आशिकी.....अब तुम ही हो। - 12 vaishnavi Shukla द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

आशिकी.....अब तुम ही हो। - 12

अध्याय: 12

दृश्य: सनाया का घर,

आशुतोष तेज कदमों से सीढ़ियां चढ़ते हुए सनाया के कमरे के सामने पहुंचता है। कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था ।

आशुतोष:(कमरे के दरवाजे के सामने खड़े होकर) सनाया,
(अंदर से कोई जवाब नही आता )

आशुतोष: (दरवाजा खटखटाते हुए) Open the door, princess।

कमरे के अंदर , गुस्से में इधर उधर टहल रही सनाया कुछ पल  वहीं खड़ी रहती है, फिर तेजी से बढ़कर दरवाजा खोलती है। और बिना कुछ  कहे  वापस जाकर बेड  पर बैठ जाती है।

आशुतोष कमरे के अंदर आया,....कमरे की हालत पूरी बिगड़ चुकी थी। चारों तरफ सामान बिखरा पड़ा था , फर्श पर टूटे हुए शोपीस,बिखरा सामान और इधर उधर  पड़े कुशन साफ बता रहे थे   कि उनपर किस कदर सनाया  का गुस्सा फूटा है।

आशुतोष धीरे से जाकर सनाया के बगल में बैठ जाता है।.....

आशुतोष: what happened,Sanaya?? Why are you so angry..?
(सनाया मुट्ठियां भींच लेती है।)

सनाया:(गुस्से में) मैं उसे छोडूंगी नही ,डैड!!

आशुतोष: किसे??

सनाया:(दांत पीसते हुए) उस बुढ़िया को , उस राजेश्वरी देवी को।

आशुतोष: क्यों? क्या हुआ? तुम ऐसा क्यों बोल हो ।

सनाया: डैड  वो कहती है की मैं.... मैं अनी के लायक नही हूं...मुझमें संस्कार नही है। (दांत पीसते हुए) संस्कार माई फुट।(और जोर से बेड पर हाथ मारती है।)

(फिर आशुतोष की ओर देखकर) डैड, आप बताओ क्या मैं अनी के लायक नही हूं।

आशुतोष: (सनाया के सिर पर हाथ फेर कर उसे शांत कराते हुए) No princess...मेरी सनाया सबसे बेस्ट है, अनिरुद्ध के लिए तुमसे बैटर कोई हो ही नही सकता!..

सनाया: बट जब तक वो राजेश्वरी देवी जिंदा हैं....वो अनी को कभी मेरा नही होने देगी।(गुस्से में) मन करता है, उसे जान से मार दूं।

तभी नैना:(अचानक से तेज आवाज में) सनाया...ये क्या बोले जा  रही हो। पागल हो गई हो ...जो मरने मारने तक की बाते करने लगी हो।।

सनाया :(गुस्से में बेड से उठते हुए) हां,हो गई हूं पागल...। I am mad for ani..! अनी सिर्फ मेरा है और जो मेरे और उसके बीच आयेगा उसे मैं खत्म कर दूंगी।

(नैना कुछ बोलने ही जा रही होती है तभी आशुतोष बीच में आता है। )

आशुतोष: (सनाया के कंधे को पकड़ कर ) Calm down sanaya calm down..!!
(सनाया गुस्से से हांफ रही थी)

आशुतोष: Don't worry, मैं Mrs महेश्वरी से बात करता हूं। तुम बस खुद पर और अनिरुद्ध पर फोकस करो...चलो अब जाओ.. फ्रेश हो जाओ हम्म।
(सनाया कुछ नही कहती और तेज कदमों से दूसरे रूम में चली जाती है।)

उसके जाने के बाद कमरे  में कुछ देर शांति छा जाती है।

नैना ने गहरी सांस लेती है और आशुतोष की तरफ देखती है।
नैना:(आशुतोष से) आप ये सब क्या कर रहे है।
(आशुतोष उसकी ओर देखता है)

नैना: आप उसकी हर सही गलत जिद्द क्यों पूरी करते रहते है?

आशुतोष: मैं अपनी बेटी से बहुत प्यार करता हूं...और आज तक मैंने उसकी हर ख्वाहिश पूरी की है ...हर चीज उसके मांगने से पहले उसके हाथ में रखी है.!!

नैना: आपका यही प्यार उसे जिद्दी और गुस्सैल बना रहा ..!! संभल जाइए आशुतोष।

आशुतोष :(उसकी इस बात को अनसुना करते हुए, ऑर्डरिंग टोन में) ये रूम जल्द से जल्द ठीक करवाओ, सनाया का  बेडरूम  जल्दी सही हो जाना चाहिए।
( और वहां से चला जाता है।)

नैना: (निराशा भरी आवाज में खुद से) आप सही नही कर रहे आशुतोष।....आपको क्या लगता है अनिरुद्ध कोई खिलौना है की आपकी बेटी को पसंद आया और आपने खरीद कर दे दिया।।....
(और नैना भी वहां से निकल जाती है।)

दृश्य: मंदिर प्रांगण। शाम का वक्त

मंदिर प्रांगण भक्तो की भीड़ से गुलजार था , चारों और रंग बिरंगी रोशनियां जगमगा रही थी। फूलों की महक और कृष्ण भजनों की मधुर धुन पूरे वातावरण को भक्तिमय बना रही थी।

राधा - कृष्ण की सुंदर प्रतिमाओं को विशेष श्रृंगार से सजाया गया था । पास ही रंग बिरंगे फूलों से बना एक भव्य झूला तैयार था जिसमें कुछ देर में ठाकुर जी को विराजमान किया जाना था।

श्रद्धा और प्रीति भी तैयार होकर अपने अपने परिवार के साथ पहुंच चुकी थी।
प्रीति ने हल्के गुलाबी रंग का लंहगा पहन रखा था और अपने हल्के घुंघराले बालों को खुला छोड़ रखा था...जिसमे वह काफी प्यारी लग रही थी।
और श्रद्धा ने  गहरे नीले रंग का अनारकली सूट पहन रखा था, खुले बाल माथे पर बिंदी..!!चेहरे की मासूमियत उसकी सुंदरता को चार चांद लगा रही थी।

दूसरी तरफ,
दृश्य : होटेल रूम ।

अनिरुद्ध अपने होटल रूम अवार्ड शो के लिए तैयार हो रहा था।
काले रंग का मंहगा बिजनेस सूट , हाथ में घड़ी और चेहरे पर वही शांत प्रभावशाली व्यक्तित्व।

तभी आनंद रूम में दाखिल होता है।
आनंद:(मस्ती में) क्या बात है भाई...!! बड़ा  हैंडसम लग रहा है

अनिरुद्ध उसे तिरछी नजर घूरता है।

आनंद:  हर टाइम घूरता क्यों रहता है यार(अनिरुद्ध की नजरे अभी भी आनंद पर बनी हुई थी) अच्छा ठीक है यार.... चले??...

अनिरुद्ध: (आगे बढ़ते हुए)हम्म् चलो ।

दोनो रूम से निकल जाते हैं  दोनो नीचे पहुंचे जहां एक लग्जरियस कार उनका इंतजार कर रही थी। दोनो कार में बैठ जाते है...कार अवार्ड शो के भव्य आयोजन स्थल की ओर बढ़ जाती है।

दृश्य: मंदिर प्रांगण....!!

भजन मंडली मधुर स्वर में कृष्णा भजन गा रहे थे मंदिर में उपस्थित सभी लोग भक्ति रस में डूबे हुए थे।
तभी मंदिर के बाहर हलचल होने लगी ।सभी की निगाहे मुख्य द्वार की ओर उठ गई। एक सफेद रंग की कार आकर रुकती है।

कैलाश(प्रीति के पिता): ये क्या हो रहा है।।??
प्रीति:(मुस्कुराते हुए) पापा , शायद हमारी मुख्य अथिति आ गई हैं। राजेश्वरी देवी जी। बहुत बड़ी समाज सेविका है।

कैलाश:(मुस्कुराकर) अच्छा।

प्रीति श्रद्धा को लेकर थोड़ा आगे आ जाती है ताकि वे दोनो राजेश्वरी जी को देख सके।

कर से पहले एक व्यक्ति उतरा और उसने पीछे का दरवाजा खोला ।धीरे - धीरे राजेश्वरी जी बाहर आती हैं।।।

(मंदिर के पुजारी हरी प्रसाद जी तुरंत आगे बढ़े ।)

हरी प्रसाद जी:(हाथ जोड़कर) नमस्ते राजेश्वरी जी।

राजेश्वरी देवी जी:(मुस्कुराते हुए) नमस्ते पंडित जी।

हरी प्रसाद जी:(आगे आने का इशारा करते हुए) आईए।
पहले राजेश्वरी जी मंदिर में राधाकृष्ण की के दर्शन करती हैं फिर 

दोनो मंदिर प्रांगण की ओर बढ़े ! वहां उनके लिए विशेष रूप से एक सुंदर सोफे की व्यवस्था की गई थी।
जिस स्थान पर राजेश्वरी जी और  हरी प्रसाद जी बैठे हुए थे , उसके ठीक सामने एक छोटा सा मंच तैयार किया गया था जहां बच्चो द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का मंचन प्रस्तुत किया जाना था।

कुछ समय बाद।
मंच के बगल में श्रद्धा और प्रीति कुछ बच्चो के साथ खड़ी थी । सभी बच्चे अपने अपने पात्रों की वेशभूषा में तैयार थे।

प्रीति: जा श्रद्धा....कार्यक्रम की शुरुआत कर।

श्रद्धा: हां ठीक है तुम बच्चो को तैयार रखना।

प्रीति: हां।

श्रद्धा मंच पर कदम रखती है।हल्की हवा उसके खुले बालों को छूकर गुजरती है। उसने एक क्षण के लिए श्रीकृष्ण की प्रतिमा की ओर देखा , हाथ जोड़कर प्रणाम किया और फिर माइक के सामने आकर खड़ी हो गई ।

श्रद्धा: (सहज मुस्कान और श्रद्धा भाव के साथ) कहते हैं कि जब मन सच्ची श्रद्धा से भर जाता है तो शब्दो की आवश्यकता कम पड़ जाती है और आज यह संध्या कुछ ऐसी ही हैं।
(थोड़ा रुक कर) भगवान श्रीकृष्ण केवल एक नाम नही हैं वे मुस्कान में छिपी आशा हैं , कठिनाइयों में धैर्य हैं,और जीवन के हर मोड़ पर सही मार्ग दिखाने वाली दिव्य शक्ति हैं।
(अमृत , वंदना दोनो श्रद्धा को देखकर बहुत खुश थे)

श्रद्धा:उनका सम्पूर्ण जीवन हमे यही सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हो यदि मन में विश्वास और कर्म में सच्चाई हो , तो हर संघर्ष पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
(श्रद्धा मुस्कुराते हुए सामने बैठे लोगो की तरफ देखती है)

श्रद्धा: आज की इस शुभ रात्रि में हम सब केवल एक उत्सव मनाने के लिए एकत्र नही हुए है ...बल्कि उस प्रेम ,उस विश्वास और उस भक्ति को अनुभव करने के लिए एकत्र हुए हैं जिसने युगों से मानवता का मार्गदर्शन किया है
(राजेश्वरी जी श्रद्धा को बड़े ध्यान से देख वा सुन रही थी )

राजेश्वरी जी: (हरी प्रसाद जी से) पंडित जी, ये बच्ची कौन है??

हरी प्रसाद जी:(मुस्कुराकर) जी , श्रद्धा बिटिया है। यहीं पास की सोसाइटी में रहती है। बड़ी ही प्यारी बच्ची है , 

राजेश्वरी जी:( श्रद्धा की ओर देखकर हल्की आवाज में नाम दोहराते हुए) श्रद्धा।

श्रद्धा: इस पावन अवसर पर हमारे नन्हे कलाकार अपने निष्कपट प्रयासों से कान्हा जी की मनमोहक बाल लीलाओं को आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे।
आइए, हम सब मिलकर उस नटखट माखनचोर उस प्रेम के सागर, उस योगेश्वर का स्वागत करें , जिनके बिना यह सृष्टि अधूरी है।
बोलिए..... कृष्ण कन्हैया लाल की।....

जय.....(पूरा प्रांगण एक साथ गुंज उठा।)

तालियों की गड़गड़ाहट पूरे मंदिर में फैल गई ,। राजेश्वरी जी की नजर श्रद्धा पर ठहरी हुई थी , वो मासूम मुस्कान , सहज भाव , सुंदर चेहरा , मधुर  वाणी और उसका व्यक्तित्व उन्हे प्रभावित कर रहा था। (उनके चेहरे पर प्रशंसा भरी मुस्कान उभर आई)

और धीरे धीरे मंच पर बच्चो की प्रस्तुतियां शुरू को गई।

आज के लिए बस इतना ही ....आगे जानने के लिए पढ़ते रहें।।।

आशिकी.....अब तुम ही हो।

Thank you to all ...meri kahani ko appreciate krne ke liye😊..!!

Aur kahani pasand aaye to rating aur review jarur den😇

राधे राधे।।।🙏✨