दो पतियों की लाडली पत्नी - 57 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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दो पतियों की लाडली पत्नी - 57

घर आज कुछ ज़्यादा ही शांत था…कबीर किसी काम से बाहर गया हुआ था। किचन की हलचल खत्म हो चुकी थी…कमरों में बस घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।

श्रेया हॉल में बैठी थी…उसकी नजरें बार-बार दरवाज़े की तरफ उठ जातीं…फिर धीरे से झुक जातीं।उधर…
करन अपने कमरे के कोने में खड़ा था।हाथ मुट्ठियों में बंधे हुए…और आँखें नीचे झुकी हुई। वो बार-बार खुद से लड़ रहा था।

करन (मन ही मन, टूटे हुए स्वर में) बोला था 
मैं उसके सामने कैसे जाऊँ…?
जिसे सबसे ज़्यादा संभालना चाहिए था… उसी को तोड़ दिया…।

उसने दीवार पर हल्का सा मुक्का मारा…पर आवाज़ भी दबाकर…जैसे दर्द भी चुपचाप सहना चाहता हो।
उसी वक्त…श्रेया धीरे-धीरे उसके कमरे के दरवाज़े तक आ गई। उसने कुछ पल उसे यूँ ही खड़े देखा…फिर हल्के से दरवाज़ा खटखटाया।
टुक… टुक…

करन एकदम से चौंक गया। उसने जल्दी से अपने आँसू पोंछे…

और बिना उसकी तरफ देखे बोला—
आ… आओ…

श्रेया धीरे से अंदर आई। कमरे में अजीब सी दूरी थी…
दोनों के बीच कुछ कदमों का फासला…पर वो फासला सिर्फ जगह का नहीं था।कुछ पल…दोनों चुप रहे। फिर श्रेया ने हिम्मत की।

श्रेया (धीमे, हिचकते हुए) बोली - 
आप… मुझसे अब भी नज़रें क्यों चुरा रहे हैं…?

करन की सांस अटक गई। उसने नजरें उठाईं…पर सिर्फ एक पल के लिए…फिर तुरंत झुका लीं।

करन (टूटे हुए स्वर में) बोला - 
क्योंकि… मैं खुद से भी नज़रें नहीं मिला पा रहा…

श्रेया का दिल कस गया। वो धीरे-धीरे उसके करीब आई…पर कदम बहुत संभलकर रख रही थी।

श्रेया बोली - 
हर बार खुद को सज़ा देंगे… तो क्या सब ठीक हो जाएगा…?

करन हल्का सा हँसा…पर वो हँसी दर्द से भरी थी।

करन बोला - 
कम से कम… मुझे लगेगा कि मैं इसकी सज़ा भुगत रहा हूँ…।

श्रेया अब उसके बिल्कुल सामने थी। उसने पहली बार बिना डर के…सीधे उसकी आँखों में देखा।

श्रेया (धीमे, साफ शब्दों में) बोली - 
मुझे डर लगा था… बहुत…

करन की सांस रुक गई।

श्रेया (आँखें नम होते हुए) बोली - 
पर… आपने मुझे अकेला नहीं छोड़ा था।

करन की आँखों में हैरानी उभरी।

श्रेया बोली - 
आप रात भर मेरे साथ थे…मुझे संभालते रहे… खुद रोते रहे…। मुझे याद है उस रात भी आप रो रहे थे। भले ही मैं ज्यादा होश में नहीं थी पर मुझे आपके चेहरे की नमी महसूस हो रही घी।

अब करन की आँखों से आँसू बहने लगे।

करन (टूटते हुए) बोला - 
वो सब करने के बाद… मुझे हक नहीं था तुम्हें छूने का भी…।

श्रेया ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। करन एकदम सिहर गया…जैसे उसे यकीन ही नहीं हुआ।

श्रेया (धीमे) बोली - 
गलती हुई थी…पर आपने सिर्फ वही गलती नहीं हैं…

कमरे में सन्नाटा छा गया। करन उसके हाथ को देखता रह गया…फिर धीरे से अपनी उंगलियाँ ढीली कर दीं।

करन (डरते हुए) बोला - 
मैं… फिर से तुम्हें डराना नहीं चाहता…

श्रेया ने सिर हल्का सा ना में हिलाया।

श्रेया बोली - 
डर अब भी है...पर… भरोसा भी थोड़ा-थोड़ा आ रहा है…।

ये सुनते ही…करन पूरी तरह टूट गया। उसने धीरे से घुटनों के बल बैठकर अपना सिर झुका लिया।

करन (रोते हुए) बोला - 
मैं कोशिश करूँगा…हर दिन… खुद को बेहतर बनाने की…।

श्रेया का दिल भर आया। उसने झुककर…बहुत हिचकिचाते हुए…करन के सिर पर अपना हाथ रख दिया। करन एकदम स्थिर हो गया…जैसे उसे पहली बार… माफी की हल्की सी छाया मिली हो। कमरे में अब भी खामोशी थी…पर वो खामोशी भारी नहीं थी।
वो एक शुरुआत थी…धीमी… नाज़ुक…पर सच्ची…॥

श्रेया ने धीरे से झुककर उसे अपने सीने से लगा लिया…
जैसे किसी टूटे हुए बच्चे को संभाल रही हो। करण एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर हो गया…फिर जैसे उसके अंदर दबा हुआ सारा दर्द एक साथ बाहर आ गया।
उसकी सिसकियाँ तेज हो गईं…उसने श्रेया को कसकर पकड़ लिया…जैसे वो उसे खो देने से डर रहा हो।

करण (टूटे हुए स्वर में) बोला - 
मैं… मैं इसके लायक नहीं हूँ श्रेया…मैंने तुम्हें दर्द दिया है…।

श्रेया ने उसकी पीठ पर धीरे-धीरे हाथ फेरना शुरू किया…उसकी उंगलियाँ बेहद नरम थीं… पर उनमें अजीब सा सुकून था।

श्रेया (धीमे, संभालते हुए) बोली - 
मैं हूँ ना… आपको guilt करने की कोई ज़रूरत नहीं है…।

करण की पकड़ और कस गई।

श्रेया (थोड़ा रुककर, गहरी सांस लेकर) बोली - 
पति हो आप दोनों मेरे…मेरे साथ ये सब आप दोनों नहीं करोगे… तो कौन करेगा…?

ये सुनकर करण जैसे अंदर तक हिल गया। उसने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया…आँखें लाल थीं… पर उनमें एक सवाल भी था… और डर भी।

करण बोला - 
तुम… सच में मुझे माफ़ कर पाओगी…?

श्रेया ने उसकी आँखों में देखा…कुछ पल चुप रही…फिर हल्के से सिर हिला दिया।

श्रेया बोली - 
पूरी तरह… शायद अभी नहीं…पर कोशिश… कर रही हूँ…।

करण की आँखों से फिर आँसू बहने लगे…पर इस बार उनमें सिर्फ दर्द नहीं था…थोड़ी सी राहत भी थी। श्रेया ने उसे फिर से अपने पास खींच लिया…और इस बार करण बिना झिझक उसके सीने में छुप गया। कमरे में सिर्फ उसकी सिसकियों की आवाज़ थी…और श्रेया की धड़कनों की…कुछ देर बाद…करण थोड़ा संभला…पर अभी भी उसका सिर श्रेया के सीने से लगा हुआ था।

करण (धीमे, थके हुए स्वर में) बोला - 
मैं वादा करता हूँ…अब कभी तुम्हें डरने की वजह नहीं बनूँगा…।

श्रेया ने हल्की सी मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा…

श्रेया बोली - 
बस… यही चाहिए मुझे…

उसी वक्त…दरवाज़े के बाहर हल्की सी आहट हुई। कबीर वापस आ चुका था…वो दरवाज़े पर खड़ा था…
और अंदर का नज़ारा देख रहा था।उसकी आँखों में एक अजीब सा मिश्रण था दर्द… राहत… और थोड़ा सा खालीपन। उसने देखा…श्रेया ने करण को अपने सीने से लगा रखा था…

कबीर (मन ही मन, हल्की टीस के साथ) बोला - 
शायद… ये पल उनका था…

वो चुपचाप मुड़ने लगा… पर तभी श्रेया की नजर दरवाज़े पर पड़ी।

श्रेया (धीमे, पर साफ आवाज़ में) बोली - 
कबीर जी… अंदर आओ…

कबीर रुक गया। उसने धीरे से दरवाज़े की तरफ देखा…फिर वापस उनकी तरफ। करण ने भी सिर उठाया…उसकी आँखें कबीर से मिलीं। कुछ पल…तीनों के बीच एक खामोश संवाद हुआ। फिर…कबीर धीरे-धीरे अंदर आया। उसके कदम भारी थे…पर वो रुका नहीं। श्रेया ने अपना एक हाथ आगे बढ़ाया…

श्रेया (नरम आवाज़ में) बोली - 
यहाँ आओ…

कबीर कुछ पल हिचकिचाया…फिर आकर उनके पास बैठ गया। अगले ही पल…श्रेया ने उसे भी अपने पास खींच लिया। अब तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए थे… करण अब भी सिसक रहा था…कबीर चुप था… पर उसकी आँखें नम थीं…और श्रेया…दोनों को थामे हुए थी…जैसे वो सिर्फ एक लड़की नहीं…बल्कि उनके टूटे हुए दिलों का सहारा बन चुकी हो।
उस दिन…पहली बार…तीनों ने अपने दर्द को छुपाया नहीं…बल्कि…एक-दूसरे में बाँट दिया…॥

कमरे में गहरी खामोशी थी…तीनों एक-दूसरे के करीब थे…पर दिलों में अब भी हलचल चल रही थी।श्रेया ने धीरे से दोनों को देखा…पहले करण… फिर कबीर…उसकी आँखों में अब डर कम था…और एक अजीब-सी दृढ़ता आ गई थी।

श्रेया (धीरे, साफ आवाज़ में) बोली - 
मैं सिर्फ आप दोनों की हूँ…और आप दोनों मेरे पति हो…।

दोनों भाई एक साथ उसकी तरफ देखने लगे। जैसे उनकी सांसें रुक गई हों।

श्रेया (हल्का रुककर) बोली - 
हक है आपका मुझपर…

ये शब्द सुनकर करण और कबीर दोनों अंदर तक हिल गए। करण के चेहरे पर दर्द उभर आया।उसने तुरंत सिर हिलाया—

करण (घबराकर, टूटे स्वर में) बोला - 
नहीं श्रेया… ऐसा मत कहो…हक का मतलब ये नहीं कि मैं तुम्हें दर्द दूँ…।

उसकी आवाज़ कांप रही थी।कबीर भी चुप नहीं रह पाया—

कबीर (गंभीर, पर नरम स्वर में) बोला - 
हक है… पर जबरदस्ती नहीं…हम तुम्हें डराकर कुछ नहीं चाहते…।

श्रेया ने दोनों की बातें सुनी…उसकी आँखें भर आईं…

श्रेया (धीरे, समझाते हुए) बोली - 
मैं जानती हूँ…और अब मुझे ये भी समझ आ रहा है कि आप दोनों मुझे कितना चाहते हो…।

वो थोड़ा और करीब आई…और दोनों के हाथ अपने हाथों में ले लिए।

श्रेया बोली - 
मैं ये नहीं कह रही कि जो हुआ वो सही था…पर मैं ये भी नहीं चाहती कि आप दोनों खुद को सज़ा देते रहो…

करण की आँखों से आँसू बह निकले। कबीर ने धीरे से उसकी उंगलियाँ कस लीं।

श्रेया (टूटती पर सच्ची आवाज़ में) बोली - 
अगर हम साथ हैं…तो हमें एक-दूसरे को ठीक भी करना होगा…।

कुछ पल… कोई कुछ नहीं बोला।

फिर करण ने धीरे से कहा—
मैं… तुम्हारा हक तभी लूँगा…जब तुम खुद बिना डर के मेरे पास आओगी…।

कबीर ने भी सिर हिलाया—

कबीर बोला - 
और मैं भी…तुम्हारी मुस्कान के बिना… कुछ नहीं चाहता मैं…।

श्रेया की आँखों में हल्की चमक आ गई। उसने दोनों को फिर से अपने पास खींच लिया…अब ये सिर्फ “हक” की बात नहीं थी…ये भरोसे की शुरुआत थी… जहाँ तीनों ने एक नई लाइन खींची प्यार रहेगा…हक रहेगा…
पर सबसे ऊपर…एक-दूसरे का दिल रहेगा…॥