श्रापित एक प्रेम कहानी - 85 CHIRANJIT TEWARY द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 85

चतुर आलोक से कहता है:

" ये क्या यार यहां पर ताला लगा है। लगता है सभी बाहर हुए है। अब क्या करें यार ?"

 आलोक बिना कुछ जवाब दिये हवेली के गेट के पास जाता है। जहां पर दिवार मे एक छोटी सी खिड़की जैसी थी जिसमे एक छौटा सा दरवाजा लगा था । जिसे बहोत गौर से दैखने पर ही पता चलता था। आलोक उस दरवाजा को खोलता है और उसमे से चाबियां निकालकर मेन गेट को खोल देता है। 


चतुर ये सब दैखकर हैरान था । चतुर हैरानी से आलोक से कहता है:

" ये क्या था यार मैं कितनी बार तेरे घर पर आया हूँ पर आज तक इस खुफिया जगह पर मेरी नजर नही पड़ी और क्या क्या छुपाए रखा है तुमने आलोक ?"

आलोक चिड़कर कहता है:

" अपनी बकवास बंद करो और अंदर चलो।"

 चतुर कहता है :

" पर अंदर क्यों जाना जब घर मे कोई है ही नही। "


आलोक कहता है:

" तु चलता है या यही रुक कर बकवास करता रहेगा।"

चतुर कहता है:

"हां हां ...! चलो मैं यहां अकेले क्या करुगां। "

इतना बोलकर चतुर और आलोक हवेली के अंदर चला जाता है। हवेली के दरवाजा खुलने का आवाज सुनकर हवेली के अंदर बैठा निलु डर जाता है। उसे लगता है के शायद कोई देत्य उसे ढुंडते हूए यहां आ गया है। निलु डरते हुए एक कोने मे जाकर छिप जाता है। 

आलोक और चतुर हवेली के हर कमरे मे जाकर चेतन को ढुडने लगता है। चतुर आलोक से कहता है। यार आलोक तुम्हें नही लगता के हम अपना टाईम खराब कर रहे है। जब हवेली मे कोई है ही नही तो फिर हम ढुंड किसे रहे है ? आलोक चतुर की बात का कोई जवाब नही देता है और चेतन को हर कमरे मो ढुंडने लग जाता है। 

हवेली के हर कमरे की खुलने की आवाज सुनकर निलु बहोत डर जाता है। उसे अब ये विश्वास हो जाता है के हवेली के अंदर कोई देत्य ही आ गया है जो उसे हर कमरे मे ढुंड रहा है। निलु कमरे मे रखी अलमारी के पिछे छिप जाता है।

 आलोक और चतुर चेतन को ढुडते हूए निलु के बाजु वाले कमरे तक पहूँच जाता है़। चतुर आलोक से कहता है:

" ये क्या कर रहे हो यार ! मैं कह रहा हूँ ना के यहाँ पर कोई नही है हम बेकार मे ही अपना टाईम खराब कर रहे है। "

चतुर इतना बोल ही रहा था के तभी निलु से अलमारी को धक्का लग जाता है जिससे अलमारी के उपर रखी कांच का फूलदानी गिर कर टुट जाता है। आलोक और चतुर काँच की फूलदानी टुटने की आवाज सुनकर एक दम से रुक जाता है। दोनो ही धीरे धीरे उस कमरे की और बड़ने लगता है। 

चतुर आलोक से कहता है :

" यार यहां पर जरुर कोई है । मैं जानता था के यहां पर हमे चेतन जरुर मिलेगा।"

 आलोक चतुर की और हैरानी ये दैखता है के अभी ये कह रहा था के यहां पर कोई नही मिलने वाला और अभी कह रहा है के उसे पता था के यहां पर चेतन जरुर मिलेगा। चतुर आलोक को दैखकर कमरे की और इशारा करते हूए कहता है:

" उधर ...! उधर ....! वहां शायद कोई है। "

इतना बोलकर चतुर कमरे की और जाने लगता है। आलोक अपने माथे पर हाथ मारते हुए कमरे की और जाता है। कमरे अंदर बैठा निलु को आलोक और चतुर की परछाई कमरे के अंदर दिखने लगता है। जो धिरे धिरे कमरे की और ही आ रहा था। निलु का डर से बहोत बुरा हाल था । 


वो पसीने से पूरी तरह भींग चुका था और हाथ जौड़कर भगवान से प्राथना कर रहा था के हे भगवान इस बार के लिए मुझे बचा लो । 

बचा लो भगवान। 

जैसे जैसे आलोक और चतुर कमरे की बड़ रहा था । निलु के दिल की धड़कन और भी तेज होती जा रही थी। लगता है आज वो कुंम्भन मेरा बली चड़ा कर ही मानेगा। हे भगवान अब मैं क्या करूं। 

तभी आलोक और चतुर कमरे के अंदर घुस जाता है। जिसे निलु डर से अपनी सांस को रौक लेता है और मुह पर एक हाथ रख देता है। कमरे मे अंधेरा होने की वजह से निलु को आलोक और चतुर सिर्फ काली परछाई जैसी दिख रहा था । आलोक और चतुर कमरे अंदर जाकर दैखता है के वहां पर घोर अंधेरा है। आलोक स्विच बोर्ड की और जाता है और लाइट की स्विच को ऑन कर देता है । 

जिससे करने मे रोशनी हो जाती है। रोशनी होते ही निलु जौर जौर से कहता है:

" नही...! म......! म.....मम.....मम.... मुझे माफ करदो । मैं कुछ नही जानता । मैं कुछ नही जानता । व....व....वव ... वो... वो मणी मेरे पास नही है। तुम चले जाओ यहां से। च...चच..च... चले जाओ..। मुझे छोड़ दो। "

आलोक और चतुर निलु की ऐसी हालत दैखकर हैरान था । वो दोनो दैखता है के निलु पुरी तरह से पसिने से भीगां हुआ था । और एक जगह सिमट कर अपनी आंखे बंद करके बैठा था। निलु बहोत डरा और घबराया हुआ था। 

निलु की ऐसी हालत दैखकर आलोत और चतुर दौनो ही हैरान था । और फिर निलु के मुह से मणी की बात सुनकर आलोक और चतुर सौच मे पड़ जाता है। के आखीर ये निलु काका किस मणी की बात कर रहा है। आलोक चलकर निलु के पास जाता है और निलु के पास जाकर बैठ जाता है ।

 निलु अभी भी डर से काँप रहा था और बस वही बात बार बार दौहराए जा रहा था ।

" मुझे कुछ नही पता । मुझे छौड़ दो । मेरा बली मत चड़ाओ । मेरे पास कोई मणी नही है। "

आलोक निलु के कंधे पर हाथ रख कर कहता है:

" निलु काका ...! मैं हूँ आलोक ... निलु काका ..! "

आलोक के बुलाने पर भी निलु कोई जवाब नही देता है और बस वही सब दौहराए जा रहा था । तब आलोक निलु को जौर से हिलाते हूए कहता है:

" निलु काका ....! "

आलोक के हिलाने से निलु अपना सर उठाकर हैरानी से दैखता है तो सामने उसे आलोक बैठा मिलता है और निलु दुसरी और नजरे घुमाकर दैखता है तो उसे चतुर पास मे खड़ा दिखाई देता है । निलु बस हैरानी से चुप चाप कभी आलोक की और तो कभी चतुर की और दैख रहा था। आलोक निलु से कहता है:

 निलु काका ! आप यहां ऐसे क्यों छुपे हुए थे । और आप ये सब क्या बोल रहे थे । कौन आपका बली चढ़ाना चाहता है। और आप ये किस मणी की बात कर रहे हो ?"

 आलोक निलु से पूछ कर उसकी और ध्यान से दैखता है। निलु बहोत ही ज्यादा घबराया हुआ था। वो कुछ भी बोल नही पा रहा था । आलोक निलु को वहां से उठाते हुए कहता है:

" आप उठीयो ...! उठीये यहां से ।"

 निलु डर से उठ नही रहा था तो आलोक फिर निलु से कहता है:

" आप डरीये मत यहां और कोई नही है मेरे और चतुर के अलावा । "

आलोक के इतना बोलने पर निलु धिरे धिरे उठता है। आलोक मिलु को उठाकर बाहर एक कुर्सी पर बैठाता है और चतुर से कहता है :

" चतुर वहां से एक गिलास पानी लेकर आ ना। "

आलोक की बात सुनकर चतुर निलु के लिए पानी लेकर आता है। निलु पानी का गिलास पकड़कर पानी पिने लगता है। पानी पीने के बाद निलु का हाथ जिसमे गिलास था वो हाथ काँप रहा था। आलोक निलु को दिलासा देते हूए कहता है:

" क्या बात है काका ! आपको मैने पहले कभी ऐसे डरा हुआ नही देखा । क्या बात है आप किससे इतना डर रहे हो और आप अंदर मे वो सब क्या बोल रहे थे ? "

निलु आलोक के सवाल से बचने के लिए कहता है ।:

" म....म...म....मुझे.....! मुझे मालिक के पास जाना है। मुझे मालिक के पास जाना है।"

 चतुर निलु से बड़ी चावाकी के साथ कहता है:

" हां ...हां.. ठिक है चलो मैं लेकर चलता हूँ आपको दक्षराज अंकल के पास । चलिए बताए कहां गए है वो हम आपको वही पर लेकर चलेगें। "

निलु अब चतुर की बात पर फंस चुका था। उसके पास चतुर के बात का कोई जवाब नही था। क्योकी निलु ये नही बता सकता था के दक्षराज अघोरी बाबा के पास गया है।

 आलोक निलु को समझाते हूए कहता है:

" निलु काका ..! मैं जानता हूँ के आप हम सब से कुछ छुपा रहे है। हम सबने हॉस्पिटल मे ही दैखा था के कैसे आप और बड़े पापा दौनो काना फुसी कर रहे थे । तब से हम सब आप को दैख रहे है और आप है के हर बार झुठ पे झुठ बोले जा रहे हो। "

आलोक गुस्से से निलु को कहता है:

" निलु काका हम बच्चे नही रहे के आपके झुठ को हम समझ ना सके। हमने कमरे के अंदर मे भी दैखा के कैसे आप बड़ बड़ा रहे थे । अब बोलिए आपका कौन बली देना चाहता है और आपके पास किसका मणी है। आप हमसे क्या छुपा रहे है बोलिए ! "


To be continue.....1333