बारिश की तेज बूंदें हवेली की खिड़कियों से टकरा रही थीं।
पूरा शर्मा परिवार डर और तनाव में बैठा हुआ था। घर में शादी की तैयारियां चल रही थीं… लेकिन किसी को अंदाज़ा नहीं था कि अगले कुछ मिनटों में सब कुछ बदलने वाला है।
आर्या दुल्हन के जोड़े में अपने कमरे में बैठी थी। उसकी आंखों में आंसू थे।
आज उसकी शादी किसी और से होने वाली थी… लेकिन उसका दिल बार-बार सिर्फ एक ही नाम ले रहा था—
“विक्रांत…”
उसी वक्त बाहर अचानक गाड़ियों के रुकने की आवाज आई।
घर के बाहर काले रंग की कई लग्जरी गाड़ियां आकर रुकीं।
बारिश के बीच धीरे-धीरे एक लंबा-सा आदमी कार से उतरा।
ब्लैक शेरवानी… आंखों में गुस्सा… और हाथ में बंदूक।
वो था — विक्रांत सिंह
दरवाजा जोर से खुला।
सब डरकर खड़े हो गए।
आर्या के पापा घबराकर बोले,
“वि… विक्रांत जी… आप यहाँ…?”
विक्रांत की आंखें सिर्फ एक इंसान को ढूंढ रही थीं।
“आर्या कहाँ है…?”
उसकी भारी आवाज सुनकर पूरा घर कांप गया।
तभी ऊपर सीढ़ियों पर खड़ी आर्या दिखाई दी।
लाल जोड़े में… कांपती हुई… डरी हुई।
जैसे ही विक्रांत की नजर उस पर पड़ी… उसकी सांसें रुक गईं।
अगले ही पल उसने बंदूक उठाकर हवा में फायर कर दिया।
धड़ामmm!!!
घर में चीखें गूंज उठीं।
“ये शादी नहीं होगी!” विक्रांत गरजा।
आर्या डरकर पीछे हट गई।
“वि… विक्रांत जी ये क्या कर रहे हैं आप…?”
विक्रांत उसकी तरफ बढ़ा।
“मैं तुम्हें किसी और का होते हुए नहीं देख सकता आर्या… नहीं देख सकता!”
आर्या के पापा गुस्से में बोले,
“ये जबरदस्ती है! आप होश में नहीं हैं!”
विक्रांत ने उनकी तरफ बंदूक कर दी।
“होश तो मैने उस दिन खो गया था… जिस दिन पहली बार आर्या को देखा था।”
पूरा घर खामोश हो गया।
उसकी आंखों में दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
“मैंने जिंदगी में सब कुछ खोया है… प्यार… भरोसा… रिश्ते… लेकिन आर्या को नहीं खो सकता।”
आर्या की आंखों से आंसू बहने लगे।
“लेकिन इस तरह…?”
विक्रांत उसके बिल्कुल सामने आकर खड़ा हो गया।
“अगर आज तुम किसी और की हो गई… तो मैं जिंदा नहीं रह पाऊंगा।”
उसकी आवाज टूट चुकी थी।
तभी नीचे दूल्हे वाले भी आ गए। माहौल पूरी तरह बिगड़ चुका था।
दूल्हा गुस्से में बोला,
“ये पागल हो गया है!”
लेकिन अगले ही पल विक्रांत ने उसकी कॉलर पकड़ ली।
“नाम मत लेना उसका अपने मुंह से!”
सब लोग डर गए।
आर्या पहली बार विक्रांत के उस रूप को देख रही थी…
एक ऐसा आदमी… जो पूरी दुनिया से लड़ सकता था… सिर्फ उसके लिए।
तभी विक्रांत ने पंडित की तरफ देखा।
“शादी शुरू करो।”
पंडित डर गया।
“म… मगर…”
“मैंने कहा शादी शुरू करो!”
उसकी आवाज पूरे हॉल में गूंज गई।
आर्या रोते हुए बोली,
“विक्रांत जी… ये गलत है…”
विक्रांत ने उसकी तरफ देखा।
और पहली बार उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।
“गलत तो तब हुआ था आर्या… जब किस्मत ने मुझे तुमसे इतने साल बाद मिलाया।”
उसने धीरे से बंदूक नीचे कर दी।
मंडप में बैठे सभी लोग सहमे हुए थे।
शहनाइयों की आवाज़ अब डर के सन्नाटे में दब चुकी थी।
आर्य की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। वह अपनी कलाई छुड़ाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन विक्रांत की पकड़ इतनी मजबूत थी कि उसका हाथ लाल पड़ चुका था।
“छोड़िए मुझे…!” आर्य दर्द से बोली, “ये शादी नहीं ज़बरदस्ती है…!”
लेकिन विक्रांत की आंखों में इस वक्त सिर्फ जुनून था।
एक ऐसा जुनून जिसने उसके प्यार को पागलपन बना दिया था।
उसने आर्य को जबरदस्ती मंडप में बिठाया और पंडित की तरफ देखकर ठंडी आवाज़ में बोला—
“मंत्र शुरू कीजिए।”
पंडित के हाथ कांप रहे थे।
उन्होंने डरते हुए करण की तरफ देखा।
करण ने बंदूक सीधे आर्य के पिता के सिर पर तान रखी थी जबकि उसके दो आदमी आर्य की मां को पकड़े खड़े थे।
“अगर किसी ने भी चालाकी करने की कोशिश की…” करण धीमे लेकिन खतरनाक स्वर में बोला, “तो सबसे पहले गोली इनके सीने में जाएगी।”
“नहीं…!” आर्य चीख पड़ी।
उसने घबराकर अपने माता-पिता की तरफ देखा।
उसकी मां रो रही थीं और पिता बेबस आंखों से अपनी बेटी को देख रहे थे।
“बेटा…” उसके पिता की आवाज़ कांप गई, “हमारे लिए कुछ मत करना…”
“पापा…” आर्य टूटकर रो पड़ी।
विक्रांत कुछ पल तक आर्य को देखता रहा।
उसकी आंखों में दर्द भी था… और डर भी।
उसे डर था कि अगर आज आर्य उसकी नहीं हुई… तो वह उसे हमेशा के लिए खो देगा।
उसने धीरे से आर्य के पास झुककर कहा—
“मैं तुमसे प्यार करता हूं आर्य… बहुत ज्यादा। तुम्हें खो नहीं सकता।”
आर्य ने गुस्से और नफरत से उसकी तरफ देखा।
“प्यार…?” वह हंस पड़ी, लेकिन उसकी हंसी में दर्द था, “जिस प्यार में डर हो… बंदूक हो… वो प्यार नहीं होता विक्रांत सिंह।”
ये शब्द सीधे विक्रांत के दिल में उतर गए।
कुछ पल के लिए उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।
लेकिन तभी करण फिर गरजा—
“भाई! जल्दी कीजिए। पुलिस कभी भी यहां पहुंच सकती है।”
विक्रांत ने आंखें बंद कीं जैसे खुद से लड़ रहा हो।
फिर उसने कांपते हाथों से वरमाला उठाई और आर्य की तरफ बढ़ा दी।
आर्य पीछे हट गई।
“मैं ये शादी कभी स्वीकार नहीं करूंगी…” उसने रोते हुए कहा, “आप मेरा शरीर पा सकते हैं… दिल नहीं।”
मंडप में सन्नाटा छा गया।
विक्रांत की आंखों में पहली बार दर्द साफ दिखा।
उसे एहसास हो रहा था कि वह जिस लड़की से बेइंतहा प्यार करता है… उसी की नजरों में खुद को गिरा चुका है।
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
करण ने बंदूक का ट्रिगर दबाने जैसा इशारा किया—
“भाई!”
और अगले ही पल…
विक्रांत ने कांपते हाथों से आर्य के गले में वरमाला डाल दी।
जैसे ही विक्रांत ने कांपते हाथों से आर्य के गले में वरमाला डाली…
उसी पल बाहर से पुलिस सायरन की आवाज़ गूंज उठी।
“पुलिस!” करण चौंककर चिल्लाया।
मंडप में अफरा-तफरी मच गई।
मेहमान इधर-उधर भागने लगे।
करण ने घबराहट में अपनी बंदूक और कसकर आर्य के पापा की तरफ तान दी।
लेकिन तभी उसके एक आदमी ने पीछे से आकर कहा—
“भाई! पीछे वाले गेट से पुलिस अंदर आ रही है!”
करण एक पल के लिए मुड़ा…
और उसी घबराहट में उसकी उंगली ट्रिगर पर दब गई।
धाऽऽय!!!
गोली की आवाज़ पूरे मंडप में गूंज उठी।
कुछ सेकंड के लिए जैसे समय रुक गया।
फिर आर्य ने देखा—
उसके पापा के सीने से खून निकल रहा था।
“पा…पा…!”
आर्य की चीख पूरे हॉल में गूंज गई।
उसके पिता लड़खड़ाकर नीचे गिर पड़े।
“नहींऽऽऽ!!!”
आर्य भागकर उनके पास पहुंची और उनके सिर को अपनी गोद में रख लिया।
उसके हाथ खून से भर चुके थे।
“पापा… आंखें खोलिए… प्लीज पापा…” वह बुरी तरह रो रही थी।
उसकी मां भी चीखते हुए उनके पास आ गईं।
“ये क्या हो गया…!” उनकी रुलाई फूट पड़ी।
करण खुद भी घबरा गया था।
“भाई… मुझसे गलती से—”
लेकिन इससे पहले कि वह अपनी बात पूरी करता…
विक्रांत ने गुस्से में उसका कॉलर पकड़ लिया।
“तू पागल हो गया है क्या?!” विक्रांत दहाड़ा।
उसकी आंखों में पहली बार डर साफ दिखाई दे रहा था।
आर्य ने आंसुओं भरी आंखों से विक्रांत की तरफ देखा।
उस नजर में इतनी नफरत थी कि विक्रांत अंदर तक कांप उठा।
“ये सब आपकी वजह से हुआ है…” आर्य टूटती आवाज़ में बोली, “अगर आप हमें यहां जबरदस्ती नहीं लाते… तो मेरे पापा—”
वह आगे बोल ही नहीं पाई और फूट-फूटकर रोने लगी।
विक्रांत जैसे पत्थर बन गया।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसके जुनून ने किसी की जिंदगी तबाह कर दी।
आर्य के पिता मुश्किल से सांस ले पा रहे थे।
उन्होंने कांपते हाथ से आर्य का चेहरा छुआ।
“बेटा…” उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, “रो मत…”
“कुछ नहीं होगा आपको!” आर्य चीख पड़ी, “मैं आपको कुछ नहीं होने दूंगी!”
लेकिन उनके होंठों से खून निकल आया।
विक्रांत तुरंत नीचे झुका और बोला—
“गाड़ी निकालो! अभी अस्पताल चलते हैं!”
फिर उसने खुद आर्य के पापा को उठाया।
आर्य ने उसका हाथ झटक दिया।
“दूर रहिए उनसे!” वह चीखी
, “आपने मेरे पापा को मार दिया!”
ये शब्द सुनकर विक्रांत की आंखें भर आईं।
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि आज पहली बार…
उसे खुद से नफरत हो रही थी।