द रिंग - रिटर्न ऑफ कर्मा
कहते हैं...
कुछ आत्माएँ मरने के बाद भी शांति नहीं पातीं।
वे इंतज़ार करती हैं...
उस दिन का...
जब उनका अधूरा हिसाब पूरा हो सके।
सिल्वर सिटी से बहुत दूर...
घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच बसा था एक छोटा सा गाँव—
शिवकालीपुरम।
और उसी गाँव के किनारे खड़ी थी एक विशाल हवेली।
एक ऐसी हवेली...
जिसका नाम सुनते ही लोगों के चेहरों का रंग उड़ जाता था।
क्योंकि बीस साल पहले...
उसी हवेली में एक भयानक हत्या हुई थी।
एक मासूम लड़की की हत्या।
उसका कसूर सिर्फ इतना था कि उसने गलत लोगों पर भरोसा कर लिया था।
उस रात हवेली उसकी चीखों से गूँज उठी थी।
लेकिन उसकी चीखें सुनने वाला कोई नहीं था।
उसके साथ विश्वासघात हुआ...
उसे बेरहमी से मार दिया गया...
और उसकी कहानी को हमेशा के लिए दफन कर दिया गया।
लेकिन...
उसकी आत्मा नहीं मरी।
मौत के बाद उसकी आत्मा एक रहस्यमयी लाल नग वाली अंगूठी में कैद हो गई।
एक ऐसी अंगूठी...
जो देखने में किसी खजाने से कम नहीं थी।
बीस साल तक...
वह आत्मा उस अंगूठी के भीतर कैद रही।
न ज़िंदा...
न पूरी तरह मृत।
बस एक ही इंतज़ार में...
आज़ादी के इंतज़ार में।
और फिर...
बीस साल बाद...
किस्मत ने एक बार फिर करवट ली।
दो बेबकूफ लोगों पैसों के लालच में उसे आज़ाद कर दिया
उन्हें लगा कि अब वे अमीर होने वाले हैं...
लेकिन उन्हें नहीं पता था...
उन्होंने एक ऐसे श्राप को जगा दिया है
जो बीस साल से बदले की आग में जल रहा था।
एक आत्मा...
एक अंगूठी...
और एक अधूरा बदला...
अब वापस लौटने वाला था।
THE RING: RETURN OF कर्मा
शहर से लगभग 150 किलोमीटर दूर, जंगलों के बीचो-बीच बनी एक विशाल और सदियों पुरानी सुनसान हवेली। यह बंगला शहर के एक बहुत बड़े बिजनेसमैन राघवन ने कुछ ही समय पहले खरीदा था। लेकिन रहने आने के कुछ ही दिनों बाद, यहाँ रात के सन्नाटे में पायल की छन-छन, दीवारों पर खून के धब्बे और हवा में तैरती हुई परछाइयाँ दिखने लगीं। इन डरावनी हरकतों (Unnatural Activities) की वजह से राघवन ने डर के मारे रातों-रात यह बंगला खाली कर दिया।
परेशान होकर राघवन ने इंटरनेट पर छानबीन की और उसे एक अजीब और कड़क वेबसाइट मिली— "www.BhootPukaarDafnaar.com"। यह वेबसाइट किसी और की नहीं, बल्कि शहर के सबसे मशहूर और शातिर घोस्ट कैचर 'कार्तिकेयन' (कार्थी) की थी, जो हर केस को सॉल्व करने की फिक्स फीस ५०००० रुपये लेता है—ना एक रुपया कम, ना एक रुपया ज़्यादा।
बॉस... मुझे इस बंगले की हवा ठीक नहीं लग रही। यहाँ की मकड़ियाँ भी हमें देखकर मुस्कुरा रही हैं। चलो ना बॉस, ५०००० के चक्कर में कहीं हमारी तेरहवीं की दावत न हो जाए!
पंडी
(रोने जैसी शक्ल बनाकर)
हाँ बॉस! अगर भूतनी ने हमारे भीतर की आत्मा निकाल ली, तो एडवांस में लिए २५००० रुपये राघवन सर को वापस कौन करेगा?
(बिना पीछे मुड़े, स्वैग से चश्मा हटाते हुए)
पुलिकेशी... पंडी... ज़बान को लगाम दो! कार्तिकेयन का घोस्ट डिटेक्टर कभी झूठ नहीं बोलता। इस बंगले में जो कोई भी है, आज उसका टिकट कटना पक्का है। तुम दोनों बस पीछे रहो और बैकअप संभालो।
जैसे ही तीनों बंगले के बड़े हॉल के बीच में पहुँचते हैं, अचानक ज़ोरदार धमाके के साथ मुख्य दरवाज़ा खुद-ब-खुद बंद हो जाता है!
हॉल का झूमर अपने आप ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगता है और पूरी हवेली में एक औरत के भयानक खिलखिलाकर हंसने की आवाज़ गूंज उठती है।
भूतनी की आवाज़
(गंभीर और डरावनी आवाज़ में)
"यहाँ जो आता है... वो वापस नहीं जाता..."
आवाज़ सुनते ही पुलिकेशी और पंडी चिल्लाते हुए सीधे कार्थी की पीठ पर बंदर की तरह चढ़ जाते हैं। कार्थी दोनों के बोझ से नीचे झुक जाता है, लेकिन अपना कड़क अंदाज़ नहीं छोड़ता।
कहानी जारी रहेगी...