनों पर रखे कच्चे मांस के लोथड़ों से एक अजीब सी नीली भाप उठने लगी, जो सीधे जाकर जलती हुई चिता की आग में समाने लगी। तंत्र का यह प्रथम चरण पूरा होते ही, श्मशान के सन्नाटे को चीरते हुए हवा का एक ऐसा बर्फीला झोंका आया जिसने मेरे शरीर का खून जमा दिया। 

          वह हवा सामान्य नहीं थी; उसमें किसी के फुसफुसाने और रोने की डरावनी आवाज़ें घुली हुई थीं।        तभी गुरुजी ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए और उनके कंठ से निकलने वाले गुप्त शाबर मंत्रों की गति दोगुनी हो गई। मंत्रों की आवृत्ति जैसे-जैसे बढ़ने लगी, वैसे-वैसे चिता की आग का रंग बदलने लगा। वह पीली-लाल लपटों से बदलकर हल्की नीली और हरी होने लगी।​ठीक आधी रात के 12 :00 बजे। अचानक, श्मशान की भूमि में एक तीव्र कंपन हुआ।          पेड़ों पर बैठे सैकड़ों चमगादड़ एक साथ चीखते हुए आसमान में उड़ गए।

 चिता से निकलने वाला धुआं हवा में फैलने के बजाय जमीन पर रेंगने लगा।​तभी, बबूल के पेड़ों के पीछे से और श्मशान के निकट बनें कब्रिस्तान से पुरानी कब्रों के भीतर से कुछ आकृतियां उभरने लगीं। मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। वे भूत-प्रेतिनियां और डाकिनियां थीं।

उनके शरीर सड़ चुके थे, कुछ के चेहरे आधे जले हुए थे, और उनकी आँखें खोखली थीं जिनमें से काला पानी बह रहा था।

 उन्होंने एक-दूसरे के हाथ पकड़े और उस जलती हुई चिता के चारों ओर नाचने लगीं।उनका वह नृत्य वीभत्स था।

वे अपनी गर्दनों को 180 डिग्री पर घुमा रही थीं, उनकी जीभें बाहर लटकी हुई थीं और उनके पैरों के घुंघरू की जगह सूखी हड्डियां आपस में टकराकर 'खट-खट' की डरावनी ध्वनि कर रही थीं।

 उनकी हँसी इतनी तीखी थी कि मेरे कानों से खून निकलने लगा।

​"हरेन ! अपनी जगह से हिलना मत! अगर तुमने इस घेरे को छोड़ा, तो ये चुड़ैलें तुम्हारी जीभ खींच लेंगी!"

 गुरुजी ने अपनी आँखें बिना खोले ही मुझे सचेत किया।                 तभी, चिता के ठीक बीच से एक भयानक गर्जना हुई। लपटें अचानक थमीं और फिर दस फीट ऊंची उठ गईं। धुएं के उस गुबार के बीच से एक विशाल, नरभक्षी रूप प्रकट हुआ।   

           उसकी चमड़ी भैंसे जैसी काली और खुरदरी थी, पेट घड़े की तरह फूला हुआ था, और उसके मुंह से दो बड़े नुकीले दांत बाहर की ओर निकले हुए थे। "वह कूष्मांड था"।       सबसे भयानक बात यह थी कि उस कूष्मांड के बाएं हाथ में एक धुंधली, नीली रोशनी छटपटा रही थी। उस रोशनी के भीतर मुझे मधु का चेहरा दिखाई दिया। 

वह दर्द से चीख रही थी।,

 "हरेन... मुझे बचाओ! यह मुझे खा जाएगा !"

​"मधु!" 

मैं चिल्लाया और आगे बढ़ने ही वाला था कि गुरुजी ने मेरा हाथ पकड़कर मुझे पीछे खींचा।

 उनकी पकड़ लोहे जैसी मजबूत थी।

अध्याय 04:-

 (शव साधना का खौफनाक चरम) 

वह कूष्मांड अपनी लाल, धधकती आँखों से हमें देखने लगा। उसकी आवाज से पूरा आसफपुर श्मशान कांप उठा।, 

"हरीशंकर ! तू ....अपनी तुच्छ शक्तियों के बल पर मुझसे मेरा भोग छीनने आया है ? इस लड़की की आत्मा अब मेरी भूख है। अगर तूने बाधा डाली, तो मैं इस लड़के के सामने तेरी बोटी-बोटी नोच खाऊंगा!"

गुरुजी हरीशंकर के चेहरे पर डर का एक भी भाव नहीं था। उन्होंने एक भयानक, अघोरी अट्टहास किया। 

उनकी हँसी ने उन नाचती हुई प्रेतिनियों को शांत कर दिया।​          "मूर्ख पिशाच! तूने एक अघोरी की शक्ति को नहीं आंका है,।" 

गुरुजी गरजे।

अब जो शुरू हुआ, वह

"शव साधना" का एक ऐसा बेजोड़ नमूना था जिसे देखकर कोई भी कमजोर दिल इंसान दम तोड़ देता। 

               गुरुजी अपने आसन से उठे और सीधे उस धधकती हुई चिता की ओर बढ़ गए। 

चिता के भीतर उस अज्ञात शव का आधा चेहरा जल चुका था और आधा अभी भी मांस से भरा हुआ था।गुरुजी ने बिना झिझक अपना दाहिना हाथ उस जलती आग के अंदर डाल दिया। 

उन्होंने उस धधकते हुए शव की खोपड़ी (कपाल) को अपने नंगे हाथों से पकड़ लिया। आग उनकी त्वचा को छू रही थी, लेकिन तंत्र बल के कारण वह जल नहीं रहे थे। उन्होंने अपनी बाईं हथेली को काटा और अपने रक्त को उस जलती खोपड़ी पर टपका दिया।

         पञ्च मकारों से जागृत ऊर्जा और शव के माध्यम से ब्रह्मांडीय तामसिक शक्तियों का यह मिलन रोंगटे खड़े कर देने वाला था।

 श्मशान की मिट्टी चारों ओर से उड़ने लगी। जिस से एक भयानक हवा का बवंडर बन गया।​गुरुजी ने चिल्लाकर मुझसे कहा।

 "हरेन! समय आ गया है। इस सिद्ध रक्षा-सूत्र को पकड़ो, अपनी उंगली का रक्त इस पर लगाओ और अपनी पूरी आत्मा की शक्ति से मधु को पुकारो ! संकोच मत करो, अन्यथा यह शव साधना अधूरी रह जाएगी और हम दोनों यही प्रेत बनकर भटकेंगे!"   

    ​मैंने कांपते हाथों से अपनी उंगली को एक नुकीले पत्थर से चीर दिया। दर्द की एक लहर मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई। मैंने अपना खून उस सूत्र पर लगाया और चिता की ओर मुंह करके पूरी ताकत से चिल्लाया।, 

"मधु... मेरी आवाज सुनो ! वापस आ जाओ !!!"​

अध्याय 5:-

( महाविस्फोट और अंतिम टकराव) 

मेरे पुकारते ही, गुरुजी ने चिता के भीतर से उस जलते हुए शव की खोपड़ी पर एक जोरदार तांत्रिक प्रहार किया। —''कपाल क्रिया'' 

ठीक तभी एक कान फोड़ देने वाला धमाका हुआ।

 शव की खोपड़ी दो हिस्सों में फट गई और उसमें से एक तीव्र, सफेद रोशनी निकली। 

        गुरुजी ने उस रोशनी को अपनी उंगली से कूष्मांड की ओर मोड़ दिया।

उन्होंने पञ्च मकार के सिद्ध मद्य को हवा में उछाला और मंत्र पढ़ा। 

जैसे ही मदिरा की बूंदें उस सफेद रोशनी से मिलीं, वे आग के गोलों में बदल गईं। 

वह आग सीधे कूष्मांड के विशाल शरीर पर जाकर लगी।​"अहहहहह!" 

कूष्मांड एक असहनीय दर्द से चीख उठा। 

उसका पूरा शरीर जलने लगा।

उसके हाथ की पकड़ ढीली हो गई।

 मधु की वह नीली, पवित्र आत्मा उसकी मुट्ठी से छूट गई।

 मैंने देखा कि वह सूक्ष्म रोशनी हवा में तैरती हुई श्मशान की सीमा से बाहर, गाँव की ओर, जहाँ मधु का शरीर था, तेजी से बढ़ गई।

कूष्मांड का शरीर धीरे-धीरे पिघलकर चिता की राख में तब्दील होने लगा। 

              जाते-जाते उसने एक आखिरी भयानक चीख मारी, जिससे श्मशान के सारे पेड़ जड़ से उखड़ गए। नाचती हुई भूत-प्रेतिनियां भी हवा में धुएं की तरह विलीन हो गईं।​

उपसंहार-:

(अंतहीन खौफ) 

और अब सब कुछ शांत हो चुका था। हवा का वह भारीपन गायब था, लेकिन चारों ओर बिखरी हुई हड्डियां, उखड़े हुए पेड़ और जलती चिता की राख इस बात की गवाह थी कि यहाँ क्या घटा था।

भोर की पहली धुंधली किरण आसफपुर के आसमान पर उभर रही थी।

 गुरुजी हरीशंकर चिता के पास थके हुए, लेकिन विजयी मुद्रा में खड़े थे।

उनका पूरा शरीर भस्म से सना हुआ था। उन्होंने मेरी ओर देखा और कहा।,

"हरेन, जाओ। तुम्हारी मधु अब पूरी तरह मुक्त है। वह अपने घर पर होश में आ चुकी होगी।"

मैंने गुरुजी के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। मेरी आँखों में आंसू थे, लेकिन मन में एक गहरा, कभी न मिटने वाला खौफ बैठ चुका था।

मैं भागता हुआ गाँव में मधु के घर पहुँचा। वह बिस्तर पर बैठी थी, पूरी तरह स्वस्थ और सामान्य। 

मुझे देखकर वह मुस्कुराई। लेकिन जैसे ही मैं उसके पास बैठा और उसने मेरा हाथ थामा,

मुझे महसूस हुआ कि उसका हाथ अभी भी श्मशान की उस बर्फीली हवा की तरह बिल्कुल ठंडा था।

उसने मेरी ओर देखा, और उसकी आँखों की पुतलियाँ पल भर के लिए ठीक वैसे ही पूरी तरह काली हो गईं जैसी मैंने श्मशान में देखी थीं। 

वह धीरे से मुस्कुराई और बोली,

"तुम आ गए, हरेन?"

          मेरी रीढ़ में एक बार फिर वही भयानक सिहरन दौड़ गई। 

▪️क्या कूष्मांड वास्तव में नष्ट हो गया था ? 

▪️या साधना का कोई हिस्सा अधूरा रह गया था ? 

आसफपुर का वह श्मशान आज भी मेरे भीतर जीवंत था, और डर... डर अभी खत्म नहीं हुआ था।

Written by H K Bharadwaj