तीनों का प्यार अब एक सा हो गया था…अलग-अलग नहीं…बल्कि एक ही डोर में बंधा हुआ। काफी दिनों बाद…तीनों ने साथ बाहर जाने का प्लान बनाया।
हल्की-सी शाम थी…सड़क पर भीड़ थी…चारों तरफ रोशनी और चहल-पहल।
श्रेया बीच में चल रही थी…उसके एक तरफ करण…और दूसरी तरफ कबीर। तीनों साथ थे…और पहली बार ऐसा लग रहा था जैसे वो सच में एक परिवार हैं।
श्रेया (हल्की मुस्कान के साथ) बोली -
आज अच्छा लग रहा है… ऐसे साथ बाहर आकर…
कबीर मुस्कुरा दिया…और करण ने बस उसे चुपचाप देखा। तभी…थोड़ी दूरी पर खड़ा एक लड़का बार-बार श्रेया की तरफ देख रहा था। उसकी नजरें साफ़ थीं…
वो श्रेया को ही देख रहा था। करण की नजर उस पर पड़ी। एक पल में ही उसके चेहरे का भाव बदल गया।
उसकी आँखों में हल्की सी जलन और गुस्सा आ गया।
करण (धीमे, अपने आप से) बोला -
कौन है ये…?
श्रेया अभी भी अनजान थी…वो बस इधर-उधर देख रही थी। तभी करण ने अचानक अपना हाथ बढ़ाकर
श्रेया को अपनी तरफ खींच लिया। उसका हाथ श्रेया के कंधे पर आ गया। श्रेया हल्का सा चौंकी—
श्रेया बोली -
करण जी…?
करण (थोड़ा सख्त, पर दबे स्वर में) बोला -
बस… ऐसे ही…
उधर कबीर ने भी उस लड़के को देख लिया था। उसका चेहरा गंभीर हो गया। उसने तुरंत श्रेया का हाथ पकड़ लिया।
कबीर (जल्दी में, हल्के गुस्से के साथ) बोला -
चलो जल्दी… वो लड़का देख रहा है…
श्रेया अब समझ गई। उसने एक पल के लिए दोनों को देखा…एक तरफ करण का कंधे पर रखा हाथ…
दूसरी तरफ कबीर की कसकर पकड़ी हुई उंगलियाँ…
उसके दिल में अजीब-सी भावना आई…थोड़ा सा डर…
पर उससे कहीं ज्यादा अपनापन।
श्रेया (धीमे, हल्की मुस्कान के साथ) बोली -
आप दोनों भी ना…
करण ने उस लड़के की तरफ आखिरी बार देखा…फिर अपना ध्यान पूरी तरह श्रेया पर कर लिया। कबीर उसे लेकर थोड़ा आगे बढ़ गया। अब तीनों तेज़ कदमों से चल रहे थे…जैसे एक-दूसरे को अपने घेरे में लेकर।कुछ दूर जाने के बाद…श्रेया रुक गई। दोनों उसकी तरफ देखने लगे।
श्रेया (शरारत भरी मुस्कान के साथ) बोली -
इतनी possesivness…?
कबीर हल्का सा मुस्कुराया—
तुम्हारे लिए… हाँ…
करण ने धीरे से कहा—
क्योंकि तुम हमारी हो…
श्रेया ने दोनों के हाथ और कसकर पकड़ लिए…
श्रेया बोली -
और आप दोनों… मेरे…
तीनों हँस पड़े। शाम की भीड़ में…तीनों एक साथ आगे बढ़ गए। अब डर नहीं था…बस एक साथ होने का अहसास था…॥
शाम धीरे-धीरे रात में बदल रही थी…तीनों अब भी साथ थे…पर अब उनके कदम थोड़े हल्के हो गए थे… जैसे दिल का बोझ कम हो गया हो। आगे एक छोटा सा मेला लगा था…रंग-बिरंगी लाइट्स…खाने की खुशबू…
और लोगों की हँसी…श्रेया की आँखें चमक उठीं।
श्रेया (खुश होकर) बोली -
चलो ना… वहाँ चलते हैं…
कबीर ने तुरंत हाँ कर दी—
तुम्हें जो अच्छा लगे…
करण बस उसे देखता रहा…उसकी मुस्कान में अब डर नहीं था…बस सच्ची खुशी थी।
करण (धीरे) बोला -
चलो…
तीनों मेले के अंदर गए। श्रेया कभी इधर देखती…कभी उधर…जैसे छोटी बच्ची बन गई हो। कभी चूड़ियाँ देखती…कभी झुमके…कबीर उसके पीछे-पीछे चल रहा था…और करण थोड़ा साइड में…पर उसकी नजर हर वक्त श्रेया पर ही थी। तभी श्रेया एक चूड़ी वाले स्टॉल पर रुक गई।
श्रेया (उत्साह से) बोली -
ये वाली कितनी सुंदर है…
वो चूड़ियाँ हाथ में लेकर देखने लगी।
कबीर ने तुरंत दुकानदार से कहा—
भैया, पैक कर दीजिए…
श्रेया ने उसकी तरफ देखा—
अरे… रहने दो…
कबीर (हल्के मुस्कान के साथ) बोला -
तुम्हारे लिए है…
उधर करण चुपचाप खड़ा था…फिर उसने धीरे से दूसरी चूड़ियों का सेट उठाया…जो थोड़ा अलग था…
करण बोला -
ये भी ट्राय करो…
श्रेया ने उसकी तरफ देखा…उसकी आँखों में झिझक नहीं थी…बस अपनापन था। उसने वो चूड़ियाँ पहन लीं।
जब चूड़ियाँ उसकी कलाई में खनकीं…तीनों कुछ पल के लिए चुप हो गए। जैसे उस आवाज़ में उनका रिश्ता बोल रहा हो।
कबीर (धीरे, मुस्कुराते हुए) बोला -
अच्छी लग रही हैं…
करण ने भी सिर हिलाया—
बहुत…
श्रेया हल्का सा शरमा गई। मेले में श्रेया को दो जोड़ी चूड़ियों के set मिल गए। Pink + red वाला करण की तरफ से था । और blue + golden vala कबीर की तरफ से था।
फिर…तीनों आगे बढ़े…और एक झूले के पास रुक गए।
श्रेया ने बच्चों की तरह कहा—
मुझे बैठना है…
कबीर हँस पड़ा—
ठीक है… पर गिरना मत…
करण ने पहले सीट चेक की…फिर उसे बैठाया…खुद एक तरफ खड़ा रहा…और कबीर दूसरी तरफ। झूला धीरे-धीरे चलने लगा। श्रेया हँस रही थी…खुलकर… बिना डर के…दोनों उसे देख रहे थे…
करण (मन ही मन) बोला -
बस… ये मुस्कान कभी ना जाए…
कबीर (धीरे, खुद से) बोला -
इसके लिए कुछ भी…
झूला रुक गया…श्रेया उतरी…और बिना सोचे उसने दोनों का हाथ पकड़ लिया।
श्रेया (खुश होकर) बोली -
आज… बहुत अच्छा लग रहा है…
करण और कबीर ने एक-दूसरे की तरफ देखा…फिर दोनों मुस्कुरा दिए। अब तीनों फिर से भीड़ में चल पड़े इस बार…सिर्फ साथ नहीं…बल्कि सच में…एक हो चुके थे…॥
मेले की चहल-पहल के बीच चलते-चलते अचानक श्रेया रुक गई। उसने हल्के से अपने पेट पर हाथ रखा और दोनों की तरफ देखा।
श्रेया (थोड़ा मासूम अंदाज़ में) बोली -
मुझे भूख लगी है…
कबीर हल्का सा हँस पड़ा।
कबीर बोला -
अभी तो चूड़ियाँ, झूला… सब हो गया… अब मैडम को भूख भी लग गई?
श्रेया ने उसे हल्का सा घूरा—
तो क्या करूँ… लग रही है…
करण ने तुरंत इधर-उधर नजर दौड़ाई।
करण बोला -
पास में एक रेस्टोरेंट है… चलो वहीं चलते हैं…
कबीर ने सिर हिलाया—
चलो…
तीनों मेले से बाहर निकले…और थोड़ी ही दूरी पर एक छोटा सा रेस्टोरेंट दिख गया। अंदर हल्की रोशनी थी…
और माहौल शांत था। तीनों अंदर जाकर एक टेबल पर बैठ गए। श्रेया बीच में…जैसे हमेशा…वेटर मेन्यू देकर चला गया। श्रेया मेन्यू देख रही थी…पर उसे समझ नहीं आ रहा था क्या ऑर्डर करे।
श्रेया (कन्फ्यूज होकर) बोली -
इतना सब है… क्या लूँ…?
कबीर मुस्कुराया—
जो दिल करे…
करण ने धीरे से कहा—
या फिर… जो हम दोनों कहें…
श्रेया ने दोनों की तरफ देखा…और हल्का सा मुस्कुरा दी।
श्रेया बोली -
ठीक है… आप लोग ही ऑर्डर कर दो…
कबीर ने कुछ डिशेस ऑर्डर कर दीं। थोड़ी देर में खाना आ गया। टेबल पर खुशबू फैल गई।श्रेया ने पहला निवाला उठाया…पर जैसे ही खाने लगी करण ने तुरंत पानी का ग्लास उसकी तरफ बढ़ा दिया।
करण बोला -
पहले पानी…
श्रेया ने उसकी तरफ देखा…फिर चुपचाप पानी पी लिया। कबीर ये सब देख रहा था…उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
कबीर बोला -
भैया… अब तो आप पूरी तरह ख्याल रखने लगे हो…
करण थोड़ा झेंप गया।
करण बोला -
बस… आदत हो गई है…
श्रेया ने दोनों को देखा…और उसका दिल फिर से भर आया। वो धीरे-धीरे खाना खाने लगी। कुछ देर तक तीनों चुपचाप खाते रहे…पर वो चुप्पी अजीब नहीं थी…
वो सुकून भरी थी। फिर अचानक श्रेया ने एक निवाला तोड़कर पहले करण की तरफ बढ़ाया। करण चौंक गया—
करण बोला -
श्रेया…?
श्रेया (धीमे) बोली -
खाइए…
करण ने धीरे से वो निवाला खा लिया। फिर श्रेया ने दूसरा निवाला कबीर की तरफ बढ़ाया।
कबीर मुस्कुरा दिया—
ये तो unfair है… मुझे बाद में…
श्रेया बोली -
दोनों बराबर हैं…
कबीर ने भी खा लिया। तीनों हँस पड़े। उस छोटे से रेस्टोरेंट में…तीनों के बीच एक नई सहजता आ गई थी।
अब ना झिझक थी…ना डर…बस एक साथ होने की सादगी थी…और वही…उनके रिश्ते को और गहरा बना रही थी…॥