आलोक की बात को सुनकर वृन्दा गुस्से से एकांश की और दैखकर कहती है।
" कोई जरुरत नही है। मैं खुद चली जाऊगीं। "
आलोक मना तरते हूए कहती है :
" नही वृन्दा , तुम्हारा अकेले जाना सही नही होगा ।"
वृऩ्दा समझाते हूए कहती है :
" अकेली कहां ऑटो वाला साथ होगा ना , तुम चिंता मत करो ।"
इतना बोलकर वृन्दां वहां से ओटो पकड़कर चली जाती है। चतुर , आलोक और गुणा भी चला जाता है। सभी के जाने के बाद वर्शाली एकांश से पूछती है।
" एकांश जी ये आलोक और चतुर दोनो आलोक के घर पर चेतन को क्यो ढुडने गये । और चेतन वहां पर क्यों जाएगा ? "
एकांश कहता है।
" हम सबको ये शक है के चेतन और आलोक के बड़े पापा का कुछ कनेक्शन है। "
कनेक्शन शब्द सुनकर वर्शाली हैरानी से कहती है।
" क्या ....! क्या है उससे। "
एकांश वर्शाली को समझाते हूए कहता है।
" कनेक्शन है का मतलब है । के वो दौनो मिले हुए है। यही पता करने के लिए आलोक अपने घर गया है। "
एकांश की बात सुनकर वर्शाली कहती है।
" क्या ....? और ये बात आप मुझे अब बता रहे हो।
" "क्यो इसमे कौन सी बड़ी बात है?"
एकांश वर्शाली से कहता है।
तब वर्शाली कहती है:
" यही तो बात है एकांश जी अगर चेतन और आलोक के बड़े पापा दोनो मिले हूए है तो इसका अर्थ ये हूआ के हम मणी तक पहूँच जाएगें। हो सकता है वो मणी आलोक के बड़े पापा के पास हो?"
वर्शाली की बात सुनकर एकांश हैरान हो जाता है। और वर्शाली से कहता है:
" हां वर्शाली तुम ठीक कह रही हो। ये बात तो मेरे दिमाग मे कभी आया ही नही और ना ही कभी इस बारे मे सौचा।"
वर्शाली कहती है:
" तो अब सिघ्र चलिए अन्यथा कही दैर ना हो जाए। "
एकांश वर्शाली को रोकते हूए कहता है:
" नही.....! रुको वर्शाली !"
एकांश की बात पर वर्शाली रुक जाती है। एकांश अपने बात को जारी रखते हूए वर्शाली को पास जाकर कहता है:
" अभी वहां पर जाना ठीक नही होगा । आलोक और गुणा गये है ना। अगर चेतन वहां पर है। तो इसका मतलब ये होगा के मणी शायद इन्ही दोनो मे से किसी एक के पास है क्योकी उस रात भी चेतन अकेला नही था । उसके साथ एक और आदमी भी था।"
" और हो सकता है के वो आदमी और कोई नही बल्की आलोक के बड़े पापा दक्षराज हो। "
वर्शाली फिर से एकांश पर दवाब बनाकर कहती है:
" तो फिर अब विलम्ब किस बात का सिघ्रता किजिए चलिए आलोक का घर । "
वर्शाली की उत्सुकता को दैखकर एकांश फिर से वर्शाली को मना करते हूए कहता है:
" नही वर्शाली ! हमारा अभी वहां जाना ठिक नही है। क्योकी अगर हम भी वहां पर गये तो उन्हें शक हो जाएगा और वो सावधान हो जाऐगें । इसिलिए आलोक और चतुर को आनो दो। अभी हमे दक्षराज चाचा पर सिर्फ शक है। ये अभी तक पता नही चला है के चेतन और दक्षराज चाचा दौनो मिले हूए है। और जब तक ये पूर्ण रुप से पता नही चल जाता तब तक हमे चेतन और दक्षराज चाचा दौनो पर अपनी आंंखे । "
इतना बोलकर एकांश रुक जाता है। क्योकी इससे ज्यादा वो वर्शाली के भाषा मे बोल नही सकता था। एकांश की बात सुवकर वर्शाली जौर जौर से हंसने लगती है। और हंसते हूए कहती है।
" एकांश जी आपको मेरी तरह बोलने की कोई आवश्यकता नही है। मैं आपकी हर बात को समझ जाउगां और जब ना समझु तब आप समझा देना परतुं इस तरह से और मत बोलिए। अजीब लगते हो ।"
वर्शाली के हंसने से एकांश अपना मुह बनाते हुए कहता है।
" अच्छा ...! तो तुम्हे क्या लगता है के मैं ठिक से बोल नही पा रहा हूँ। वो इस तरह बोलने का आदत नही है ना बस इसिलिए । वरना मैं तुमसे भी अच्छा बोल लेता। "
वर्शाली एक हल्की मुस्कान के साथ कहती है:
" अच्छा ठीक है। ज्ञात है मुझे अब चले अन्यथा घर पहूँचने मे दैर हो जाएगी। "
वर्शाली के इतना कहने पर एकांश अपनी बाइक को स्टार्ट करता है और वहां से मार्केट की और चला जाता है।
वर्शाली और एकांश की सारी बांते मांतक और त्रिजला सुन लेता है। त्रिजला मांतक से कहती है।
" स्वामी ..! ये वही परी और एकांश है जिसे हम ढुंड रहे हैं। क्यों ना हम इन दौनो को अभी कुम्भन के समक्ष लेकर चलते है। "
मातंक कहता है:
" तुम ठीक कह रही हो त्रिजला अब हमे ज्यादा विलम्ब ना करके इन दोनो को मित्र कुंम्भन के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।"
इतना बोलकर दोनो ही वहां से वर्शाली और एकाश के पिछे चला जाता है। उधर अघोरी बाबा और दक्षराज गुफा के अंदर बैठा हुआ था । दक्षराज अघोरी से कहता है:
" बाबा मुझे एक बात अभी भी समझ मे नही आ रही है। के अगर कुंम्भन के बेटी की मणी चेतन के पास है तो हमसे इस बारे मे क्यो छुपाए रखा। और अगर मणी उसके पास भी है तो फिर श्राप उसे क्यो नही लगी जो श्राप मे़ैं भुगत रहा हूँ।"
अघोरी कहता है:
" तुमने उस झरने मे स्नान किया था इसिलिए तुम श्राप भुगत रहे हो। परतुं मुझे इस बात की खोज शीघ्र ही करनी पड़ेगी के क्या चेतन के पास वास्तव मे कोई मणी है या नही।"
" अगर है । तो इसका मतलब ये है दक्ष के वो कुछ गलत सौच मे है। वो कुछ ना कुछ अहित करने के ताक मे है। हमे बड़े ही सावधानी के साथ ये पता लगाना पड़ेगा । "
" के चेतन उस मणी से क्या करने की सोच रहा है ?"
" दक्ष अगर मेघ मणी चेतन के पास है तो इसका एक और अर्थ ये निकलता है के वो सांतक मणी को पाने की चेष्ठा करेगा और अगर ये दोनो मणी उसके हाथ लग गई तो वो उन दोनो मणीयों के शक्ती का गलत उपयोग करेगा इसिलिए दक्ष तुम अपने मणी को सावधानी से रखना ताकी चेतन की नजर उस मणी तक ना जाए। "
" मुझे तो लगता है के वो तेरे जो मणी है उसे पाना चाहता है ।"
दक्षराज कहता है:
" जी बाबा मैं इसका पूरा ध्यान रखूगां। और मेघ मणी का पता लगाने की कोशिश करता रहूँगां । "
अघोरी कहता है:
" ठिक है दक्ष । परंतु एक बात और है दक्ष।"
दक्षराज हैरानी से अघोरी बाबा से कहता है:
" क्या बाबा ?"
अघोरी कहता है:
" सांतक मणी की खोज मे एक परी भी इस पृथ्वी पर
आई है। तुम्हें उस परी से भी सावधान रहने की आवश्यकता है। ये समय तुम्हारे लिए बहोत ही कठीन होने वाला है। क्योकी अब तुम्हारे पिछे देत्य , परी और चेतन तीनो उस मणी की खोज मे है। "
" तो तुम्हें अब हर समय सतर्क रहने की आवश्यकता है।"
परी का नाम सुनकर दक्षराज कुछ सौचने लग जाता है। तभी अघोरी फिर से कहता है :
" क्या सौच रहे हो दक्ष ? "
दक्षराज कहता है:
" जी बाबा । बस मैं ये सौच रहा था के पता नही मेरे साथ आगे क्या होने वाला है। क्योकी अब मैं हर तरफ से घिर चुका हूँ । जहां से बच निकलना बहुत ही
कठीन है।"
अघोरी दक्षराज से कहता है:
" तु चिंता मत कर और जैसा मैने कहा वैसा करता जा । तुझे अवश्य सफलता प्राप्त होगी।"
दक्षराज अघोरी से कहता है:
" बाबा एक समस्या और है जिसके लिए मैं यहां पर आया हूँ ।"
अघोरी कहता है:
" अब कौनसी समस्या आ गई तुम्हें दक्ष। "
दक्षराज अघोरी बाबा को निलु के बारे मे सब कुछ बोलकर सुना देता है और कहता है:
" बाबा अब कुंम्भन मणी के साथ साथ निलु को भी ढुंड रहा है। और अगर निलु पकड़ा गया तो उसके साथ साथ मैं भी कुंम्भन का शिकार बन जाऊगां। बाबा आप ही कुछ उपाय बताओ। "
अघोरी कहता है:
" तुमने एक कार्य ठीक किया के निलु को तुमने कमरे मे ही बंद करके रख दिया। परतुं उसे सदेव अपने पास रखना भी तो मुश्किल है । तुम्हें शीघ्र ही निलु को कही और पहूँचाना होगा एक ऐसी जगह जहां पर किया की दृष्टी निलु पर ना पड़े। "
दक्षराज अघोरी बाबा से कहता है:
" पर ऐसी जगह कहां है बाबा ? "
अघोरी कहता है:
" मैं इसकी सुचना भी तुम्हें बाद मे भिजवा दुगां। अब तुम जाओ और मणी की खोज करो । और हां ...! सावधानी से सभी कार्य करना । ताकि किसी का भी तुम पर संदेह ना हो पाए। "
दक्षराज अघोरी को प्रणाम करते हूए वहां ये चला जाता है। इधर आलोक और चतुर हवेली पहूँच जाता है। और दौनो ही गाड़ी से उतर कर हवेली के मेन गेट तक चला जाता है। जहां पर आलोक दैखता है के हवेली बाहर से बंद है।
चतुर आलोक से कहता है:
" ये क्या यार यहां पर ताला लगा है। लगता है सभी बाहर हुए है। अब क्या करें यार ?"
To be continue....1321