ऋग्वेद सूक्ति (१) की व्याख्या "न स सखा यो न ददाति सख्ये"ऋग्वेद --10/117/4भावार्थ -- ,वह मित्र नहीँ है जो सहायता न करें।पूरा मंत्र अर्थ सहितआपने जो पंक्ति उद्धृत की है — “न स सखा यो न ददाति सख्ये” — यह वास्तव में ऋग्वेद 10.117.4 का अंश है।पूरा मंत्र इस प्रकार है:न स सखा यो न ददाति सख्येसचाभुवे सचमानाय पित्वः।अपास्मात् प्रेयान्न तदोकः अस्तिपृणन्तमन्यमरणं चिदिच्छेत्॥— ऋग्वेद 10.117.4पदच्छेद एवं भावार्थन सः सखा — वह मित्र नहीं है।यः न ददाति सख्ये — जो मित्रता में (आवश्यक समय पर) कुछ नहीं देता।सचाभुवे सचमानाय पित्वः — अपने साथ रहने वाले, सहयोगी अथवा याचक मित्र को अन्न-पानी नहीं देता।अपास्मात् प्रेयान् — ऐसे व्यक्ति से दूर चले जाना चाहिए।न तत् ओकः अस्ति — वह घर (या संगति) रहने योग्य नहीं है।पृणन्तम् अन्यम् अरणं चित् इच्छेत् — उदार और सहायता करने वाले किसी दूसरे व्यक्ति का आश्रय लेना चाहिए।सरल हिन्दी भावार्थ“जो व्यक्ति मित्रता के नाते अपने मित्र या आवश्यकता वाले साथी की सहायता नहीं करता, वह सच्चा मित्र नहीं है। ऐसे व्यक्ति का घर या संग उचित नहीं; उससे दूर होकर किसी उदार, सहायता करने वाले व्यक्ति का आश्रय लेना चाहिए।”यह सूक्त (ऋग्वेद 10.117) मुख्यतः दान, उदारता, अतिथि-सत्कार और सामाजिक सहयोग की महिमा का वर्णन करता है। इसमें कहा गया है कि धन और अन्न का उपयोग केवल अपने लिए नहीं, बल्कि ज़रूरतमंदों की सहायता के लिए भी होना चाहिए।वेदों में प्रमाण-- उद्धृत मंत्र ऋग्वेद 10.117.4 स्वयं ही मित्रता और सहायता का प्रमाण है। इसके साथ वेदों में मित्रता, सहयोग और परस्पर हित की भावना पर कई अन्य मंत्र भी मिलते हैं:ऋग्वेद 10.191.2संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।भावार्थ: साथ चलो, साथ विचार करो और अपने मनों को एक बनाओ।ऋग्वेद 10.191.4समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।भावार्थ: तुम्हारे संकल्प और हृदय समान हों, जिससे परस्पर एकता बनी रहे।अथर्ववेद 3.30.1सहृदयं साममनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः।भावार्थ: मैं तुम्हें एक हृदय वाला, एक मन वाला और द्वेष रहित बनाता हूँ।यजुर्वेद 36.18मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।भावार्थ: सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखो।ऋग्वेद 10.117.5पृणीयादिन्नाधमानाय तव्यन्।भावार्थ: याचक और जरूरतमंद की सहायता करनी चाहिए; उदारता ही श्रेष्ठ मार्ग है।इन मंत्रों से स्पष्ट होता है कि वेद केवल मित्रता की बात नहीं करते, बल्कि सहयोग, दान, परोपकार, एकता और संकट में सहायता को धर्म का अंग मानते हैं।विशेष रूप से आपका उद्धरण:"न स सखा यो न ददाति सख्ये"(ऋग्वेद 10.117.4)वेदों में यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण है कि जो आवश्यकता पड़ने पर सहायता नहीं करता, वह सच्चा मित्र नहीं कहलाता।उपनिषदों में प्रमाण--उपनिषदों में "मित्र संकट में सहायता करे" इस वाक्य का ठीक वही रूप नहीं मिलता जैसा ऋग्वेद 10.117.4 में है, क्योंकि उपनिषदों का मुख्य विषय आत्मविद्या और ब्रह्मविद्या है। फिर भी, उपनिषद परस्पर सद्भाव, सेवा, सह-अध्ययन और कल्याण की भावना पर बल देते हैं।1. तैत्तिरीय उपनिषद् 1.11.2श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया अदेयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्॥अर्थ: श्रद्धा से दान दो; सम्मान, विनय और सद्भावना के साथ दान दो।यह मंत्र आवश्यकता पड़ने पर दूसरों की सहायता और उदारता का उपदेश देता है।2. तैत्तिरीय उपनिषद् 1.11.3मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव॥अर्थ: माता, पिता, आचार्य और अतिथि का देवतुल्य सम्मान करो।यह सामाजिक उत्तरदायित्व और सेवा की भावना को प्रकट करता है।3. शान्ति मन्त्र (तैत्तिरीय, कठ, श्वेताश्वतर आदि उपनिषदों में)सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।अर्थ: हम दोनों की रक्षा हो, हम दोनों साथ मिलकर फल भोगें, और साथ मिलकर पराक्रम करें।यह परस्पर सहयोग और साथ निभाने की भावना का उत्कृष्ट उदाहरण है।4. ईशावास्य उपनिषद् -1तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥अर्थ: त्याग की भावना से जीवन बिताओ और लोभ मत करो।त्याग और उदारता से ही दूसरों की सहायता संभव होती है।5. बृहदारण्यक उपनिषद् 5.2.3दत्त, दयध्वम्, दम्यत।अर्थ: दान करो, दया करो और आत्मसंयम रखो।यह उपनिषदों का अत्यंत प्रसिद्ध उपदेश है, जो परोपकार और सहायताभाव का आधार प्रस्तुत करता है।निष्कर्ष:यदि "मित्र की सहायता" के विषय में प्रत्यक्ष वैदिक प्रमाण चाहिए तो ऋग्वेद 10.117.4 सर्वोत्तम है। उपनिषदों में उसके निकटतम सिद्धांत दान (दत्त), दया (दयध्वम्), सहकार (सह नाववतु), और उदारता (श्रद्धया देयम्) के रूप में मिलते हैं। ये सभी इस विचार का समर्थन करते हैं कि सच्चे संबंधों में परस्पर सहायता और कल्याण आवश्यक है।पुराणों में प्रमाण --“न स सखा यो न ददाति सख्ये” (जो मित्रता में सहायता न करे, वह सच्चा मित्र नहीं) — इस भाव के निकट विभिन्न पुराणों से कुछ प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं। जहाँ संभव है, स्कन्ध/अध्याय/श्लोक संख्या दी गई है।1. श्रीमद्भागवत महापुराणतितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्वदेहिनाम् ।अजातशत्रवः शान्ताः साधवः साधुभूषणाः ॥अर्थ: साधु पुरुष सब प्राणियों के सुहृद (हितैषी मित्र) होते हैं। 2. श्रीमद्भागवत महापुराणश्रीकृष्ण द्वारा सुदामा का आदर और सहायता मित्रधर्म का सर्वोच्च उदाहरण माना गया है। भगवान अपने निर्धन मित्र को नहीं भूलते। यह प्रसंग सच्ची मित्रता का पुराणोक्त आदर्श है। 3. विष्णु पुराणसुहृदां सर्वभूतानाम्अर्थ: श्रेष्ठ पुरुष सभी प्राणियों के हितैषी होते हैं। मित्रता का आधार सार्वभौमिक हित है।4. पद्म पुराणपरोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।अर्थ: दूसरों का उपकार पुण्य है और दूसरों को कष्ट देना पाप है।सच्चा मित्र उपकार करता है, पीड़ा नहीं देता।5. नारद पुराणसाधवः सर्वभूतानां हिते रताः।अर्थ: सज्जन लोग सबके हित में लगे रहते हैं।मित्रता का मूल तत्व हितचिन्तन है।6. स्कन्द पुराणनोपकारसमं पुण्यं नापकारसमं पापम्।अर्थ: उपकार के समान कोई पुण्य नहीं और अपकार के समान कोई पाप नहीं।यह मित्रधर्म के मूल सिद्धान्त को व्यक्त करता है।7. गरुड़ पुराणआत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।अर्थ: जो दूसरों को अपने समान समझता है, वही सच्चा ज्ञानी है।ऐसा व्यक्ति ही सच्चा मित्र बन सकता है।विशेष टिप्पणीपुराणों में मित्र-लक्षण पर उतने प्रत्यक्ष श्लोक नहीं हैं जितने भर्तृहरि नीतिशतक, हितोपदेश, पंचतन्त्र या महाभारत की विदुरनीति में मिलते हैं। पुराणों में यह शिक्षा मुख्यतः सुहृदता (हितैषिता), परोपकार, दया और सर्वभूत-हित के रूप में व्यक्त की गई है।भगवद्गीता में प्रमाण --आपके द्वारा उद्धृत भाव “सच्चा मित्र वही है जो संकट में साथ दे” का यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता का श्लोक नहीं है। इसलिए इसका कोई प्रत्यक्ष गीता-अध्याय/श्लोक संख्या देना सही नहीं होगा।हाँ, गीता में मित्रता, हितैषिता और सबके प्रति समभाव का भाव मिलता है। उदाहरण के लिए:सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥— श्रीमद्भगवद्गीता 6.9अर्थ: जो व्यक्ति सुहृद (हितैषी), मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष करने वाले, बन्धु, साधु और पापी—सभी के प्रति समभाव रखता है, वह श्रेष्ठ है।एक अन्य श्लोक:अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।— श्रीमद्भगवद्गीता 12.13अर्थ: जो सभी प्राणियों से द्वेषरहित, मैत्रीभाव रखने वाला और करुणामय है, वह भगवान को प्रिय है।इस प्रकार, गीता में मैत्री (मित्रता), सुहृदता (हितैषिता) और संकट में धर्मपूर्वक साथ देने की भावना का समर्थन मिलता है, लेकिन “न स सखा यो न ददाति सख्ये...” वाला श्लोक गीता का नहींयदि आप गीता में सच्चे मित्र, हितैषी और दूसरों के कल्याण के विषय में प्रमाण चाहते हैं, तो ये श्लोक भी महत्वपूर्ण हैं:1. भगवान सब प्राणियों के सुहृद (हितैषी) हैंभोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥— श्रीमद्भगवद्गीता 5.29अर्थ: मुझे समस्त प्राणियों का सुहृद (निःस्वार्थ हित करने वाला मित्र) जानकर मनुष्य शान्ति प्राप्त करता है।2. मैत्री और करुणा का गुणअद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥— गीता 12.13अर्थ: जो सब प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव और करुणा रखता है, वह श्रेष्ठ भक्त है।3. लोकसंग्रह (लोककल्याण) का भावयद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥— गीता 3.21अर्थ: श्रेष्ठ पुरुष जो आचरण करता है, दूसरे लोग उसका अनुसरण करते हैं। इसलिए उसका आचरण लोकहितकारी होना चाहिए।4. सबके हित में लगे रहनालबन्ते ब्रह्मनिर्वाणम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः।छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥— गीता 5.25अर्थ: जो सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे परम शान्ति को प्राप्त होते हैं।5. अपना उद्धार स्वयं करेंउद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥— गीता 6.5अर्थ: मनुष्य स्वयं अपना मित्र भी है और स्वयं अपना शत्रु भी।इन श्लोकों से स्पष्ट है कि गीता मैत्री, करुणा, हितैषिता, लोककल्याण और संकट में धर्मपूर्ण सहयोग की भावना का समर्थन करती है। हालांकि “न स सखा यो न ददाति सख्ये” जैसी पंक्ति शब्दशः गीता में नहीं है।है।महाभारत में प्रमाण ---“सच्चे मित्र के लक्षण”—उस पर महाभारत में विशेष रूप से विदुरनीति (उद्योगपर्व) में अनेक उपदेश मिलते हैं। ध्यान रहे कि महाभारत के विभिन्न संस्करणों (गीता प्रेस, भांडारकर क्रिटिकल एडिशन, दक्षिण भारतीय पाठ आदि) में श्लोक संख्या में अंतर हो सकता है।महाभारत में मित्र के बारे में कुछ प्रसिद्ध प्रमाण:1. मित्र की पहचानयो मित्राणि करोत्यत्र न कौटिल्येन वर्तते।स मित्रलाभं लभते न चानर्थेन युज्यते॥महाभारत, उद्योगपर्व, विदुरनीति भावार्थ: जो व्यक्ति कपट के बिना मित्रता करता है, वही सच्चा मित्र प्राप्त करता है।2. संकट में साथ देने वाला ही मित्रआपत्सु मित्रं जानीयात्...महाभारत, उद्योगपर्व (विदुरनीति) भावार्थ: मित्र की परीक्षा संकट के समय होती है।3. हित की बात कहने वाला मित्रयः प्रियाण्याह हितानि च।विदुरनीति, उद्योगपर्व भावार्थ: जो प्रिय भी बोले और हितकर भी बोले, वही सच्चा मित्र है।4. मित्र का परित्याग न करनान मित्रं परित्यजेत्...उद्योगपर्व, विदुरनीति भावार्थ: विपत्ति में मित्र का त्याग नहीं करना चाहिए।5. मित्र के दोष को ढँकनादोषान् गुहति मित्रस्य...विदुरनीति भावार्थ: मित्र के दोषों का प्रचार नहीं करता, बल्कि उसके हित का विचार करता है।6. विश्वास ही मित्रता का आधारविश्वासो मित्रकारणम्।महाभारत, उद्योगपर्व भावार्थ: विश्वास मित्रता की जड़ है।7. मित्र का कल्याण चाहनासर्वथा सुहृदां कार्यं हितमेव समाचरेत्।उद्योगपर्व, विदुरनीति भावार्थ: सच्चा मित्र सदैव अपने मित्र के हित का आचरण करता है।वाल्मीकि रामायण में प्रमाण --“न स सखा यो न ददाति सख्ये” (जो मित्र के काम न आए वह मित्र नहीं) के भाव पर वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण से श्लोक माँगे हैं।ध्यान दें: यह पंक्ति रामायण का श्लोक नहीं है। इसलिए रामायण में हमें समान भाव वाले श्लोक देखने होंगे।वाल्मीकि रामायण – श्रीराम और सुग्रीव की मैत्रीकिष्किन्धाकाण्ड 5.17रोचते यदि मे सख्यं बाहुरेषः प्रसारितः ।गृह्यतां पाणिना पाणिर्मर्यादा बध्यतां ध्रुवा ॥भावार्थ: यदि तुम्हें मेरी मित्रता स्वीकार हो, तो मेरा यह हाथ बढ़ा हुआ है; हाथ में हाथ देकर स्थायी मित्रता स्थापित करो। किष्किन्धाकाण्ड 5.18ततोऽग्निं दीप्यमानं तु चक्रतुश्च प्रदक्षिणम् ।सुग्रीवो राघवश्चैव वयस्यत्वमुपागतौ ॥भावार्थ: फिर सुग्रीव और श्रीराम ने अग्नि की परिक्रमा करके मित्रता का बंधन स्वीकार किया। मित्र के लिए उपकार का धर्मकिष्किन्धाकाण्ड (राम का सुग्रीव को आश्वासन)उपकारफलं मित्रम् अपकारोऽरिलक्षणम् ।भावार्थ: उपकार करना मित्र का लक्षण है और अपकार करना शत्रु का लक्षण है।यह राम–सुग्रीव मैत्री के मूल सिद्धांत के रूप में उद्धृत किया जाता है। हनुमान के प्रति श्रीराम का विश्वासकिष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 3नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः ।नासामवेदविदुषः शक्यमेवं प्रभाषितुम् ॥भावार्थ: जो ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का ज्ञाता न हो, वह इस प्रकार सुन्दर और हितकारी वचन नहीं बोल सकता।यहाँ श्रीराम हनुमान के गुणों की प्रशंसा कर रहे हैं, जो आगे चलकर आदर्श मित्र और सेवक सिद्ध होते हैं। स्मृतियों में प्रमाण --“सच्चा मित्र वही है जो हित करे, संकट में साथ दे, और अहित न करे” — उसके लिए स्मृतियों में कुछ प्रसिद्ध श्लोक मिलते हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण बात:मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, नारदस्मृति आदि में “मित्र-लक्षण” पर बहुत कम श्लोक सीधे मिलते हैं। अधिकतर प्रसिद्ध उद्धरण नीति-ग्रंथों (हितोपदेश, चाणक्यनीति, महाभारत-विदुरनीति) से हैं। फिर भी स्मृति-साहित्य में मैत्री, सुहृदता और हितैषिता के कुछ प्रमाण इस प्रकार उद्धृत किए जाते हैं:1. मनुस्मृति 4.138सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥भावार्थ: मित्र या किसी के साथ ऐसा व्यवहार हो जो सत्य भी हो और हितकारी भी।2. मनुस्मृति 6.75अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत्।भावार्थ: सब प्राणियों को अभय देना और उनका अहित न करना श्रेष्ठ आचरण है।3. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122दानं दमः दया शान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम्।भावार्थ: दया, शान्ति और उदारता धर्म के साधन हैं; यही मित्रता का आधार भी हैं। 4. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.132अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।भावार्थ: अहिंसा और सत्य का पालन करने वाला ही सच्चा सुहृद हो सकता है। 5. पराशर स्मृति (आचारकाण्ड)परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।भावार्थ: दूसरों का उपकार पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप है।6. वशिष्ठ स्मृति 30.1 (प्रसिद्ध उद्धरण)आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।भावार्थ: जो दूसरों को अपने समान समझता है, वही सच्चा ज्ञानी और हितैषी है।7. विष्णु स्मृति (अध्याय 2)दया सर्वभूतेषु।भावार्थ: सभी प्राणियों पर दया करना धर्म है; यही मैत्री का मूल है।निष्कर्षस्मृतियों में मित्रता का सिद्धांत मुख्यतः दया, परोपकार, सत्य, अहिंसा और सुहृदता के रूप में व्यक्त किया गया है। नीति ग्रन्थों में प्रमाण --“न स सखा यो न ददाति सख्ये” (जो मित्रता निभाए नहीं, वह मित्र नहीं) — इस भाव पर नीति-ग्रंथों में अनेक प्रमाण मिलते हैं। नीचे कुछ प्रसिद्ध श्लोक उनके ग्रंथ और उद्धरण सहित दिए जा रहे हैं।1. हितोपदेश, मित्रलाभ 1.14उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे शत्रुसङ्कटे।राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः॥अर्थ: उत्सव, विपत्ति, अकाल, शत्रु-संकट, राज-द्वार और श्मशान में जो साथ खड़ा रहे, वही सच्चा बन्धु (मित्र) है।2. हितोपदेश, मित्रलाभ 1.75परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।वर्जयेत् तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥अर्थ: जो सामने मीठा बोले और पीछे से हानि करे, ऐसे मित्र का त्याग करना चाहिए।3. पंचतन्त्र, मित्रभेदन विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति॥अर्थ: अविश्वसनीय पर विश्वास न करे, और विश्वसनीय पर भी अति-विश्वास न करे।4. चाणक्य नीति, अध्याय 2 श्लोक 6परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।वर्जयेत् तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥अर्थ: कपटी मित्र बाहर से दूध और भीतर से विष के समान है।5. चाणक्य नीति, अध्याय 4 श्लोक 17न कश्चित् कस्यचिन्मित्रं न कश्चित् कस्यचिद्रिपुः।व्यवहारेण जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा॥अर्थ: कोई जन्म से मित्र या शत्रु नहीं होता; व्यवहार से मित्रता और शत्रुता बनती है।6. भर्तृहरि नीति-शतक, श्लोक 75तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यत्।अर्थ: वही सच्चा मित्र है जो सुख और दुःख दोनों में समान रूप से साथ दे।7. भर्तृहरि नीति-शतक, श्लोक 73पापान्निवारयति योजयते हितायगुह्यं च गूहति गुणान् प्रकटीकरोति।आपद्गतं च न जहाति ददाति कालेसन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः॥अर्थ: सच्चा मित्र—पाप से रोकता है, हित में लगाता है,रहस्य छिपाता है,गुणों को प्रकट करता है,विपत्ति में साथ नहीं छोड़ता,और समय पर सहायता करता है। संतजन इसे सन्मित्र के लक्षण बताते हैं।सारइन नीति-ग्रंथों में सबसे प्रबल और प्रसिद्ध प्रमाण भर्तृहरि नीति-शतक (श्लोक 73) है, क्योंकि उसमें सच्चे मित्र के लक्षण सीधे बताए गए हैं:“आपद्गतं च न जहाति ददाति काले”(विपत्ति में साथ न छोड़े और समय पर सहायता करे।)यही भाव “न स सखा यो न ददाति सख्ये” से सबसे अधिक मेल खाता है।इस्लाम में प्रमाण -- “सच्चा मित्र, मददगार, हितैषी और संकट में साथ देने वाला” है, तो क़ुरआन में मित्रता के लिए प्रायः ولي (वली), نصير (मददगार), رفيق (साथी) जैसे शब्द आते हैं। यहाँ 7 प्रमाण दिए जा रहे हैं:1. नेक लोगों की संगतिوَاصْبِرْ نَفْسَكَ مَعَ الَّذِينَ يَدْعُونَ رَبَّهُم بِالْغَدَاةِ وَالْعَشِيِّ يُرِيدُونَ وَجْهَهُसूरह अल-कहफ़ 18:28अर्थ: अपने आपको उन लोगों के साथ रखो जो सुबह-शाम अपने रब को पुकारते हैं।2. मोमिन आपस में मित्र और सहायक हैंوَالْمُؤْمِنُونَ وَالْمُؤْمِنَاتُ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍसूरह अत-तौबा 9:71अर्थ: ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली स्त्रियाँ एक-दूसरे के सहायक (मित्र) हैं।3. नेकी और परहेज़गारी में सहयोगوَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَىसूरह अल-माइदा 5:2अर्थ: नेकी और धर्मपरायणता के कामों में एक-दूसरे की सहायता करो।4. अल्लाह नेक लोगों का मित्र हैاللَّهُ وَلِيُّ الَّذِينَ آمَنُواसूरह अल-बक़रह 2:257अर्थ: अल्लाह ईमान वालों का संरक्षक और मित्र है।5. सच्चे साथी का महत्वالْأَخِلَّاءُ يَوْمَئِذٍ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ إِلَّا الْمُتَّقِينَसूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ 43:67अर्थ: उस दिन (क़ियामत में) मित्र एक-दूसरे के शत्रु बन जाएंगे, सिवाय परहेज़गारों के।6. अल्लाह ही सबसे अच्छा सहायकوَاللَّهُ خَيْرُ الْوَلِيِّ وَهُوَ خَيْرُ النَّاصِرِينَसूरह आले इमरान 3:150अर्थ: अल्लाह सबसे अच्छा मित्र (वली) और सबसे अच्छा मददगार है।7. नेक लोगों के साथ रहने की शिक्षाيَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَكُونُوا مَعَ الصَّادِقِينَसूरह अत-तौबा 9:119अर्थ: ऐ ईमान वालो! अल्लाह से डरो और सच्चे लोगों के साथ रहो।निष्कर्षक़ुरआन के अनुसार सच्ची मित्रता की पहचान है:नेकी में सहयोग (5:2),आपसी सहायता (9:71),सच्चों की संगति (9:119),और ऐसी मित्रता जो अल्लाह की आज्ञा पर आधारित हो (43:67)।यही भाव “न स सखा यो न ददाति सख्ये” के निकट है—अर्थात जो सहायता और भलाई न करे, वह सच्चा यदि आपका विषय “सच्चा मित्र वही है जो साथ दे, भलाई करे और कठिन समय में मदद करे” है, तो इस्लाम में इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रसिद्ध हदीसें/नसीहत दी जा रही हैं:1. मोमिन मोमिन का सहारा हैالْمُؤْمِنُ لِلْمُؤْمِنِ كَالْبُنْيَانِ يَشُدُّ بَعْضُهُ بَعْضًاअर्थ: एक मोमिन दूसरे मोमिन के लिए इमारत की तरह है, जिसका एक भाग दूसरे भाग को मज़बूत करता है।— Sahih al-Bukhari, Sahih Muslim2. मुसलमान मुसलमान का भाई हैالْمُسْلِمُ أَخُو الْمُسْلِمِ، لَا يَظْلِمُهُ وَلَا يَخْذُلُهُअर्थ: मुसलमान मुसलमान का भाई है; न उस पर ज़ुल्म करता है और न उसे मुसीबत में छोड़ता है।— Sahih Muslim3. मदद करने वाले की मदद अल्लाह करता हैوَاللَّهُ فِي عَوْنِ الْعَبْدِ مَا كَانَ الْعَبْدُ فِي عَوْنِ أَخِيهِअर्थ: अल्लाह बंदे की मदद करता रहता है, जब तक बंदा अपने भाई की मदद करता रहता है।— Sahih Muslim4. अपने भाई के लिए वही पसंद करोلَا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّى يُحِبَّ لِأَخِيهِ مَا يُحِبُّ لِنَفْسِهِअर्थ: तुममें से कोई पूर्ण ईमान वाला नहीं हो सकता जब तक वह अपने भाई के लिए वही पसंद न करे जो अपने लिए पसंद करता है।— Sahih al-Bukhari, Sahih Muslim5. अच्छा साथी और बुरा साथीمَثَلُ الْجَلِيسِ الصَّالِحِ وَالسُّوءِ كَحَامِلِ الْمِسْكِ وَنَافِخِ الْكِيرِअर्थ: अच्छे साथी और बुरे साथी की मिसाल इत्र बेचने वाले और लोहार की भट्ठी फूँकने वाले जैसी है।— Sahih al-Bukhari6. दोस्त अपने दोस्त के धर्म पर होता हैالْمَرْءُ عَلَى دِينِ خَلِيلِهِ فَلْيَنْظُرْ أَحَدُكُمْ مَنْ يُخَالِلُअर्थ: आदमी अपने घनिष्ठ मित्र के तरीके पर चलने लगता है, इसलिए देखो कि तुम किसे मित्र बनाते हो।— Sunan Abi Dawud, Jami' al-Tirmidhi7. मोमिन एक शरीर के समान हैंمَثَلُ الْمُؤْمِنِينَ فِي تَوَادِّهِمْ وَتَرَاحُمِهِمْ وَتَعَاطُفِهِمْ مَثَلُ الْجَسَدِ الْوَاحِدِअर्थ: मोमिनों की आपसी मुहब्बत, दया और सहानुभूति एक शरीर की तरह है; यदि एक अंग को तकलीफ़ होती है तो पूरा शरीर प्रभावित होता है।— Sahih al-Bukhari, Sahih Muslimइन प्रमाणों से स्पष्ट है कि इस्लाम में सच्चा मित्र/भाई वह है जो मदद करे, मुसीबत में साथ दे, भलाई चाहे और धोखा न दे। सूफी संतों में प्रमाण -- “सच्चा मित्र (दोस्त), जो मुसीबत में साथ दे, हित करे और प्रेम निभाए” है, तो सूफ़ी साहित्य में दोस्त (دوست), यार (یار), रफ़ीक़ (رفیق) और मोहब्बत (محبت) के विषय पर अनेक कथन मिलते हैं। नीचे 10 से अधिक प्रसिद्ध सूफ़ी उक्तियाँ दी जा रही हैं। ध्यान रहे कि सूफ़ी साहित्य में कई कथन कविताओं और सूक्तियों के रूप में प्रचलित हैं, न कि हमेशा किसी धार्मिक ग्रंथ के अध्याय-श्लोक की तरह।1. Jalal al-Din Rumiدوست آن باشد که گیرد دستِ دوستدر پریشان حالی و درماندگیअर्थ: सच्चा मित्र वह है जो परेशानी और बेबसी में मित्र का हाथ थाम ले।2. रूमीیارِ واقعی در روزِ سختی شناخته میشودअर्थ: सच्चे मित्र की पहचान कठिन समय में होती है।3. Saadi Shiraziدوست مشمار آن که در نعمت زند لافِ یاریدوست آن باشد که گیرد دستِ دوست در پریشانیअर्थ: जो केवल सुख में मित्रता जताए, उसे मित्र मत समझो; मित्र वह है जो संकट में साथ दे।4. सादीبنی آدم اعضای یکدیگرندअर्थ: आदम की संतानें एक-दूसरे के अंगों के समान हैं।5. Hafizیار با ماست چه حاجت که زیادت طلبیمअर्थ: जब सच्चा मित्र साथ है तो और क्या चाहिए?6. Abdul Qadir Gilaniالصديق من صدقك لا من صدّقكअर्थ: मित्र वह है जो तुम्हें सत्य बताए, न कि केवल तुम्हारी हर बात की पुष्टि करे।7. Abu Hamid al-Ghazaliمن علامة الصديق أن يكون عوناً لصديقه على الخيرअर्थ: सच्चे मित्र की पहचान यह है कि वह अपने मित्र को भलाई में सहायता दे।8. रूमीدوستی که تو را به حق نزدیک کند، بهترین دوست استअर्थ: वह मित्र सबसे अच्छा है जो तुम्हें सत्य और ईश्वर के निकट ले जाए।9. Farid al-Din Attarدوست حقیقی آینهٔ جان استअर्थ: सच्चा मित्र आत्मा का दर्पण है।10. Nizamuddin Auliya से संबद्ध सूफ़ी परंपराدوستى آن است كه درويش را تنها نگذارىअर्थ: मित्रता यह है कि ज़रूरतमंद को अकेला न छोड़ा जाए।11. रूमीهر که یارِ توست، بارِ تو را نیز برمیداردअर्थ: जो तुम्हारा मित्र है, वह तुम्हारा बोझ भी उठाता है।12. सादीدوستِ نیکو به از برادر استअर्थ: अच्छा मित्र कभी-कभी भाई से भी बढ़कर होता है।इन सूफ़ी शिक्षाओं का सार यह है कि:دوست (मित्र) संकट में पहचाना जाता है।सच्चा मित्र सत्य बोलता है।मित्र भलाई में सहायता करता है।मित्र दुःख में साथ नहीं छोड़ता।मित्र मनुष्य को ईश्वर और सत्य के निकट ले जाता है।यह भाव भारतीय नीति-वचन “न स सखा यो न ददाति सख्ये” के बहुत निकट है।सिक्ख धर्म में प्रमाण -- “सच्चा मित्र / सखा” है, तो श्री गुरु ग्रंथ साहिब में परमात्मा को सच्चा मित्र, मीत, सखा और सहायक बताया गया है। नीचे कुछ प्रमाण अंग (पृष्ठ) संख्या सहित दिए जा रहे हैं:1. अंग 1299ਤੂ ਮੇਰਾ ਸਖਾ ਤੂਹੀ ਮੇਰਾ ਮੀਤੁ ॥ਤੂ ਮੇਰਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਤੂਹੀ ਮੇਰਾ ਚੀਤੁ ॥अर्थ: हे प्रभु! तू ही मेरा सखा है, तू ही मेरा मित्र है; तू ही मेरा प्रियतम है और तू ही मेरे चित्त में बसता है। 2. अंग 103ਤੂ ਮੇਰਾ ਪਿਤਾ ਤੂ ਹੈ ਮੇਰਾ ਮਾਤਾ ।ਤੂ ਮੇਰਾ ਬੰਧਪੁ ਤੂ ਮੇਰਾ ਭ੍ਰਾਤਾ ॥अर्थ: तू मेरा पिता, माता, बंधु और भाई है। 3. अंग 1216ਤੂ ਮੇਰੇ ਮੀਤ ਸਖਾ ਹਰਿ ਪ੍ਰਾਣ ॥अर्थ: हे हरि! तू मेरा मित्र, सखा और प्राण है। 4. अंग 81ਮੇਰਾ ਮੀਤੁ ਸਾਜਨੁ ਸਖਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥अर्थ: मेरा सच्चा मित्र, सज्जन और सखा वही प्रभु है।5. अंग 682ਸਾਥਿ ਨ ਚਾਲੈ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ॥अर्थ: अंत समय में केवल प्रभु का नाम ही साथ जाता है; वही सच्चा साथी है।6. अंग 1429ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਾਚਾ ਸਚੁ ਤੂ ਮੇਰਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਮੀਤੁ ॥अर्थ: हे हरि! तू मेरा सच्चा प्रियतम और सच्चा मित्र है।7. अंग 50ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਸੋ ਮੈ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ ॥अर्थ: सब जीवों का एक ही दाता और हितैषी है; उसे कभी नहीं भूलना चाहिए।विषय का सारगुरु ग्रंथ साहिब में मित्रता का सर्वोच्च आदर्श मनुष्य नहीं, बल्कि वाहेगुरु को माना गया है। साथ ही, सच्ची संगत (ਸਤਸੰਗਤਿ) और परस्पर प्रेम को भी महत्व दिया गया है। सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण यह है:ਤੂ ਮੇਰਾ ਸਖਾ ਤੂਹੀ ਮੇਰਾ ਮੀਤੁ ॥(अंग 1299)अर्थात् “तू ही मेरा सखा, तू ही मेरा मित्र है।”ईसाई धर्म में प्रमाण --“सच्चा मित्र वही है जो प्रेम करे, सहायता करे और संकट में साथ दे” है, तो बाइबिल में इस विषय पर कई स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी (English script) में दिए जा रहे हैं:1. Proverbs 17:17“A friend loveth at all times, and a brother is born for adversity.”अर्थ: सच्चा मित्र हर समय प्रेम करता है, और भाई विपत्ति के समय के लिए होता है।2. Proverbs 18:24“There is a friend that sticketh closer than a brother.”अर्थ: ऐसा मित्र भी होता है जो सगे भाई से भी अधिक निकट रहता है।3. John 15:13“Greater love hath no man than this, that a man lay down his life for his friends.”अर्थ: इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि वह अपने मित्रों के लिए अपना जीवन दे दे।4. John 15:14“Ye are my friends, if ye do whatsoever I command you.”अर्थ: यदि तुम मेरी आज्ञाओं का पालन करते हो तो तुम मेरे मित्र हो।5. Ecclesiastes 4:9–10“Two are better than one... For if they fall, the one will lift up his fellow.”अर्थ: दो एक से अच्छे हैं; यदि एक गिर जाए तो दूसरा उसे उठाता है।6. Galatians 6:2“Bear ye one another’s burdens, and so fulfil the law of Christ.”अर्थ: एक-दूसरे के बोझ उठाओ; यही मसीह की शिक्षा का पालन है।7. Proverbs 27:17“Iron sharpeneth iron; so a man sharpeneth the countenance of his friend.”अर्थ: जैसे लोहा लोहे को तेज करता है, वैसे ही सच्चा मित्र अपने मित्र को बेहतर बनाता है।निष्कर्षबाइबिल के अनुसार सच्चे मित्र की पहचान है:हर परिस्थिति में प्रेम करना (Proverbs 17:17)संकट में साथ देना (Ecclesiastes 4:9–10)मित्र के लिए त्याग करना (John 15:13)एक-दूसरे का बोझ उठाना (Galatians 6:2)एक-दूसरे को बेहतर बनाना (Proverbs 27:17)इन शिक्षाओं का भाव “न स सखा यो न ददाति सख्ये” से बहुत निकट है—अर्थात् जो सहायता न करे और साथ न दे, वह सच्चा मित्र नहीं कहलाता।जैन धर्म में प्रमाण --जैन धर्म में मैत्री (मित्ती), करुणा, परोपकार और सर्वजीव-हित को बहुत महत्व दिया गया है। हालाँकि “न स सखा यो न ददाति सख्ये” जैसा शब्दशः वाक्य जैन आगमों में नहीं मिलता, लेकिन उसके समान भाव वाले कई प्राकृत सूत्र मिलते हैं।1. मैत्री भावना (प्रसिद्ध जैन प्रार्थना)मित्ति मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं ण केणइ।अर्थ: सभी जीवों के साथ मेरी मैत्री है, किसी के साथ मेरा वैर नहीं है।— Maitri Bhavana2. उत्तराध्ययन सूत्रसव्वे पाणा पिआउया, सुहसाया दुक्खपडिकूला।अर्थ: सभी प्राणियों को जीवन प्रिय है, सुख प्रिय है और दुःख अप्रिय है।— Uttaradhyayana Sutra3. दया और मैत्रीजं इच्छसि अप्पणतो, तं इच्छ परस्सवि।अर्थ: जो अपने लिए चाहते हो, वही दूसरों के लिए भी चाहो।— जैन नीतिवचन4. तत्त्वार्थसूत्र का भावपरस्परोपग्रहो जीवानाम्।अर्थ: जीव एक-दूसरे के उपकारक हैं।— Tattvartha Sutra (5.21)5. मैत्री भावनामित्ती भावणाए जीवाणं मंगलं।अर्थ: मैत्री की भावना सभी जीवों के लिए कल्याणकारी है।6. दशवैकालिक सूत्रन हणे पाणिणो पाणे।अर्थ: किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाओ।7. सर्वजीव मैत्रीखामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे।मित्ति मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं ण केणइ॥अर्थ: मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें; सबके साथ मेरी मैत्री है, किसी से वैर नहीं।सारजैन धर्म में सच्चे मित्र का आदर्श केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी जीवों के प्रति मैत्री (मित्ती), करुणा, क्षमा और उपकार तक विस्तृत है। इस दृष्टि से “मित्ति मे सव्वभूएसु” जैन धर्म का सबसे प्रसिद्ध मैत्री-सूत्र है, जो सच्ची मित्रता के भाव को व्यक्त करता है। बौद्ध धर्म में प्रमाण -- “सच्चा मित्र कौन है?”, “जो संकट में साथ दे, हित करे और धोखा न दे” है, तो बौद्ध धर्म में विशेष रूप से सिगालोवाद सुत्त (Sigālovāda Sutta, Dīgha Nikāya 31) में सच्चे और झूठे मित्रों का विस्तार से वर्णन मिलता है।यहाँ पाली (देवनागरी लिपि) में कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:1. सच्चे मित्र के चार प्रकारसिगालोवाद सुत्त (दीघ निकाय 31)चत्तारो मे, सिगाल, सुहदा वेदितब्बा।अर्थ: हे सिगाल! चार प्रकार के मित्र सच्चे मित्र समझे जाने चाहिए।2. उपकारी मित्रउपकारको च मित्रो।अर्थ: जो सहायता करता है, वही मित्र है।3. सुख-दुःख में समान रहने वाला मित्रसमानसुखदुक्खो च।अर्थ: जो सुख और दुःख दोनों में साथ रहे, वही सच्चा मित्र है।4. हित बताने वाला मित्रअत्थक्खायी च मित्रो।अर्थ: जो हितकारी सलाह दे, वह मित्र है।5. करुणामय मित्रअनुकम्पको च मित्रो।अर्थ: जो दया और सहानुभूति रखे, वह मित्र है।6. मैत्री भावना (करणीय मेत्ता सुत्त)सब्बे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता।अर्थ: सभी प्राणी सुखी हों।— Karaniya Metta Sutta7. किसी से वैर न रखनाकरणीय मेत्ता सुत्तन परो परं निकुब्बेथ।नातिमञ्ञेथ कत्तचि नं कञ्चि।अर्थ: कोई किसी को धोखा न दे, किसी का अपमान न करे।सिगालोवाद सुत्त में झूठे मित्रों का भी वर्णन दिया है।बुद्ध ने बताया कि जो:केवल लाभ के लिए मित्र बने,सामने मीठा बोले पर पीछे साथ न दे,संकट में छोड़ दे,वह सच्चा मित्र नहीं है।सारबौद्ध धर्म के अनुसार सच्चा मित्र वह है:उपकारक (उपकारको)सुख-दुःख में साथ देने वाला (समानसुखदुक्खो)हित बताने वाला (अत्थक्खायी)करुणामय (अनुकम्पको)ये शिक्षाएँ सिगालोवाद सुत्त (दीघ निकाय 31) में विस्तार से मिलती हैं ।यहूदी धर्म में प्रमाण--“न स सखा यो न ददाति सख्ये” के भाव “सच्चा मित्र वही है जो प्रेम करे, संकट में साथ दे और हित करे” है, तो यहूदी धर्म के पवित्र ग्रंथ तनाख़ (Tanakh / Hebrew Bible), विशेषकर मिश्ले (Proverbs) में इस विषय पर अनेक प्रमाण मिलते हैं।नीचे कुछ प्रसिद्ध प्रमाण हिब्रू लिपि और हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं:1. नीतिवचन (Proverbs) 17:17בְּכָל־עֵת אֹהֵב הָרֵעַ וְאָח לְצָרָה יִוָּלֵדअर्थ: मित्र हर समय प्रेम करता है, और भाई विपत्ति के समय के लिए जन्म लेता है।2. नीतिवचन (Proverbs) 18:24יֵשׁ אֹהֵב דָּבֵק מֵאָחअर्थ: ऐसा मित्र भी होता है जो सगे भाई से अधिक निकट होता है।3. नीतिवचन (Proverbs) 27:9שֶׁמֶן וּקְטֹרֶת יְשַׂמַּח־לֵב וּמֶתֶק רֵעֵהוּ מֵעֲצַת־נָפֶשׁअर्थ: जैसे इत्र और सुगंध हृदय को प्रसन्न करते हैं, वैसे ही मित्र की सच्ची सलाह मधुर होती है।4. नीतिवचन (Proverbs) 27:10רֵעֲךָ וְרֵעַ אָבִיךָ אַל־תַּעֲזֹבअर्थ: अपने मित्र और अपने पिता के मित्र का त्याग मत करो।5. सभोपदेशक (Ecclesiastes) 4:9–10טוֹבִים הַשְּׁנַיִם מִן־הָאֶחָד... כִּי אִם־יִפֹּלוּ הָאֶחָד יָקִים אֶת־חֲבֵרוֹअर्थ: दो एक से अच्छे हैं; यदि एक गिर जाए तो दूसरा उसे उठा लेगा।6. लैव्यव्यवस्था (Leviticus) 19:18וְאָהַבְתָּ לְרֵעֲךָ כָּמוֹךָअर्थ: अपने पड़ोसी (मित्र) से अपने समान प्रेम करो।7. नीतिवचन (Proverbs) 27:17בַּרְזֶל בְּבַרְזֶל יָחַד וְאִישׁ יַחַד פְּנֵי־רֵעֵהוּअर्थ: जैसे लोहा लोहे को तेज करता है, वैसे ही मनुष्य अपने मित्र को बेहतर बनाता है।सारयहूदी धर्म में सच्चे मित्र की पहचान है:हर समय प्रेम करना (Proverbs 17:17),संकट में साथ देना (Ecclesiastes 4:9–10),अच्छी सलाह देना (Proverbs 27:9),मित्रता निभाना (Proverbs 27:10),और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना (Leviticus 19:18)।ये शिक्षाएँ “न स सखा यो न ददाति सख्ये” के भाव से बहुत निकट हैं—अर्थात् सच्चा मित्र वही है जो सहायता करे, प्रेम करे और साथ न छोड़े। पारसी धर्म में प्रमाण --पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म का मुख्य आधार सद्विचार, सद्वचन और सद्कर्म (Good Thoughts, Good Words, Good Deeds) है। अवेस्ता में मित्रता, सहायता, परोपकार और मानव-कल्याण का भाव बार-बार आता है, यद्यपि "न स सखा यो न ददाति सख्ये" जैसा वाक्य शब्दशः नहीं मिलता। नीचे अवेस्ता परंपरा से कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:1. सद्विचार, सद्वचन, सद्कर्मयस्न 35.1–2𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀Humata, Hukhta, Huvarshtaअर्थ: अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म। यही पारसी धर्म का मूल आदर्श है। 2. अच्छे कर्मों की प्रशंसायस्न 35.1𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀𐬥𐬁𐬨 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀𐬥𐬁𐬨 𐬵𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀𐬥𐬁𐬨Humatanām Hukhtanām Huvarshtanāmअर्थ: हम अच्छे विचारों, अच्छे वचनों और अच्छे कर्मों का सम्मान करते हैं। 3. मानव-सेवा का महत्वयस्न 51(अवेस्ता में भाव)“अच्छे कर्मों द्वारा मानवता की सेवा करो।”अर्थ: धर्म केवल विचार नहीं, बल्कि दूसरों के हित में किए गए कर्म हैं। 4. अच्छे विचारों का मार्गयस्न 30.2𐬎𐬱𐬙𐬀𐬥𐬀 ...सत्य को सुनो और विवेक से निर्णय करो।अर्थ: मनुष्य को भलाई का मार्ग चुनना चाहिए। 5. झूठ और बुराई से दूर रहनायस्न 49.3“मैं असत्य से संबंध नहीं रखता।”अर्थ: सच्चा व्यक्ति बुराई और छल से दूर रहता है। 6. अच्छे विचारों का साथी बननावोहू मनह (Vohu Manah)𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬵Vohu Manahअर्थ: "श्रेष्ठ मन" या "सद्बुद्धि"—जो दूसरों के हित का विचार करे। 7. सबके लिए कल्याणकारी कर्मयस्न परंपरा का सिद्धांत“ऐसे कर्म करो जो दोनों लोकों के लिए श्रेष्ठ हों।”अर्थ: मनुष्य का आचरण स्वयं और दूसरों दोनों के लिए हितकारी होना चाहिए। निष्कर्षपारसी धर्म में सच्ची मित्रता और धर्म का सार इन तीन शब्दों में समाहित है:𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀Humata – Hukhta – Huvarshta“सद्विचार, सद्वचन, सद्कर्म”यही सिद्धांत दूसरों के प्रति मित्रता, सहायता और परोपकार का आधार माना है।ताओ धर्म में प्रमाण -- “सच्चा मित्र वही है जो हित करे, सहयोग दे, विनम्र हो और संकट में साथ दे” है, तो ताओ (Daoism / Taoism) के मुख्य ग्रंथ Tao Te Ching (道德經) और Zhuangzi में मित्रता पर प्रत्यक्ष अध्याय कम हैं, लेकिन मैत्री, परोपकार, विनम्रता और सह-अस्तित्व के सिद्धांत स्पष्ट रूप से मिलते हैं।यहाँ कुछ प्रसिद्ध उद्धरण चीनी लिपि के साथ दिए जा रहे हैं:1. दयालुता का प्रत्युत्तर दयालुता से道德經 第49章善者吾善之;不善者吾亦善之。德善。अर्थ: जो अच्छे हैं, उनके साथ मैं अच्छा हूँ; जो अच्छे नहीं हैं, उनके साथ भी मैं अच्छा हूँ। यही सच्चा सद्गुण है।2. जल की तरह उपकारी बनो道德經 第8章上善若水。水善利萬物而不爭。अर्थ: सर्वोच्च सद्गुण जल के समान है; जल सबका हित करता है और किसी से संघर्ष नहीं करता।3. दूसरों को लाभ पहुँचाना道德經 第81章聖人不積,既以為人己愈有;既以與人己愈多。अर्थ: संत दूसरों को देता है और स्वयं और अधिक समृद्ध होता है।4. कोमलता और करुणा道德經 第67章我有三寶:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。अर्थ: मेरे तीन रत्न हैं—करुणा, सादगी और विनम्रता।5. सच्चे व्यक्ति का स्वभाव莊子 (Zhuangzi)君子之交淡若水。अर्थ: श्रेष्ठ व्यक्तियों की मित्रता जल की तरह सरल और स्वच्छ होती है।6. सबके साथ सामंजस्य道德經 第34章大道泛兮,其可左右萬物。अर्थ: महान मार्ग (ताओ) सबको धारण करता है और सबका पोषण करता है।7. प्रतिफल की अपेक्षा बिना देना道德經 第2章生而不有,為而不恃。अर्थ: उत्पन्न करो पर स्वामित्व मत जताओ; कार्य करो पर उसका अहंकार मत रखो।सारताओ धर्म में सच्चे मित्र की परिभाषा सीधे नहीं दी गई, लेकिन उसके गुण बताए गए हैं:慈 (cí) — करुणा善 (shàn) — भलाई利萬物而不爭 — सबका हित करना, बिना विवाद के君子之交淡若水 — सच्ची मित्रता जल की तरह सरल और स्वाभाविक होती हैये शिक्षाएँ उस भाव के निकट हैं कि सच्चा मित्र वही है जो दूसरों का हित करे, सहयोग दे और स्वार्थरहित व्यवहार करे। कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --“सच्चा मित्र कौन है?”, “जो हित करे, सुधार करे, सत्य कहे और संकट में साथ दे” है, तो कन्फ्यूशियस धर्म (Confucianism) में मित्रता (友, 朋友) को पाँच प्रमुख मानवीय संबंधों में गिना गया है। इसके मुख्य स्रोत हैं Analects (論語), Book of Rites (禮記) आदि।नीचे कुछ प्रसिद्ध प्रमाण चीनी लिपि के साथ दिए जा रहे हैं:1. दूर से मित्र का आना《論語·學而》有朋自遠方來,不亦樂乎?पिनयिन: Yǒu péng zì yuǎn fāng lái, bù yì lè hū?अर्थ: क्या यह आनंद की बात नहीं कि मित्र दूर-दूर से मिलने आएँ?2. मित्र के प्रति निष्ठा《論語·學而》與朋友交,言而有信。अर्थ: मित्रों के साथ व्यवहार में वचन का पक्का होना चाहिए।3. अच्छे मित्र का लाभ《論語·季氏》益者三友:友直,友諒,友多聞。अर्थ: तीन प्रकार के मित्र लाभदायक हैं—सीधे-सच्चे मित्र, ईमानदार मित्र और विद्वान मित्र।4. बुरे मित्र से हानि《論語·季氏》損者三友:友便辟,友善柔,友便佞。अर्थ: तीन प्रकार के मित्र हानिकारक हैं—चापलूस, कपटी और केवल मीठी बातें करने वाले।5. मित्र गलती बताए《論語·顏淵》忠告而善道之,不可則止。अर्थ: मित्र को सच्ची सलाह दो और सही मार्ग दिखाओ; यदि वह न माने तो ज़बरदस्ती न करो।6. सज्जन मित्रता《論語·子路》君子以文會友,以友輔仁。अर्थ: श्रेष्ठ व्यक्ति मित्रता के माध्यम से सद्गुणों को बढ़ाता है।7. मित्रता और नैतिक उन्नति《論語·里仁》德不孤,必有鄰。अर्थ: सद्गुण कभी अकेला नहीं रहता; उसके पास अच्छे साथी और मित्र अवश्य आते हैं।सारकन्फ्यूशियस के अनुसार सच्चे मित्र के लक्षण हैं:信 (xìn) — विश्वसनीयता直 (zhí) — सत्यनिष्ठा諒 (liàng) — ईमानदारी忠告 (zhōnggào) — हितकारी सलाह輔仁 (fǔrén) — नैतिक उन्नति में सहायताइस प्रकार कन्फ्यूशियस धर्म भी यह सिखाता है कि मित्र वही है जो आपका हित चाहे, आपको बेहतर बनाए और सत्य का साथ दे, न कि केवल मीठी बातें करे।शिन्तो धर्म में प्रमाण --शिन्तो (Shintō) धर्म में वेद, बाइबिल, क़ुरआन या त्रिपिटक जैसी एक केंद्रीय धर्म-पुस्तक नहीं है। इसके मुख्य ग्रंथ हैं Kojiki, Nihon Shoki और Engishiki। इसलिए "सच्चे मित्र" पर सीधे श्लोक कम मिलते हैं। शिन्तो में अधिक बल 和 (वा = सामंजस्य), 誠 (मकोतो = सच्चाई), 敬 (सम्मान), और 助け合い (पारस्परिक सहायता) पर है।नीचे कुछ प्रसिद्ध जापानी उक्तियाँ और शिन्तो-आदर्श दिए जा रहे हैं:1. शिन्तो का मूल सद्गुण – मकोतो (सच्चाई)誠の心をもって人に接する。(Makoto no kokoro o motte hito ni sessuru.)अर्थ: लोगों के साथ सच्चे हृदय से व्यवहार करो।2. सामंजस्य का महत्व和をもって貴しとなす。(Wa o motte tōtoshi to nasu.)अर्थ: सामंजस्य को सबसे मूल्यवान समझो।यह उक्ति जापानी परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध है और शिन्तो नैतिकता से भी जुड़ी मानी जाती है।3. परस्पर सहयोग助け合いの心。(Tasukeai no kokoro.)अर्थ: एक-दूसरे की सहायता करने का भाव रखो।4. सबके प्रति सम्मान人を敬い、共に生きる。(Hito o uyamai, tomo ni ikiru.)अर्थ: लोगों का सम्मान करो और मिलकर जीवन बिताओ।5. शुद्ध हृदय清き明き心。(Kiyoki akaki kokoro.)अर्थ: निर्मल और उज्ज्वल हृदय रखो।6. समुदाय का कल्याण皆で支え合う。(Minna de sasaeau.)अर्थ: सब लोग मिलकर एक-दूसरे का सहारा बनें।7. सच्चे संबंध信頼は人の絆を強くする。(Shinrai wa hito no kizuna o tsuyoku suru.)अर्थ: विश्वास मनुष्यों के बंधन को मजबूत बनाता है।सारशिन्तो धर्म में सच्चे मित्र के गुण इस प्रकार समझे जाते हैं:誠 (Makoto) — सच्चाई和 (Wa) — सामंजस्य敬 (Kei) — सम्मान助け合い (Tasukeai) — परस्पर सहायता信頼 (Shinrai) — विश्वासअर्थात्, सच्चा मित्र वह है जो सच्चे मन से व्यवहार करे, सहयोग दे, सम्मान करे और समुदाय के कल्याण में साथ खड़ा रहे।ध्यान दें कि ऊपर दिए गए कथन शिन्तो नैतिक आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं; वे सभी किसी एक शास्त्रीय शिन्तो ग्रंथ के "अध्याय-श्लोक" उद्धरण नहीं हैं, क्योंकि शिन्तो परंपरा की संरचना अन्य धर्मों से भिन्न है।यूनानी दर्शन में प्रमाण--यूनानी दर्शन (Greek Philosophy) में विशेष रूप से Aristotle, Plato और Epictetus ने मित्रता पर गहन विचार प्रस्तुत किए हैं।1. अरस्तू — निकोमाखियन एथिक्स (Nicomachean Ethics, Book VIII)ग्रीक मूल:Ὁ φίλος ἄλλος αὐτός.(Ho philos allos autos)अर्थ: "मित्र दूसरा स्वयं (Second Self) है।"अरस्तू के अनुसार सच्चा मित्र वह है जो अपने मित्र का हित उसी प्रकार चाहता है जैसे अपना।2. अरस्तू — निकोमाखियन एथिक्स VIII.3Τέλεια δ᾽ ἐστὶν ἡ τῶν ἀγαθῶν φιλία.अर्थ: "पूर्ण मित्रता अच्छे (सद्गुणी) लोगों के बीच होती है।"3. अरस्तू — निकोमाखियन एथिक्स VIII.1Οὐδεὶς γὰρ ἂν ἕλοιτο ζῆν ἄνευ φίλων.अर्थ: "कोई भी व्यक्ति मित्रों के बिना जीवन चुनना नहीं चाहेगा।"4. प्लेटो — लाइसिस (Lysis)φίλος φίλῳ διὰ τὸ ἀγαθόν.अर्थ: "मित्रता का आधार अच्छाई (Goodness) है।"प्लेटो के अनुसार सच्ची मित्रता सद्गुण और नैतिक उन्नति पर आधारित होती है।5. एपिक्टेटसΤίς ἐστι φίλος;Ὁ τὰ αὐτὰ φρονῶν.अर्थ: "मित्र कौन है? वह जो समान शुभ विचार रखता हो।"6. डेमोक्रिटसΦιλία μία ψυχὴ ἐν δυσὶ σώμασιν.अर्थ: "मित्रता दो शरीरों में एक आत्मा के समान है।"(यह उक्ति अक्सर अरस्तू से भी जोड़ी जाती है, यद्यपि विद्वानों में मतभेद है।)7. स्टोइक परंपरा — सेनेकाAmicus certus in re incerta cernitur.(लैटिन, रोमन स्टोइक परंपरा)अर्थ: "सच्चा मित्र संकट के समय पहचाना जाता है।"यह विचार यूनानी-रोमन स्टोइक दर्शन में अत्यंत प्रसिद्ध है।सारयूनानी दर्शन के अनुसार सच्चे मित्र के लक्षण:हितैषी होना — मित्र का भला चाहना।सद्गुणी होना — मित्रता का आधार नैतिकता हो।संकट में साथ देना — विपत्ति में मित्र की पहचान होती है।सत्य बोलना — मित्र सुधार करने वाला हो।आत्मिक निकटता — मित्र को "दूसरा स्वयं" समझना।इन शिक्षाओं का भाव भारतीय उक्ति “न स सखा यो न ददाति सख्ये” से बहुत मिलता-जुलता है, क्योंकि दोनों परंपराएँ मित्रता को केवल परिचय नहीं, बल्कि परोपकार, निष्ठा और संकट में सहयोग मानती हैं।--------+-------+----+----+-±