एकांश मुस्कान देकर कर जवाब देता है। वर्शाली कुछ सोचती हूई कहती है:
" परतुं एकांश जी इस वस्त्र को पहनने से क्या लाभ ? "
वर्शाली के इस सवाल से एकांश हड़बड़ा जाता है और वर्शाली से कहता है:
" वो मुझे नही पता तुम ये सब किसी लड़की से ही पूछ लेना।"
वर्शाली एकांश की और दैखती है एकांश अपनी नजरे निचे किया हुआ था वर्शाली हलकी मुस्कान के साथ मन ही मन सोचती है:
" एकांश जी आपतो बिल्कुल लड़कीयों की तरह शर्माने लगे ।"
एकांश वर्शाली के लिए ड्रेस पंसद करता है जिससे वर्शाली को भी पंसद आती है। एकांश वर्शाली से कहता है:
" वर्शाली ये ड्रेस तुम पर बहोत अच्छी लगेगी । तुम इसे पहन कर दैखो।"
वर्शाली हैरानी से कहती है :
" पर एकांश जी यहां सबके सामने कैसे पहनू ? "
एकांश हल्की मुस्कान के साथ कहता है:
" अरे मतलब यहां नही । आओ मैं तुम्हे चेंजिग रुम मे लेकर चलता हूँ ।"
एकांश वर्शाली का हाथ पकड़ कर चेजिंग रुम की और लेकर जा रहा था । वर्शाली हैरानी से एकांश को दैखता है और सौचती है :
" ये चेंजिग रुम क्या है । अब अगर एकाश जी से मैं इस विषय मे पूछुगीं तो वो फिर से हसने लगेगें । इसिलिए अब वहां पर जाकर ही दैखता हूँ के क्या है ये चेजिंग रुम !"
चेजिगं रुम पहूँचने के बाद एकांश वर्शाली से कपड़े को देते हुए कहता है:
" ये लो और अंदर जाकर चेंज कर लो ।"
वर्शाली संकोच होकर कहती है:
" यहां ...?"
" हां वर्शाली ...! "
"तुम अंदर जाओ और दरवाजे को अंदर से बंद कर दो । फिर कपड़े को बदल कर बाहर आ जाओ ।"
एकांश की बात सुनकर वर्शाली अदर चली जाती है । इधर मांतक और त्रिजला मॉल के कपड़े पहनकर खुश होकर मॉल मे घुम रहा था । मॉल मे मातंक दैखती है के एक जगह पर बहोत सारा फल और सब्जीयां रखी हूई थी । फल को दैखकर मांतक खुश होते हूए त्रिजला से कहता है:
" त्रिजला वहां देखो कितने सारे फल रखा हुआ है वहां पर । मुझे भूख भी लगी है । अब और रहा नही जाता चलो चलकर फल ग्रहण करते है। "
त्रिजला मांतक से कहती है:
" परतुं स्वामी हम मानव लोक मे है और यहां पर इतने सारे मानव घुम रहे है। परतुं कोई भी मानव उस फल को नही ग्रहण कर रहा है। इसका अर्थ ये हुआ के जरुर ये फल किसी और के है। "
" और अगर हमने इसे बिना किसीसे पूछ कर ग्रहण कर लिया तो हो सकता के जिस मानव का ये फल है उसे बुरा लग जाए।"
मातंक कहता है:
" तुम यथार्त कह रहो हो त्रिजला हमे ये स्मरण रखना होगा के हम मानव लोक मे है और हमे यहां के नियमो के बारे ज्ञान नही है। इसीलिए हमे कुछ भी करने से पहले सावधान रहना होगा ताकि हमारा सत्य सबके सामने ना आ जाए।"
इतना बोलकर दोनो वहां से दुसरे जगह मे चला जाता है। जहां पर मांतक देखता है के बहोत सारे लोग अंदर जा रहे थे और भोजन ग्रहण कर रहे थे । मातंक इसे दैखकर खुश हो जाता है और त्रिजला से कहता है:
"वहां दैखो त्रिजला वहां पर तो सभी भीतर जाकर भोजन ग्रहण कर रहा है । यहां पर तो कोई संदेह नही है। क्यों ना हम भी चल कर कुछ भोजन ग्रहण करते है । "
त्रिजला भी मांतक के बात से अपनी सहमती देते हूए हां मे अपना जवाब देती है और कहती है:
" हां स्वामी ये ठीक रहेगा । "
इतना बोलकर दोनो ही अंदर चला जाता है।
अंदर जाकर दोनो ही इधर उधर देखने लगता है। के तभी एक वेटर वहां पर आता है और मांतक और त्रिजला से कहता है:
" गूड इवनिंग सर । गुड इवनिंग मेम । आईये यहां बैठीये ।"
उस वेटर ने मांतक और त्रिजला को बड़े नम्र भाव से कहा और दोनो को एक जगह पर बैठा कर चला गया । वेटर के नम्र भाव को दैख कर मांतक और त्रिजला दोनो ही बहोत खुश हो जाता है। मांतक कहता है।
:
" वाह क्या स्वभाव है उस मानव का । हमे कितने अच्छे से यहां पर बैठाया वाह । मन प्रसन्न हो गया । "
"यहाँ के मानव कितने अच्छे है ।"
तभी वो वेटर दोबारा आता है वेटर के हाथ मे एक मेनु कार्ड था जिसे वो मांतक के हाथ मे थमा कर कहता है:
" लिजिए सर ये हमारे यहां का मेनु कार्ड है । आपको जो भी खाना पंसद हो आप दैखकर आर्डर दे दिजिए ।"
इतना बोलकर वेटर ने मेनु कार्ड को मांतक के हाथ मे देकर चली जाता है। मेनु कार्ड मिलने के बाद मांतक और त्रिजला दोनो ही मेनु कार्ड को दैख रहा था पर दोनो मे से किसीको भी कुछ समझ मे नही आ रहा था।
मांतक त्रिजला से कहता है :
" ये क्या है। और वो क्या बोलकर जला गया मुझे कुछ समझ मे वही आया ।"
त्रिजला कहती है:
" हां स्वामी । मुझे भी कुछ समझ मे नही आया। "
दोनो आपस मे बात कर ही रहे थे के तभी वहां पर वो वेटर वापस आ जाता है और मांतक से कहता है:
" सो ...! टेल मी सर । व्हाट वुड यु लाईक टु ईट । "
मांतक वेटर से इस तरह का भाषा सुनकर हैरान था । मांतक मन ही मन सोचता है:
" ये क्या बोल रहा है मुझे कुछ समझ मे नही आ रहा है।"
वेटर दोबारा से पूछता है:
" सर । आपने कुछ पंसद किया ?"
मातंक झट से कहता है :
" क्या पंसद करु...?"
वेटर कहता है :
" खाना सर ...! आप खानो मे क्या लोगे ..?"
मांतक कहता है:
" जो तुम्हारे पास है लेकर आओ । "
.
वेटर कहता है:
" सर वो तो आप बोलिएगा तभी मैं ला पाऊगां । मैं अपने मन से नही ला सकता ।"
मांतक कहता है:
" ठिक है । तुम हमारे लिए मांस और उसके साथ जो भी पकाया है लेकर आओ। "
वेटर फिर कहता है:
" सर चिकन लाऊ या मटन ..? "
मांतक कहता है:
" ये नही चाहिए । तुम्हे जो कहा वही लेकर आओ । "
वेटर मन ही मन सोचता है :
" ये कौन और कहां से आ गया जिससे कुछ समझ ही नही है।"
मांतक कहता है :
" जाओ मानव सिघ्रता करो हमे बहुत भूख लगी है।"
वेटर अपने सर को खुजाते हुए वहां से चला जाता है। वर्शाली अंदर जाकर कपड़े बदलने लग जाती है। वर्शाली कपड़े तो बदल लेती है पर उसके पिछे का हुक नही लगा पाती है ।
वर्शाली एकांश को बुलाती है और वर्शाली से कहती है :
" एकींश दी जरा सुनिए ना "
एकांश कहता है :
" क्या हुआ वर्शाली तुम्हें इतनी दैरी क्यों लग रही है। "
वर्शाली अंदर से कहती है:
" बस हो गया है एकांश जी पर ये पिछे से बंद नही हो रहा है ।"
वर्शाली चेंजिग रुम का दरवाजा खोलकर बाहर आती है। तो एकांश उसे दैखकर पागल सा हो जाता है। वर्शाली इस ड्रेस मे बहोत ही खुबसूरत लग रही थी एकांश बस वर्शाली को दैखे ही जा रहा था उसकी नजरे मानो वर्शाली से हटने की नाम ही नही ले रहा था।
तभी वर्शाली एकांश की ध्यान को भट काते हूए कहती है:
" आप ऐसे मुझे दैखचे ही रहोगे या मेरी सहायता भी करोगे। "
वर्शाली की बात पर एकांश हड़बड़ाते हुए कहता है:
" आ.....हां....हां..." मैं करता हूँ । मैं करता हूँ । क्या करना है बोलो ।"
वर्शाली अपनी पीठ को एकांश के तरफ घुमाकर कहती है:
" दैखीए ना ये नही लगा पा रही हूँ मैं तबसे ।"
वर्शाली के पीठ को दैखकर एकांश दैखती ही रह जाता है। दुध जैसी सफेद पीठ को दैखकर एकांश मंत्र मुग्ध हो जाता है और वर्शाली के ड्रेस की हुक को बंद करने लग जाता है जिससे एकांश का हाथ वर्शाली के पिठ को टच कर जाता है जिससे एकांश और वर्शाली दोनो के शरीर मे एक सिहरन उठ जाती है ।
दोनो ही एक दुसरे मे खो सा जाता है वो दोनो ये भूल जाता है के कहां पर है। एकांश का हाथ वर्शाली के पिठ को धिरे धिरे छु रहा था ।
ये पहली बार था जब एकांश का हाथ वर्शाली के किसी अंग को छु रहा था। दोनो ही एक दुसरे मे खोया हुआ था । तभी एकांश अपने आपको संभालते हूए धिरे से वर्शाली के हुक को लगा देता है।
To be continue....13645