श्रापित एक प्रेम कहानी - 88 CHIRANJIT TEWARY द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 88

ये पहली बार था जब एकांश का हाथ वर्शाली के किसी अंग को छु रहा था। दोनो ही एक दुसरे मे खोया हुआ था । तभी एकांश अपने आपको संभालते हूए धिरे से वर्शाली के हुक को लगा देता है। 

वर्शाली अब भी उसी तरह से खड़ी थी मानो उसे कुछ पता ही ना चला हो के एकांश ने कब उसका हुक बंद कर दिया है। पर एकांश यो जानता थे के ये एक पब्लिक प्लेस है और यहां पर वर्शाली के साथ ये सब करना सही नही था क्योकी वर्शाली एक लड़की है। 



इसी बात का ध्यान रखते हूए एकांश वर्शाली से कहता है:



" वर्शाली हो गया मैने तुम्हारा हुक लगा दिया। "..


एकांश के इतना करने पर भी वर्शाली जैसे के तैसे ही खड़ी थी । एकांश फिर से वर्शाली के कान के पास बड़े प्यार से कहता है:



" वर्शाली मैने तुम्हारी वस्त्र की हुक को लगा दिया है।"



एकांश के इतने करीब से कहने पर वर्शाली की पुरे शरिर मे करंट जैसा दौड़ जाता है और वर्शाली पिछे मुड़कर दैखती है के एकांश हल्की मुस्कान लिए उसकी और दैख रहा था। वर्शाली एकांश से अपनी नजरे चुराते हुए कहती है:



" मैं कैसी लग रही हूँ एकांश जी ?"


एकांश वर्शाली की खुबसूरती को दैखकर कहता है :


" इसका जवाब मै नही ........"


 इतना बोलकर एकांश वर्शाली को आईने के सामने ले जाता है और कहता है:


" ये ........ देगा ! "


वर्शाली आईने मे अपने आप को दैखकर शर्माने लगती है। वो बहोत खुबसुरत लग रही थी इतना के सभी अपनी नजरे वर्शाली की और ही करके रखा था और एक दुसरे से धक्का लगने लगा था। एकांश जानता था के चूंकी वर्शाली एक परी है और उसके जैसी खुबसूरत दुसरा नही था ।


 इसिलिए एकांश वर्शाली को स्कार्फ से चेहरा को ढक देता है और वहां से दुसरी और जाने लगता है। वर्शाली एकांश से पूछती है:


" क्या हुआ एकांश जी आपने मुझे ऐसे वहां से क्यों लेकर आ गए ?"


एकांश कहता है :


" वो इसिलिए क्योकी सभी तुम्हारी और ही दैख रहा था ।"


वर्शाली हैरानी से पूछती है । 

" मेरी और दैख रहा था ? तो इसमे क्या ..? "


एकांश अपना मुह बना कर कहता है:


" दैखना आम बात है पर जब कोई हद से ज्यादा खुबसूरत हो तो लोग उसे नही उसकी गतल जगह को दैखता है । और मुझे अच्छा नही लग रहा था के कोई तुम्हे दैखे । इसिलिए अब तुम ऐसे ही रहोगी । "



वर्शाली मुस्कान देकर कहती है :


"ठिक है जैसी आपकी इच्छा"


 एकांश और वर्शाली दोनो ही एक दुसरे के लिए कपड़े पंसद करते है । वर्शाली कुछ अंतर वस्त्र वाले कपड़े को लेकर एकांश से कहती है:


" मैं ये सब रख लु । मुझे दैखना है के इस वस्त्र को पहन कर क्या होता है।"


 एकांश हां मैं अपना सर हिला देता है और कहता है:

"
वर्शाली कुछ खाओगी ...? "


वर्शाली कहती है :


"क्या ....? "


एकांश कहता है :



 चलो ना वहां उधर जाकर बैठते है। तुम्हें जो पंसद होगा वो खा लेने ।"


 वर्शाली मान जाती है और दौनो उसी रेस्टोरेंट मे जाकर बैठता है जहां पर मातंक और त्रिजला बैठकर खा रही थी। वर्शाली और एकांश दोनो ही रेस्टोरेंट के अंदर जाकर बैठ जाता है ।



 एक वेटर आकर एकांश से कहता है:



" गुड इवनिंग सर ..! "



एकांश भी जवाब देकर कहता है :



गुड इवनिंग"



वेटर कहता है :


" सर क्या लेगें आप ....? "


एकांश कहता है:


" मेनु दो और थौड़ा सा टाईम । ओके ...!"


 वेटर कहता है:


" ओ....के सर ..!"


इतना बोलकर वेटर वहां से चला जाता है। दुसरे टेबल मे मांतक और त्रिजला मटन खाये जा रहा था और वेटर को ऑडर दिये जा रहा था। जब बाईसवीं बार मांतक मटन मगांता है तो वेटर कहता है :


" सर आज मटन कम था और नही है।"


मातंक अपनी उगलीयां चाटते हुए कहता है।
:


" क्या ..? और मांस नही है। हे मानव मेरा तो अभी तक पेट भी नही भरा है। और तुम कह रहे हो के मांस नही है। अब क्या खाउं ?"


 वेटर कहता है:


"सॉरी सर पर अभी और मटन नही है । सर चिकन है वो चलेगी...?"


चिकन का नाम सुनकर मांतक कहता है:


" मांस ही है ना ....?"



वेटर कहता है :


" हां सर मांस ही है।"


 मातंक खुश होकर कहता है :

" ठिक फिर सिघ्र लेकर आओ । मैं और प्रतिक्षा नही कर सकता । "


मांतक के अजीब भाषा सुनकर वेटर थोड़ा हैरान रह जाता है और मांतक से ऑडर लेकर चला जाता है। मातक त्रिजला से कहता है :


" जो भी हो ये मानव मांस बहोत अच्छा बनाता है। वाह क्या बात है । आंनद आ गया ।"


 त्रिजला कहती है:


" हां स्वामी सच मे आंनद आ गया ।"


इधर एकांश वर्शाली और अपने लिए सारे भेज खाना मंगाता है क्योकी एकांश जानता था के वर्शाली एक परी है और परी नॉन भेज नही खाती है। वेटर दोनो के लिए खाना लाता है ।


 एकांश कहता है :


" वर्शाली मैं तुम्हारे लिए परी लोक का भोजन तो नही ला सकता पर यहां अपने लोक का भोजन तो खिला ही सकता हूँ ।"


वर्शाली हल्की मुस्कान के साथ कहती है:


" आपका हर वस्तु मुझे पंसद है।"


 इतना बोलकर वर्शाली खाने लगती है। एकांश वर्शाली की और ही दैखता है और सोचता है पता नही वर्शाली को खाना अच्छा लग भी रहा होगा या नही। वर्शाली एकांश की और दैखकर कहती है:


"आप चितां मत करिए भोजन बहोत स्वादिष्ट है। अब आप भी खाईए । "



वर्शाली से इतना सुनकर एकांश खुश हो जाता है और खाने लगता है। मांतक और त्रिजला चिकन खाकर त्रिप्त हो जाता है। दोनो ने बाईसवीं प्लैट मटन और बीस प्लैट चिकन खा लेता है और सिर्फ एक प्लाट बिरयानी। 



वेटर अपने एक दुसरे साथी वेटर से मांतक और त्रिजला को दैखकर कहता है :


" पता नही यार ये कौन और कहां ये भुक्कड़ आ गया ऐसा लगता है जैसे कई जन्मों तक नही खाया हो और उसकी भाषा भी ऐसी जैसे मानो ये अभी के नही बल्की पुराने जमाने के हो।"


दुसरा वेटर कहता है :


" इसे और मत खिला वरना कही बाद मे पता चले के इनके पास उतने पैसे ही नही है। "


तभी मांतक वेटर को आवाज देकर बुलाता है:

" हे मानव .......!! "




मांतक के बुलाने पर वेटर उसके पास जाता है और कहता है :


" हां सर बोलिए और क्या चाहिए आपको?"


मांतक कहता है:


" हे मानव जाओ और जाकर और मांस लेकर आओ। "


वेटर कहता है :


" माफ कीजिएगा सर अब और मांस नही है हमारे यहां जितने थे सब आपने खा लिए आप दौ मिनट बैठिए मैं आपके लिए बिल बनाकर लाता हूँ ।"


इतना बोलकर वेटर वहां से चला जाता है। त्रिजला कहता है:


" स्वामी अब चलिए यहां से , यहां पर और ठहरना उचीत नही है।"


मांतक कहता है:

 तुम उचित कह रही हो त्रिजला अब हमे यहां से जाना चाहिए परतुं क्या करु उस मानव ने ऐसा मांस खिलाया के मेरी भूख सांत ही नही हो रही है और बड़ती चली जी रही है। "


" और अभी वो और क्या बिल बनाके लायेगा , उसे भी खा लोता हूँ क्या पता वो भी और स्वादिष्ट हो ?"


त्रिजला कहती है :


" नही स्वामी , अब चलिए यहां से ।"



तभी वहां पर वेटर बिल और गरम पानी निलु के साथ हाथ धोने के लिए लेकर आता है। मांतक हाथ धोने वाली पानी को उठकर पी जाता है तो त्रिजला भी मांतक को दैखकर पानी को पी जाती है । जिसे दैखकर वेटर कहता है:


" सर ये ...... "


वेटर के इतना कहने पर मातंक कहता है:


" तुम्हारे यहां का भोजन तो बहोत ही स्वादिष्ट है । हे मानव मुझे ये जानना है के ये भोजन बनाया किसने है क्योकी इस तरह का भोजन तो हमे अपने लोक पर नही मिलता है। "


वेटर मांतक की बात से परेसान हो जाता है और झिझकारते हुए कहता है:


"सर ...! मेरा नाम मानव नही गोपु है। अब ये लिजिए बिल और इसे पे करिए ।"


 मांतक को वेटर की बात समझ मे नही आता है तो मांतक वेटर से कहता है:


" नही नही अब किसी वस्तु की कोई आवश्यकता नही है।"


 इतना बोलकर मांतक और त्रिजला वहां से जाने लगते है। तभी वेटर दौनो को रोककर कहता है:


" अरे अरे .....! कहां चल दिये ...? जो खाया है उसका बिल कौन भरेगा...?"


 मांतक बड़े विनम्र भाव से कहता है:


" बिल क्या होता है मानव ..?"


" अच्छा हमसे चालाकी ..! ये सब नही चलेगा यहां । "

" मुझे तो पहले ही तुम दौनो पर शक हो रहा था के जरुर तुम दोनो कुछ ना कुछ गड़बड़ करोगे। चुप चाप हमारे पैसे दो। "

वेटर गुस्से से कहता है। 


 मांतक फिर बड़े प्यार से कहता है:


" हे मानव अभी तुमने कहा के बिल भरदो फिर कह रहे हो पैसे दो ये दोनो अलग अलग वस्तुए क्या है ये हमारे पास नही है ।"


 वेटर फिर कहता है:


" दैखो मेरा सब्र का बांध टुट जाएगा ये क्या लगा रखा है तबसे । हे मानव ...! और ये वस्तु ...? मुझे पागल समझा हे़ै क्या ...? या सकल से मैं चु.........!" चुपचाप पैसे दो और निकलो यहां से।"


 त्रिजला मांतक से कहती है:


" ये क्या बोल रहे है स्वामी क्या चाहता है ये मानव ...?"


 मातंक फिर बड़े विनम्र से कहता है।
:


" दैखो मानव एक तो तुमने बड़े प्यार से हमे भोजन कराया जिससे मेरा मन बहोत प्रसन्न हो गया और उसके पश्चात तुम ऐसे व्यवहार कर रहे हो....?"


 माॉतक की बात सुनकर वेटर गुस्सा से कहता है :

"लगता है तुम ऐसे नही मानोगे रुको तुम ।"



To be continue......1392