वोह मुलाकात Vijay Erry द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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वोह मुलाकात

वोह मुलाकात
भावपूर्ण हिंदी कहानी
लेखक: विजय शर्मा ऐरी
बरसात की हल्की-हल्की बूंदें आसमान से गिर रही थीं। शाम का समय था। शहर के पुराने रेलवे स्टेशन पर लोगों की भीड़ लगी हुई थी। कोई अपने प्रियजन को विदा करने आया था, तो कोई किसी का इंतजार कर रहा था।
प्लेटफॉर्म नंबर तीन की एक बेंच पर बैठा अमन बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था। उसकी आंखों में बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी।
"क्या वह आएगी?" उसने मन ही मन सोचा।
पांच साल...
पूरे पांच साल बाद आज वह अपनी जिंदगी के सबसे खास इंसान से मिलने वाला था।
उसका नाम था नेहा।
नेहा और अमन एक समय एक-दूसरे से बेहद प्यार करते थे। कॉलेज में दोनों की दोस्ती हुई थी और धीरे-धीरे वह दोस्ती प्रेम में बदल गई थी।
दोनों अक्सर साथ बैठकर भविष्य के सपने देखा करते थे।
एक दिन कॉलेज की कैंटीन में नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा था—
"अमन, अगर हम शादी करेंगे तो हमारा छोटा-सा घर होगा।"
अमन हंस पड़ा था।
"और उस घर के बाहर एक छोटा-सा बगीचा होगा।"
"और उसमें ढेर सारे फूल होंगे।"
"और उनमें सबसे सुंदर फूल तुम होगी।"
यह सुनकर नेहा शरमा गई थी।
दोनों की दुनिया बहुत खूबसूरत थी।
लेकिन जिंदगी हमेशा इंसान की योजनाओं के अनुसार नहीं चलती।
कॉलेज खत्म होने के बाद अमन को नौकरी के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा।
उधर नेहा के परिवार पर अचानक आर्थिक संकट आ गया।
उसके पिता बीमार पड़ गए।
घर की जिम्मेदारियां बढ़ गईं।
इसी दौरान नेहा के परिवार ने उसकी शादी तय कर दी।
नेहा ने बहुत कोशिश की।
उसने अमन को फोन किया।
लेकिन उस समय अमन एक ऐसे क्षेत्र में काम कर रहा था जहां नेटवर्क की समस्या थी।
कई दिनों तक दोनों की बात नहीं हो सकी।
आखिरकार परिस्थितियों के सामने हारकर नेहा को शादी करनी पड़ी।
जब अमन वापस लौटा, तब तक सब कुछ बदल चुका था।
उस दिन वह घंटों रोया था।
उसे लगा था जैसे उसकी पूरी दुनिया उजड़ गई हो।
समय गुजरता गया।
दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गए।
लेकिन कुछ रिश्ते कभी पूरी तरह खत्म नहीं होते।
वे दिल के किसी कोने में हमेशा जिंदा रहते हैं।
कुछ दिन पहले अचानक अमन के मोबाइल पर एक संदेश आया।
"क्या हम एक बार मिल सकते हैं?"
नीचे नाम लिखा था—नेहा।
संदेश पढ़ते ही अमन का दिल तेजी से धड़कने लगा।
उसने तुरंत जवाब दिया—
"कब और कहां?"
नेहा ने रेलवे स्टेशन का नाम और समय भेज दिया।
और आज वही दिन था।
तभी अमन की नजर दूर खड़ी एक महिला पर पड़ी।
सफेद सूट पहने, चेहरे पर हल्की मुस्कान लिए वह धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रही थी।
वह नेहा थी।
पांच सालों ने उसके चेहरे पर परिपक्वता ला दी थी।
लेकिन उसकी आंखें आज भी वैसी ही थीं।
दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।
जैसे समय अचानक रुक गया हो।
सब कुछ शांत हो गया।
नेहा ने मुस्कुराकर कहा—
"कैसे हो अमन?"
अमन ने धीरे से उत्तर दिया—
"ठीक हूं... और तुम?"
"मैं भी ठीक हूं।"
फिर दोनों के बीच कुछ क्षणों की चुप्पी छा गई।
कभी जो घंटों बातें किया करते थे, आज शब्द कम पड़ रहे थे।
दोनों पास की बेंच पर बैठ गए।
नेहा ने पूछा—
"अब भी नाराज हो?"
अमन हल्का-सा मुस्कुराया।
"नाराजगी बहुत पहले खत्म हो गई थी।"
"सच?"
"हां। शुरू में लगा था तुमने मुझे छोड़ दिया। लेकिन बाद में समझ आया कि शायद परिस्थितियां हम दोनों से ज्यादा ताकतवर थीं।"
नेहा की आंखें नम हो गईं।
"मैंने बहुत कोशिश की थी अमन।"
"मुझे पता है।"
"लेकिन मैं हार गई।"
अमन ने कहा—
"तुम नहीं हारी थीं। कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे मोड़ पर ले आती है जहां कोई रास्ता सही नहीं होता।"
नेहा की आंखों से एक आंसू निकल आया।
"तुम पहले जैसे ही हो।"
"और तुम भी।"
दोनों हल्का-सा हंस पड़े।
कुछ देर बाद नेहा बोली—
"याद है कॉलेज का आखिरी दिन?"
"कैसे भूल सकता हूं?"
"तुमने कहा था कि चाहे जिंदगी हमें कहीं भी ले जाए, हम अच्छे इंसान बने रहेंगे।"
अमन मुस्कुराया।
"और तुमने कहा था कि अगर कभी मिलें तो पुराने गिले-शिकवे नहीं करेंगे।"
"हां।"
"तो आज वही कर रहे हैं।"
दोनों फिर मुस्कुरा दिए।
बारिश अब तेज होने लगी थी।
लोग इधर-उधर भागने लगे।
लेकिन दोनों वहीं बैठे रहे।
नेहा ने अचानक अपने बैग से एक पुरानी डायरी निकाली।
"यह तुम्हारी है।"
अमन चौंक गया।
"तुम्हारे पास अभी तक?"
"मैंने संभालकर रखी थी।"
अमन ने कांपते हाथों से डायरी ली।
उसमें कॉलेज के दिनों की कविताएं थीं।
पहले पन्ने पर लिखा था—
"अगर कभी बिछड़ जाएं, तो यादों को संभाल कर रखना।"
अमन की आंखें भर आईं।
"तुमने इसे संभालकर रखा?"
"कुछ चीजें फेंकी नहीं जातीं।"
अचानक अमन ने पूछा—
"तुम खुश हो?"
नेहा कुछ क्षण चुप रही।
फिर बोली—
"जिंदगी परफेक्ट नहीं है, लेकिन मैं संतुष्ट हूं। मेरे पति अच्छे इंसान हैं। मेरा एक बेटा भी है।"
अमन मुस्कुराया।
"यह सुनकर अच्छा लगा।"
"और तुम?"
"मैंने शादी नहीं की।"
नेहा ने आश्चर्य से देखा।
"क्यों?"
अमन हंस पड़ा।
"शायद सही इंसान नहीं मिला।"
दोनों समझ गए कि वह मजाक कर रहा था, लेकिन उसके पीछे कहीं न कहीं एक सच्चाई भी थी।
शाम धीरे-धीरे रात में बदल रही थी।
स्टेशन की लाइटें जल उठी थीं।
घोषणा हुई—
"गाड़ी संख्या 12904 कुछ ही मिनटों में प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर आएगी।"
नेहा उठ खड़ी हुई।
"मेरी ट्रेन आने वाली है।"
अमन भी खड़ा हो गया।
उसके दिल में एक अजीब-सी बेचैनी थी।
उसे महसूस हो रहा था कि यह मुलाकात सचमुच आखिरी हो सकती है।
नेहा ने कहा—
"अमन, एक बात पूछूं?"
"हां।"
"क्या तुमने कभी मुझसे नफरत की थी?"
अमन ने उसकी आंखों में देखा।
फिर बोला—
"जिससे सच्चा प्यार हो, उससे नफरत नहीं हो सकती।"
नेहा की आंखों से आंसू बह निकले।
"धन्यवाद।"
"किस लिए?"
"मुझे समझने के लिए।"
ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी।
लोग चढ़ने लगे।
नेहा ने अपना सामान उठाया।
फिर अचानक उसने अमन का हाथ पकड़ लिया।
"अगर अगले जन्म जैसा कुछ होता है..."
वह रुक गई।
अमन मुस्कुराया।
"तो?"
"तो मैं चाहूंगी कि हम फिर मिलें।"
अमन की आंखें भी नम हो गईं।
"और इस बार वक्त हमारे खिलाफ न हो।"
नेहा ने सिर हिलाया।
ट्रेन चलने लगी।
नेहा दरवाजे पर खड़ी थी।
अमन प्लेटफॉर्म पर खड़ा उसे देख रहा था।
दोनों की आंखों में हजारों यादें थीं।
हजारों अधूरे सपने थे।
लेकिन कोई शिकायत नहीं थी।
कोई गुस्सा नहीं था।
सिर्फ प्यार था।
एक ऐसा प्यार जो पाने से ज्यादा समझने में विश्वास करता है।
ट्रेन धीरे-धीरे दूर चली गई।
नेहा की आकृति धुंधली होती गई।
और फिर आंखों से ओझल हो गई।
अमन काफी देर तक वहीं खड़ा रहा।
बारिश फिर शुरू हो चुकी थी।
उसने आसमान की ओर देखा और हल्की मुस्कान के साथ बुदबुदाया—
"कुछ लोग जिंदगी में साथ नहीं रहते, लेकिन दिल में हमेशा रहते हैं।"
उसने डायरी को सीने से लगाया और स्टेशन से बाहर निकल गया।
आज उसके दिल में दर्द जरूर था, लेकिन एक सुकून भी था।
पांच साल से जो सवाल अधूरे थे, उनके जवाब मिल चुके थे।
कभी-कभी आखिरी मुलाकात बिछड़ने के लिए नहीं होती।
वह दिल के पुराने घावों को भरने के लिए होती है।
और शायद यही इस मुलाकात का असली उद्देश्य था।
समाप्त
लेखक: विजय शर्मा ऐरी 🌹