कर्मठ बनो GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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कर्मठ बनो

ऋगुवेद सूक्ति (67)की व्याख्या"दक्षता महे"ऋगुवेद-7/32/9भावार्थ--दक्ष बनो। पूरा मंत्र अर्थ सहितऋग्वेद 7.32.9 का मूल मंत्र इस प्रकार है—मा स्रेधत सोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे ।तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति न देवासः कवत्नवे ॥ पदच्छेदमा । स्रेधत । सोमिनः । दक्षत । महे । कृणुध्वम् । राये । आतुजे । तरणिः । इत् । जयति । क्षेति । पुष्यति । न । देवासः । कवत्नवे ।शब्दार्थमा स्रेधत = आलस्य मत करो, शिथिल मत पड़ो।सोमिनः = यज्ञ करने वालों, सोमयागियों।दक्षत = दक्ष बनो, कर्मठ बनो, योग्य बनो।महे = महान (ईश्वर/इन्द्र) के लिए।कृणुध्वम् = कर्म करो, यज्ञ करो।राये = धन, समृद्धि के लिए।आतुजे = बलवान, सहायता करने वाले के लिए।तरणिः = परिश्रमी, सक्रिय व्यक्ति।जयति = विजय प्राप्त करता है।क्षेति = सुखपूर्वक निवास करता है।पुष्यति = उन्नति करता है, पुष्ट होता है।न देवासः कवत्नवे = देवता कंजूस, आलसी या निकृष्ट कर्म करने वाले का साथ नहीं देते।भावार्थहे यज्ञशील मनुष्यो! आलस्य मत करो, दक्ष और कर्मठ बनो। महान परम शक्ति की उपासना और शुभ कर्मों द्वारा समृद्धि प्राप्त करने का प्रयत्न करो। परिश्रमी और सक्रिय व्यक्ति ही विजय प्राप्त करता है, सुरक्षित रहता है और उन्नति करता है; देवत्व अथवा ईश्वरीय अनुग्रह आलसी, अकर्मण्य या निकृष्ट कर्म करने वालों को प्राप्त नहीं होता।इस मंत्र में “दक्षता” (दक्ष बनो) को सफलता, समृद्धि और ईश्वरीय अनुग्रह का आधार बताया गया है। ऋषि का स्पष्ट संदेश है कि उद्योग, कर्मठता और योग्यता ही उन्नति का मार्ग है।वेदों में प्रमाण--ऋग्वेद 7.32.9 में "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मयोग्य बनो) का जो उपदेश है, उसी भावना को अन्य वैदिक मंत्रों में भी व्यक्त किया गया है। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं1. ऋग्वेद 10.53.6कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।भावार्थ — मेरे दाहिने हाथ में कर्मशीलता (पुरुषार्थ) है और बाएँ हाथ में विजय है।यह मंत्र बताता है कि विजय का आधार कर्म और दक्षता है।2. यजुर्वेद 40.2 (ईशोपनिषद् मंत्र 2)कुर्वन्नेवেহ कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥भावार्थ — मनुष्य को कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। कर्मशील जीवन ही उचित मार्ग है।3. अथर्ववेद 19.53.1उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।यह प्रसिद्ध उक्ति वैदिक परंपरा में उद्योग (परिश्रम) के महत्व को व्यक्त करती है (यद्यपि यह पाठ वर्तमान अथर्ववेद संहिताओं में इस रूप में नहीं मिलता, पर वैदिक साहित्य में व्यापक रूप से उद्धृत है)।4. ऋग्वेद 1.9.7इन्द्रमिद् गाथिनो बृहत्।भावार्थ — महान कर्म और स्तुति द्वारा ही इन्द्र की कृपा प्राप्त होती है।अर्थात् केवल इच्छा नहीं, बल्कि प्रयत्न आवश्यक है।5. अथर्ववेद 6.122.3दक्षाय दक्षवृधे।भावार्थ — दक्षता के लिए, दक्षता की वृद्धि के लिए (प्रार्थना)।यहाँ "दक्ष" शब्द सीधे योग्यता, सामर्थ्य और कुशलता के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।6. ऋग्वेद 1.18.1दक्षं दधाते अपसम्।भावार्थ — देवता मनुष्यों में दक्षता और कार्यकुशलता स्थापित करते हैं।निष्कर्षवेदों में बार-बार यह शिक्षा मिलती है कि—दक्षता (दक्ष) = योग्यता, कुशलता, कर्मठता।उद्योग (परिश्रम) = सफलता का साधन।कर्म = मानव जीवन का धर्म।विजय और समृद्धि = दक्ष और कर्मशील व्यक्ति को प्राप्त होती है।विशेष रूप से ऋग्वेद 7.32.9, यजुर्वेद 40.2, ऋग्वेद 10.53.6, और अथर्ववेद 6.122.3 दक्षता एवं कर्मशीलता के सबसे स्पष्ट वैदिक प्रमाणों में गिने जाते हैं।उपनिषदों में प्रमाण--"दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मयोग्य बनो, कुशल बनो) की भावना उपनिषदों में भी अनेक स्थानों पर मिलती है। यद्यपि "दक्षता" शब्द हर जगह नहीं आता, किन्तु उद्योग, कर्मनिष्ठा, जागरूकता, आत्म-विकास और उत्कृष्ट आचरण पर विशेष बल दिया गया है।1. कठोपनिषद् 1.3.14उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्ययादुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥भावार्थ — उठो, जागो और श्रेष्ठ आचार्यों को प्राप्त करके ज्ञान प्राप्त करो। जीवन का मार्ग कठिन है, इसलिए सजग और दक्ष बनकर चलना चाहिए।2. ईशावास्योपनिषद् (मंत्र 2)कुर्वन्नेवেহ कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥भावार्थ — मनुष्य को कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। कर्मशीलता ही जीवन का उचित मार्ग है।3. तैत्तिरीयोपनिषद् 1.11.2सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः॥भावार्थ — सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, स्वाध्याय में प्रमाद मत करो।यहाँ "मा प्रमदः" (प्रमाद मत करो) दक्षता, सतर्कता और कर्तव्यनिष्ठा का उपदेश है।4. तैत्तिरीयोपनिषद् 1.11.2कुशलान्न प्रमदितव्यम्।भावार्थ — कल्याणकारी और कुशल कर्मों में कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए।यह उपनिषदों में दक्षता और कार्यकुशलता का अत्यंत स्पष्ट निर्देश है।5. मुण्डकोपनिषद् 3.2.4नायमात्मा बलहीनेन लभ्योन च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात्॥भावार्थ — यह आत्मा निर्बल, प्रमादी या अकर्मण्य व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता।अर्थात् आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी पुरुषार्थ और दक्षता आवश्यक है।6. श्वेताश्वतरोपनिषद् 6.23यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ।तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥भावार्थ — जो श्रद्धा और निष्ठा से साधना करता है, उसी के लिए ज्ञान के रहस्य प्रकाशित होते हैं।यह निष्ठा, लगन और साधना में दक्षता का महत्व बताता है।सारउपनिषदों में "दक्षता महे" की भावना निम्न शिक्षाओं के रूप में प्रकट होती है—कठोपनिषद्1.3.14उठो, जागो, पुरुषार्थ करोईशावास्योपनिषद्2कर्मशील जीवनतैत्तिरीयोपनिषद्1.11.2प्रमाद मत करोतैत्तिरीयोपनिषद्1.11.2कुशलान्न प्रमदितव्यम्मुण्डकोपनिषद्3.2.4प्रमादी को आत्मज्ञान नहींश्वेताश्वतरोपनिषद्6.23निष्ठा और लगन से ज्ञानइनमें तैत्तिरीयोपनिषद् 1.11.2 का "कुशलान्न प्रमदितव्यम्" और कठोपनिषद् 1.3.14 का "उत्तिष्ठत जाग्रत" विशेष रूप से "दक्ष बनो" की वैदिक भावना के सबसे निकट माने जाते हैं।पुराणों में प्रमाण--यदि विषय दक्षता (कर्मकुशलता), उद्योग, कर्तव्यपालन और कर्मयोग है, तो "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मकुशल बनो, अपने कार्य को योग्यता और पुरुषार्थ से करो) के समर्थन में विभिन्न पुराणों से निम्न प्रमाण प्रस्तुत हैं—1. गरुड़ पुराण (पूर्वखण्ड 111.3)उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥भावार्थ: कार्य केवल कल्पना करने से नहीं, बल्कि उद्यम (परिश्रम) से सिद्ध होते हैं। जैसे सोए हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करते।यह श्लोक दक्षता, उद्योग और कर्मशीलता का स्पष्ट उपदेश देता है।2. अग्नि पुराणविद्यया विन्दतेऽमृतम्।भावार्थ: मनुष्य विद्या के द्वारा अमृतत्व (श्रेष्ठता एवं कल्याण) प्राप्त करता है।दक्षता का मूल आधार विद्या और कौशल है; इसलिए अग्नि पुराण ज्ञान-वृद्धि पर बल देता है।3. स्कन्द पुराणनास्त्युद्यमसमो बन्धुर्नास्त्युद्यमसमः सुहृत्।नास्त्युद्यमसमं वित्तं तस्मादुद्यमवान् भवेत्॥भावार्थ: उद्यम (परिश्रम) के समान कोई मित्र, हितैषी या धन नहीं है; इसलिए मनुष्य को उद्योगी और कर्मठ होना चाहिए।4. पद्म पुराणआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥भावार्थ: आलस्य मनुष्य का शरीर में रहने वाला महान शत्रु है। उद्यम से बढ़कर कोई सहायक नहीं, क्योंकि उद्योगी व्यक्ति पतित नहीं होता।5. ब्रह्मवैवर्त पुराणविद्यावान् गुणवान् विप्रो पूज्यते सर्वदेहिभिः।भावार्थ: विद्या और गुणों से युक्त व्यक्ति सबके द्वारा सम्मानित होता है।यह दक्षता, ज्ञान और गुण-विकास के महत्व को दर्शाता है।6. विष्णु पुराण (1.19.41)सा विद्या या विमुक्तये।भावार्थ: वही विद्या है जो मनुष्य को उन्नति और मुक्ति की ओर ले जाए।दक्षता केवल तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि विवेकयुक्त ज्ञान भी है।निष्कर्षऋग्वेद के "दक्षता महे" भाव का पुराणों में विस्तार इस प्रकार मिलता है—उद्यम करो — गरुड़ पुराण, स्कन्द पुराण।आलस्य त्यागो — पद्म पुराण।विद्या बढ़ाओ — अग्नि पुराण, विष्णु पुराण।गुण और कौशल विकसित करो — ब्रह्मवैवर्त पुराण।इन सभी का संयुक्त संदेश है: "दक्ष, कर्मठ, उद्योगी और ज्ञानवान बनो।"गीता में प्रमाण --भगवद्गीता में अनेक स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं:1. कर्म में कुशलता ही योग है — गीता 2.50बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥ २.५०॥भावार्थ: बुद्धियोग से युक्त मनुष्य पुण्य और पाप दोनों से ऊपर उठ जाता है। इसलिए योग में स्थित हो जाओ, क्योंकि योग कर्मों में कौशल (दक्षता) है।यह गीता का सबसे प्रसिद्ध "दक्षता" संबंधी श्लोक है।2. कर्म करना ही अधिकार है — गीता 2.47कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ २.४७॥भावार्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं। इसलिए अकर्मण्यता (निष्क्रियता) में आसक्त मत हो।3. नियत कर्म करो — गीता 3.8नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥ ३.८॥भावार्थ: अपने नियत कर्तव्य का पालन करो, क्योंकि कर्म अकर्म (निष्क्रियता) से श्रेष्ठ है।4. आसक्ति रहित होकर उत्कृष्ट कर्म — गीता 3.19तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥ ३.१९॥भावार्थ: इसलिए आसक्ति रहित होकर अपने कर्तव्य का उत्तम प्रकार से पालन करो।5. प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्म से सिद्धि पाता है — गीता 18.45स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥ १८.४५॥भावार्थ: मनुष्य अपने-अपने कर्म में तत्पर रहकर सिद्धि प्राप्त करता है।6. अपने कर्म द्वारा भगवान की पूजा — गीता 18.46यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ १८.४६॥भावार्थ: अपने कर्म को उत्कृष्ट रूप से करके मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है।7. उत्साह और धैर्ययुक्त कर्ता — गीता 18.26मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥ १८.२६॥भावार्थ: जो कर्ता उत्साह, धैर्य और लगन से कर्म करता है, वही सात्त्विक कर्ता कहलाता है।सारगीता में दक्षता का सर्वोच्च प्रमाण स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का यह वचन है:(गीता 2.50)अर्थात् "कर्मों में कौशल (दक्षता) ही योग है।"इसलिए गीता के अनुसार दक्षता का अर्थ है—कर्तव्यनिष्ठ होना,कर्म में कुशल होना,आलस्य से दूर रहना,उत्साहपूर्वक कार्य करना,और फलासक्ति छोड़कर श्रेष्ठ कर्म करना।महाभारत में प्रमाण--"दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मठ बनो, पुरुषार्थी बनो) की भावना महाभारत में अनेक स्थानों पर व्यक्त हुई है। कुछ प्रमुख प्रमाण निम्नलिखित हैं—1. उद्योगपर्व 33.68उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति॥भावार्थ — लक्ष्मी (समृद्धि) उद्योगी और पुरुषार्थी पुरुष के पास आती है। "सब कुछ भाग्य से होगा" ऐसा कायर लोग कहते हैं।2. उद्योगपर्व 33.69उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥भावार्थ — कार्य केवल परिश्रम से सिद्ध होते हैं, मात्र इच्छाओं से नहीं। सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते।3. शान्तिपर्व 139.8अप्रमादो हि पुरुषस्य परमं श्रेय उच्यते।भावार्थ — अप्रमाद (सजगता, सतर्कता, कर्तव्यनिष्ठा) मनुष्य का परम कल्याण माना गया है।4. शान्तिपर्व 12.104.20उत्थानं हि मनुष्याणां देवाः सम्प्रतिपद्यते।भावार्थ — जो मनुष्य पुरुषार्थ और उत्थान का आश्रय लेते हैं, देवता भी उनका साथ देते हैं।5. वनपर्व 32.20न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।भावार्थ — कोई भी मनुष्य एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता; इसलिए कर्म को दक्षता से करना चाहिए।6. शान्तिपर्व 175.27अलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपुः।नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥भावार्थ — आलस्य मनुष्य का महान शत्रु है। उद्योग (परिश्रम) के समान कोई मित्र नहीं, जिसके सहारे मनुष्य कभी पतित नहीं होता।सारमहाभारत का निष्कर्ष वही है जो ऋग्वेद 7.32.9 के "दक्षता महे" में है—उद्योग (परिश्रम) करो।आलस्य का त्याग करो।अप्रमादी और सजग रहो।पुरुषार्थ से ही सफलता मिलती है।देवता भी पुरुषार्थी का साथ देते हैं।विशेष रूप से "उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः" तथा "उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः" महाभारत के सबसे प्रसिद्ध पुरुषार्थ-प्रधान वचन हैं, जो "दक्ष बनो" की भावना को अत्यंत स्पष्ट रूप से व्यक्त करते हैं।स्मृतियों में प्रमाण--ऋग्वेद 7.32.9 — "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मठ बनो) की भावना स्मृति-साहित्य में अनेक स्थानों पर मिलती है। यहाँ कुछ प्रमाणित और प्रसिद्ध स्मृति-वचन प्रस्तुत हैं:1. मनुस्मृति 4.137नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः ।अमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम् ॥भावार्थ: पूर्व की असफलताओं से निराश न हो; जीवनभर पुरुषार्थपूर्वक उन्नति और समृद्धि का प्रयास करता रहे।2. मनुस्मृति 7.107कार्यं सोऽवेक्ष्य शक्तिं च देशकालौ च तत्त्वतः ।कुरुते धर्मसिद्ध्यर्थं न स सीदति कर्हिचित् ॥भावार्थ: जो व्यक्ति अपनी शक्ति, देश और काल को समझकर कार्य करता है, वह कभी असफल नहीं होता।यह दक्षता और विवेकपूर्ण कर्म का उपदेश है।3. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.349धर्मेणार्थं समाचरेत्।भावार्थ: धर्मानुसार उद्योग और कर्म करके अर्थ (समृद्धि) प्राप्त करे।4. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122दानं दमो दया शान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम्।भावार्थ: आत्मसंयम, अनुशासन और सदाचार धर्म की सिद्धि के साधन हैं।5. पराशर स्मृतिअप्रमादोऽमृतं विद्यात् प्रमादं तु विनाशनम्।भावार्थ: अप्रमाद (सजगता, कर्तव्यनिष्ठा) अमृत के समान है और प्रमाद विनाश का कारण है।6. बृहस्पति स्मृतिउद्योगं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।भावार्थ: लक्ष्मी (समृद्धि) उद्योगी पुरुष के पास आती है।यह वचन बाद में महाभारत और नीति-साहित्य में भी व्यापक रूप से उद्धृत हुआ।7. नारद स्मृतिउत्थानं सततं कुर्यात्।भावार्थ: मनुष्य को निरंतर पुरुषार्थ और प्रयत्न करते रहना चाहिए।8-. याज्ञवल्क्य स्मृतिनित्यं स्वाध्यायशीलः स्यात्।भावार्थ: मनुष्य को निरंतर अध्ययन और आत्म-विकास में लगे रहना चाहिए।स्मृतियों का सारस्मृति-साहित्य में "दक्षता महे" की भावना मुख्यतः इन शब्दों में व्यक्त होती है—दक्षता (योग्यता)उद्योग (परिश्रम)उत्थान (प्रयत्न)अप्रमाद (सजगता)स्वाध्याय (निरंतर सीखना)धर्मानुकूल कर्मविशेष रूप से:अप्रमादोऽमृतं विद्यात्।(अप्रमाद अमृत के समान है।)उद्योगं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।(समृद्धि उद्योगी पुरुष के पास आती है।)नात्मानमवमन्येत...(असफलताओं से निराश हुए बिना प्रयास करते रहो।)ये सभी वचन ऋग्वेद के "दक्षता महे" के भाव — कर्मठता, सजगता, पुरुषार्थ और कार्यकुशलता — को व्यक्त करते हैं।नीति ग्रन्थों में प्रमाण-- ऋग्वेद 7.32.9 — "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मठ बनो, उद्योगी बनो) की भावना संस्कृत नीति-ग्रन्थों में अत्यन्त प्रबल रूप से व्यक्त हुई है। विशेषकर चाणक्य नीति, हितोपदेश, पञ्चतन्त्र तथा भर्तृहरि नीति शतक में उद्योग, पुरुषार्थ, अप्रमाद और दक्षता की प्रशंसा की गई है।1. चाणक्य नीतिउद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्।मौने च कलहो नास्ति नास्ति जागरिते भयम्॥भावार्थ: उद्योग करने वाले को दरिद्रता नहीं होती; जागरूक व्यक्ति को भय नहीं होता।2. चाणक्य नीतिआलस्योपहता विद्या परहस्तगतं धनम्।अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्॥भावार्थ: आलस्य से विद्या नष्ट हो जाती है।3. हितोपदेश (मित्रलाभ)उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥भावार्थ: कार्य केवल परिश्रम से सिद्ध होते हैं, इच्छाओं से नहीं; सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं आते।4. पञ्चतन्त्रयथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति॥भावार्थ: जैसे एक पहिये से रथ नहीं चलता, वैसे ही पुरुषार्थ के बिना भाग्य भी फल नहीं देता।5. भर्तृहरि — नीतिशतक श्लोक 74उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति॥भावार्थ: लक्ष्मी उद्योगी पुरुष के पास आती है; केवल भाग्य की बात कायर करते हैं।6. भर्तृहरि — नीतिशतकआरभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः।आरभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः॥विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः।प्रारब्धमुत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥भावार्थ: श्रेष्ठ व्यक्ति बाधाओं के आने पर भी अपने कार्य को नहीं छोड़ते।7. सुभाषितरत्नभाण्डागारन देवमपि सच्छक्तं त्यक्त्वोद्योगं समाश्रयेत्।भावार्थ: स्वयं प्रयत्न किए बिना केवल देवता पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।8. पञ्चतन्त्रन हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।भावार्थ: कोई भी व्यक्ति बिना कर्म के नहीं रह सकता।9. हितोपदेशअलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम्।अधनस्य कुतो मित्रं, अमित्रस्य कुतः सुखम्॥भावार्थ: आलसी को विद्या नहीं मिलती; विद्या के बिना धन नहीं, धन के बिना मित्र नहीं और मित्र के बिना सुख नहीं।10. भर्तृहरि — नीतिशतककर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी।भावार्थ: मनुष्य का फल उसके कर्म पर निर्भर है।11. सुभाषितउत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।(यद्यपि मूलतः कठोपनिषद् का मंत्र है, पर नीति-साहित्य में व्यापक रूप से उद्धृत)भावार्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठता प्राप्त करो।नीति-ग्रन्थों का सारनीति-साहित्य में "दक्षता महे" की भावना निम्न सिद्धांतों में व्यक्त होती है—सिद्धांतनीति-वचनउद्योगउद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणिपुरुषार्थउद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीःअप्रमादनास्ति जागरिते भयम्आलस्य-त्यागअलसस्य कुतो विद्यादृढ़ताप्रारब्धमुत्तमजनाः न परित्यजन्तिकर्मप्रधानताकर्मायत्तं फलं पुंसाम्सबसे प्रसिद्ध नीति-वचनउद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥औरउद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।ये दोनों श्लोक ऋग्वेद के "दक्षता महे" की भावना—दक्षता, परिश्रम, पुरुषार्थ और कर्मठता—को अत्यंत स्पष्ट रूप से व्यक्त करते हैं। करते हैं।वाल्मीकि रामायण और योग वाशिष्ठ   प्रमाण--ऋग्वेद 7.32.9 — "दक्षता महे" (दक्ष बनो, पुरुषार्थी बनो, कर्मठ बनो) की भावना वाल्मीकि रामायण और योगवासिष्ठ दोनों में अत्यंत स्पष्ट रूप से मिलती है।१. वाल्मीकि रामायण में प्रमाण(क) अयोध्याकाण्ड 2.100.36उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।सोत्साहस्य लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥भावार्थ: उत्साह (उद्योग, पुरुषार्थ) सबसे बड़ा बल है। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं।यह रामायण का सबसे प्रसिद्ध "पुरुषार्थ-सूत्र" है।(ख) युद्धकाण्डउत्साहवन्तः पुरुषा नावसीदन्ति कर्मसु।भावार्थ: उत्साही और कर्मठ पुरुष कार्यों में निराश नहीं होते।(ग) सुन्दरकाण्ड — हनुमान का आदर्शअनिर्वेदः श्रियो मूलम्।भावार्थ: निराश न होना ही सफलता और समृद्धि का मूल है।हनुमान समुद्र पार करने से पहले स्वयं को उत्साहित करते हुए यह सिद्धांत अपनाते हैं।(घ) युद्धकाण्डन ह्युत्साहविहीनस्य सिद्ध्यन्ति कर्मणि क्वचित्।भावार्थ: उत्साह और पुरुषार्थ के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता।२. योगवासिष्ठ में प्रमाणयोगवासिष्ठ में तो पुरुषार्थ (स्वप्रयत्न) को अत्यधिक महत्व दिया गया है। महर्षि वसिष्ठ बार-बार राम को बताते हैं कि भाग्य से अधिक बलवान पुरुषार्थ है।(क) योगवासिष्ठ, वैराग्यप्रकरणपुरुषार्थात्फलं प्राप्तं न दैवात् कस्यचित्क्वचित्।भावार्थ: किसी को भी फल केवल भाग्य से नहीं, पुरुषार्थ से प्राप्त होता है।(ख) योगवासिष्ठदैवं न किञ्चित्कुरुते पुरुषार्थादृते क्वचित्।भावार्थ: पुरुषार्थ के बिना भाग्य कुछ भी नहीं कर सकता।(ग) योगवासिष्ठ, उपशमप्रकरणयथा यत्नस्तथा सिद्धिः।भावार्थ: जैसा प्रयास, वैसी सफलता।(घ) योगवासिष्ठसर्वमेवेह हि सदा संसारे रघुनन्दन।सम्यक्प्रयुक्तात्सर्वेण पौरुषात्समवाप्यते॥भावार्थ: हे रघुनन्दन! इस संसार में सब कुछ उचित पुरुषार्थ से प्राप्त किया जा सकता है।(ङ) योगवासिष्ठपौरुषं स्पन्दफलवत् दृष्टं प्रत्यक्षतो नृणाम्।भावार्थ: मनुष्यों के जीवन में पुरुषार्थ का फल प्रत्यक्ष देखा जाता है।(च) योगवासिष्ठउद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।यह प्रसिद्ध नीति-वचन योगवासिष्ठ की परंपरागत व्याख्याओं में भी उद्धृत मिलता है।तुलनात्मक सारऋग्वेदवाल्मीकि रामायणयोगवासिष्ठदक्षता महेउत्साहो बलवानार्यपुरुषार्थात्फलं प्राप्तम्दक्ष बनोउत्साही बनोपुरुषार्थी बनोकर्मठ बनोनिराश मत होभाग्य पर निर्भर मत रहोसफलता परिश्रम सेउत्साह से कुछ दुर्लभ नहींपुरुषार्थ से सब संभवसर्वश्रेष्ठ प्रमाणवाल्मीकि रामायणउत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।सोत्साहस्य लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥योगवासिष्ठदैवं न किञ्चित्कुरुते पुरुषार्थादृते क्वचित्।सर्वमेवेह हि सदा संसारे रघुनन्दन।सम्यक्प्रयुक्तात्सर्वेण पौरुषात्समवाप्यते॥ये दोनों ग्रंथ ऋग्वेद के "दक्षता महे" के भाव को अत्यंत प्रबल रूप से पुष्ट करते हैं—उत्साह, पुरुषार्थ, उद्योग, अप्रमाद और कर्मठता ही सफलता का आधार हैं।इस्लाम धर्म में प्रमाण--यदि ऋग्वेद 7.32.9 के "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मठ बनो, प्रयत्नशील बनो) के समान विचार इस्लाम में देखे जाएँ, तो क़ुरआन और हदीस में परिश्रम, उत्कृष्ट कार्य (इह्सान), उत्तरदायित्व और कर्मशीलता पर बहुत बल दिया गया है।1. क़ुरआन 53:39وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰWa an laysa lil-insāni illā mā saʿāअर्थ: मनुष्य के लिए वही है जिसके लिए उसने प्रयास किया।यह आयत पुरुषार्थ और प्रयत्न के महत्व को स्पष्ट करती है।2. क़ुरआन 9:105وَقُلِ اعْمَلُوا فَسَيَرَى اللَّهُ عَمَلَكُمْ وَرَسُولُهُ وَالْمُؤْمِنُونَWa qul i'malū fasayarallāhu ʿamalakum wa rasūluhu wal-muʾminūnअर्थ: कह दो, "कर्म करते रहो; अल्लाह, उसके रसूल और ईमान वाले तुम्हारे कर्मों को देखेंगे।"3. क़ुरआन 13:11إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنْفُسِهِمْInna Allāha lā yughayyiru mā biqawmin ḥattā yughayyirū mā bi'anfusihimअर्थ: अल्लाह किसी समुदाय की दशा नहीं बदलता जब तक वे स्वयं अपने भीतर परिवर्तन न करें।4. क़ुरआन 62:10فَإِذَا قُضِيَتِ الصَّلَاةُ فَانْتَشِرُوا فِي الْأَرْضِ وَابْتَغُوا مِنْ فَضْلِ اللَّهِFa idhā quḍiyatiṣ-ṣalātu fantashirū fil-arḍi wabtaghū min faḍlillāhअर्थ: जब नमाज़ पूरी हो जाए तो धरती में फैल जाओ और अल्लाह की कृपा (रोज़ी) की तलाश करो।यह कर्म और जीविकोपार्जन के लिए प्रयास का निर्देश है।5. हदीस (सहीह अल-बुख़ारी)مَا أَكَلَ أَحَدٌ طَعَامًا قَطُّ خَيْرًا مِنْ أَنْ يَأْكُلَ مِنْ عَمَلِ يَدِهِMā akala aḥadun ṭaʿāman qaṭṭu khayran min an ya'kula min ʿamali yadihīअर्थ: किसी व्यक्ति ने अपने हाथों की कमाई से बेहतर भोजन कभी नहीं खाया।6. हदीस (मुहम्मद से संबद्ध प्रसिद्ध कथन)إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ إِذَا عَمِلَ أَحَدُكُمْ عَمَلًا أَنْ يُتْقِنَهُInna Allāha yuḥibbu idhā ʿamila aḥadukum ʿamalan an yutqinahuअर्थ: अल्लाह पसंद करता है कि जब तुम कोई काम करो तो उसे उत्कृष्टता और कुशलता के साथ करो।यह कथन "दक्षता" और "कार्यकुशलता" की भावना से अत्यंत निकट है।सारऋग्वेद का "दक्षता महे" और इस्लामी शिक्षाओं के निम्न सिद्धांतों में स्पष्ट समानता दिखाई देती है—प्रयत्न करो — (क़ुरआन 53:39)कर्म करते रहो — (क़ुरआन 9:105)स्वयं को सुधारो — (क़ुरआन 13:11)रोज़ी के लिए परिश्रम करो — (क़ुरआन 62:10)अपने कार्य को उत्कृष्टता से करो — (हदीस: أن يتقنه)अर्थात् इस्लाम में भी आलस्य की अपेक्षा परिश्रम, उत्तरदायित्व, आत्म-सुधार और कार्य में उत्कृष्टता को महत्व दिया गया है, जो "दक्षता महे" की मूल भावना के अनुरूप है।सूफी सन्तों में प्रमाण--सूफ़ी परम्परा में कर्मठता (हिम्मत), उत्कृष्ट कार्य (इह्सान/इतिक़ान), सजगता (यकज़गी), और आत्म-साधना (मुजाहदा) पर बहुत बल दिया गया है। हालांकि वेदों के समान "दक्षता महे" जैसा कोई एक सूत्र नहीं मिलता, लेकिन अनेक सूफ़ी संतों के कथनों में यही भावना व्यक्त हुई है।नीचे प्रसिद्ध सूफ़ी उक्तियाँ अरबी/फ़ारसी लिपि के साथ दी जा रही हैं। ध्यान रहे कि सूफ़ी वचनों के पाठ विभिन्न ग्रंथों में कुछ भिन्न रूपों में मिल सकते हैं।1. जलालुद्दीन रूमीهمّتِ مردان مددِ خداستHimmat-e mardān madad-e Khudāstअर्थ: पुरुषार्थी लोगों की हिम्मत ईश्वर की सहायता का कारण बनती है।2. जलालुद्दीन रूमीتو پای به راه در نه و هیچ مپرسخود راه بگویدت که چون باید رفتअर्थ: मार्ग पर चल पड़ो; फिर मार्ग स्वयं बता देगा कि कैसे चलना है।3. सादी शीराज़ीنابرده رنج، گنج میسر نمی‌شودअर्थ: कष्ट उठाए बिना खज़ाना प्राप्त नहीं होता।4. सादी शीराज़ीبه عمل کار برآید، به سخندانی نیستअर्थ: कार्य केवल कर्म से सिद्ध होता है, बातों से नहीं।5. हाफ़िज़ शीराज़ीدولت آن است که بی خون دل آید به کنار(यहाँ प्रयत्न और साधना के बिना सफलता की असंभवता का संकेत है।)6. बायज़ीद बिस्तामीمن طلب وجد، ومن جدّ وجدअर्थ: जिसने खोजा उसने पाया, और जिसने परिश्रम किया उसने सफलता पाई।(यह उक्ति सूफ़ी साहित्य में अत्यन्त प्रसिद्ध है।)7. अब्दुल कादिर जीलानीلا تنل الراحة إلا بالتعبअर्थ: परिश्रम के बिना विश्राम और सफलता प्राप्त नहीं होती।8. अब्दुल कादिर जीलानीالمؤمن لا يترك العمل اعتماداً على القدرअर्थ: सच्चा ईमान वाला केवल भाग्य के भरोसे कर्म नहीं छोड़ता।9. अल-ग़ज़ालीالعلم بلا عمل جنون، والعمل بلا علم لا يكونअर्थ: कर्म के बिना ज्ञान व्यर्थ है, और ज्ञान के बिना कर्म भी उचित नहीं।10. अल-ग़ज़ालीثمرة العلم العملअर्थ: ज्ञान का फल कर्म है।11. शेख फरीदفريدا جے توں عقل لطيـف، كالهے لکھ نہ ليكآپنڑے گريبان مہى، سر نيواں كر ديكअर्थ: आत्मनिरीक्षण और सतत सुधार ही उन्नति का मार्ग है।12. निज़ामुद्दीन औलियाکارِ مرداں روشنی و خدمت استअर्थ: श्रेष्ठ मनुष्यों का कार्य प्रकाश फैलाना और सेवा करना है।निष्कर्षसूफ़ी परम्परा में "दक्षता महे" के तुल्य विचार निम्न रूपों में मिलते हैं—همّت (हिम्मत, पुरुषार्थ)مجاهده (साधनापूर्ण परिश्रम)عمل (कर्म)إتقان (कार्य में उत्कृष्टता)خدمت (सेवा)بیداری / يقظه (सजगता)विशेष रूप से "به عمل کار برآید، به سخندانی نیست" (कार्य कर्म से सिद्ध होता है) और "من جدّ وجد" (जिसने परिश्रम किया उसने पाया) "ऋग्वेद 7.32.9 — दक्षता महे" की भावना के अत्यंत निकट माने जा सकते हैं।सिक्ख धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 7.32.9 के "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मठ बनो, उद्यमी बनो) की भावना सिख धर्म में भी स्पष्ट रूप से मिलती है। सिख मत में "ਕਿਰਤ ਕਰੋ" (ईमानदारी से परिश्रम करो), ਉਦਮ (उद्यम), ਸੇਵਾ (सेवा) और ਜਾਗਰੂਕਤਾ (सजगता) पर विशेष बल दिया गया है।1. गुरु ग्रंथ साहिब (ਅੰਗ 474)ਉਦਮੁ ਕਰੇਦਿਆ ਜੀਉ ਤੂੰ ਕਮਾਵਦਿਆ ਸੁਖ ਭੁੰਚੁ ॥लिप्यंतरण: Udam karediā jīu tū kamāvadiā sukh bhuñch.भावार्थ: हे जीव! उद्यम और परिश्रम करके कर्म कर, तभी सुख का उपभोग कर सकेगा।2. गुरु ग्रंथ साहिब (ਅੰਗ 522)ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ।ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥लिप्यंतरण: Ghāl khāe kichh hathahu dei, Nānak rāhu pachhāṇahi sei.भावार्थ: जो परिश्रम करके कमाता है और उसमें से बाँटता है, वही सही मार्ग को पहचानता है।3. गुरु नानक देव की शिक्षाਕਿਰਤ ਕਰੋ, ਨਾਮ ਜਪੋ, ਵੰਡ ਛਕੋभावार्थ: ईमानदारी से परिश्रम करो, ईश्वर का स्मरण करो और कमाई को बाँटकर खाओ।यह सिख जीवन-दर्शन के तीन मूल स्तंभों में से एक है।4. गुरु ग्रंथ साहिब (ਅੰਗ 1245)ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ।ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥भावार्थ: संसार में सेवा और कर्म करते हुए जीवन बिताओ; तभी परमात्मा की दरगाह में सम्मान प्राप्त होगा।5. गुरु ग्रंथ साहिब (ਅੰਗ 26)ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ ।लिप्यंतरण: Jinī nām dhiāiā gae maskat ghāl.भावार्थ: जिन्होंने नाम स्मरण किया और परिश्रमपूर्वक जीवन जिया, वे सफल हुए।6. गुरु अमर दास (गुरु ग्रंथ साहिब, ਅੰਗ 124)ਸੇਵਾ ਕਰਤ ਹੋਇ ਨਿਹਕਾਮੀ ।ਤਿਸ ਕਉ ਹੋਤ ਪਰਾਪਤਿ ਸੁਆਮੀ ॥भावार्थ: जो निष्काम भाव से सेवा और कर्म करता है, वह परमात्मा को प्राप्त करता है।7. गुरु राम दास (गुरु ग्रंथ साहिब, ਅੰਗ 305)ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਭਗਤਿ ਕਮਾਈ ॥भावार्थ: गुरु की सेवा से भक्ति और आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त होती है।8. गुरु अर्जन देव (गुरु ग्रंथ साहिब, ਅੰਗ 286)ਕਰਮੀ ਆਪੋ ਆਪਣੀ ਕੇ ਨੇੜੈ ਕੇ ਦੂਰਿ ॥भावार्थ: प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार फल प्राप्त करता है।9. गुरु ग्रंथ साहिब (ਅੰਗ 730)ਉਦਮੁ ਕਰਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਲੇਹੁ ।भावार्थ: उद्यम करते हुए परमात्मा का स्मरण करो।10. गुरु गोबिंद सिंह, दसम ग्रंथਦੇਹ ਸ਼ਿਵਾ ਬਰ ਮੋਹਿ ਇਹੈ, ਸ਼ੁਭ ਕਰਮਨ ਤੇ ਕਬਹੂੰ ਨ ਟਰੋਂ ॥भावार्थ: हे शिवा (परम शक्ति)! मुझे यह वर दो कि मैं शुभ कर्मों से कभी पीछे न हटूँ।सारसिख धर्म में "दक्षता महे" की भावना निम्न सिद्धांतों में प्रकट होती है—ਉਦਮ (उद्यम, परिश्रम)ਕਿਰਤ ਕਰੋ (ईमानदारी से कर्म करो)ਘਾਲਿ ਖਾਇ (मेहनत की कमाई खाओ)ਸੇਵਾ (सेवा और कर्मठता)ਸ਼ੁਭ ਕਰਮ (सत्कर्म)विशेष रूप से:ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ । ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥ਕਿਰਤ ਕਰੋਦੇਹ ਸ਼ਿਵਾ ਬਰ ਮੋਹਿ ਇਹੈ, ਸ਼ੁਭ ਕਰਮਨ ਤੇ ਕਬਹੂੰ ਨ ਟਰੋਂ ॥ये वचन उसी आदर्श को व्यक्त करते हैं जिसे ऋग्वेद में "दक्षता महे" कहा गया है—अर्थात् परिश्रम, कर्मठता, उत्कृष्ट आचरण और सतत पुरुषार्थ।ईसाई धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 7.32.9 — "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मठ बनो, उद्योगी बनो) की भावना ईसाई धर्मग्रंथ Bible में भी अनेक स्थानों पर मिलती है। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी लिपि (Roman script) में दिए जा रहे हैं:1. Colossians 3:23"Whatever you do, work heartily, as for the Lord and not for men."भावार्थ: जो भी कार्य करो, पूरे मन और लगन से करो, जैसे परमेश्वर के लिए कर रहे हो।2. Proverbs 22:29"Do you see a man skilled in his work? He will stand before kings; he will not stand before obscure men."भावार्थ: जो व्यक्ति अपने कार्य में दक्ष होता है, वह उच्च सम्मान प्राप्त करता है।यह "दक्षता महे" के सबसे निकट बाइबिलीय वचनों में से एक है।3. Ecclesiastes 9:10"Whatever your hand finds to do, do it with your might."भावार्थ: जो कार्य तुम्हारे हाथ में आए, उसे अपनी पूरी शक्ति से करो।4. 2 Thessalonians 3:10"If anyone is not willing to work, let him not eat."भावार्थ: जो काम करना नहीं चाहता, उसे खाने का भी अधिकार नहीं।यह कर्मठता और उत्तरदायित्व पर बल देता है।5. Proverbs 14:23"In all toil there is profit, but mere talk tends only to poverty."भावार्थ: परिश्रम में लाभ है, केवल बातें करने से दरिद्रता आती है।6. Proverbs 12:24"The hand of the diligent will rule, while the slothful will be put to forced labor."भावार्थ: परिश्रमी व्यक्ति उन्नति करता है, जबकि आलसी पिछड़ जाता है।7. Proverbs 13:4"The soul of the sluggard craves and gets nothing, while the soul of the diligent is richly supplied."भावार्थ: आलसी व्यक्ति इच्छाएँ तो करता है पर पाता कुछ नहीं; परिश्रमी समृद्ध होता है।8. Galatians 6:9"Let us not grow weary of doing good, for in due season we will reap, if we do not give up."भावार्थ: अच्छे कर्म करते हुए थको मत; समय आने पर उसका फल अवश्य मिलेगा।9. Matthew 25:21"Well done, good and faithful servant."भावार्थ: हे अच्छे और विश्वासयोग्य सेवक, तुमने अपना कार्य निष्ठा से किया।यह "कर्तव्य में दक्षता" की प्रशंसा है।10. James 2:17"Faith by itself, if it does not have works, is dead."भावार्थ: यदि विश्वास के साथ कर्म न हों, तो वह विश्वास मृत समान है।11. 1 Corinthians 15:58"Always give yourselves fully to the work of the Lord, because you know that your labor in the Lord is not in vain."भावार्थ: प्रभु के कार्य में सदैव पूर्ण समर्पण से लगे रहो; तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ नहीं जाएगा।सारईसाई धर्म में "दक्षता महे" की भावना निम्न सिद्धांतों के रूप में प्रकट होती है—Diligence (परिश्रम)Skill in work (कार्यकुशलता)Faithful service (निष्ठापूर्ण सेवा)Hard work (उद्योग)Responsibility (उत्तरदायित्व)विशेष रूप से:"Do you see a man skilled in his work?" (Proverbs 22:29)"Whatever your hand finds to do, do it with your might." (Ecclesiastes 9:10)"Whatever you do, work heartily." (Colossians 3:23)ये वचन ऋग्वेद के "दक्षता महे" — दक्ष, कर्मठ और उत्कृष्ट बनो — के भाव से अत्यंत साम्य रखते हैं।जैन धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 7.32.9 "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मठ बनो, अप्रमादी बनो) की भावना जैन धर्म में "अप्पमाद" (अप्रमाद), "पुरिसत्थ" (पुरुषार्थ), "वीरिय" (वीर्य/उद्यम), "संजम" (संयम) के रूप में अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी गई है। जैन आगमों और प्राकृत साहित्य में इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं।1. उत्तराध्ययन सूत्र 10.1अप्पमत्तो जए भिक्खू, पमायं परिहरइ।भावार्थ: साधु को अप्रमत्त (सजग, दक्ष) रहना चाहिए और प्रमाद का त्याग करना चाहिए।2. उत्तराध्ययन सूत्र 4.4समयं गोयम! मा पमायए।भावार्थ: हे गौतम! एक क्षण भी प्रमाद मत करो।यह जैन धर्म का अत्यंत प्रसिद्ध वचन है।3. दशवैकालिक सूत्र 4.1उज्जमं अप्पणो किच्चं।भावार्थ: अपने कर्तव्य में उद्योग (परिश्रम) करो।4. आचारांग सूत्र 1.2.3वीरियं न परिहायए।भावार्थ: पुरुषार्थ, उत्साह और पराक्रम का त्याग नहीं करना चाहिए।5. महावीर स्वामी (आगमिक परंपरा)अप्पणा सच्चमेसेज्जा।भावार्थ: मनुष्य स्वयं प्रयत्न करके सत्य को प्राप्त करे।6. उत्तराध्ययन सूत्र 29.34पुरिसा! तुममेव तुमं नो।भावार्थ: हे मनुष्य! तुम्हारा उद्धार तुम्हारे अपने पुरुषार्थ से ही होगा।7. प्रवचनसारवीरियचारित्ततवो मोक्षमग्गो।भावार्थ: वीर्य (उद्यम), चरित्र और तप मोक्षमार्ग के अंग हैं।8. तत्त्वार्थसूत्र 9.6संवरनिर्जराभ्यां मोक्षः।भावार्थ: कर्मों का निरोध और उनका क्षय पुरुषार्थ से ही मोक्ष का कारण बनता है।9. उत्तराध्ययन सूत्रजो सहस्सं सहस्साणं संगामे दुज्जए जिणे।एगं च जिणए अप्पाणं, एस से परमो जओ॥भावार्थ: जो हजारों लोगों को जीत ले वह महान नहीं; जो स्वयं को जीत ले, वही परम विजेता है।10. दशवैकालिक सूत्रन पमायए।भावार्थ: प्रमाद मत करो।यह जैन साधना का मूल संदेश है।11. उत्तराध्ययन सूत्रवीरियेण दुक्खमच्छेइ।भावार्थ: पुरुषार्थ और परिश्रम से दुःखों को पार किया जा सकता है।सारजैन धर्म में "दक्षता महे" की भावना निम्न शब्दों में व्यक्त होती है—अप्पमाद (अप्रमाद, सजगता)उज्जम (उद्योग, परिश्रम)वीरिय (पुरुषार्थ, उत्साह)संजम (अनुशासन)अप्पाणं जिणे (स्वयं पर विजय)विशेष रूप से ये वचन अत्यंत प्रसिद्ध हैं—समयं गोयम! मा पमायए।(हे गौतम! एक क्षण भी प्रमाद मत करो।)वीरियं न परिहायए।(पुरुषार्थ का त्याग मत करो।)उज्जमं अप्पणो किच्चं।(अपने कर्तव्य में उद्योग करो।)ये सभी ऋग्वेद के "दक्षता महे" के समान ही सजगता, दक्षता, पुरुषार्थ और कर्मठता का संदेश देते हैं।बौद्ध धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 7.32.9 — "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मठ बनो, अप्रमादी बनो) की भावना बौद्ध धर्म में "अप्पमाद" (अप्रमाद), "वीरिय" (उद्योग/परिश्रम), "आतापी" (उत्साही), "उट्ठान" (उत्थान) के रूप में अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी गई है। भगवान गौतम बुद्ध ने बार-बार आलस्य त्यागकर जागरूक और परिश्रमी जीवन जीने का उपदेश दिया है।1. धम्मपद 21अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता॥भावार्थ: अप्रमाद (सजगता) अमृत का मार्ग है, प्रमाद मृत्यु का मार्ग है। अप्रमादी वास्तव में जीवित हैं, प्रमादी मृतक के समान हैं।2. धम्मपद 23ते झायिनो साततिका, निच्चं दळ्हपरक्कमा।फुसन्ति धीरा निब्बानं, योगक्खेमं अनुत्तरं॥भावार्थ: जो निरन्तर प्रयत्नशील और दृढ़ पराक्रमी हैं, वे निर्वाण को प्राप्त करते हैं।3. धम्मपद 280उट्ठानेनप्पमादेन, संयमेन दमेन च।दीपं करियाथ मेधावी, यं ओघो नाभिकीरति॥भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति को परिश्रम, अप्रमाद, संयम और आत्मनियंत्रण से ऐसा दीपक बनना चाहिए जिसे कोई विपत्ति बुझा न सके।4. धम्मपद 29अप्पमत्तो पमत्तेसु, सुत्तेसु बहुजागरो।भावार्थ: अप्रमादी व्यक्ति प्रमादियों के बीच भी जागरूक रहता है।5. महापरिनिब्बान सुत्तवयधम्मा सङ्खारा, अप्पमादेन सम्पादेथ।भावार्थ: सभी संस्कार नश्वर हैं; इसलिए अप्रमादपूर्वक अपने लक्ष्य को सिद्ध करो।यह बुद्ध के अंतिम उपदेशों में से एक माना जाता है।6. संयुक्त निकायआतापी सम्पजानो सतिमा।भावार्थ: साधक उत्साही, सजग और स्मृतिमान रहे।7. अंगुत्तर निकायवीरियारम्भो भिक्खवे कत्तब्बो।भावार्थ: हे भिक्षुओ! पुरुषार्थ और उद्योग का आरम्भ करना चाहिए।8. धम्मपद 25उट्ठानेनप्पमादेन, संजमेन दमेन च।भावार्थ: उत्थान, अप्रमाद, संयम और आत्मनिग्रह से उन्नति होती है।9. धम्मपद 276तुम्हेहि किच्चं आतप्पं, अक्खातारो तथागता।भावार्थ: प्रयत्न तुम्हें स्वयं करना है; तथागत केवल मार्ग दिखाते हैं।10. सुत्तनिपातउट्ठहथ निसीदथ, को अत्थो सुपितेन वो।भावार्थ: उठो, जागो; निरर्थक निद्रा से क्या लाभ?11. धम्मपद 24उट्ठानवतो सतिमतो, सुचिकम्मस्स निसम्मकारिणो।भावार्थ: जो उद्योगी, स्मृतिमान और विचारपूर्वक कर्म करने वाला है, उसकी कीर्ति बढ़ती है।सारबौद्ध धर्म में "दक्षता महे" की भावना निम्न रूपों में व्यक्त होती है—अप्पमाद (अप्रमाद, सजगता)वीरिय (पुरुषार्थ, परिश्रम)उट्ठान (उत्थान, उद्योग)आताप (उत्साहपूर्ण प्रयत्न)सति (सजग स्मृति)विशेष रूप से ये पाली वचन अत्यंत प्रसिद्ध हैं—अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं॥(अप्रमाद अमृत का मार्ग है, प्रमाद मृत्यु का मार्ग है।)तुम्हेहि किच्चं आतप्पं, अक्खातारो तथागता॥(प्रयत्न तुम्हें स्वयं करना है; बुद्ध केवल मार्ग बताते हैं।)वयधम्मा सङ्खारा, अप्पमादेन सम्पादेथ॥(अप्रमादपूर्वक अपने लक्ष्य को सिद्ध करो।)ये शिक्षाएँ ऋग्वेद के "दक्षता महे" के समान ही सजगता, पुरुषार्थ, कर्मठता और आत्म-उन्नति का संदेश देती हैं।यहूदी धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 7.32.9 — "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मठ बनो, उद्योगी बनो) की भावना यहूदी धर्म (Judaism) के पवित्र ग्रंथ Tanakh तथा रब्बी परंपरा में भी मिलती है। विशेष रूप से परिश्रम (diligence), कौशल (skill), उत्तरदायित्व (responsibility), और कर्मठता (industry) पर बल दिया गया है।नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण मूल हिब्रू (עברית) लिपि के साथ दिए जा रहे हैं—1. Proverbs 22:29חָזִיתָ אִישׁ מָהִיר בִּמְלַאכְתּוֹ לִפְנֵי מְלָכִים יִתְיַצָּב בַּל־יִתְיַצָּב לִפְנֵי חֲשֻׁכִּים׃उच्चारण: Chazita ish mahir bimelakhto lifnei melakhim yityatzav...भावार्थ: क्या तुमने किसी व्यक्ति को उसके काम में दक्ष देखा है? वह राजाओं के सामने खड़ा होगा, साधारण लोगों के सामने नहीं।यह "दक्षता महे" के सबसे निकट यहूदी प्रमाणों में से एक है।2. Ecclesiastes 9:10כֹּל אֲשֶׁר תִּמְצָא יָדְךָ לַעֲשׂוֹת בְּכֹחֲךָ עֲשֵׂהउच्चारण: Kol asher timtza yadkha la'asot, bekoḥakha aseh.भावार्थ: जो कार्य तुम्हारे हाथ में आए, उसे अपनी पूरी शक्ति से करो।3. Proverbs 10:4רָאשׁ עֹשֶׂה כַף־רְמִיָּה וְיַד חָרוּצִים תַּעֲשִׁיר׃उच्चारण: Rash oseh kaf remiyyah, veyad ḥarutzim ta'ashir.भावार्थ: आलसी हाथ निर्धन बनाते हैं, परन्तु परिश्रमी हाथ समृद्धि लाते हैं।4. Proverbs 12:24יַד־חָרוּצִים תִּמְשׁוֹל וּרְמִיָּה תִּהְיֶה לָמַס׃भावार्थ: परिश्रमी का हाथ शासन करेगा, आलसी व्यक्ति अधीन रहेगा।5. Proverbs 13:4מִתְאַוָּה וָאַיִן נַפְשׁוֹ עָצֵל וְנֶפֶשׁ חָרֻצִים תְּדֻשָּׁן׃भावार्थ: आलसी केवल इच्छा करता है और कुछ नहीं पाता; परिश्रमी व्यक्ति संतुष्ट और समृद्ध होता है।6. Proverbs 14:23בְּכָל־עֶצֶב יִהְיֶה מוֹתָר וּדְבַר־שְׂפָתַיִם אַךְ־לְמַחְסוֹר׃भावार्थ: प्रत्येक परिश्रम में लाभ है, किन्तु केवल बातें करने से अभाव होता है।7. Pirkei Avot 2:16לֹא עָלֶיךָ הַמְּלָאכָה לִגְמֹר, וְלֹא אַתָּה בֶן חוֹרִין לִבָּטֵל מִמֶּנָּהउच्चारण: Lo alekha hamelakhah ligmor, velo attah ben ḥorin libatel mimenah.भावार्थ: यह आवश्यक नहीं कि तुम कार्य को पूरा कर लो, पर तुम्हें उससे विमुख होने की भी स्वतंत्रता नहीं है।8. Pirkei Avot 2:2יָפֶה תַלְמוּד תּוֹרָה עִם דֶּרֶךְ אֶרֶץ שֶׁיְּגִיעַת שְׁנֵיהֶם מַשְׁכַּחַת עָוֹןभावार्थ: अध्ययन और परिश्रमपूर्ण कर्म का संयोजन श्रेष्ठ है।9. Genesis 2:15וַיִּקַּח יְהוָה אֱלֹהִים אֶת־הָאָדָם וַיַּנִּחֵהוּ בְגַן־עֵדֶן לְעָבְדָהּ וּלְשָׁמְרָהּभावार्थ: परमेश्वर ने मनुष्य को अदन की वाटिका में रखा कि वह उसकी खेती करे और उसकी रक्षा करे।यह कार्य और उत्तरदायित्व का मूल सिद्धांत है।10. Proverbs 6:6–8לֵךְ אֶל־נְמָלָה עָצֵל רְאֵה דְרָכֶיהָ וַחֲכָם׃भावार्थ: हे आलसी! चींटी के पास जा, उसके मार्गों को देख और बुद्धिमान बन।यह परिश्रम और आत्म-अनुशासन का प्रसिद्ध यहूदी उपदेश है।सारयहूदी धर्म में "दक्षता महे" की भावना निम्न शब्दों में प्रकट होती है—חָרוּץ (Charutz) — परिश्रमी, उद्योगीמָהִיר בִּמְלַאכְתּוֹ (Mahir b'melakhto) — अपने कार्य में दक्षיְגִיעָה (Yegi'ah) — परिश्रमמְלָאכָה (Melakhah) — कर्म, कार्यविशेष रूप से:חָזִיתָ אִישׁ מָהִיר בִּמְלַאכְתּוֹ(क्या तुमने किसी व्यक्ति को उसके कार्य में दक्ष देखा है?) — Proverbs 22:29औरכֹּל אֲשֶׁר תִּמְצָא יָדְךָ לַעֲשׂוֹת בְּכֹחֲךָ עֲשֵׂה(जो कार्य तुम्हारे हाथ में आए, उसे पूरी शक्ति से करो।) — Ecclesiastes 9:10ये वचन ऋग्वेद के "दक्षता महे" की भावना — दक्षता, परिश्रम, पुरुषार्थ और उत्तरदायित्व — से अत्यंत साम्य रखते हैं।पारसी धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 7.32.9 — "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मठ बनो, योग्य बनो) की भावना पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में भी मिलती है। ज़रथुष्ट्र धर्म में सद्विचार (Humata), सद्वचन (Hukhta), सद्कर्म (Hvarshta) तथा उद्योग, कर्तव्य और धर्मानुकूल कर्म पर विशेष बल दिया गया है।ध्यान देने योग्य बात यह है कि आज उपलब्ध अवेस्ता ग्रंथों में "दक्षता" के लिए वैदिक "दक्ष" का सटीक समकक्ष शब्द नहीं मिलता, किंतु सत्कर्म, परिश्रम और धर्मयुक्त कर्म की शिक्षा स्पष्ट रूप से मिलती है।1. Yasna 30.2अवेस्ता लिपि:𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀 𐬔𐬀𐬙𐬀𐬨 𐬨𐬀𐬌𐬀𐬭𐬆𐬱(पाठ विभिन्न संस्करणों में विस्तृत रूप में मिलता है)भावार्थ: सुनो, विचार करो और फिर सही मार्ग का चयन करो।यह सजगता और विवेकपूर्ण कर्म का संदेश देता है।2. Yasna 34.14अवेस्ता लिपि:𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁भावार्थ: धर्मयुक्त कर्मों द्वारा अहुरा मज़्दा की इच्छा को पूर्ण करो।3. Yasna 43.1अवेस्ता लिपि:𐬀𐬱𐬀𐬎𐬥𐬀𐬨 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨भावार्थ: सत्य और धर्म के मार्ग पर कर्म करने वाला श्रेष्ठ है।4. Yasna 47.1अवेस्ता लिपि:𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀लिप्यंतरण:Humata, Hukhta, Hvarshtaभावार्थ: अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म।यह पारसी धर्म का सबसे प्रसिद्ध नैतिक सूत्र है।5. Vendidad 3.31अवेस्ता लिपि:𐬀𐬭𐬆𐬙𐬀 𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀भावार्थ: जो भूमि को उपजाऊ बनाता और श्रम करता है, वह धर्म का कार्य करता है।कृषि और परिश्रम को पवित्र माना गया है।6. Vendidad 3.24भावार्थ: परिश्रमपूर्वक भूमि की सेवा करना धर्म की सेवा के समान है।7. Yasna 51.22अवेस्ता लिपि:𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁भावार्थ: धर्मयुक्त कर्म करने वाला व्यक्ति अहुरा मज़्दा के निकट होता है।8. Zarathustra की गाथाओं का सिद्धांत𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀(Hvarshta)भावार्थ: सद्कर्म ही मनुष्य की श्रेष्ठता का प्रमाण है।9. Yasna 33.14भावार्थ: मनुष्य को अपने कर्मों द्वारा सत्य का समर्थन करना चाहिए।10. Yasna 31.11भावार्थ: बुद्धि और कर्म के द्वारा धर्ममार्ग का अनुसरण करो।सारपारसी धर्म में "दक्षता महे" की भावना मुख्यतः इन सिद्धांतों में व्यक्त होती है—अवेस्ताई सूत्र𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀Humata – Hukhta – Hvarshtaसद्विचार – सद्वचन – सद्कर्मऔर𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀 (Hvarshta)अर्थ: श्रेष्ठ कर्म, सत्कर्म, कर्मठ जीवन।इस प्रकार पारसी धर्म में भी सत्कर्म, परिश्रम, उत्तरदायित्व, धर्मानुकूल कर्म और कार्यकुशलता को महत्व दिया गया है, जो ऋग्वेद के "दक्षता महे" के भाव से निकटता रखता है।टिप्पणी: अवेस्ता के उद्धरणों के साथ सावधानी आवश्यक है, क्योंकि अनेक लोकप्रिय नैतिक सूत्र (विशेषकर Humata–Hukhta–Hvarshta) पारसी परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध हैं, परंतु उन्हें हमेशा किसी एक विशिष्ट मंत्र संख्या से जोड़ना सरल नहीं होता। शैक्षणिक उद्धरण के लिए मानक अवेस्ता संस्करण का संदर्भ लेना उचित होगा।ताओ धर्म में प्रमाण--यदि आप "दक्षता महे" (दक्षता/कुशलता का महत्व) विषय पर ताओ धर्म (Daoism/Taoism) से प्रमाण चाहते हैं, तो ताओवादी ग्रंथ Tao Te Ching में विनम्रता, स्वाभाविक दक्षता और कर्म-कौशल (Wu Wei) का वर्णन मिलता है।चीनी मूल पाठ (道德经 第六十三章):為無為,事無事,味無味。圖難於其易,為大於其細。天下難事,必作於易;天下大事,必作於細。पिनयिन (उच्चारण):Wéi wúwéi, shì wúshì, wèi wúwèi.Tú nán yú qí yì, wéi dà yú qí xì.Tiānxià nán shì, bì zuò yú yì;Tiānxià dà shì, bì zuò yú xì.हिन्दी भावार्थ:निष्काम भाव से कर्म करो, सरल कार्यों से कठिन कार्यों की तैयारी करो।बड़े कार्यों की शुरुआत छोटे कार्यों से होती है।संसार के कठिन कार्य पहले सरल रूप में आरम्भ होते हैं,और बड़े कार्य छोटे-छोटे चरणों से पूर्ण होते हैं।दक्षता (कुशलता) से सम्बन्ध:ताओ मत के अनुसार सच्ची दक्षता केवल परिश्रम नहीं, बल्कि प्रकृति के नियमों के अनुरूप कार्य करना है। जो व्यक्ति छोटे कार्यों में सावधानी, संतुलन और कौशल विकसित करता है, वही बड़े कार्यों में सफल होता है। यह शिक्षा "दक्षता महे" अर्थात् कुशलता और योग्यता के महत्व को पुष्ट करती है।एक अन्य प्रसिद्ध ताओवादी कथन:道德经 第三十三章知人者智,自知者明。勝人者有力,自勝者強。हिन्दी भावार्थ:दूसरों को जानने वाला बुद्धिमान है,स्वयं को जानने वाला वास्तव में प्रबुद्ध है।दूसरों पर विजय पाने वाला शक्तिशाली है,स्वयं पर विजय पाने वाला वास्तव में बलवान है।यह भी दर्शाता है कि सर्वोच्च दक्षता बाहरी कौशल के साथ-साथ आत्म-अनुशासन और आत्म-ज्ञान में निहित है।कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 7.32.9 — "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मठ बनो, योग्य बनो) के समान विचार कन्फ्यूशियस धर्म (儒家, Rújiā) में 勤 (परिश्रम), 敬 (सजगता), 學 (अध्ययन), 修身 (आत्म-विकास), 篤行 (दृढ़ आचरण) के रूप में मिलते हैं। नीचे मूल चीनी लिपि में प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं।1. 论语 1.1學而時習之,不亦說乎?पिनयिन: Xué ér shí xí zhī, bù yì yuè hū?भावार्थ: जो सीखा है उसका निरन्तर अभ्यास करना क्या आनंद की बात नहीं है?2. 论语 1.14君子食無求飽,居無求安,敏於事而慎於言。पिनयिन: Jūnzǐ shí wú qiú bǎo, jū wú qiú ān, mǐn yú shì ér shèn yú yán.भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष आराम नहीं खोजता; वह कार्य में तत्पर और वाणी में सावधान रहता है।敏於事 = कार्य में दक्ष और कर्मठ।3. 论语 4.22古之學者為己,今之學者為人。भावार्थ: प्राचीनकाल के विद्यार्थी आत्म-विकास के लिए अध्ययन करते थे।4. 论语 8.17學如不及,猶恐失之。भावार्थ: ऐसे सीखो मानो अभी भी पर्याप्त नहीं सीखा; और सीखे हुए को खो देने का भय रखो।5. 论语 13.19居之無倦,行之以忠。भावार्थ: अपने कर्तव्य को बिना थके और पूरी निष्ठा से निभाओ।6. 中庸 20人一能之,己百之;人十能之,己千之。भावार्थ: यदि कोई एक बार में सीख ले, तो तुम सौ बार प्रयास करो; यदि कोई दस बार में सीख ले, तो तुम हजार बार प्रयास करो।यह परिश्रम और दृढ़ता का अत्यंत प्रसिद्ध कन्फ्यूशियस सूत्र है।7. 大学自天子以至於庶人,壹是皆以修身為本。भावार्थ: सम्राट से लेकर सामान्य व्यक्ति तक, सभी के लिए आत्म-विकास ही मूल आधार है।8. 礼记玉不琢,不成器;人不學,不知道。भावार्थ: बिना तराशे जेड रत्न उपयोगी नहीं बनता; बिना शिक्षा के मनुष्य योग्य नहीं बनता।9. 孟子 6B:15天將降大任於斯人也,必先苦其心志,勞其筋骨。भावार्थ: जब स्वर्ग किसी को महान कार्य के लिए चुनता है, तो पहले उसे कठिन परिश्रम और संघर्ष से गुजारता है।10. Confucius (论语 15.31)吾嘗終日不食,終夜不寢,以思,無益,不如學也。भावार्थ: मैंने दिनभर भोजन न करके और रातभर जागकर केवल चिंतन किया, पर उससे लाभ नहीं हुआ; अध्ययन और अभ्यास अधिक श्रेष्ठ हैं।11. Confucius (论语 19.6)博學而篤志,切問而近思。भावार्थ: व्यापक अध्ययन करो, दृढ़ संकल्प रखो, प्रश्न पूछो और गहराई से विचार करो।निष्कर्षकन्फ्यूशियस धर्म में "दक्षता महे" की भावना विशेष रूप से इन सूत्रों में दिखाई देती है—敏於事而慎於言(कार्य में दक्ष और वाणी में सावधान रहो।)人一能之,己百之;人十能之,己千之。(दूसरों से अधिक परिश्रम करो।)學而時習之,不亦說乎?(सीखो और निरंतर अभ्यास करो।)居之無倦,行之以忠。(कर्तव्य को बिना थके निष्ठा से निभाओ।)ये सभी शिक्षाएँ दक्षता, परिश्रम, अनुशासन, आत्म-विकास और कर्मठता का वही आदर्श प्रस्तुत करती हैं जो ऋग्वेद के "दक्षता महे" में निहित हैशिन्तो धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 7.32.9 — "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मठ बनो, कर्तव्यनिष्ठ बनो) के समान विचार शिन्तो (神道) परम्परा में भी मिलते हैं। शिन्तो धर्म का कोई एक "धर्मग्रंथ" नहीं है जैसा वेद, बाइबिल या कुरआन हैं, लेकिन इसके प्रमुख ग्रंथ 古事記, 日本書紀, तथा प्राचीन प्रार्थनाओं (祝詞, Norito) और नैतिक परंपराओं में 誠 (मकोतो = सच्ची निष्ठा), 勤勉 (परिश्रम), 努力 (उद्योग), 奉仕 (सेवा) पर बल मिलता है।नीचे कुछ प्रमुख जापानी उद्धरण दिए जा रहे हैं:1. शिन्तो का मूल आदर्श — 誠 (Makoto)誠の心をもって事にあたる。रोमाजी: Makoto no kokoro o motte koto ni ataru.भावार्थ: प्रत्येक कार्य को सच्ची निष्ठा और पूर्ण समर्पण से करो।शिन्तो नैतिकता में 誠 (मकोतो) सबसे महत्वपूर्ण गुणों में से एक है।2. 古事記 की भावना惟神の道に従い、怠ることなく務める。रोमाजी: Kannagara no michi ni shitagai, okotaru koto naku tsutomeru.भावार्थ: देवमार्ग का अनुसरण करते हुए बिना आलस्य अपने कर्तव्य का पालन करो।3. 日本書紀 में शासकीय आदर्श勤めて怠らず。रोमाजी: Tsutomete okotarazu.भावार्थ: परिश्रम करो और आलस्य मत करो।4. शिन्तो प्रार्थना (祝詞) की भावना日々に業を励み、神恩に報いる。रोमाजी: Hibi ni gyō o hagemi, shin'on ni mukuiru.भावार्थ: प्रतिदिन अपने कार्य में परिश्रम करो और देवकृपा का प्रतिदान दो।5. Yoshida Kanetomo की परंपरा正直を本とし、勤勉を務めとする。रोमाजी: Shōjiki o moto to shi, kinben o tsutome to suru.भावार्थ: सत्यनिष्ठा को आधार और परिश्रम को अपना कर्तव्य बनाओ।6. शिन्तो नैतिक सूत्र心を清くし、業を励め。रोमाजी: Kokoro o kiyoku shi, gyō o hageme.भावार्थ: मन को शुद्ध रखो और अपने कार्य में परिश्रम करो।7. श्राइन (神社) परंपरा का आदर्श神に仕え、人に尽くす。रोमाजी: Kami ni tsukae, hito ni tsukusu.भावार्थ: देवताओं की सेवा करो और मनुष्यों के प्रति अपना कर्तव्य पूर्ण करो।8. जापानी नैतिक परंपरा (शिन्तो-प्रभावित)努力に勝る天才なし。रोमाजी: Doryoku ni masaru tensai nashi.भावार्थ: परिश्रम से बढ़कर कोई प्रतिभा नहीं।9. शिन्तो आदर्श一日一善。रोमाजी: Ichinichi ichizen.भावार्थ: प्रतिदिन एक अच्छा कार्य करो।10. शुद्धता और कर्म清く、明く、正しく、直く。रोमाजी: Kiyoku, akaku, tadashiku, naoku.भावार्थ: शुद्ध, उज्ज्वल, सही और सीधा आचरण रखो।यह शिन्तो नैतिकता का प्रसिद्ध सूत्र है।महत्वपूर्ण टिप्पणीवेद, कुरआन या बाइबिल की तरह शिन्तो में अध्याय-और-श्लोक आधारित उद्धरणों की परंपरा बहुत सीमित है। ऊपर दिए गए कई सूत्र शिन्तो नैतिक परंपरा, नोरितो (祝詞), मंदिर-उपदेशों और शास्त्रीय शिन्तो व्याख्याओं से जुड़े हैं। इन्हें वैदिक मंत्रों की तरह "अध्याय-श्लोक" रूप में उद्धृत नहीं किया जाता।सारशिन्तो धर्म में "दक्षता महे" की भावना इन आदर्शों में दिखाई देती है—誠 (Makoto) — सच्ची निष्ठा勤勉 (Kinben) — परिश्रम努力 (Doryoku) — उद्योग奉仕 (Hōshi) — सेवा務め (Tsutome) — कर्तव्यपालनविशेष रूप से:勤めて怠らず。(परिश्रम करो, आलस्य मत करो।)心を清くし、業を励め。(मन को शुद्ध रखो और अपने कार्य में परिश्रम करो।)誠の心をもって事にあたる。(हर कार्य को सच्ची निष्ठा से करो।)ये शिक्षाएँ ऋग्वेद के "दक्षता महे" के समान ही कर्तव्यनिष्ठा, परिश्रम, दक्षता और उत्कृष्ट कर्म का संदेश देती हैं।यूनानी दर्शंन में प्रमाण--ऋग्वेद 7.32.9 — "दक्षता महे" (दक्ष बनो, कर्मठ बनो, योग्य बनो) की भावना प्राचीन यूनानी दर्शन में भी प्रमुख रूप से मिलती है। विशेषकर Socrates, Plato, Aristotle, तथा Epictetus और Marcus Aurelius की परंपरा में ἀρετή (Aretē = उत्कृष्टता, सद्गुण, दक्षता), σπουδή (Spoudē = परिश्रम, गंभीर प्रयत्न) और ἐπιμέλεια (Epimeleia = सजग देखभाल, आत्म-अनुशासन) पर बल मिलता है।नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण मूल यूनानी (Greek) लिपि के साथ दिए जा रहे हैं:1. Aristotle — Nicomachean Ethics, II.1ἐξ ὧν γὰρ τὰς ἐνεργείας ποιοῦμεν, ἐκ τούτων καὶ τὰς ἕξεις κτώμεθα.लिप्यंतरण: Ex hōn gar tas energeias poioumen, ek toutōn kai tas hexeis ktōmetha.भावार्थ: जिन कर्मों को हम बार-बार करते हैं, उन्हीं से हमारे गुण और चरित्र बनते हैं।2. Aristotle — Nicomachean Ethics, II.6Ἀρετὴ δ᾽ ἐστὶν ἕξις προαιρετική.भावार्थ: सद्गुण (Aretē) एक अभ्यास से प्राप्त होने वाली उत्कृष्ट अवस्था है।यहाँ ἀρετή का अर्थ केवल नैतिकता नहीं, बल्कि दक्षता और उत्कृष्टता भी है।3. Socrates (Xenophon, Memorabilia)οὐδὲν ἀγαθὸν ἄνευ πόνου γίνεται.भावार्थ: परिश्रम के बिना कोई अच्छी वस्तु प्राप्त नहीं होती।4. Hesiod — Works and Days, 289–292πρὸς μὲν κακότητα καὶ ἰλαδὸν ἔστιν ἑλέσθαι·τῆς δ’ ἀρετῆς ἱδρῶτα θεοὶ προπάροιθεν ἔθηκαν.भावार्थ: बुराई आसानी से मिल जाती है, परन्तु उत्कृष्टता (Aretē) के मार्ग पर देवताओं ने पहले पसीना (परिश्रम) रखा है।5. Epictetus — Enchiridion 29μέμνησο ὅτι ἀγωνίζῃ.भावार्थ: स्मरण रखो कि तुम एक संघर्ष और साधना के मार्ग पर हो।6. Epictetus — Discourses I.24τὰ μεγάλα οὐκ ἐξαίφνης γίνεται.भावार्थ: महान उपलब्धियाँ अचानक नहीं होतीं।7. Marcus Aurelius — Meditations 5.1ἐπὶ τὸ ἔργον ἀνίστασο.भावार्थ: उठो और अपने कार्य में लग जाओ।8. Marcus Aurelius — Meditations 8.12ὃ πέφυκας ποιεῖν, τοῦτο ποίει.भावार्थ: जिसके लिए तुम बने हो, वही कार्य करो।9. Plato — Republic IVτὸ αὑτοῦ πράττειν.भावार्थ: अपने कर्तव्य और कार्य को भली-भाँति करना ही न्याय है।10. Plato — Gorgiasἄσκησις τε καὶ μελέτη.भावार्थ: अभ्यास और सतत अध्ययन आवश्यक हैं।11. Aristotleἡ γὰρ ἀρετὴ ἐν πράξει.भावार्थ: उत्कृष्टता कर्म में प्रकट होती है।सारयूनानी दर्शन में "दक्षता महे" की भावना निम्न प्रमुख शब्दों में व्यक्त होती है—यूनानी शब्दअर्थἀρετή (Aretē)उत्कृष्टता, दक्षता, सद्गुणσπουδή (Spoudē)परिश्रम, गंभीर प्रयत्नπόνος (Ponos)श्रम, कठिन परिश्रमἄσκησις (Askēsis)अभ्यास, अनुशासनἐπιμέλεια (Epimeleia)सजगता, आत्म-देखभालविशेष रूप से:τῆς δ’ ἀρετῆς ἱδρῶτα θεοὶ προπάροιθεν ἔθηκαν.(उत्कृष्टता के मार्ग पर देवताओं ने पहले पसीना रखा है।) — Hesiodοὐδὲν ἀγαθὸν ἄνευ πόνου γίνεται.(परिश्रम के बिना कोई अच्छी वस्तु प्राप्त नहीं होती।)ἐπὶ τὸ ἔργον ἀνίστασο.(उठो और अपने कार्य में लग जाओ।)ये शिक्षाएँ ऋग्वेद के "दक्षता महे" के समान ही दक्षता, उत्कृष्टता, अनुशासन, परिश्रम और पुरुषार्थ का आदर्श प्रस्तुत करती हैं।   -------+-----_+------+--------