उसे उसकी बचकानी बातें पसंद नहीं थी... InkImagination द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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उसे उसकी बचकानी बातें पसंद नहीं थी...

उसे उसकी बचकानी बातें पसंद नहीं थीं...

कुछ रिश्ते समझदारी से नहीं, किस्मत की जिद से बनते हैं।
कुछ लोग हमारी पसंद नहीं होते, फिर भी दिल की सबसे खूबसूरत आदत बन जाते हैं।
और कभी-कभी... जिसे हम बचपना समझकर नजरअंदाज करते हैं, वही हमारी जिंदगी की सबसे प्यारी वजह बन जाता है...

लखनऊ के बाहरी इलाके में, जहां शहर की हलचल से दूर हरियाली फैली हुई थी, एक विशाल हवेली खड़ी थी। दूर से देखने पर वह किसी राजसी महल जैसी लगती थी—उच्ची दीवारें, मेहराबदार गलियारे, पुराने जमाने के फव्वारे और रंग-बिरंगे बगीचे। इस हवेली का मालिक था आर्यवीर सिंह।
उम्र अट्ठाईस साल। कद छह फीट दो इंच, चौड़े कंधे, मजबूत वक्षस्थल और चेहरे पर हमेशा एक गंभीर, अटल अभिव्यक्ति। उसके काले घने बाल, तेज नजरें और ठोड़ी की हल्की दाढ़ी उसे और भी रौबदार बनाती थी। आर्यवीर अपने पिता के विशाल बिजनेस साम्राज्य को संभालता था—रियल एस्टेट, होटल चेन और निर्यात का कारोबार। लोग उससे डरते थे, उसकी इज्जत करते थे, लेकिन कोई उसके करीब नहीं आ पाता था।
उसकी एक ही शिकायत थी—शोर-शराबा, बेवजह की हंसी, बचकानी हरकतें और नाटक।
वह हमेशा कहता,
"शादी करनी है तो किसी समझदार, परिपक्व लड़की से। जो मेरी पार्टनर बने, जिम्मेदारियों को समझे। बच्ची नहीं, सहारा।"
लेकिन किस्मत ने उसके सारे प्लान उलट दिए।
जिस लड़की से उसकी शादी तय हुई, उसका नाम था अन्वी। अभी-अभी अठारह साल की हुई थी। छोटा-सा गोल चेहरा, बड़ी-बड़ी भूरी आंखें जो हमेशा चमकती रहती थीं, गुलाबी होंठ और दो मोटी चोटियां जो उसकी पीठ पर लहराती रहती थीं। वह कार्टून देखना पसंद करती, चॉकलेट देखते ही उसकी आंखें चमक उठतीं, और खरगोशों से बातें करने में उसे घंटों गुजर जाते। अपनी उम्र से छोटी दिखने की उसकी आदत आज भी बरकरार थी—खासकर आर्यवीर के सामने।
दोनों परिवार कई पीढ़ियों से एक-दूसरे को जानते थे। एक शाम आर्यवीर की दादी ने साफ-साफ कह दिया,
"मरने से पहले अपने पोते की शादी देखना चाहती हूं।"
घर में भावनाओं का तूफान आ गया। आर्यवीर ने बहुत विरोध किया, बहुत समझाया, लेकिन दादी की आंसू भरी आंखों के आगे वह हार गया। परिवार की खुशी के लिए उसने हामी भर दी।

पहली मुलाकात

जब आर्यवीर अन्वी से मिलने बगीचे में पहुंचा, तो वह एक पुराने पीपल के नीचे घास पर बैठी थी। गोद में एक सफेद खरगोश लिए, उसे धीरे-धीरे कहानी सुना रही थी। उसकी चोटियां हवा में लहरा रही थीं।
आर्यवीर कुछ देर दूर खड़ा उसे देखता रहा। फिर ठंडे स्वर में बोला,
"तुम क्या कर रही हो?"
अन्वी चौंक गई। खरगोश को सीने से चिपकाकर घबराई हुई नजरों से ऊपर देखा।
"मैं... इसे कहानी सुना रही थी।"
"खरगोश को?" आर्यवीर का माथा सिकुड़ गया।
"हां... इसे अच्छी लगती है।" अन्वी मुस्कुराई, मासूमियत से।
आर्यवीर ने मन ही मन सोचा, हे भगवान, यह क्या है?
मुलाकात छोटी रही। घर लौटकर जब परिवार ने पूछा, तो उसने लंबी सांस ली।
"वह बच्ची है।"
दादी मुस्कुराईं, "आज बच्ची है, कल तुम्हारी पूरी दुनिया बन जाएगी।"

शादी और नई शुरुआत

कुछ महीनों बाद शादी हो गई। पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गई यह शादी। एक तरफ गंभीर, रौबदार आर्यवीर। दूसरी तरफ नन्ही-सी, खिलखिलाती अन्वी।
शादी की पहली रात। कमरे में मंद रोशनी थी। अन्वी बिस्तर पर घुटनों पर बैठी, चुपके से चॉकलेट खा रही थी। आर्यवीर अंदर आया तो वह घबरा गई और चॉकलेट तकिए के नीचे छिपा दी।
"तुम क्या कर रही हो?" उसकी भारी आवाज गूंजी।
"भूख... भूख लगी थी," अन्वी ने नीचे देखते हुए कहा।
आर्यवीर ने पहली बार हल्का सा मुस्कुराया। उसने पास आकर तकिए से चॉकलेट निकाली और उसे वापस थमा दी।
"खाओ। लेकिन अगली बार मुझसे पूछ लिया करो।"
उस रात अन्वी ने पहली बार आर्यवीर की आंखों में नरमी देखी।

हवेली में तूफान

अन्वी के आने से हवेली की शांति हमेशा के लिए चली गई।
सुबह-सुबह वह नौकरानियों के साथ लूडो खेलती। दादी के साथ छत पर पतंग उड़ाती। कभी-कभी पूरे घर में दौड़ लगाती, हंसती-खिलखिलाती। आर्यवीर की महंगी फाइलों पर कार्टून स्टिकर लगाती, उसके सूट पर रंग-बिरंगे बटन लगाकर रख देती।
एक दिन आर्यवीर मीटिंग से थका-हारा लौटा। कमरे में घुसते ही उसकी चीख निकल गई,
"अन्वी!!!"
उसकी महंगी ब्लैक फाइलों पर रंग-बिरंगे स्टिकर और ड्रॉइंग्स बनी हुई थीं।
अन्वी डरते-डरते आई, "जी?"
"ये किसने किया?"
"मैंने... फाइलें बहुत बोरिंग लग रही थीं। मैंने उन्हें खुश कर दिया।"
आर्यवीर आंखें बंद करके खड़ा रहा। गुस्सा और हंसी के बीच फंसा हुआ।
शुरुआत में उसे अन्वी की हर हरकत परेशान करती थी। वह सोचता, यह कितनी अपरिपक्व है।

प्यार की शुरुआत

एक रात आर्यवीर बहुत देर से, बेहद तनाव में घर लौटा। बिजनेस में बड़ी समस्या आ गई थी। पूरा घर सो चुका था, लेकिन ड्राइंग रूम की लाइट जल रही थी।
अंदर गया तो अन्वी सोफे पर बैठी उसका इंतजार कर रही थी। उसके बाल खुले हुए थे, आंखों में नींद थी, लेकिन वह जाग रही थी।
"तुम अभी तक सोई नहीं?"
"आपके बिना खाना खाने का मन नहीं करता," अन्वी ने धीरे से कहा। "मैंने गरम-गरम खाना रखवा दिया है।"
आर्यवीर चुपचाप बैठ गया। अन्वी ने खुद उसके लिए प्लेट सजाई, खाना परोसा। उस रात पहली बार उसे लगा—यह लड़की बचकानी जरूर है, लेकिन उसका दिल स्वच्छ सोने जैसा है।
धीरे-धीरे बदलाव आने लगा।
बारिश का एक दिन। अन्वी बगीचे में भीग रही थी, हाथ फैलाए नाच रही थी। आर्यवीर बालकनी से चिल्लाया, "भीग जाओगी, बीमार पड़ जाओगी!"
"आ जाइए ना! एक दिन बच्चा बनकर देखिए ना!" अन्वी ने हाथ बढ़ाया।
आर्यवीर कुछ पल देखता रहा, फिर नीचे उतरा। और उस दिन, सालों बाद, वह बारिश में भीगा। अन्वी के साथ। उसकी हंसी सुनकर खुद भी हंस पड़ा। अन्वी ने उसका हाथ पकड़कर घुमाया। उस पल आर्यवीर को एहसास हुआ—उसकी दुनिया में रंग भरने वाली यह लड़की है।

दूरियाँ और एहसास

जब अन्वी एक हफ्ते के लिए मायके गई, हवेली अचानक सूनी पड़ गई। कोई हंसी नहीं, कोई शोर नहीं, कोई चॉकलेट का पैकेट फर्श पर नहीं। आर्यवीर बेचैन हो गया। तीसरे दिन वह अन्वी के कमरे में चला गया। उसकी किताबें, खिलौने, अधखाई चॉकलेट्स, उसकी खुशबू...
उसे अपनी बेचैनी का एहसास हुआ। वह उसे मिस कर रहा था। बहुत ज्यादा।
सातवें दिन जब अन्वी वापस आई, आर्यवीर खुद दरवाजे पर खड़ा था।
अन्वी हैरान, "आप यहां?"
"हां।" आर्यवीर ने उसे देखा, फिर धीरे से बोला, "तुम्हारे बिना घर अच्छा नहीं लग रहा था, अन्वी।"
उस रात अन्वी ने अपनी डायरी में लिखा:
"शायद... मैं अपनी पति से प्यार करने लगी हूं।"
गहराता प्यार
अब हाल यह था कि जो आदमी कभी उसकी हरकतों से परेशान रहता था, वही उसके पीछे-पीछे घूमता था।
अगर अन्वी देर से सोती, तो आर्यवीर खुद उसे जगाने आता, माथे पर किस करते हुए।
अगर वह खाना नहीं खाती, तो वह खुद उसके मुंह में कौर रखता।
अगर वह नाराज होती, तो घंटों मनाता—फूल लाकर, चॉकलेट लाकर, और कभी-कभी खुद को बच्चा बनाकर।
एक शाम उसकी मां ने हंसते हुए कहा, "पहले तो इसकी शिकायतें करते थे।"
आर्यवीर ने अन्वी की ओर देखा, जो शर्मा रही थी।
"पहले मैं इसे समझ नहीं पाया था। अब... अब इसकी हर बात पसंद है। यहां तक कि इसकी बचकानी हरकतें भी।"
"सबसे ज्यादा वही," उसने अन्वी के कान में फुसफुसाते हुए कहा।

समापन

कुछ महीने बाद दादी ने दोनों को बगीचे में देखा। अन्वी चॉकलेट खा रही थी। आर्यवीर ने उसका हाथ पकड़ा, आधी चॉकलेट खुद खा ली। दोनों हंस रहे थे।
दादी मुस्कुराईं, "देखा? मैंने कहा था ना... आज बच्ची है, कल तुम्हारी पूरी दुनिया बन जाएगी।"
आर्यवीर ने अन्वी को अपनी बाहों में खींच लिया। उसकी चमकती आंखें, मासूम मुस्कान और वही बचकानी शरारतें देखकर उसने धीरे से उसके माथे को चूमा।
क्योंकि अब उसे समझ आ चुका था—
प्यार परफेक्ट लोगों से नहीं होता।
प्यार उस इंसान से होता है जो आपकी गंभीर दुनिया में रंग भर दे, हंसी ले आए, और आपको फिर से जीना सिखा दे।
वह समझदार पत्नी चाहता था...
किस्मत ने उसे एक शरारती, मासूम लड़की दे दी।
उसे उसकी बचकानी बातें पसंद नहीं थीं...
लेकिन एक दिन वही बातें उसकी सबसे प्यारी मुस्कान बन गईं।
इश्क उम्र नहीं देखता,
इश्क आदत बन जाता है।
और जब कोई इंसान आपकी आदत बन जाए,
तो फिर वही आपकी पूरी दुनिया बन जाता है।
~ समाप्त ~ 💕