श्रापित एक प्रेम कहानी - 86 CHIRANJIT TEWARY द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 86

निलु के उपर आलोक दवाब बनाते हुए पूछता है:


" निलु काका अब बोलिए क्या बात है। आप डरीये मत । हो सकता है इसमे हम आपकी कोई सहायता कर सके। आप हमे बेखोफ होकर बोलिए । "


निलु के पास अब कोई चारा नही था । निलु आलोक के पास अपना हाथ जौड़कर कहता है:


" बेटा मुझसे कुछ मत पुछो । अगर मैने आपको सब बता दिया तो मालिक मुझे जान से मार देगें। इसिलिए बेटा तुम सब यहां से चले जाओ। "


आलोक निलु का हाथ पकड़कर कहता है:


" निलु काका आप तो मुझे बचपन से जानते हो । आपने ही तो मुझे पाल कर बड़ा किया है। तो फिर आपको मुझ पर भरोसा नही है क्या। आप मुझे सारी बातें सच सच बोलिए ताकि हम आपकी मदद कर सके और मैं आपसे वादा करता हूँ के बड़े पापा को ये बात कभी पता नही चलेगी के आपने मुझे ये सब बताया है। "

" काका हम भी एक मणी की खोज कर रहे है , कही आपको मणी के बारे मे तो नहू पता ? दैखिए काका वो मणी मिलना बहुत जरुरी है , क्योंकी वही है इन सब फसादो का जड़ , काका हमे एक चेतन नाम के आदमी को भी ढुंड रहा हूँ , अगर ईपको पता है तो प्लीज बता दिजिए, इससे सबकी भला ही होगा ।"


आलोक की बात सुनकर निलु कुछ दैर सौचता है फिर एक गहरी सांस लेता है और कहता है:


" ठिक है बैटा मैं तुम्हें सब सच सच बताऊगां। "


निलु के मुह से इतना सुनने के बाद चतुर और आलोक दोनो ही निलु काका के पास बैठ जाता है। उधर एकांश और वर्शाली दौनो ही एक मॉल के पास रुकता है । वर्शाली मॉल मे रुकने के बाद एकांश से पूछती है

" ये हम कहां आए है एकांश जी ? "

एकांश वर्शाली से कहता है:

" इसे सॉपिगं मॉल कहते है वर्शाली । "

वर्शाली मुह बनाते हुए कहती है:

"शॉपिंग मॉल ...? यहां क्या होता है ?"

 एकांश हल्की मुस्कान के साथ कहता है:

" शॉपिंग मॉल का मतलब है एक बड़ा संलग्न खरीदारी क्षेत्र। "

वर्शाली फिर अपना मुह बनाती हूई पूछती है :

" क्या ....? अब ये क्या है?"

एकांश कहता है:

" तुम ये सब छौड़ो बस इतना याद रखो के यहां पर तुम्हे सब कुछ मिलेगा।"

 वर्शाली फिर पूछती है:

" सब कुछ मिलेगा का क्या तात्पर्य है।"

एकांश अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहता है:

" मतलब ये है के यहां तुम्हे हर वो चिज मिलेगा जिसका जरुरत एक इंसान को होता है और यहां पर तुम्हारे लिए कपड़े ...! वो क्या कहते हैं । हां वस्त्र लेने के लिए आए हैं।"

 एकांश के इस तरह से माथे पर हाथ रखकर बोलने से वर्शाली नाराज हो जाती है और कहती है:

" मुझे आपके पृथ्वी के बारे मे ये सब ज्ञात नही है इसिलिए मैं आपसे पूछ रही हूँ । अन्यथा कभी नही पूछतीं ऐर आप अपना सर पर हाथ रख रहे हैं । "

वर्शाली की बात पर एकांश कहता है:

" अरे ऐसी बात नही है वर्शाली ! मैं तो बस तुमसे मजाक कर रहा था । अब चलो अंदर जाते है। "

वर्शाली खुश होती हूई मॉल के अंदर चली जाती है। एकांश और वर्शाली के जाने के बाद वहां पर मांतक और त्रिजला भी उड़कर आ जाते है और सबसे छिप कर पक्षी से मानव रुप ले लेता है और फिर वर्शाली और एकांश के पिछे पिछे मांतक और त्रिजला भी मॉल के अंदर चला जाता है। 


मॉल के अंदर घुसते ही मांतक और त्रिजला को दो आदमी गेट के अंदर खड़ा दिखाई देता है जो गेट को खोलकर बड़े ही सांत मन से गुड मार्निंग कहता है। 

" गुड इवनिंग सर। "

मांतक और त्रिजला को कुछ समझ मे नही आता और दोनो बिना कुछ बोले ही अंदर चला जाता है । मातंक त्रिजला से कहता है:

" बड़ा विचित्र सा बात कही उस मानव ने जो मुझे समझ मे नही आया । "

त्रिजला कहती है:

" हां स्वामी । मुझे भी कुछ समझ मे नही आया ।"

इतना बोलकर दोनो ही मॉल के अदर चला जाता है। मॉल को अंदर से दैखकर वर्शाली कहती है:

" कितना सुदंर ये महल है एकांश जी ।"

 वर्शाली मॉल की एक एक चिज को दैखकर खुश हो रही थी और उसके साथ एकांश भी खुश हो रहा था। मांतक और त्रिजला भी मॉल को दैखकर खुश हो रहा था। त्रिजला कहती है:

" ये कौन सी जगह है स्वामी जो इतनी सुंदर है। इन मानवो ने कितनी सुंदर रचना की है।"

 मांतक कहता है :

" हां त्रिजला तुम सत्य कह रही हो। मुझे भी इस महल को दैखकर आश्चर्य हो रहा है , यहाँ पर तो मानव के परिधान भी है ।"

त्रिजला मॉल की सुंदरता को निहार रही थी । मातंक त्रिजली से कहता है:

"अब चलो अन्यथा वो दोनो कही चले ना जाए । "

इतना बोलकर दोनो ही वर्शाली और एकांश के पिछे चला जाता है। एकांश और वर्शाली एस्केलेटर के सामने जा कर रुक जाता है। वर्शाली एस्केलेटर को दैखकर कहती है :

 ये क्या सिड़ी जैसा यंत्र है एकांश जी । जो ये स्वमं ही उपर की और जा रहा है। "

एकांश कहता है:

" इसे हमलोग एस्केलेटर कहते है। मतलब चलती सिड़ी ।"

 एकांश वर्शाली को दिखाते हूए कहता है:

" ये दैखो इस पर ऐसे चड़ते है।"

एकांश एस्केलेटर पर चड़कर फिर निचे आ जाता है। और वर्शाली का हाथ पकड़ कर उसे चड़ने के लिए कहता है!

एकांश वर्शाली को किसी तरह से एस्केलेटर पर चड़ाता है। और उपर चला जाता है। मातंक और त्रिजला भी उन दोनो को दैखकर किसि तरह से एस्केलेटर पर चड़ जाता है। एस्केलेटर पर चड़ने के बाद त्रिजला मातंक से खुश होकर कहती है:

" स्वामी इस सिड़ी नुमा यंत्र पर चड़कर तो आनंद आ गया । क्या यंत्र बनाया है इन मानवो ने।"

 मांतक त्रिजला की बात का समर्थन करते हूए कहता है:

" हां त्रिजला तुम सत्य कह रही हो। मुझे भी ये सब हैरान कर रहा है। "

त्रिजला कपड़ो की और इशारा करते हूए कहती है:

" स्वामी उस दिशा मे चलिए ना । दैखीए तो वहां पर कितने सुंदर सुंदर वस्त्र है।"

मातंक भी कपड़ो को दैखकर उसी दिशा मे चला जाता है वो दोनो अब ये भूल चुका था के वो दोनो यहां पर एकांश और वर्शाली की पिछा करने के लिए आए थे। 

त्रिजला और मांतक दोनो ही मॉल मे तरह तरह के कपड़े को दैखकर खुश हो जाता है। और एक एक करके सारे कपड़े पहन कर आईने मे आपने आपको दैखता है। मांतक और त्रिजला अपनी देत्य शक्ती से कपड़े को एक सेंकेड के अंदर ही पहन लेता है। और पहन कर मॉल मे घुमने लगता है।


एकांश वर्शाली को कपड़े दिखाने लग जाता है । वर्शाली अपने लिए कपड़े चुनने लगती है । तभी तभी वर्शाली की नजर वहां रखे लड़कीयों के अंतर वस्त्र पर जाती है जिसमे लड़कीयों के अंतर वस्त्र पहने फोटो बना हुआ था। वर्शाली उस पेकेट को हाथ मे लेकर दैखने लगती है। 


वर्शाली फोटो को दैखकर आश्चर्य मे पड़ जाती है और शर्माने लगती है। एकांश वर्शाली को दैखकर समझ जाता है के उसने अतंर वस्त्र पहने लड़की की फोटो दैखली है । एकांश वर्शाली से उस पेकेट को लेकर रख देता है और कहता है:

" ये तुम्हारी काम की नही है इसे रख दो इसे । "

एकांश बात को बदल कर वर्शाली के लिए ड्रेस देखने लग जाता है। वर्शाली एकांश से पूछती है:

" एकांश जी एक बात पूछु ..? "

"हां पुछो ना ।"

( एकांश ड्रेस देखते हूए कहता है। )

वर्शाली कहती है :

" उसमे जो लड़की का चित्र बना हुआ था क्या वो वस्त्र सच मे लड़कियां पहनती है ? "

एकांश वर्शाली से ऐसे सवाल सुनकर अपने सर को झुकाए हां मे अपना सर हिलाकर जवाब देता है। वर्शाली हसते हूए कहती है:

" परतुं एकांश जी ! ये कैसी वस्त्र है । और इस तरह के वस्त्र पहनकर वो सबके सामने कैसे आती होगी ! उन्हे लज्जा नही आती ?"

 एकांश वर्शाली से कहता है:

" अरे नही नही वर्शाली ऐसी बात नही है। लड़किया ये कपड़े मतलब वस्त्र पहनकर सबके सामने नही जाती है। ये तो वे अपने कपड़े के अंदर पहनती है। "

वर्शाली कहती है :

"अर्थात पहले इसे फिर इसके उपर कपड़े पहनते है ? "

" हां यही बात है। "

एकांश मुस्कान देकर कर जवाब देता है। वर्शाली कुछ सोचती हूई कहती है:

" परतुं एकांश जी इस वस्त्र को पहनने से क्या लाभ ? "



To be continue....1349