माफिया कि दुल्हनिया - भाग 1 Mamta Sahani द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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माफिया कि दुल्हनिया - भाग 1

पापा… मैं उससे शादी नहीं कर सकती… वो उम्र में मुझसे 10 साल बड़ा है…!”
21 साल की आर्या शर्मा की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उसकी आवाज कांप रही थी। सामने खड़े उसके पिता राघवेंद्र शर्मा चुपचाप अपनी बेटी को देख रहे थे। कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था।
आर्या ने कांपते हाथों से अपना दुपट्टा ठीक किया और फिर दर्द भरी आवाज में बोली—
“पापा… अभी मेरी उम्र ही क्या है…? मैंने अभी-अभी अपनी पढ़ाई पूरी की है… मेरे अपने सपने हैं… मैं ऐसे किसी इंसान के साथ पूरी जिंदगी कैसे बिता सकती हूं जिसे मैं ठीक से जानती तक नहीं…?”
राघवेंद्र शर्मा ने गहरी सांस ली।
वो अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे… लेकिन आज उनकी आंखों में मजबूरी साफ दिखाई दे रही थी।
“आर्या…” उन्होंने धीमी आवाज में कहा,
“कभी-कभी जिंदगी में फैसले दिल से नहीं… हालात देखकर लेने पड़ते हैं।”
“लेकिन मेरी जिंदगी है पापा!” आर्या लगभग चीख पड़ी।
“आप कैसे तय कर सकते हैं कि मुझे किसके साथ रहना है…?”
इतना कहकर वह फूट-फूटकर रोने लगी।
राघवेंद्र शर्मा ने नजरें झुका लीं।
उनके चेहरे पर दर्द था… अपराधबोध था… लेकिन साथ ही कोई ऐसी मजबूरी भी थी जिसे वो अपनी बेटी को बता नहीं पा रहे थे।
“तुम समझ नहीं रही हो बेटा…”
उन्होंने भारी आवाज में कहा,
“विक्रांत सिंह बहुत बड़े बिजनेसमैन हैं। उनका रिश्ता ठुकराना हमारे लिए आसान नहीं है।”
“तो क्या सिर्फ पैसे और रुतबे के लिए आप मुझे किसी भी इंसान के साथ बांध देंगे?” आर्या ने नम आंखों से अपने पिता को देखा।
उसकी बात सुनकर राघवेंद्र कुछ पल के लिए चुप हो गए।
तभी कमरे का दरवाजा खुला।
आर्या की मां सविता शर्मा अंदर आईं। उन्होंने अपनी बेटी को रोते देखा तो तुरंत उसके पास बैठ गईं।
“आर्या… शांत हो जाओ बेटा…”
लेकिन आर्या अब टूट चुकी थी।
“मम्मा… आप ही बताइए… क्या मैं गलत हूं…? वो आदमी मुझसे बीस साल बड़ा है…! उसकी उम्र 41 साल है…! लोग मुझे उसकी पत्नी कम… बेटी ज्यादा समझेंगे…”
उसकी आवाज भर्रा गई।
सविता शर्मा की आंखें भी नम हो गईं।
एक मां होने के नाते वो अपनी बेटी का दर्द समझ रही थीं… लेकिन पत्नी होने के नाते अपने पति की मजबूरी भी।
उधर राघवेंद्र शर्मा खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए। बाहर तेज बारिश हो रही थी। जैसे आसमान भी आज किसी के दर्द में रो रहा हो।
कुछ देर बाद उन्होंने धीमी लेकिन सख्त आवाज में कहा—
“यह शादी होगी, आर्या।”
आर्या ने हैरानी और टूटे हुए दिल से अपने पिता को देखा।
“पापा…”
“मैं फैसला कर चुका हूं।”
बस इतना सुनना था कि आर्या की दुनिया जैसे वहीं रुक गई।
उसने कांपते होंठों से कहा—
“ठीक है पापा… अगर आपकी खुशी इसी में है… तो मैं शादी कर लूंगी…”
लेकिन अगले ही पल उसने अपनी आंखों के आंसू पोंछे और दर्द भरी मुस्कान के साथ बोली—
“पर याद रखिएगा… उस दिन आपकी बेटी जिंदा जरूर होगी… मगर अंदर से पूरी तरह मर चुकी होगी…”
इतना कहकर आर्या वहां से भागती हुई अपने कमरे में चली गई।
और पीछे रह गए राघवेंद्र शर्मा…
जो पहली बार खुद को अपनी ही बेटी की नजरों में गिरा हुआ महसूस कर रहे थे…।विक्रांत सिंह…
नाम ही काफी था।
पूरा शहर उसे एक सफल बिजनेसमैन के रूप में जानता था। करोड़ों की कंपनी, आलीशान बंगला, बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ… सब कुछ था उसके पास।
लेकिन अगर कुछ नहीं था… तो वह था सुकून।
कभी एक वक्त था जब विक्रांत भी साधारण सा इंसान हुआ करता था।
एक मध्यम वर्गीय लड़का… जिसके पास सपने तो बहुत थे, मगर पैसे नहीं।
उसने अपनी पहली पत्नी से बेहद प्यार किया था। इतना कि उसके लिए दुनिया से लड़ गया था।
लेकिन शादी के कुछ साल बाद ही उसकी पत्नी ने उसे छोड़ दिया।
कारण…?
“तुम मुझे वो जिंदगी नहीं दे सकते जिसकी मुझे आदत है, विक्रांत… प्यार से पेट नहीं भरता।”
उस दिन पहली बार विक्रांत टूटा था।
इतना टूटा… कि फिर कभी किसी के सामने अपने जज़्बात जाहिर नहीं कर पाया।
उसने अपने आँसू, अपनी तकलीफ… सब कुछ बिजनेस की दुनिया में दफना दिया।
दिन-रात बस काम…
मीटिंग्स… डील्स… पैसे… सफलता…
और देखते ही देखते…
40 साल की उम्र में विक्रांत सिंह देश के सबसे बड़े बिजनेसमैन में गिना जाने लगा।
लेकिन उस सफलता की चमक के पीछे… उसका दिल बिल्कुल खाली था।
उसे अब प्यार पर भरोसा नहीं रहा था।
उसे लगता था कि हर रिश्ता सिर्फ पैसे से जुड़ा होता है।
फिर एक दिन…
वह अपनी कंपनी के एक कॉलेज प्रोजेक्ट के सिलसिले में गया था।
वहीं… पहली बार उसने उसे देखा।
आर्या।
सफेद सलवार सूट में… खुले बाल… आंखों में मासूमियत और चेहरे पर एक अजीब सी शांति।
वह बाकी लड़कियों की तरह विक्रांत की दौलत या रुतबे को देखकर प्रभावित नहीं हुई।
बल्कि जब सब लोग उसके आगे-पीछे घूम रहे थे… आर्या लाइब्रेरी के कोने में बैठी अपनी किताबों में खोई हुई थी।
और शायद…
यही बात विक्रांत को रोक गई।
उसकी नजरें पहली बार किसी पर इतनी देर तक ठहरी थीं।
वह बस उसे देखता रह गया।
उसकी मुस्कान… उसकी सादगी… उसकी आंखों की चमक…
सब कुछ विक्रांत के दिल के उस हिस्से को छू रहा था… जिसे उसने सालों पहले बंद कर दिया था।
“सर… आप ठीक हैं?”
साथ खड़े मैनेजर की आवाज से विक्रांत होश में आया।
लेकिन उसकी नजरें अब भी आर्या पर थीं।
उस पल…
40 साल का वो आदमी… जो कभी किसी के सामने नहीं झुका…
अपने दिल से हार गया।
पहली नजर में ही…
उसे आर्या से प्यार हो गया था।कॉलेज का कार्यक्रम खत्म हो चुका था।
सभी लोग धीरे-धीरे वहां से जा रहे थे… लेकिन विक्रांत अब भी वहीं खड़ा था।
उसकी नजरें बार-बार सिर्फ एक चेहरे को ढूंढ रही थीं—
आर्या।
“सर… मीटिंग के लिए देर हो रही है।”
मैनेजर ने धीरे से याद दिलाया।
विक्रांत ने बिना उसकी तरफ देखे कहा—
“उस लड़की का नाम क्या है?”
मैनेजर कुछ पल चौंका।
“कौन लड़की सर?”
विक्रांत की नजरें सीधा लाइब्रेरी के बाहर खड़ी आर्या पर टिक गईं।
“वो…”
मैनेजर ने हल्की मुस्कान दबाई।
“आर्या शर्मा… पोस्ट ग्रेजुएशन फाइनल ईयर। स्कॉलर स्टूडेंट है।”
“हम्म…”
बस इतना कहकर विक्रांत वहां से चला गया।
लेकिन पहली बार…
उसका मन बिजनेस में नहीं लग रहा था।
रात…
अपने विशाल कमरे में खड़ा विक्रांत बालकनी से शहर की रोशनी देख रहा था।
हाथ में कॉफी थी… लेकिन दिमाग में सिर्फ आर्या।
उसे खुद पर अजीब सा गुस्सा भी आ रहा था।
“क्या हो गया है तुम्हें विक्रांत…?”
उसने खुद से कहा।
40 साल की उम्र…
और सामने एक 22 साल की लड़की।
ये रिश्ता कहीं से भी सही नहीं लगता था।
लेकिन दिल…
दिल कहां उम्र देखता है।
उसी वक्त उसका दोस्त और बिजनेस पार्टनर करण कमरे में आया।
“क्या बात है? आज महान विक्रांत सिंह इतने खोए हुए क्यों हैं?”
विक्रांत हल्का सा मुस्कुराया।
“कुछ नहीं।”
“तुझे मैं बचपन से जानता हूं… बता क्या बात है?”
कुछ पल चुप रहने के बाद विक्रांत धीरे से बोला—
“आज… किसी को देखा।”
करण पहले तो शांत रहा… फिर जोर से हंस पड़ा।
“ओहो… आखिर बर्फ का पहाड़ पिघल ही गया!”
विक्रांत ने उसे घूरा।
“मजाक मत कर।”
“नाम?”
“…आर्या।”
करण ने गौर से विक्रांत का चेहरा देखा।
सालों बाद… उसकी आंखों में वो चमक दिख रही थी… जो कभी खत्म हो चुकी थी।
“तू सच में उसे पसंद करने लगा है?”
विक्रांत ने नजरें झुका लीं।
“पता नहीं… लेकिन जब उसे देखा ना… ऐसा लगा जैसे बहुत शोर के बाद अचानक सुकून मिल गया हो।”
करण की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।
“लेकिन विक्रांत… उम्र का फर्क बहुत है।”
विक्रांत हल्का सा हंसा… मगर उस हंसी में दर्द था।
“मुझे पता है। इसलिए शायद ये सिर्फ मेरे दिल तक ही रहेगा।”
दूसरी तरफ…
आर्या अपने छोटे से घर में बैठी पढ़ाई कर रही थी।
उसके पापा नौकरी से लौटे थे और मां रसोई में खाना बना रही थीं।
“आर्या बेटा…”
उसकी मां ने आवाज लगाई।
“जी मां?”
“आज कॉलेज में वो बड़े बिजनेसमैन आए थे ना? सब लड़कियां उन्हीं की बातें कर रही थीं।”
आर्या ने किताब बंद की।
“विक्रांत सिंह?”
“हां वही।”
आर्या कुछ पल शांत रही।
उसे याद आया…
जब वह लाइब्रेरी से बाहर निकली थी… तब उसने महसूस किया था कि कोई उसे लगातार देख रहा है।
और जब उसने नजर उठाई थी…
सामने विक्रांत था।
उसकी आंखों में अजीब सी गहराई थी।
ना घमंड… ना दिखावा…
बस… एक अजीब सा अकेलापन।
ना जाने क्यों…
वो चेहरा आर्या के दिल में भी कहीं रह गया था।


हर हर महादेव 

लेखिका ममता साहनी