दो पतियों की लाडली पत्नी - 55 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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दो पतियों की लाडली पत्नी - 55

कबीर उस समय पूरी तरह टूट चुका था।
उसका दिल बेचैन था, दिमाग़ उलझनों से भरा हुआ था। उसे महसूस हुआ कि उसे किसी की ज़रूरत है—किसी ऐसे इंसान की जो उसे संभाल सके।
जिसकी मौजूदगी उसे भीतर से मजबूत बनाए।

कबीर (धीमे स्वर में अपने आप से) बोला - 
मुझे… मुझे कोई चाहिए… कोई ऐसा जो मुझे रोक सके… जो मुझे फिर से खुद बनाये।

उसे अपने भाई करन की याद आने लगी।
उसने सोचा कि करन हमेशा उसके लिए वहां रहता था।
बचपन में, जब भी कबीर किसी मुश्किल में फंसता, डरता या अकेला होता, करन उसे हर तरह की मुसीबत से बचा लेता था। कबीर का दिल भर आया।

कबीर (आँखों में आंसू, फफकते हुए) बोला - 
करन… भैया… आप हमेशा मेरी ताकत रहे हो… जब मैं डरता था, आपने मुझे संभाला… अब… अब मुझे फिर से आपकी जरूरत है।

उसने अपने भीतर उस बचपन की यादों को ताज़ा किया जिस दिन करन ने उसे उसके डर से बाहर खींचा,
जिस दिन करन ने उसकी हर गलती पर उसे समझाया,
जिस दिन करन ने उसके लिए खुद को थकाया, रोया, पर कभी हार नहीं मानी।

कबीर अब महसूस कर रहा था कि उसके अंदर जो डर और बेचैनी है, उसे दूर करने के लिए उसे वही ताकत चाहिए थी जो बचपन में उसके भाई ने दी थी। वह अकेला था, पर उसकी आँखों में एक उम्मीद जगी—
कि करन की याद और उसका प्यार उसे फिर से संभाल सकते हैं।

कबीर धीरे-धीरे अपनी साँसों को गहरा करता रहा।
उसने महसूस किया कि अब वह अकेला नहीं था।
उसके भीतर की कमजोरी, डर और दर्द, करन की याद से धीरे-धीरे शांत होने लगे।

कबीर (धीमे स्वर में, खुद से) बोला - 
भैया… अगर आप यहाँ होते… तो मुझे पता होता कि मैं सुरक्षित हूँ… अब भी, आपकी याद मेरे साथ है… और शायद यही मुझे मजबूत बनाएगी।

रात की खामोशी में, कबीर ने अपने टूटे हुए दिल को संभालने की कोशिश की। भले ही करन पास नहीं था, पर उसकी याद और बचपन की सुरक्षा की अनुभूति ने उसे थोड़ी राहत दी। उसकी आँखों में आंसू थे, पर उसके होठों पर हल्की मुस्कान भी उभर रही थी।

वो जान गया था—कभी भी अकेला होने पर भी, उसके पास उसकी यादें और करन की मौजूदगी हमेशा थीं।
और यही उसकी ताकत बन गई।

वहीं करन बेचैन हो रहा था। उसने धीरे-धीरे श्रेया को अपनी बाहों से दूर किया और बिस्तर पर आराम से लिटाया। वो खुद भी कुछ हल्का महसूस करना चाहता था, पर उसकी नजरें कबीर की तरफ चली गईं।

करन चुपचाप कबीर के कमरे की तरफ बढ़ा।
दरवाजे के पास पहुँचकर उसने देखा कि कबीर बुरी तरह टूट चुका था। आँखों में आंसू, शरीर थरथरा रहा था। वह रो-रोकर बच्चों की तरह बुरी हालत में था।

करन धीरे से अंदर गया। कबीर ने जैसे ही करन को देखा, वह भागते हुए उसके पास लिपट गया। बचपन की तरह, जिस तरह कभी करन ने उसे गले लगाया था,
अब वही करन उसके सामने खड़ा था।

कबीर (रोते हुए, बुरी तरह फफकते हुए) बोला - 
भैया… भैया… मुझे… मुझे संभालो… मुझे… मैं नहीं सह पा रहा…

करन ने उसे मजबूत हाथों से गले लगा लिया।
वह महसूस कर रहा था कि उसका छोटा भाई कितना टूटा हुआ है।

करन (धीमे स्वर में, गले में कांपते हुए) बोला - 
शांत हो जा, कबीर… मैं यहाँ हूँ… सब ठीक हो जाएगा… बस रोते रह…

कबीर बच्चे की तरह उसके गले में सिर दबा कर रोने लगा। उसकी सारी बेचैनी, डर और कमजोरी बाहर आ रही थी। करन ने उसे धीरे-धीरे अपने सीने से लगाकर सहलाना शुरू किया। हर बार जब कबीर फफकता,

 करन उसे थपथपाता और कहता -
ठीक है, ठीक है… मैं हूँ ना… अब तु अकेला नहीं है।

कबीर ने थोड़ी देर के लिए करन की बाहों में सिर दबाकर रोना जारी रखा। उसके आँसुओं की हर बूंद ने करन के दिल को भी पिघला दिया। वह महसूस कर रहा था कि उसका छोटा भाई अब भी वही मासूम और नाज़ुक बच्चा है, जिसे वह बचपन में हर मुश्किल से बचाता था।

कबीर धीरे-धीरे करन की बाहों में थम गया। उसका रोना कम हुआ, पर आंखों में नमी अभी भी थी।
करन ने उसे चुपचाप अपनी बाहों में समेट लिया।
उसने महसूस किया कि इस टूटे हुए भाई को सिर्फ प्यार और समझ की जरूरत थी।

करन (धीमे स्वर में, खुद से सोचते हुए) बोला - 
कबीर… अब तु अकेला नहीं है… मैं हूँ… हमेशा तेरे साथ रहूँगा। चाहे जो भी हो जाए…

रात की खामोशी में, दोनों भाई बस एक-दूसरे के पास बैठे रहे। कबीर अब रो-रोकर थक गया था, पर करन की मौजूदगी ने उसे धीरे-धीरे शांत किया। यह रात, टूटे हुए दिलों को जोड़ने और उनकी मजबूती का सबूत थी।

करन ने जैसे-तैसे कबीर को शांत किया। उसने उसे अपने कमरे में ले जाकर बिस्तर पर बैठाया। धीरे-धीरे दोनों भाई श्रेया की तरफ लिट गए। श्रेया गहरी नींद में थी, unaware कि उसके दोनों पति अब उसके पास थे। करन ने धीरे-धीरे कबीर को समझाना शुरू किया।

वो बोला - 
कबीर… मैं जानता हूँ कि तु नहीं समझ पा रहा कि ये क्यों डरती है। श्रेया… डर चुकी है… ये सब… मेरी वजह से हुआ। उस रात जब मैंने… मैं नहीं चाहता था कि ऐसा हो, पर मेरी कमजोरी की वजह से… उसने दर्द सहा।
उसकी आँखें और उसका दिल अभी भी डर से भर गए हैं....

कबीर आँखें फैलाकर करन की बात सुन रहा था।
वह भौचक्का था कि उसका बड़ा भाई इतना टूट चुका था कि उसे खुद भी यही रास्ता दिखा रहा है।

कबीर (धीमे स्वर में) बोला - 
भैया… आपके emotions… आपकी मजबूरी … मुझे समझ में आ रही है।
आपने जो भी किया.... आपका मकसद उसे hurt करना नहीं था....पर बस आप...control नहीं कर पाए...।

करन ने सिर झुकाकर कबीर से कहा -
हां… कबीर… मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा है। 
मैं अपनी feelings control नहीं कर पाया...और इसी वजह से श्रेया को तकलीफ हुई....
और मैं चाहता हूं कि तू समझ... मैं अभी भी उसका ख्याल रखता हूं... और तेरा भी...

कबीर ने धीरे से करन के हाथ पकड़ लिए।

 वो बोला - 
भैया… मैं समझ गया....पर हमारी श्रेया के लिए हमे साथ रहना होगा....उसे अभी तक shock है...उसे पता नहीं कि हम दोनों उसे कितना प्यार करते हैं....।

करन ने सिर हिलाते हुए कहा -
बिल्कुल…मैं नहीं चाहता कि इसे और डर लगे...और मैं चाहता हूं हम दोनों इसे संभाले...जैसे बचपन में हम एक दूसरे को संभलते थे...।

उस रात, तीनों एक साथ बिस्तर पर लेटे रहे।
श्रेया नींद में थी, पर उसके दोनों पति उसके पास मौजूद थे। करन और कबीर ने धीरे-धीरे एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। वो जानते थे कि अब उनकी जिम्मेदारी सिर्फ श्रेया नहीं, बल्कि एक-दूसरे की भी थी। वो रात, टूटे हुए दिलों और डर को सुलझाने और प्यार को समझने की रात बन गई।