स्याह भय भरी रात H.k Bhardwaj द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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स्याह भय भरी रात

एक डरावनी कहांनी

(स्याह भय भरी रात) 

    💀स्याह भय भरी रात💀

Written by H K Bharadwaj

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    (आसफपुर का खूनी अतीत) 

उत्तर प्रदेश के जनपद बदायूँ का एक छोटा सा गाँव—आसफपुर। 

वैसे तो यह गाँव नक्शे पर बेहद आम सा नजर आता है, लेकिन इसके सन्नाटे में एक ऐसी खौफनाक हकीकत दफन थी, जिससे हम सब पूरी तरह अनजान थे। 

यह कहानी मेरी, मेरी प्रेमिका मधु, 

और उसकी कॉलेज की सहेलियों—आभा और मिथलेश की है।

 एक ऐसी रात, जिसने हमारे भीतर के डर को हमेशा के लिए अमर कर दिया।

​1. (सफर और बदायूँ की वो खामोश शाम) 

​मधु और मैं पिछले तीन साल से रिलेशनशिप में थे। बरेली कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही मधु, आभा और मिथलेश की गहरी दोस्ती थी। गर्मियों की छुट्टियों में मधु ने जिद की कि इस बार हम सब उसके पैतृक गाँव आसफपुर चलेंगे। उसने बताया था कि वहाँ उसका एक बहुत पुराना, आलीशान पुश्तैनी मकान है, जहाँ अब कोई नहीं रहता। एक एडवेंचर ट्रिप के बहाने हम सब अपनी कार से बदायूँ के लिए निकल पड़े।

​शाम के करीब सात बज रहे थे जब हमारी गाड़ी ने आसफपुर की सीमा में प्रवेश किया।

 गाँव की शुरुआत में ही एक बहुत बड़ा, पुराना बरगद का पेड़ था। 

उस पेड़ की टहनियाँ इस तरह नीचे झुकी हुई थीं मानो कोई कंकाल अपनी उंगलियाँ फैलाकर हमारा रास्ता रोकने की कोशिश कर रहा हो।

           मैंने गाड़ी चलाते हुए बगल में बैठी मधु की तरफ देखा।, 

"मधु, तुम्हारा गाँव कुछ ज्यादा ही शांत नहीं है ? ......दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं दिख रहा।"

​मधु ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी।

 उसने कहा।, 

"गाँव के लोग शाम ढलते ही घरों में दुबक जाते हैं। यहाँ की कुछ पुरानी मान्यताएँ हैं।"

​"मान्यताएँ या अंधविश्वास?"

 पीछे बैठी आभा ने हंसते हुए कहा। मिथलेश ने भी उसका साथ दिया।                 लेकिन जैसे ही गाड़ी मधु के उस पुश्तैनी मकान के सामने रुकी, हम सबकी हंसी गायब हो गई।

​         वह एक विशाल, दो मंजिला हवेलीनुमा मकान था। 

उसकी दीवारें काली पड़ चुकी थीं और खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे।

 ऐसा लगता था मानो वह घर सांस ले रहा हो—एक भारी, बीमार सांस।

​2. (हवेली का सन्नाटा और वो अजीब गंध) 

​घर के अंदर कदम रखते ही एक सड़ी हुई, सीलन भरी बदबू ने हमारे नथुनों को भर दिया।

 ऐसा लग रहा था जैसे कोई जानवर सालों से अंदर पड़ा सड़ रहा हो।

​"उफ ! यहाँ कितनी गंदी बदबू है," मिथलेश ने अपनी नाक पर रुमाल रखते हुए कहा।

​" पुरानी हवेली है, सालों से बंद पड़ी है, इसलिए शायद ऐसा है," ।

मधु ने सफाई दी और आंगन की तरफ बढ़ गई।

​आंगन के ठीक बीचों-बीच एक बहुत पुराना कुआँ था, जिसे लोहे के भारी जालों से ढका गया था। 

उस कुएँ को देखकर मेरे मन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। 

कुएँ के चारों तरफ काले रंग के अजीब से निशान थे, जैसे किसी ने वहाँ खून के हाथ छपाए हों और वो वक्त के साथ काले पड़ गए हों।

​रात के लगभग ग्यारह बज चुके थे।

 हम सबने आंगन से सटे एक बड़े कमरे में डेरा डाला। 

उस हबेली की बिजली गाँव में पहले ही कट चुकी थी, इसलिए हमने दो बड़ी मोमबत्तियाँ और अपनी फोन की फ्लैशलाइट्स जला रखी थीं।

​"चलो, कोई हॉरर गेम खेलते हैं!" 

आभा ने माहौल का डर भगाने के लिए सुझाव दिया।

​"नहीं आभा, इस घर में यह सब मत करो।," 

मधु ने बेहद गंभीर होकर कहा।

 उसकी आवाज़ में एक अजीब सा खौफ था जो मुझे साफ महसूस हो रहा था।

 मैंने मधु का हाथ थामा, उसका हाथ बर्फ की तरह ठंडा था।

​"मधु, तुम ठीक तो हो?"

 मैंने उससे फुसफुसाकर पूछा।

​उसने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखें डरी हुई थीं।

 "हमें यहाँ नहीं आना चाहिए था। मेरे दादाजी हमेशा कहते थे कि इस हवेली की मिट्टी भूखी है..."

​तभी, पूरे घर की मोमबत्तियाँ एक साथ बुझ गईं।

 कमरा गहरे, स्याह अंधेरे में डूब गया।

​3. (खौफ का आगाज: कुएँ की वो आवाज़) 

​अंधेरा होते ही सन्नाटा और गहरा हो गया। हम सबने अपने फोन की फ्लैशलाइट ऑन की।

 लेकिन तभी, कमरे के ठीक बाहर, आंगन से एक आवाज़ आई।

​सर्र... सर्र... सर्र...

​ऐसा लगा जैसे कोई भारी चीज जमीन पर घिसटती हुई चल रही हो।

 हम सब सहम गए।

​"क-कौन है बाहर?" 

मैंने हिम्मत जुटाकर चिल्लाकर पूछा।

​कोई जवाब नहीं आया।

 बस वो घिसटने की आवाज़ लगातार तेज होती गई।

 मैंने कमरे का दरवाज़ा थोड़ा सा खोला और टॉर्च की रोशनी आंगन की तरफ फेंकी।

 जो नजारा मैंने वहाँ देखा, उसने मेरे पैरों तले से जमीन खिसका दी।

​लोहे के जालों से ढके उस कुएँ के ऊपर, एक औरत बैठी थी। उसने सफेद रंग की फटी हुई साड़ी पहनी थी, जो पूरी तरह कीचड़ और काले पानी से सनी हुई थी। 

उसके बाल बिखरे हुए थे और वो कुएँ के अंदर अपना हाथ डालकर कुछ ढूंढ रही थी।

तभी, उसने अपनी गर्दन को बिल्कुल एक झटके में हमारी तरफ बिना पीछे मुडे़ घुमाया।

​उसका चेहरा... ओ माइ गॉड ! 

उसका आधा चेहरा पूरी तरह से सड़ चुका था, जिसमें सफेद कीड़े कुलबुला रहे थे। उसकी आँखें नहीं थीं, सिर्फ दो गहरे, काले गड्ढे थे जिनमें से गाढ़ा, काला खून बह रहा था। 

उसने हमारी तरफ देखकर अपने नुकीले, पीले दांतों को भींचा और एक ऐसी भयानक चीख मारी जिसने हमारे कान के पर्दे फाड़ दिए।

​"भागो !"

 मैं चिल्लाया और दरवाज़ा बंद करने की कोशिश की, लेकिन बाहर से किसी अदृश्य ताकत ने दरवाज़े पर इतना जोरदार धक्का मारा कि मैं दूर जा गिरा।

​4. (रूह कंपा देने वाला थ्रिलर) 

​कमरे के अंदर चीख-पुकार मच गई। आभा और मिथलेश कोने में छिपकर रोने लगीं।

 मधु मेरे पास आई और उसने मुझे कसकर पकड़ लिया।

​"यह वो है... यह चमेली है!" 

मधु बुरी तरह हांफते हुए रो रही थी।

​"कौन चमेली, मधु ?!" 

मैंने उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर पूछा।

​"मेरे दादाजी की सौतेली बहन... पचास साल पहले इसी रात को गाँव वालों ने उसे डायन कहकर इसी कुएँ में जिंदा फेंक दिया था।

 वो हर साल अपनी मौत का बदला लेने आती है।

 उसे इस खानदान का खून चाहिए!" मधु की बात सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

​तभी कमरे की खिड़की के शीशे कड़कड़ाकर टूटे और अंदर एक बर्फीली, ठंडी हवा का झोंका आया। उस हवा के साथ ही कमरे के अंदर चार-पांच काली परछाइयाँ उभर आईं।

         वो परछाइयाँ इंसानी आकार की थीं, लेकिन उनके चेहरे नहीं थे।

​मिथलेश जो कोने में बैठी थी, अचानक हवा में ऊपर उठने लगी।

 मानो किसी अदृश्य हाथ ने उसकी गर्दन दबोच ली हो,और उस ऊपर उठा रहा हो।

​" ब ब बचाओ ! ब ब बचाओ मुझे बचाओ!" 

मिथलेश हवा में अपनें हाथ पैर हिलाती हुई तड़पने लगी। 

उसका चेहरा नीला पड़ने लगा।

​मैंने अपनी जेब से एक छोटा चाकू निकाला और उस दिशा में हवा में वार किया, लेकिन वहाँ कुछ नहीं था। अचानक मिथलेश की गर्दन से एक भयानक कड़क की आवाज़ आई।                उसकी आँखें ऊपर की तरफ उलट गईं और उसका बेजान शरीर फर्श पर धप्प की हल्की आवाज़ के साथ नीचे फर्श पर गिर पड़ा। 

मिथलेश मर चुकी थी।

​"मिथलेश!!" 

आभा जोर से चिल्लाई और पागल की तरह कमरे से बाहर भागने लगी।

​"आभा, मत जाओ बाहर!" 

मैंने चिल्लाकर रोकना चाहा, लेकिन वो तब तक आंगन में जा चुकी थी।

​हमने टॉर्च की रोशनी बाहर डाली। आभा आंगन के बीचों-बीच खड़ी थी। अचानक, कुएँ के अंदर से कई काले, सड़े हुए हाथ बाहर निकले। उन हाथों ने आभा के पैरों को पकड़ा और उसे अपनी तरफ खींचने लगे। 

आभा ने बचने के लिए जमीन को अपने नाखूनों से खुरच डाला, लेकिन उन हाथों की ताकत बहुत ज्यादा थी। देखते ही देखते, आभा को उस कुएँ के अंदर खींच लिया गया।

 कुएँ के अंदर से उसकी आखिरी चीख गूंजी, और फिर एक भयानक शांति छा गई।

​5. (सस्पेंस-: कौन असली, कौन नकली ?) 

​अब कमरे में सिर्फ मैं और मधु बचे थे। चारों तरफ मौत का तांडव था। 

मेरी प्रेमिका मधु डर से थर-थर कांप रही थी। मैंने उसका हाथ पकड़ा।

"मधु, हमें यहाँ से निकलना होगा। कार की चाबी मेरे पास है, चलो!"

​हम दोनों कमरे से निकले और मुख्य दरवाजे की तरफ भागे। मुख्य दरवाजा लोहे का एक बड़ा गेट था।

 मैंने उसे खोलने की कोशिश की, लेकिन वो जाम था। मैंने पूरी ताकत लगा दी, पर वो हिला तक नहीं।

​"यह नहीं खुलेगा।," 

पीछे से मधु की आवाज़ आई।

​उसकी आवाज़ में अब वो डर नहीं था। उसकी आवाज़ बेहद भारी, ठंडी और अजीब थी।

​मैंने पीछे मुड़कर देखा। टॉर्च की मद्धम रोशनी मधु के चेहरे पर पड़ी।

 वह मुस्कुरा रही थी—एक ऐसी मुस्कान जो कोई इंसान नहीं दे सकता।

 उसकी आँखें पूरी तरह से काली हो चुकी थीं, आँखों का सफेद हिस्सा पूरी तरह गायब था।

​"मधु... तुम..." 

मेरी जुबान लड़खड़ा गई।

​"मैंने कहा था ना, उसे इस खानदान का खून चाहिए।

 लेकिन उसे अब तुम्हारी भी बली चाहिए,।" 

मधु ने कहा और अचानक उसकी त्वचा फटने लगी। उसके चेहरे की खाल उतरने लगी और उसके नीचे से वही सड़ा हुआ चेहरा बाहर आने लगा जो हमने कुएँ पर देखा था।

​मेरा दम सूख गया। मैं घवराकर पीछे हटा, लेकिन तभी मेरे पीछे से किसी ने मेरा कंधा छुआ।

​मैंने डरते-डरते पीछे देखा। वहाँ एक और मधु खड़ी थी ! 

वह रो रही थी, उसके कपड़े फटे हुए थे और उसके सिर से खून बह रहा था।

​"मुझे बचाओ ! वो मैं नहीं हूँ ! वो छलावा है !" 

मेरे पीछे खड़ी मधु चिल्लाई।

​अब मेरे सामने दो मधु थीं।

        एक वो जो धीरे-धीरे डायन का रूप ले रही थी, और दूसरी वो जो रोकर मुझसे मदद मांग रही थी।

 सस्पेंस और खौफ इस कदर बढ़ चुका था कि मेरा दिमाग काम करना बंद कर रहा था। 

मेरी प्रेमिका कौन थी? 

और वो शैतान कौन था?

​"तुम मेरे पास आओ।," 

सामने वाली मधु ने अपनी लम्बी जीभ बाहर निकाली, जो करीब एक फीट लंबी और काली थी।

​तभी मेरे हाथ में मौजूद मोबाइल पर एक मैसेज टोन बजी। गाँव की सीमा में आते ही नेटवर्क गायब था, लेकिन इस वक्त एक पुराना मैसेज डिलीवर हुआ था, जो मधु ने मुझे यात्रा शुरू करने से पहले भेजा था। 

उस मैसेज में लिखा था।, 

'मेरे सीधे गाल पर जो तिल है, वो मुझे बचपन से पसंद है।'

​मैंने तुरंत अपनी टॉर्च दोनों के चेहरों पर मारी।

 जो मधु रो रही थी, उसके बाएं गाल पर तिल था। 

और जो मुस्कुरा रही थी, उसके दाएं गाल पर तिल था!

​यानी, जो रो रही थी और मुझसे मदद मांग रही थी, वो असल में शैतान था जो मुझे भ्रमित कर रहा था! और जो मेरे सामने डायन बन रही थी, वो असल में मधु के शरीर पर कब्जा कर चुकी थी।

​6. (अंत या एक नई शुरुआत ?) 

​"तुम मधु नहीं हो !" 

मैंने रोती हुई मधु (जो असल में छलावा थी) की तरफ चाकू से वार किया।

 जैसे ही चाकू उसे लगा, वह एक काले धुएं में बदल गई और उसकी एक भयानक चीख गूंजी।

​अब असली मधु, जो उस डायन के वश में थी, मेरी तरफ बढ़ी।

 उसकी उंगलियों के नाखून शेर के पंजों की तरह लंबे और नुकीले हो चुके थे। उसने मेरी छाती पर वार किया।

 दर्द की एक तीखी लहर मेरे पूरे बदन में दौड़ गई।

 मेरा खून फर्श पर बहने लगा।

​"मधु... होश में आओ... मैं हूँ..." ।

मैंने तड़पते हुए कहा।

​मेरी आवाज़ सुनकर मधु के चेहरे के भाव एक पल के लिए बदले।

 उसकी असली आत्मा ने शायद उस शैतान से लड़ने की कोशिश की। उसकी आँखों से आंसू टपकने लगे।

​"भागो... यहाँ से... भागो..." ।

मधु की असली आवाज़ अंदर से आई।

​मैंने अपनी बची-कुची ताकत जुटाई, जमीन पर पड़ी मोमबत्ती उठाई और उसे आंगन में रखे केरोसिन के डिब्बे पर फेंक दिया, जो वहाँ जनरेटर के लिए रखा था।

​पल भर में, पूरी हवेली में आग लग गई।            आग की लपटें तेजी से उठने लगीं।

 उस आग की रोशनी में डायन की ताकत कमजोर होने लगी।

 उसने मधु के शरीर को छोड़ दिया और एक जलती हुई परछाई के रूप में कुएँ के अंदर कूद गई।

​मधु बेहोश होकर फर्श पर गिर पड़ी। मैंने उसे अपनी बाहों में उठाया।

 आग के कारण मुख्य दरवाजे की लकड़ी कमजोर हो चुकी थी।

 मैंने अपनी पूरी ताकत से उस पर लात मारी और दरवाजा टूट गया। मैं मधु को लेकर बाहर आ गया।

​(उपसंहार) 

​सुबह जब गाँव वाले और पुलिस वहाँ पहुँचे, तो पूरी हवेली राख हो चुकी थी। मिथलेश और आभा का कोई नामोनिशान नहीं मिला। 

पुलिस ने उन्हें 'लापता' घोषित कर दिया।

आज इस घटना को दो साल बीत चुके हैं। 

मैं और मधु आसफपुर से बहुत दूर आ चुके हैं। मधु अब ठीक है, लेकिन वो उस रात के बाद से कभी खुलकर नहीं हंसी।

​कभी-कभी, जब रात को बहुत तेज बारिश होती है और बिजली कड़कती है, मधु अचानक उठकर बैठ जाती है। वह सोई हुई अवस्था में ही कुएँ की तरफ चलने की नकल करती है और फुसफुसाती है।—

"चमेली अभी भूखी है..."

मैं उसे कसकर पकड़ लेता हूँ, यह जानते हुए कि आसफपुर की उस "स्याह रात" का खौफ हमारे दिलों से कभी खत्म नहीं होगा।

Written by H K Bharadwaj

नोट:- यह कहांनी पूर्णत्या काल्पनिक कहाँनी है।