अगले दिन सुबह की हल्की धूप कमरे में फैल रही थी।
श्रेया की नींद धीरे-धीरे खुली। उसने हल्का सा हिलना चाहा, पर उसे महसूस हुआ कि वह दोनों तरफ से किसी की बाहों में घिरी हुई है।
उसने आँखें खोलीं…और जो उसने देखा, उससे उसका दिल एक पल के लिए थम गया। वह करन के सीने से लगी हुई थी। करन की बाँहें उसे ढके हुए थीं, जैसे वह उसे हर डर से बचा लेना चाहता हो। उसकी साँसें शांत थीं, पर उसके चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी।
वहीं पीछे से…कबीर उसकी पीठ से चिपका हुआ था।
उसकी एक बाँह श्रेया की कमर के पास थी, और दूसरी उसके नीचे दबी हुई थी।जैसे उसने उसे रात भर छोड़ने की हिम्मत ही नहीं की हो।
श्रेया कुछ पल के लिए बिल्कुल स्थिर रह गई। उसका दिल तेज़ धड़कने लगा। इतनी नज़दीकी… इतना अपनापन… और साथ ही एक अनजाना डर।
श्रेया (मन ही मन, हल्की घबराहट में) बोली -
ये… ये क्या है… मैं… मैं दोनों के बीच…?
उसने धीरे से अपना सिर उठाया और करन के चेहरे की तरफ देखा। करन सो रहा था, पर उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई थी। जैसे नींद में भी वह उसे खोना नहीं चाहता हो।
फिर उसने पीछे महसूस किया कबीर की साँसें उसकी गर्दन को छू रही थीं। वो भी गहरी नींद में था, पर उसकी पकड़ में एक अजीब सा डर और लगाव था।
श्रेया की आँखें भर आईं। उसे पहली बार महसूस हुआ कि दोनों ही उसे खोने से डरते हैं…दोनों ही अंदर से टूटे हुए हैं…।
श्रेया (धीमे मन में) बोली -
ये दोनों… इतने टूटे हुए क्यों हैं…?
वो कुछ पल वैसे ही चुप रही। न उसने खुद को छुड़ाया…न ही किसी को जगाया…धीरे-धीरे उसका डर थोड़ा कम होने लगा। दोनों की बाहों में उसे एक अजीब सी सुरक्षा महसूस हो रही थी।
उसने हल्के से आँखें बंद कर लीं। उसका दिल अब भी भारी था, पर उसमें एक नरमी आ गई थी। तभी करन हल्का सा हिला। उसकी पकड़ थोड़ी और कस गई, जैसे वह नींद में भी उसे अपने पास महसूस कर रहा हो।
करन (नींद में बुदबुदाते हुए) बोला -
श्रेया… कहीं मत जाना…
श्रेया का दिल पिघल गया। उसी वक्त कबीर भी हल्का सा हिला, और उसकी पकड़ भी और गहरी हो गई।
कबीर (धीमे, नींद में) बोला -
मत छोड़ना…
अब श्रेया खुद को रोक नहीं पाई।उसकी आँखों से आँसू बह निकले—पर इस बार दर्द के नहीं…बल्कि इस एहसास के कि…वो दोनों के लिए कितनी ज़रूरी है।
वो दोनों के बीच चुपचाप पड़ी रही न डर पूरी तरह गया था…न ही दर्द…पर पहली बार…उसे लगा कि शायद… सब कुछ ठीक हो सकता है।
कमरे में अब भी वही खामोशी थी…पर अब उस खामोशी में एक अजीब सा सुकून भी था। श्रेया अब जाग चुकी थी…पर वो वैसे ही दोनों के बीच चुपचाप लेटी रही।जैसे अगर वो हिली… तो ये पल टूट जाएगा।
उसकी उंगलियाँ धीरे से करन की शर्ट को पकड़ लेती हैं। और पीछे… कबीर की पकड़ उसकी कमर पर हल्की सी और कस जाती है।
श्रेया (मन ही मन, हल्की काँपती सांसों के साथ) बोली-
क्या सच में… ये दोनों मुझे इतना चाहते हैं…?
उसी वक्त…करन की नींद धीरे-धीरे खुलने लगी। उसने हल्की सी आँखें खोलीं…और जैसे ही उसे एहसास हुआ कि श्रेया उसके सीने से लगी है उसका दिल जोर से धड़क उठा। वो एकदम से घबरा गया।
करन (मन में, घबराहट से) बोला -
नहीं… मैं… मैं फिर से इसे डरा दूँगा…
वो धीरे से खुद को पीछे खींचने लगा…ताकि श्रेया उससे दूर हो जाए। पर तभी…श्रेया ने उसका शर्ट और कसकर पकड़ लिया।
श्रेया (धीरे, आँखें बंद किए हुए) बोली -
मत हटिए…
करन ठहर गया। उसके हाथ हवा में ही रुक गए।
करन (हकलाते हुए, बहुत धीमे) बोला -
श्रेया… मैं… मैं तुम्हें डराना नहीं चाहता…
श्रेया ने धीरे से आँखें खोलीं। उसकी आँखों में अब भी डर था…पर साथ में भरोसे की हल्की सी झलक भी थी।
श्रेया (धीमे, टूटती आवाज़ में) बोली -
डर तो लगता है… पर… आपसे दूर जाने से ज़्यादा…
करन की आँखें भर आईं।वो कुछ बोल ही नहीं पाया।
उसी समय…पीछे से कबीर भी जाग गया। उसने जैसे ही ये सब सुना…उसका दिल भी कस गया।
कबीर (धीरे, शांत पर दर्द भरी आवाज़ में) बोला -
अगर डर लगे… तो हम दोनों हैं ना…
श्रेया ने हल्का सा सिर घुमाकर कबीर की तरफ देखा।
उसकी आँखों में सवाल थे…पर साथ ही एक उम्मीद भी। कबीर ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।
कबीर बोला -
हम तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे… कभी नहीं…
अब तीनों के बीच एक अजीब सी खामोशी थी…पर इस बार वो खामोशी बोझ नहीं…बल्कि एक नया रिश्ता बना रही थी।श्रेया ने धीरे-धीरे खुद को थोड़ा सा दोनों के और करीब कर लिया। जैसे पहली बार…वो खुद अपनी मर्ज़ी से उनके पास आ रही हो।
उसका दिल अब भी पूरी तरह शांत नहीं था…पर अब उसमें डर के साथ-साथ…थोड़ा सा भरोसा भी था। और शायद…यही उस रिश्ते की नई शुरुआत थी…जहाँ दर्द भी था…पर साथ में संभालने वाले दो हाथ भी थे…॥
किचन में हल्की-हल्की खुशबू फैल रही थी। चूल्हे पर सब्ज़ी बन रही थी… और श्रेया शांत चेहरे के साथ उसे चला रही थी।
पर आज कुछ अलग था…आज वो अकेली नहीं थी। करन उसके पास खड़ा था…चुपचाप सब्ज़ियाँ काट रहा था। उसकी नजरें बार-बार श्रेया पर चली जातीं… फिर तुरंत झुक जातीं। जैसे वो अब भी खुद को उसके लायक नहीं समझ पा रहा था।
और तभी…पीछे से कबीर आया…और बिना कुछ कहे श्रेया को अपनी बाहों में ले लिया। श्रेया एक पल के लिए हल्का सा चौंकी…उसके हाथ रुक गए।
श्रेया (धीमे, हल्की घबराहट में) बोली -
क… कबीर जी… क्या कर रहे हो…?
कबीर ने अपना चेहरा उसके कंधे के पास छुपा लिया।
कबीर (धीमी, सुकून भरी आवाज़ में) बोला -
बस… ऐसे ही… अच्छा लगता है…
उसकी साँसें श्रेया की गर्दन को छू रही थीं।श्रेया का दिल तेज़ धड़कने लगा…पर इस बार वो खुद को अलग नहीं कर पाई। करन ये सब देख रहा था…उसके हाथ रुक गए।एक पल के लिए उसके दिल में चुभन हुई…
पर अगले ही पल उसने अपनी नजरें झुका लीं।
करन (मन ही मन) बोला -
मुझे हक नहीं है… मैं बस… दूर से ही देख सकता हूँ…
श्रेया ने ये महसूस कर लिया। उसने हल्का सा सिर घुमाकर करन की तरफ देखा।
श्रेया (धीमे, नरम आवाज़ में) बोली -
आप… वहाँ क्यों खड़े हैं…?
करन चौंक गया।
करन बोला -
मैं… मैं बस… काम कर रहा था…
श्रेया ने गैस बंद की… और धीरे से कबीर की पकड़ से खुद को थोड़ा सा छुड़ाया। फिर वो करन के पास आई…और उसके हाथ से चाकू लेकर साइड रख दिया।
करन (घबराकर) बोला -
श्रेया… मैं… कुछ गलत—
श्रेया ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।
श्रेया (धीरे, आँखों में नमी के साथ) बोली -
आप दूर क्यों जा रहे हैं…?
करन बिल्कुल चुप हो गया। उसके पास कोई जवाब नहीं था। पीछे खड़ा कबीर ये सब देख रहा था…उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई।
कबीर (हल्के मज़ाक में, पर गहराई के साथ) बोला -
भैया… अब भागने से काम नहीं चलेगा…
करन ने उसकी तरफ देखा…उसकी आँखों में अब भी दर्द था… पर साथ में एक हल्की सी उम्मीद भी। श्रेया ने धीरे से दोनों के हाथ पकड़ लिए। अब तीनों एक साथ खड़े थे…किचन के बीचों-बीच…
श्रेया (धीमे, टूटती पर सच्ची आवाज़ में) बोली -
मैं… कोशिश कर रही हूँ… समझने की… आप दोनों को…।
कबीर ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
कबीर बोला -
हम भी… खुद को बदलने की कोशिश कर रहे हैं…
करन की आँखों से एक आँसू गिर गया।
करन (बहुत धीरे) बोला -
और मैं… हर दिन खुद को माफ़ करने की कोशिश कर रहा हूँ…।
कुछ पल के लिए तीनों चुप हो गए। फिर…श्रेया ने हल्का सा मुस्कुराने की कोशिश की।
श्रेया बोली -
अब खाना बनाएं… या ऐसे ही खड़े रहेंगे…?
कबीर हँस पड़ा…और फिर से पीछे से उसे हल्के से पकड़ लिया—इस बार थोड़ा संभलकर। करन ने भी अपने आँसू पोंछे। और फिर से काम में लग गया। पर इस बार…वो अकेला नहीं था। तीनों के बीच अब भी उलझनें थीं…दर्द था…पर उस किचन में आज पहली बार…एक घर जैसा एहसास भी था…॥