अधूरी कॉल Kapil Tiwari द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी कॉल

मैं बैठा कुछ सोच ही रहा था कि तभी मेरे पीछे रखे मोबाइल से एक जानी-पहचानी सी आवाज़ सुनाई दी। देखा तो घर से फोन आ रहा था—फोन पर वही लोग थे जो समय-समय पर अपनी कामनाओं की 'अपडेट' लेते रहते हैं। मैं समझ गया था कि आज भी वही होगा जो सालों से होता आया है।

मैंने फोन उठाया, "हेलो।"

वहाँ से बड़ी क्रुद्ध सी आवाज़ आई, "तुम पागल हो गए हो क्या?"

मैं कुछ पल ठहरा और बोला, "नहीं, ऐसा कुछ नहीं है।"

मेरे इतना बोलते ही उनका जवाब आया, "तुम फोन क्यों नहीं लगाते हो? कई-कई हफ्तों तक बात नहीं करते! कहाँ रहते हो, कहाँ हो? कुछ पता ही नहीं चलता। तुम्हारा हमें कुछ समझ ही नहीं आता है! काफी लंबे समय से तुम घर भी नहीं आए हो, बोल रहे थे आने के लिए? कम से कम बात तो किया करो!"

मैं सिर्फ उनकी बातों का जवाब "हूँ-हूँ" में देता रहा।

तभी फोन पर पीछे से चाचा ने बोला, "तुम अपने मुख्य उद्देश्य को कहीं भूल तो नहीं गए?"

मैंने उत्तर दिया, "नहीं।"

मुझे अच्छी तरह पता था कि वे किस उद्देश्य की बात कर रहे थे। उन्होंने मुझे कुछ सालों पहले सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए एक बड़े शहर में भेजा था; और भेजने के साथ-साथ कुछ उम्मीदें भी मेरे साथ आई थीं।

समय के साथ मुझे समझ आया कि यह समाज द्वारा मेरे ऊपर आरोपित की गई एक कामना है, जिसे मैं अपना लक्ष्य समझ रहा था। अच्छी बात यह रही कि मैंने समय रहते इससे निजात पा लिया और अब मैं लेखन (राइटिंग) करता हूँ।

लेकिन इस निर्णय से मेरे ऊपर जिन्होंने 'निवेश' किया है, वे खुश नहीं रहते। इसलिए वे फोन करके मुझे याद दिलाते रहते हैं कि तुम्हारा मुख्य उद्देश्य सिविल सर्विस में जाना ही है।

फोन पर ही चाचा ने कई उदाहरण पेश किए, "फलाने का लड़का मास्टर हो गया है, कुछ रिश्तेदारों के लड़के भी जल्दी ही सरकारी नौकरी में आ जाएँगे। जो अपने उद्देश्य से भटकता है, उसकी विफलता का यही मुख्य कारण होता है।"

मैंने कहा, "ठीक है, जिसे जो पसंद है वह करे। मुझे जो पसंद है और जो सही लग रहा है, मैं वह कर रहा हूँ। प्रत्येक इंसान अपने आप में अलग होता है—सोचने, बोलने, खुद को प्रस्तुत करने और पढ़ने का तरीका सबका अलग-अलग होता है। किसी की किसी और से तुलना करना उतना भी ठीक नहीं है, जितना आप सोचते हैं।"

चाचा बोले, "तुम यह राइटिंग छोड़ो। अभी समय है, तैयारी फिर से शुरू करो। कम से कम सारे अटेम्प्ट तो दे लो।"

मैंने साफ़ कहा, "मैंने एक समय इस चीज़ को अपनी काफी ऊर्जा और वक़्त दिया है, अब मुझसे यह नहीं होगा। और जो मेरे लिए सही नहीं है, उस पर मैं क्यों समय दूँ? अगर मुझे यह बात बिना 30 साल की उम्र तक वक़्त गँवाए, 23 साल में ही समझ आ गई, तो यह तो अच्छी ही बात है।"

चाचा झुँझलाकर बोले, "तुम समझ नहीं रहे हो! हमसे कुछ लोगों ने बोला था कि तुम अपने लड़के को सरकारी नौकरी नहीं दिला पाओगे। इसलिए तुम्हें यह करना ही होगा, उन्हें गलत साबित करना ही होगा!"

मैं मन ही मन सोच रहा था कि यह क्या है? मैं एक इंसान हूँ या कोई ट्रॉफी? जिसे जीतना इसलिए ज़रूरी है ताकि दूसरों को दिखाया जा सके! किसी के अधूरेपन से निकली कामनाएँ मेरे ऊपर थोप दी गईं और उनकी वजह से मैं किसी दूसरे को खुश करने के लिए, कई सालों तक फिर से उसी तैयारी के नाटक में खुद को फंसा दूँ? यह बिल्कुल सही नहीं है।

तभी चाचा बोले, "सुन रहे हो न मैं क्या बोल रहा हूँ?"

मैंने अनमने ढंग से उत्तर दिया, "हूँ।"

हम दोनों थोड़ी देर शांत रहे। फिर मैंने हिम्मत जुटाकर बोला, "मुझे लिखना-पढ़ना, घूमना और पूरी आज़ादी (फ्रीडम) के साथ काम करना ज़्यादा पसंद है।"

चाचा ने दलील दी, "ठीक है, लेकिन सिविल सर्विस में भी तो फ्रीडम होती है।"

मैंने बिना किसी झिझक के कहा, "नहीं।"

और फिर एक बार हम दोनों के बीच गहरी खामोशी छा गई।

...और फिर फोन कट जाता है, या शायद काट दिया जाता है।

~ कपिल तिवारी “यथार्थ”