हीर-रांझा: द मॉडर्न थ्रिलर - 7 Shaziya Khan द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

हीर-रांझा: द मॉडर्न थ्रिलर - 7

एपिसोड 7: आख़िरी धुन और भागने की तैयारी




मोहब्बत जब इम्तिहान मांगती है, तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं... हौसले अगर बुलंद हों, तो तूफ़ान भी रास्ता बदल लेते हैं।"

— समीर ख़ान

कैदो के जाने के बाद हीर ने एक पल भी बर्बाद नहीं किया। वह अपनी गाड़ी में बैठी और जितनी तेज़ी से गाड़ी चला सकती थी, चलाते हुए रहमान के अपार्टमेंट की तरफ भागी। रास्ते भर कैदो की वो खौफनाक धमकियाँ उसके कानों में गूँज रही थीं। उसे अपने पिता की लाचारी और रहमान की जान का डर, दोनों एक साथ सता रहे थे। लेकिन वह हीर थी, जो मुश्किलों के आगे घुटने टेकना नहीं जानती थी।



जब वह रहमान के कमरे में पहुँचे, तो दरवाज़ा खुलते ही वह सीधे रहमान के सीने से जा लगी। उसकी आँखों में आँसू थे, जो उसके गुस्से और डर का मिला-जुला रूप थे। रहमान ने उसे संभाला और सोफे पर बिठाया। काशिफ भी वहीं बैठा लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। हीर की हालत देखकर दोनों समझ गए कि पानी अब सिर से ऊपर गुज़र चुका है। हीर ने बिना कुछ छुपाए, कैदो के निकाह वाले कॉन्ट्रैक्ट, पिता की बर्बादी और रहमान को जान से मारने की धमकी वाली पूरी कहानी कह सुनाई।



यह सुनते ही रहमान का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने अपने गिटार को एक तरफ रखा, जो अब तक उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सहारा था। "हीर... मैं जानता था कि वह कोई न कोई बड़ी चाल ज़रूर चलेगा। लेकिन वह इस हद तक गिर जाएगा, मैंने नहीं सोचा था। तुम्हारी खातिर, तुम्हारे पिता की इज़्ज़त की खातिर मैं अपनी जान भी दे दूँगा। तुम मुझसे दूर हो जाओ हीर, मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से तुम्हारा हंसता-खेलता परिवार तबाह हो जाए," रहमान ने बेहद टूटती हुई आवाज़ में कहा।



"चुप रहो रहमान!" हीर ने चिल्लाकर उसका हाथ पकड़ लिया। "तुमने क्या सोचा कि मैं उस दरिंदे के सामने घुटने टेक दूँगी? कभी नहीं। मोहब्बत की है तुमसे, और आख़िरी सांस तक इस मोहब्बत को निभाऊँगी। अगर मरना भी पड़ा, तो हम साथ मरेंगे, लेकिन मैं उस कैदो की जीत का जश्न कभी नहीं बनने दूँगी।" हीर की इस बेबाकी और जज़्बे को देखकर रहमान की आँखों में भी एक नई हिम्मत जाग उठी।



तभी काशिफ, जो अब तक खामोशी से सब सुन रहा था, अपनी कुर्सी से खड़ा हुआ। उसने अपना लैपटॉप बंद किया और टेबल पर आकर बैठ गया। उसने अपनी जैकेट की अंदरूनी जेब से एक लिफाफा निकाला और उसे सीधे टेबल पर रख दिया। जब हीर ने उस लिफाफे को खोला, तो उसके अंदर दो नए पासपोर्ट और यूरोप की वन-वे फ्लाइट टिकट्स थीं। उन पासपोर्ट्स पर रहमान और हीर की तस्वीरें थीं, लेकिन नाम बदले हुए थे।



काशिफ ने बेहद गंभीर और नपे-तुले लहज़े में कहा, "वक्त आ गया है मेरे भाई। कैदो कोई मामूली विलेन नहीं है। उसके पास पैसा, पावर और शूटरों की पूरी फौज है। यहाँ शिकागो में रहकर तुम उसका मुकाबला कानूनी तौर पर नहीं जीत सकते, क्योंकि कानून की आँखों में धूल झोंकना उसे अच्छे से आता है। निकाह के दिन से ठीक एक रात पहले, यानी कल रात, जब कैदो के लोग तैयारियों में व्यस्त होंगे और पूरा शहर सो रहा होगा, मैं अपनी बुलेटप्रूफ गाड़ी से तुम दोनों को यहाँ से निकालूँगा। हम सीधे न्यू यॉर्क के एक प्राइवेट एयरफील्ड पर जाएंगे, जहाँ मेरे कुछ बेहद भरोसेमंद दोस्त हैं। वहाँ से तुम दोनों इस मुल्क को छोड़कर हमेशा के लिए दूर चले जाओगे, जहाँ कैदो का साया भी तुम तक नहीं पहुँच पाएगा।"



हीर ने उन टिकट्स को देखा और फिर काशिफ की तरफ मुड़ी। "काशिफ... तुम्हारा यह अहसान मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगी। लेकिन मैं कैदो को बिना कोई सज़ा दिए, एक भगोड़े की तरह यहाँ से नहीं जाना चाहती। उसने मेरे पापा को धोखा दिया है, उनके बिज़नेस को धोखे से हड़पा है। मैं उसे ऐसे ही जीतने नहीं दे सकती।"



काशिफ ने मुस्कुराते हुए हीर के सर पर हाथ रखा। "हीर, मैं तुम्हें भागने के लिए नहीं कह रहा। मैं तो बस तुम दोनों के लिए एक सुरक्षित रास्ता बना रहा हूँ। तुम अपनी चाल चलो, कैदो को बेनकाब करो। लेकिन जैसे ही तुम्हारा वार मुकम्मल हो, तुम्हें तुरंत यहाँ से निकलना होगा। क्योंकि घायल सांप सबसे ज़्यादा ज़हरीला होता है। कल रात ठीक 12 बजे, मेरी गाड़ी इस अपार्टमेंट के पिछले गेट पर खड़ी मिलेगी। अपनी तैयारी पूरी रखना।"



शाम की नमाज़ का वक्त हो चुका था। खिड़की से आती ठंडी हवाओं के बीच रहमान ने अपना गिटार उठाया। उसने तारों पर अपनी उंगलियाँ फेरीं। यह एक ऐसी धुन थी जिसमें बिछड़ने का डर नहीं, बल्कि आने वाले कल की चुनौती और अपने प्यार को पा लेने का एक अटूट विश्वास था। हीर ने रहमान की आँखों में देखा और दोनों समझ गए कि कल की रात उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा और आख़िरी इम्तिहान होने वाली है। (जारी है )

लेखक _समीर खान