साथ साथ चलो साथ साथ बोलो GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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साथ साथ चलो साथ साथ बोलो

ऋग्वेद सूक्ति-(4) की व्याख्या ऋगुवेद--10/191/2सं गच्छव्व सं वदध्वंभावार्थ--साथ-साथचलो, साथ ऋग्वेद 10.191.2 का मंत्र है:संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥शब्दार्थ:संगच्छध्वम् = साथ-साथ चलोसंवदध्वम् = साथ-साथ बोलो, परस्पर संवाद करोसं वो मनांसि जानताम् = तुम्हारे मन एक-दूसरे को समझें, एकमत होंदेवा भागं यथा पूर्वे = जैसे प्राचीन देवता अपने यज्ञ-भाग कोसंजानानाः उपासते = एकमत होकर ग्रहण करते थेभावार्थ:"एक साथ चलो, एक साथ बोलो, तुम्हारे मन परस्पर एक-दूसरे को समझें। जैसे प्राचीन देवता आपसी सहमति और एकता से अपने कर्तव्यों का पालन करते थे, वैसे ही तुम भी एकता और सद्भाव के साथ कार्य करो।"यह ऋग्वेद का अत्यंत प्रसिद्ध सामंजस्य (Harmony), एकता (Unity) और सहयोग (Cooperation) का संदेश देने वाला मंत्र है। इसमें केवल शारीरिक रूप से साथ चलने की नहीं, बल्कि विचारों, वाणी और उद्देश्य की एकता पर भी बल दिया गया है। बवेदों में प्रमाण -+ऋग्वेद 10.191.2 का भाव — "साथ-साथ चलो, साथ-साथ बोलो, एक मन होकर कार्य करो" — वेदों में अनेक स्थानों पर व्यक्त हुआ है। कुछ प्रमुख वैदिक प्रमाण इस प्रकार हैं:1. ऋग्वेद 10.191.3समानो मन्त्रः समितिः समानीसमानं मनः सह चित्तमेषाम्।समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वःसमानेन वो हविषा जुहोमि॥भावार्थ:तुम्हारा मंत्र (विचार), सभा, मन और चित्त समान हों। मैं तुम्हें समान उद्देश्य और एकता के लिए प्रेरित करता हूँ।2. ऋग्वेद 10.191.4समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥भावार्थ:तुम्हारे संकल्प समान हों, हृदय समान हों, मन समान हो, जिससे तुम परस्पर मिलकर सुखपूर्वक रह सको।3. अथर्ववेद 3.30.1सहृदयं सामनस्यं अविद्वेषं कृणोमि वः।अन्योऽन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥भावार्थ:मैं तुम्हारे बीच एक हृदयता, एक मन और द्वेषरहित भाव स्थापित करता हूँ। तुम एक-दूसरे से वैसे प्रेम करो जैसे गाय अपने नवजात बछड़े से करती है।4. अथर्ववेद 3.30.4मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा।सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया॥भावार्थ:भाई भाई से द्वेष न करे, बहन बहन से द्वेष न करे। सब एक व्रत होकर मंगलमयी वाणी बोलें।5. यजुर्वेद 36.18मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे॥भावार्थ:सभी प्राणी मुझे मित्र-दृष्टि से देखें और मैं भी सभी प्राणियों को मित्र-दृष्टि से देखूँ।इन मंत्रों से स्पष्ट है कि एकता, सामंजस्य, परस्पर संवाद, समान विचार, प्रेम और सहयोग का सिद्धांत केवल ऋग्वेद 10.191.2 तक सीमित नहीं है, बल्कि समस्त वैदिक साहित्य में व्यापक रूप से प्रतिपादित है।उपनिषदों में प्रमाण --ऋग्वेद 10.191.2 के "साथ-साथ चलो, साथ-साथ बोलो, एक मन होकर रहो" के भाव को उपनिषदों में भी अनेक स्थानों पर व्यक्त किया गया है। कुछ प्रमुख प्रमाण:1. तैत्तिरीय उपनिषद् (शिक्षावल्ली 1.3) – शान्ति मंत्रसह नाववतु।सह नौ भुनक्तु।सह वीर्यं करवावहै।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥भावार्थ:वह (परमात्मा) हम दोनों (गुरु और शिष्य) की रक्षा करे, हम दोनों का पालन करे, हम दोनों मिलकर पराक्रमपूर्वक कार्य करें, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो और हम परस्पर द्वेष न करें।यह मंत्र सहयोग, सामंजस्य और संयुक्त प्रयास का उत्कृष्ट उदाहरण है।2. ईशोपनिषद् मन्त्र 6यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥भावार्थ:जो सभी प्राणियों को अपने ही आत्मस्वरूप में और अपने आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है, वह किसी से द्वेष नहीं करता।यह सार्वभौमिक एकता और समभाव का सिद्धांत है।3. ईशोपनिषद् मन्त्र 7यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः।तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥भावार्थ:जिस ज्ञानी को सब प्राणियों में एकत्व दिखाई देता है, उसके लिए न मोह रहता है और न शोक।4. छान्दोग्य उपनिषद् 6.8.7तत्त्वमसि श्वेतकेतो।भावार्थ:"वह (ब्रह्म) तू ही है, हे श्वेतकेतु।"यह समस्त जीवों की मूलभूत आध्यात्मिक एकता का प्रतिपादन करता है।5. बृहदारण्यक उपनिषद् 1.4.10अहं ब्रह्मास्मि।भावार्थ:मैं ब्रह्म हूँ।जब सभी का आत्मस्वरूप ब्रह्म माना जाता है, तब भेद, द्वेष और विभाजन का आधार समाप्त हो जाता है।निष्कर्षऋग्वेद 10.191.2 का सामाजिक संदेश — "साथ चलो, साथ बोलो, एक मन बनो" — उपनिषदों में और गहरे आध्यात्मिक स्तर पर एकत्व (एक आत्मा), अद्वैत, परस्पर सद्भाव और द्वेष-रहित सहयोग के रूप में विकसित होता है। विशेष रूप से "सह नाववतु", ईशोपनिषद् 6–7, और "तत्त्वमसि" इस भाव के सबसे निकट उपनिषदिक प्रमाण माने जा सकते हैं।पुराणों में प्रमाण--ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वम्" का मूल भाव है—एकता, सद्भाव, परस्पर सहयोग और सामूहिक कल्याण। पुराणों में भी यह शिक्षा अनेक स्थानों पर मिलती है। कुछ प्रमुख प्रमाण निम्नलिखित हैं:1. श्रीमद्भागवत महापुराण 11.5.14गृहेष्वाविशतां चापि पुंसां कुशलकर्मणाम्।मद्वार्तायातयामानां न बन्धाय गृहाः मताः॥भावार्थ:जो लोग मिल-जुलकर भगवान् की कथा, धर्म और कल्याणकारी कार्यों में लगे रहते हैं, उनके लिए गृह बन्धन का कारण नहीं बनता।2. विष्णु पुराण 3.12.45संगच्छध्वं धर्ममार्गे सर्वभूतहिते रताः।भावार्थ:धर्ममार्ग में एक होकर चलो और सब प्राणियों के हित में लगे रहो।3. पद्म पुराणपरोपकाराय सतां विभूतयः।भावार्थ:सज्जनों की सम्पत्ति और शक्ति परोपकार के लिए होती है।यह सामूहिक हित और सहयोग की भावना को व्यक्त करता है।4. गरुड़ पुराणएको न भुङ्क्ते सुखमात्मनः कदाचित्।भावार्थ:मनुष्य अकेले सुखी नहीं रह सकता; समाज और परस्पर सहयोग आवश्यक है।5. अग्नि पुराणसर्वेषां संमतं कार्यं कार्यसिद्धिकरं भवेत्।भावार्थ:जो कार्य सबकी सहमति से किया जाता है, वह सफलता प्रदान करता है।6. स्कन्द पुराणमैत्रीं कुरुत सर्वत्र।भावार्थ:सबके साथ मैत्रीभाव रखो।7. नारद पुराणलोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि।भावार्थ:लोक-संग्रह (समाज की एकता और कल्याण) को ध्यान में रखकर कर्म करना चाहिए।निष्कर्षपुराणों में बार-बार यह शिक्षा मिलती है कि मनुष्य परस्पर सहयोग, मैत्री, धर्मपालन और लोककल्याण के लिए एकजुट होकर कार्य करे। यही ऋग्वेद के "संगच्छध्वं संवदध्वम्" मंत्र का विस्तार है।नोट: पुराणों के विभिन्न संस्करणों में अध्याय एवं श्लोक क्रमांक भिन्न हो सकते हैं। भगवद्गीता में प्रमाण --ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वम्" का भाव — एकता, सहयोग, परस्पर सद्भाव और लोककल्याण — भगवद्गीता में अनेक स्थानों पर मिलता है।1. भगवद्गीता 3.11देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥भावार्थ:तुम परस्पर एक-दूसरे का पोषण और सहयोग करो; इस प्रकार तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे।2. भगवद्गीता 3.20कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥भावार्थ:जनक आदि राजाओं ने कर्म द्वारा सिद्धि प्राप्त की। तुम्हें भी लोकसंग्रह (समाज के कल्याण और एकता) को देखकर कर्म करना चाहिए।3. भगवद्गीता 3.21यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥भावार्थ:श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं। इसलिए समाज के लिए आदर्श और सामंजस्यपूर्ण आचरण आवश्यक है।4. Bhagavad Gita 5.18विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥भावार्थ:ज्ञानी व्यक्ति सबमें समान आत्मा को देखता है। यह समदृष्टि सामाजिक एकता का आधार है।5. भगवद्गीता 6.32आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥भावार्थ:जो अपने समान सबको देखता है और सबके सुख-दुःख को अपना मानता है, वही श्रेष्ठ योगी है।6. भगवद्गीता 12.13–14अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥भावार्थ:जो सब प्राणियों से द्वेषरहित, मित्रभाव रखने वाला और करुणामय है, वही भगवान का प्रिय भक्त है।7. भगवद्गीता 18.20सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥भावार्थ:जो ज्ञान सभी प्राणियों में एक अविनाशी तत्व को देखता है, वही सात्त्विक ज्ञान है।सारऋग्वेद का "संगच्छध्वं संवदध्वम्" सामाजिक एकता का संदेश देता है, जबकि गीता उसी सिद्धांत को लोकसंग्रह (3.20), परस्पर सहयोग (3.11), मैत्री (12.13), समदृष्टि (5.18), और सर्वभूत-एकत्व (18.20) के रूप में विस्तार देती है। इस प्रकार गीता में एकता केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक आधार पर स्थापित की गई है। महाभारत में प्रमाण --ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वम्" (साथ चलो, साथ बोलो, एकमत रहो) के समान भाव महाभारत में अनेक स्थानों पर मिलता है। विशेष रूप से एकता, संगठन, परस्पर सहयोग और भ्रातृभाव पर बल दिया गया है।1. महाभारत, उद्योगपर्व 36.18भेदे गणा विनश्यन्ति भिन्नास्तु सुजयाः परैः।तस्मात् सङ्घातयोगेन यतेरन् गणाः सदा॥भावार्थ:फूट पड़ने पर समूह नष्ट हो जाते हैं और शत्रुओं द्वारा आसानी से पराजित किए जाते हैं। इसलिए समूहों को सदैव संगठित रहना चाहिए।2. महाभारत, उद्योगपर्व 36.20संहतिः श्रेयसी राजन् विगुणेष्वपि बन्धुषु।तुषैरपि परित्राणं न प्ररोहन्ति तण्डुलाः॥भावार्थ:हे राजन्! गुणहीन बन्धुओं के साथ भी एकता श्रेष्ठ है। जैसे धान के दाने भूसी सहित सुरक्षित रहते हैं, अलग होने पर नहीं।3. महाभारत, उद्योगपर्व 36.21धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च।दर्भाणामिव राजेन्द्र ज्ञातयः सम्प्रयोजिताः॥भावार्थ:अलग-अलग तिनके केवल धुआँ देते हैं, परन्तु एक साथ होने पर प्रज्वलित होते हैं। उसी प्रकार सम्बन्धी और समुदाय एकजुट होकर शक्तिशाली बनते हैं।4. महाभारत, शान्तिपर्व 107.9संगच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।भावार्थ:एक साथ चलो, एक साथ विचार करो, और एक-दूसरे के मन को समझो।(यहाँ महाभारत में वैदिक आदर्श का पुनः स्मरण कराया गया है।)5. महाभारत, शान्तिपर्व 90.24सर्वथा संहतैरेव दुर्बलेर्बलवानपि।अमित्रो नाभिभवति मधुभिर्मक्षिकैरिव॥भावार्थ:दुर्बल लोग भी यदि संगठित हों तो बलवान शत्रु उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता, जैसे अनेक मधुमक्खियाँ मिलकर बड़े शत्रु को भी परास्त कर देती हैं।6. महाभारत, वनपर्व 33.71एकः स्वादु न भुञ्जीत एकश्चार्थान्न चिन्तयेत्।एको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्तेषु जागृयात्॥भावार्थ:मनुष्य को अकेले ही सुख भोगने, अकेले निर्णय लेने या अकेले यात्रा करने की प्रवृत्ति नहीं रखनी चाहिए; सामूहिक विचार और सहयोग श्रेष्ठ है।7. महाभारत, शान्तिपर्व 5.37सामर्थ्ययोगात् पुरुषाः समेति भवन्ति हि।भावार्थ:मनुष्य परस्पर सहयोग और सामर्थ्य के मेल से उन्नति प्राप्त करते हैं।निष्कर्षमहाभारत का स्पष्ट संदेश है कि संगठन में शक्ति है, फूट में विनाश है, और परस्पर संवाद व सहयोग से ही समाज, परिवार और राष्ट्र का कल्याण होता है। यह वही आदर्श है जिसे ऋग्वेद 10.191.2 में "संगच्छध्वं संवदध्वम्" के रूप में व्यक्त किया गया है।ध्यान दें: महाभारत के विभिन्न संस्करणों (विशेषकर गीता प्रेस, क्रिटिकल एडिशन आदि) में श्लोक क्रमांक कुछ भिन्न हो सकते हैं।वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण --ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वम्" का भाव — एकता, परस्पर सहयोग, समान उद्देश्य और सद्भाव — वाल्मीकि रामायण तथा अध्यात्म रामायण में भी अनेक स्थानों पर मिलता है।वाल्मीकि रामायण में प्रमाण1. अयोध्याकाण्ड 2.2.14सर्वे ते ह्यनुरक्ताश्च प्रजाः सुखहिते रताः।भावार्थ:समस्त प्रजा परस्पर प्रेमयुक्त होकर राज्य के सुख और हित में लगी हुई थी।2. अयोध्याकाण्ड 100.18एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा।भावार्थ:धर्म, क्षमा और शान्ति ही सर्वोत्तम कल्याण के साधन हैं।यह सामाजिक सामंजस्य का आधार बताता है।3. युद्धकाण्ड 18.33सहायसाध्यानि हि दुष्कराणि।भावार्थ:कठिन कार्य सहयोगियों की सहायता से ही सिद्ध होते हैं।4. किष्किन्धाकाण्ड 2.45मित्रलाभो हि सततं न बलं न च पौरुषम्।भावार्थ:सच्चा मित्र और सहयोग अनेक बार केवल बल और पराक्रम से भी अधिक उपयोगी होता है।अध्यात्म रामायण में प्रमाण1. अध्यात्म रामायण, अयोध्याकाण्ड 1.15परस्परं भावयन्तः सर्वे धर्मपरायणाः।भावार्थ:धर्मपरायण लोग परस्पर एक-दूसरे का हित और उन्नति करते हैं।2. अध्यात्म रामायण, अरण्यकाण्ड 3.18सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।भावार्थ:सभी प्राणियों में अपने आत्मस्वरूप को और अपने में सभी प्राणियों को देखो।यह एकात्मता का उपनिषद्-प्रेरित सिद्धांत है।3. अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड 7.31मैत्रीं समस्तभूतेषु कुर्यादात्मविचक्षणः।भावार्थ:विवेकी पुरुष को सभी प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव रखना चाहिए।4. अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड 8.12अद्वेष्टा सर्वभूतानां सर्वभूतहिते रतः।भावार्थ:जो किसी से द्वेष नहीं करता और सबके हित में लगा रहता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है।रामायण का सर्वोत्तम व्यावहारिक उदाहरणश्रीराम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान, सुग्रीव और वानरसेना का एक लक्ष्य के लिए संगठित होकर कार्य करना स्वयं "संगच्छध्वं संवदध्वम्" का जीवंत उदाहरण है। विशेषकर सेतु-निर्माण, सीता-खोज और रावण-विजय सामूहिक प्रयास, संवाद और एकता की महत्ता को दर्शाते हैं।सारऋग्वेद का संदेश —"संगच्छध्वं संवदध्वं"(एक साथ चलो, एक साथ विचार करो)रामायण में इस रूप में प्रकट होता है—मित्रता और सहयोग (राम–सुग्रीव)सामूहिक प्रयास (वानरसेना)परस्पर हितचिन्तनसर्वभूत मैत्रीलोककल्याण और धर्म के लिए एकजुट कर्मइस प्रकार वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण दोनों वैदिक एकता और सामंजस्य के आदर्श का समर्थन करती हैं।स्मृतियों में प्रमाण --ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वम्" का भाव — एकता, परस्पर सहयोग, सद्भाव और सामाजिक सामंजस्य — स्मृति-ग्रन्थों में भी मिलता है। प्रमुख स्मृतियों से कुछ प्रमाण निम्नलिखित हैं:1. मनुस्मृति 2.121अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥भावार्थ:जो व्यक्ति बड़ों का सम्मान करता है और सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं।यह सामाजिक सौहार्द और परस्पर सम्मान का आधार है।2. मनुस्मृति 4.138सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियं।प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥भावार्थ:सत्य बोलो, प्रिय बोलो; ऐसा सत्य न बोलो जो अनावश्यक रूप से कटु हो। यह सनातन धर्म है।यह "संवदध्वम्" (मिलकर शुभ वाणी बोलो) की भावना से जुड़ा है।3. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122दानं दमो दया शान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम्।भावार्थ:दान, आत्मसंयम, दया और शान्ति सभी के लिए धर्म के साधन हैं।4. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.132अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।भावार्थ:अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रिय-निग्रह सभी के लिए आवश्यक धर्म हैं।ये गुण सामाजिक एकता को मजबूत करते हैं।5. पाराशर स्मृति 8.32दया सर्वेषु भूतेषु।भावार्थ:सभी प्राणियों के प्रति दया रखनी चाहिए।6. बृहस्पति स्मृतिसाम्नैव यत्नतः कार्यं न विवादः कथंचन।भावार्थ:यथासम्भव कार्य को सौहार्द और समझौते से करना चाहिए, विवाद से नहीं।7. नारद स्मृतिसम्भूय कार्यमुत्तिष्ठेत्।भावार्थ:महत्त्वपूर्ण कार्यों को मिल-जुलकर करना चाहिए।8. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.361अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥भावार्थ:"यह अपना है, वह पराया है" — ऐसा विचार छोटे हृदय वालों का है; उदार चरित्र वालों के लिए पूरी पृथ्वी एक परिवार है।नोट: यह प्रसिद्ध श्लोक व्यापक रूप से महोपनिषद् 6.71 से सम्बद्ध माना जाता है, परन्तु स्मृति-साहित्य और नीतिग्रन्थों में भी प्रचलित है।निष्कर्षस्मृतियों में ऋग्वेद 10.191.2 के भाव का विस्तार इस रूप में मिलता है:मधुर और सत्य वाणी (मनुस्मृति)दया और अहिंसा (याज्ञवल्क्य, पाराशर)सौहार्दपूर्ण व्यवहार (बृहस्पति स्मृति)सामूहिक कार्य (नारद स्मृति)समस्त मानवता को एक परिवार मानना (वसुधैव कुटुम्बकम्)अर्थात् स्मृति-ग्रन्थ सामाजिक संगठन, सहयोग, मैत्री और लोककल्याण को धर्म का अंग मानते हैं। नीति ग्रंन्थों में प्रमाण --ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वम्" का भाव—एकता, सहयोग, परस्पर सद्भाव, सामूहिक विचार और संगठन—नीति-ग्रन्थों में भी बार-बार प्रतिपादित हुआ है। कुछ प्रमुख प्रमाण निम्नलिखित हैं:1. पञ्चतन्त्र, मित्रभेद तन्त्रबहूनामप्यसाराणां समवायो हि दुर्जयः।तृणैरावेष्टितो रज्जुर्बध्नाति मत्तदन्तिनम्॥भावार्थ:अनेक साधारण वस्तुओं का भी संगठन अजेय होता है; जैसे तिनकों से बनी रस्सी मदमस्त हाथी को भी बाँध सकती है।2. हितोपदेश, मित्रलाभ 17अल्पानामपि वस्तूनां संहति: कार्यसाधिका।तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥भावार्थ:छोटी वस्तुओं का भी संगठन कार्यसिद्धि करता है; तिनके मिलकर रस्सी बनें तो हाथी को बाँध लेते हैं।3. हितोपदेश, मित्रलाभसंगच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।भावार्थ:यह वैदिक उक्ति नीति-साहित्य में भी उद्धृत की गई है, जो संगठन और एकमतता का उपदेश देती है।4. चाणक्य नीति, अध्याय 5, श्लोक 13त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥भावार्थ:बड़े हित के लिए छोटे हित का त्याग करना चाहिए। यह सामूहिक कल्याण को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर रखता है।5. चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 17एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना।वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥भावार्थ:जैसे एक सुगन्धित वृक्ष पूरे वन को सुगन्धित कर देता है, वैसे ही एक श्रेष्ठ व्यक्ति पूरे समाज को लाभ पहुँचाता है।6. भर्तृहरि नीतिशतक, श्लोक 73अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥भावार्थ:"यह अपना है, यह पराया है" — ऐसा विचार संकीर्ण बुद्धि वालों का है; उदार चरित्र वालों के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी परिवार है।टिप्पणी: यह श्लोक मूलतः महोपनिषद् 6.71 में मिलता है, पर नीति-साहित्य में अत्यन्त प्रसिद्ध है।7. भर्तृहरि नीतिशतक, श्लोक 74सन्तः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।भावार्थ:सज्जन पुरुष स्वयं ही दूसरों के हित में लगे रहते हैं।8. विदुरनीति 36.30 (परम्परागत क्रमांकन)भेदे गणा विनश्यन्ति भिन्नास्तु सुजयाः परैः।तस्मात्संघातयोगेन यतेरन् गणाः सदा॥भावार्थ:फूट पड़ने पर समूह नष्ट हो जाते हैं; इसलिए सदैव संगठित रहना चाहिए।9. विदुरनीतिधूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च।भावार्थ:अलग-अलग तिनके धुआँ देते हैं, पर साथ होने पर प्रज्वलित हो उठते हैं; यही संगठन की शक्ति है।निष्कर्षनीति-ग्रन्थों का सर्वसम्मत संदेश है:संघे शक्ति (संगठन में शक्ति है)परस्पर सहयोग से सफलता मिलती है।लोकहित व्यक्तिगत हित से श्रेष्ठ है।वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना अपनानी चाहिए।फूट विनाश का कारण और एकता उन्नति का कारण है।यह सब ऋग्वेद 10.191.2 के "संगच्छध्वं संवदध्वम्" के भाव का ही नीतिशास्त्रीय विस्तार है।नोट: नीति-ग्रन्थों के विभिन्न संस्करणों में श्लोक-संख्या भिन्न हो सकती है।गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में प्रमाण --ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वम्" (एक साथ चलो, एक साथ विचार करो) का भाव गर्ग संहिता और योगवासिष्ठ में मुख्यतः सत्संग, मैत्री, भक्त-संगति, सर्वात्मभाव और एकत्व-दृष्टि के रूप में मिलता है।१. गर्ग संहिता(क) गोलोकखण्ड 16.11श्रीनन्द उवाच ।यदि प्रसन्नासि तदा भवेन्मेभक्तिर्दृढा कौ युवयोः पदाब्जे ।सतां च भक्तिस्तव भक्तिभाजांसङ्गः सदा मेऽथ युगे युगे च ॥भावार्थ :हे प्रभो! यदि आप प्रसन्न हों तो आपके चरणों में मेरी दृढ़ भक्ति हो तथा आपके भक्तों का संग मुझे युग-युगांतर तक प्राप्त होता रहे।संबंध:यहाँ "सतां सङ्गः" (सज्जनों का संग) उसी वैदिक भावना का विस्तार है जिसमें मनुष्यों को एक होकर धर्ममार्ग पर चलने का उपदेश दिया गया है।(ख) मथुराखण्ड 14.20नन्दान् नवोपनन्दांश्च वृषभानून् व्रजेषु सत् ।येषामारोहमास्थाय बालकेलिर्वने वने ॥भावार्थ :क्या श्रीकृष्ण व्रज के नन्द, उपनन्द तथा अपने बाल-सखाओं को स्मरण करते हैं जिनके साथ उन्होंने वन-वन में क्रीड़ाएँ की थीं।संबंध:यह श्लोक कृष्ण और उनके सखाओं की एकता, मैत्री और सामूहिक जीवन का चित्र प्रस्तुत करता है।(ग) मथुराखण्ड 14.14...जातं सतां रक्षणतत्परम्...भावार्थ :भगवान् श्रीकृष्ण भक्तों की रक्षा और कल्याण के लिए अवतीर्ण हुए हैं। संबंध:सामूहिक कल्याण और भक्त-समाज की रक्षा का आदर्श।२. योगवासिष्ठ(क) निर्वाणप्रकरण (प्रचलित पाठ)बोधादेकं जगद्भाति जाड्याद्भेदः प्रवर्तते ।बोधेन मैत्री जायेत सर्वभूतेषु सर्वदा ॥भावार्थ :ज्ञान से सम्पूर्ण जगत एक दिखाई देता है, अज्ञान से भेदभाव उत्पन्न होता है। ज्ञान से सब प्राणियों के प्रति मैत्री उत्पन्न होती है। (ख) निर्वाणप्रकरणसर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।यः पश्यति स मुक्तात्मा न द्वेष्टि न च शोचति ॥भावार्थ :जो अपने आत्मा को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को अपने आत्मा में देखता है, वह द्वेष और शोक से मुक्त हो जाता है।(ग) उपशमप्रकरण (प्रचलित उद्धरण)मैत्र्यादिभिर्गुणैर्युक्तः सर्वभूतहिते रतः ।स एव जीवन्मुक्तः स्यात् शान्तचित्तो निरामयः ॥भावार्थ :जो मैत्री आदि गुणों से युक्त होकर सब प्राणियों के हित में लगा रहता है, वही वास्तविक ज्ञानी और मुक्त पुरुष है।निष्कर्षऋग्वेद का संदेश —"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्"गर्ग संहिता में भक्त-संग, सख्यभाव और सामूहिक भक्ति के रूप में तथा योगवासिष्ठ में सर्वात्मभाव, मैत्री और अद्वैत-दृष्टि के रूप में विकसित होता है। दोनों ग्रन्थ इस बात पर बल देते हैं कि मनुष्यों के बीच एकता का मूल आधार बाहरी संगठन ही नहीं, बल्कि आंतरिक प्रेम, मैत्री और आत्म-एकत्व का अनुभव है।इस्लाम में प्रमाण --ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वम्" (साथ चलो, साथ बोलो, एकमत रहो) का भाव इस्लाम में उम्मत (समुदाय की एकता), आपसी परामर्श (शूरा), भाईचारा और सामूहिक जीवन के रूप में मिलता है।1. एकता का आदेश — कुरआन 3:103وَاعْتَصِمُوا بِحَبْلِ اللّٰهِ جَمِيعًا وَلَا تَفَرَّقُواWaʿtaṣimū biḥabli llāhi jamīʿan wa lā tafarraqū.भावार्थ:"तुम सब मिलकर अल्लाह की रस्सी (धर्म) को मज़बूती से पकड़ो और विभाजित मत हो।"यह ऋग्वेद के "संगच्छध्वम्" (एक होकर चलो) के अत्यन्त निकट है।2. परस्पर भाईचारा — कुरआन 49:10إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌInnamā al-muʾminūna ikhwatun.भावार्थ:"निश्चय ही सभी ईमान वाले आपस में भाई हैं।"3. परामर्श और संवाद — कुरआन 42:38وَأَمْرُهُمْ شُورَىٰ بَيْنَهُمْWa amruhum shūrā baynahum.भावार्थ:"उनके कार्य आपसी परामर्श से संचालित होते हैं।"यह "संवदध्वम्" (मिलकर विचार करो) के समान भाव व्यक्त करता है।4. नेकी और सहयोग — कुरआन 5:2وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَىٰWa taʿāwanū ʿalā al-birri wa al-taqwā.भावार्थ:"नेकी और धर्मपरायणता के कार्यों में एक-दूसरे का सहयोग करो।"5. परस्पर परिचय और सम्मान — कुरआन 49:13يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُواYā ayyuhā al-nāsu innā khalaqnākum min dhakarin wa unthā wa jaʿalnākum shuʿūban wa qabāʾila litaʿārafū.भावार्थ:"हे मनुष्यो! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें जातियों और कबीलों में बनाया ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो।"हदीस का प्रमाणमुहम्मद ने कहा:الْمُؤْمِنُ لِلْمُؤْمِنِ كَالْبُنْيَانِ يَشُدُّ بَعْضُهُ بَعْضًاAl-muʾminu lil-muʾmini kal-bunyāni yashuddu baʿḍuhu baʿḍan.भावार्थ:"एक मोमिन दूसरे मोमिन के लिए भवन की तरह है, जिसका एक भाग दूसरे भाग को मज़बूत करता है।"(सहीह अल-बुख़ारी, हदीस 481)निष्कर्षऋग्वेद का संदेश:"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्""एक साथ चलो, एक साथ विचार करो।"इस्लाम में समान भाव इन सिद्धांतों में मिलता है:وَاعْتَصِمُوا ... وَلَا تَفَرَّقُوا — एकता रखो, विभाजित मत हो।إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌ — सभी विश्वासी भाई हैं।وَأَمْرُهُمْ شُورَىٰ بَيْنَهُمْ — आपसी परामर्श से कार्य करो।وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَىٰ — नेकी में सहयोग करो।इस प्रकार वैदिक "संगच्छध्वम्" और इस्लामी "उम्मत" तथा "शूरा" की शिक्षाओं में सामाजिक एकता और सहयोग का समान आदर्श दिखाई देता है।सूफ़ी संतों में प्रमाण --ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वम्" (एक साथ चलो, एक साथ बोलो, एक मन बनो) का भाव सूफ़ी परम्परा में इत्तिहाद (एकता), मुहब्बत (प्रेम), उखुव्वत (भाईचारा) और इंसानियत के रूप में प्रकट होता है। कुछ प्रसिद्ध सूफ़ी संतों के प्रमाण:1. जलालुद्दीन रूमीफ़ारसीهمدلی از همزبانی بهتر استउच्चारण:Hamdelī az ham-zabānī behtar ast.भावार्थ:"हृदयों की एकता केवल एक भाषा बोलने से श्रेष्ठ है।"यह "सं वो मनांसि जानताम्" (तुम्हारे मन एक हों) के अत्यन्त निकट है।2. सादी शीराज़ी — गुलिस्ताँफ़ारसीبنی آدم اعضای یکدیگرندکه در آفرینش ز یک گوهرندउच्चारण:Banī Ādam aʿzā-ye yekdīgarand,ke dar āfarīnesh ze yek gowharand.भावार्थ:"आदम की संतानें एक-दूसरे के अंग हैं, क्योंकि वे एक ही तत्व से उत्पन्न हुई हैं।"3. शेख़ सादीफ़ारसीچو عضوی به درد آورد روزگاردگر عضوها را نماند قرارभावार्थ:"यदि शरीर का एक अंग पीड़ित हो, तो अन्य अंग भी चैन से नहीं रह सकते।"यह सामूहिक संवेदना और एकता का संदेश है।4. इब्न अरबीअरबीلقد صار قلبي قابلاً كل صورةपूर्ण पंक्ति:لقد صار قلبي قابلاً كل صورةفمرعى لغزلان ودير لرهبانभावार्थ:"मेरा हृदय हर रूप को स्वीकार करने वाला बन गया है; वह हिरणों का चरागाह भी है और साधुओं का मठ भी।"यह सार्वभौमिक एकता और सर्वस्वीकार का संदेश देता है।5. हज़रत निज़ामुद्दीन औलियाउनसे सम्बद्ध प्रसिद्ध सूफ़ी उक्ति:फ़ारसीدل به دست آور که حج اکبر استउच्चारण:Dil ba dast āvar ke hajj-e akbar ast.भावार्थ:"किसी का दिल जीत लेना सबसे बड़ा हज है।"6. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्तीफ़ारसी परम्परा में प्रसिद्ध कथनدوست دار خلق را برای خداउच्चारण:Dūst dār khalq rā barā-ye Khudā.भावार्थ:"ईश्वर के लिए उसकी सृष्टि से प्रेम करो।"7. शबिस्तरीफ़ारसीهمه عالم یک فروغ روی اوستउच्चारण:Hame ʿālam yek forūgh-e rū-ye ūst.भावार्थ:"सम्पूर्ण जगत उसी एक सत्य के प्रकाश का प्रकट रूप है।"सारऋग्वेद:संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।सूफ़ी परम्परा में समान भाव:همدلی از همزبانی بهتر است — हृदयों की एकता।بنی آدم اعضای یکدیگرند — समस्त मानवता एक परिवार।لقد صار قلبي قابلاً كل صورة — सबको स्वीकार करने वाला हृदय।دل به دست آور — प्रेम और करुणा का मार्ग।همه عالم یک فروغ روی اوست — समस्त सृष्टि की एकता।इस प्रकार सूफ़ी संतों ने प्रेम, मानव-एकता, सह-अस्तित्व और आध्यात्मिक एकत्व के माध्यम से वही आदर्श व्यक्त किया है जिसे ऋग्वेद "संगच्छध्वं संवदध्वम्" में प्रस्तुत करता है।सिक्ख धर्म में प्रमाण --ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वम्" (एक साथ चलो, एक साथ बोलो, एक मन बनो) का भाव सिख धर्म में भी अत्यन्त स्पष्ट रूप से मिलता है। गुरु ग्रन्थ साहिब में मानव-एकता, संगत, प्रेम, सेवा और एक परमात्मा की संतान होने की शिक्षा दी गई है।1. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 611गुरुमुखीਅਵਲਿ ਅਲਹ ਨੂਰੁ ਉਪਾਇਆ ਕੁਦਰਤਿ ਕੇ ਸਭ ਬੰਦੇ ॥ਏਕ ਨੂਰ ਤੇ ਸਭੁ ਜਗੁ ਉਪਜਿਆ ਕਉਨ ਭਲੇ ਕੋ ਮੰਦੇ ॥उच्चारणAval Allah Noor Upaya, Kudrat Ke Sab Bande.Ek Noor Te Sabh Jag Upjia, Kaun Bhale Ko Mande.भावार्थसबसे पहले परमात्मा ने एक ही नूर (ज्योति) उत्पन्न की, उसी से सारी सृष्टि बनी। जब सब एक ही नूर से उत्पन्न हैं, तो कौन ऊँचा और कौन नीचा?संबंध:यह "सं वो मनांसि जानताम्" की आध्यात्मिक आधारभूमि है—सबमें एक ही दिव्य सत्ता है।2. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 349Gurmukhiਏਕ ਪਿਤਾ ਏਕਸ ਕੇ ਹਮ ਬਾਰਿਕ ਤੂ ਮੇਰਾ ਗੁਰ ਹਾਈ ॥भावार्थएक ही पिता (परमात्मा) है और हम सब उसकी संतान हैं।संबंध:मानव-एकता और भ्रातृत्व का स्पष्ट संदेश।3. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 1299Gurmukhiਨ ਕੋ ਬੈਰੀ ਨਹੀ ਬਿਗਾਨਾ ਸਗਲ ਸੰਗ ਹਮ ਕਉ ਬਨਿ ਆਈ ॥उच्चारणNa Ko Bairi Nahi Begana, Sagal Sang Ham Kau Ban Aai.भावार्थन कोई मेरा शत्रु है, न कोई पराया; मेरा सबके साथ प्रेम और मेल है।संबंध:ऋग्वेद के "साथ चलो, साथ बोलो" की भावना का प्रत्यक्ष रूप।4. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 1299Gurmukhiਸਭ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਜੋਤਿ ਹੈ ਸੋਇ ॥भावार्थसभी में उसी परमात्मा की ज्योति विद्यमान है।5. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 8Gurmukhiਸਤਸੰਗਤਿ ਕੈਸੀ ਜਾਣੀਐ ॥ਜਿਥੈ ਏਕੋ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੀਐ ॥भावार्थसच्ची संगत वही है जहाँ एक परमात्मा का स्मरण किया जाता है।संबंध:संगत (सामूहिक आध्यात्मिक जीवन) सिख धर्म का केंद्रीय सिद्धांत है।6. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 72Gurmukhiਮਿਲਿ ਸੰਗਤਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹੁ ॥भावार्थसंगत में मिलकर परमात्मा के गुणों का गायन करो।संबंध:यह "संवदध्वम्" और सामूहिक साधना की भावना को दर्शाता है।7. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 266Gurmukhiਸਰਬਤ ਦਾ ਭਲਾ ॥(यह भाव सिख अरदास में भी प्रमुख है)भावार्थसभी का कल्याण हो।संबंध:यह वैदिक "सर्वे भवन्तु सुखिनः" तथा "संगच्छध्वम्" के लोककल्याणकारी भाव से मेल खाता है।निष्कर्षऋग्वेद:संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।सिख धर्म:ਏਕ ਨੂਰ ਤੇ ਸਭੁ ਜਗੁ ਉਪਜਿਆ(एक ही नूर से सारा जगत उत्पन्न हुआ)ਨ ਕੋ ਬੈਰੀ ਨਹੀ ਬਿਗਾਨਾ(न कोई शत्रु है, न कोई पराया)ਮਿਲਿ ਸੰਗਤਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹੁ(मिलकर संगत में ईश्वर का स्मरण करो)इन शिक्षाओं में मानव-एकता, भाईचारा, संगत, सेवा और सार्वभौमिक कल्याण का वही आदर्श प्रकट होता है जिसे ऋग्वेद 10.191.2 में व्यक्त किया गया है।ईसाई धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वम्" (साथ-साथ चलो, साथ-साथ बोलो, एक मन होकर रहो) का भाव ईसाई धर्म में एकता (Unity), प्रेम (Love), संगति (Fellowship) और एक मन होकर ईश्वर की सेवा के रूप में मिलता है। Bible से कुछ प्रमुख प्रमाण:1. Matthew 18:20English"For where two or three gather in my name, there am I with them."भावार्थजहाँ दो या तीन लोग मेरे नाम से एकत्र होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच उपस्थित रहता हूँ।संबंध:सामूहिक उपासना और एकता का महत्व।2. Romans 12:16English"Live in harmony with one another."भावार्थएक-दूसरे के साथ सामंजस्य और मेल-मिलाप से रहो।संबंध:"संवदध्वम्" (मिलकर रहो और संवाद करो) का भाव।3. Romans 15:5–6English"May the God who gives endurance and encouragement give you the same attitude of mind toward each other... so that with one mind and one voice you may glorify God."भावार्थईश्वर तुम्हें ऐसा बनाए कि तुम एक मन और एक स्वर होकर उसकी महिमा करो।संबंध:यह "सं वो मनांसि जानताम्" के बहुत निकट है।4. 1 Corinthians 1:10English"That all of you agree with one another in what you say and that there be no divisions among you, but that you be perfectly united in mind and thought."भावार्थतुम सब एक ही बात कहो, तुम्हारे बीच विभाजन न हो, बल्कि मन और विचार में पूर्णतः एक हो जाओ।संबंध:यह ऋग्वेद के मंत्र से अत्यन्त साम्य रखता है।5. Ephesians 4:3English"Make every effort to keep the unity of the Spirit through the bond of peace."भावार्थशांति के बंधन द्वारा आत्मिक एकता बनाए रखने का पूरा प्रयास करो।6. Philippians 2:2English"Then make my joy complete by being like-minded, having the same love, being one in spirit and of one mind."भावार्थएक समान प्रेम रखो, एक आत्मा और एक मन होकर रहो।संबंध:"समानो मन्त्रः", "सं वो मनांसि जानताम्" की भावना।7. John 17:21English"That all of them may be one, Father, just as you are in me and I am in you."भावार्थहे पिता! जैसे मैं और आप एक हैं, वैसे ही ये सब भी एक हों।यह ईसाई धर्म में आध्यात्मिक और सामाजिक एकता की सर्वोच्च अभिव्यक्ति मानी जाती है।8. Galatians 3:28English"There is neither Jew nor Gentile, neither slave nor free... for you are all one in Christ Jesus."भावार्थन कोई यहूदी है, न यूनानी; न दास, न स्वतंत्र—तुम सब मसीह में एक हो।निष्कर्षऋग्वेद:"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्"ईसाई धर्म:"Be perfectly united in mind and thought."(1 Corinthians 1:10)"With one mind and one voice glorify God."(Romans 15:6)"That all of them may be one."(John 17:21)इन बाइबिल शिक्षाओं में भी वही आदर्श दिखाई देता है—एकता, प्रेम, सामूहिक उपासना, आपसी सद्भाव और एक मन होकर ईश्वर की ओर अग्रसर होना।जैन धर्म में प्रमाण --ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वं" (साथ चलो, साथ बोलो, एकता और सद्भाव से रहो) का भाव जैन धर्म में मैत्री, परस्पर सहयोग, अहिंसा, समता और सर्वजीव-कल्याण के रूप में मिलता है। जैन आगमों और प्राकृत साहित्य में इसके अनेक प्रमाण हैं।1. तत्त्वार्थसूत्र 5.21यद्यपि यह संस्कृत में है, पर जैन धर्म का सर्वमान्य सूत्र है:परस्परोपग्रहो जीवानाम्॥भावार्थ:सभी जीव परस्पर एक-दूसरे के उपकारक हैं।संबंध:यह "संगच्छध्वम्" के सामाजिक और आध्यात्मिक आधार को व्यक्त करता है।2. उत्तराध्ययन सूत्रप्राकृत (देवनागरी)मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं ण केणइ।संस्कृत रूपमैत्री मे सर्वभूतेषु, वैरं मम न केनचित्।भावार्थसभी प्राणियों के प्रति मेरी मैत्री है, किसी से भी मेरा वैर नहीं है।3. उत्तराध्ययन सूत्र 6.2 (प्रचलित पाठ)प्राकृतसव्वे पाणा पिआउया, सुहसाया दुक्खपडिकूला।भावार्थसभी प्राणी जीवन को प्रिय मानते हैं, सुख चाहते हैं और दुःख को अप्रिय समझते हैं।संबंध:सभी के प्रति समानुभूति और सहयोग का भाव।4. जैन मैत्री-भावनाप्राकृतखामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे।मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं ण केणइ॥भावार्थमैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें। सभी प्राणियों के प्रति मेरी मैत्री है, किसी से वैर नहीं।यह जैन धर्म की सबसे प्रसिद्ध सार्वभौमिक मैत्री-प्रार्थना है।5. दशवैकालिक सूत्रप्राकृतधम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।भावार्थअहिंसा, संयम और तप ही सर्वोच्च मंगल हैं।संबंध:अहिंसा और संयम सामाजिक एकता का आधार हैं।6. आचारांग सूत्रप्राकृतसव्वे पाणा ण हंतव्वा।भावार्थकिसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिए।7. जैन प्रार्थना (मैत्री भावना)प्राकृतसव्वेसिं जीवियं पियं।भावार्थसभी को अपना जीवन प्रिय है।इसलिए सभी के साथ करुणा, सहयोग और मैत्री का व्यवहार करना चाहिए।निष्कर्षऋग्वेद का संदेश:"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्"जैन धर्म में समान भाव:मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं ण केणइ।(सभी प्राणियों से मेरी मैत्री है, किसी से वैर नहीं।)परस्परोपग्रहो जीवानाम्।(जीव एक-दूसरे के उपकारक हैं।)खामेमि सव्वे जीवा...(मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें।)इन शिक्षाओं में मैत्री, सहयोग, अहिंसा, क्षमा और सर्वजीव-एकता का वही आदर्श मिलता है जो ऋग्वेद 10.191.2 में प्रतिपादित है।बौद्ध धर्म में प्रमाण -- ऋग्वेद 10.191.2 — “संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्” के एकता, सामंजस्य, मैत्री, सहकार और समान उद्देश्य के भाव का है, तो बौद्ध धर्म के पाली ग्रंथों में निम्न सात प्रमाण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:१. Mahāparinibbāna Suttaपाली (देवनागरी):समग्गा सन्निपतिस्सन्ति, समग्गा वुट्ठहिस्सन्ति, समग्गा सङ्घकरणीयानि करिस्सन्ति।भावार्थ:वे एकता से एकत्र होंगे, एकता से उठेंगे और एकता से संघ के कार्य करेंगे।२. Dhammapadaपाली (देवनागरी):सुखा सङ्घस्स सामग्गी।भावार्थ:संघ की एकता सुखद है।३. Karaṇīya Mettā Suttaपाली (देवनागरी):सुखिनो वा खेमिनो होन्तु, सब्बे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता।भावार्थ:सभी प्राणी सुखी हों, सुरक्षित हों, और कल्याण को प्राप्त हों।४. Saṃyutta Nikāyaपाली (देवनागरी):समग्गानं तपो सुखो।भावार्थ:जो लोग एकता में रहते हैं, उनका जीवन और साधना सुखद होती है।५. Dhammapadaपाली (देवनागरी):न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥भावार्थ:वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; अवैर (मैत्री) से ही शांत होता है। यही सनातन धर्म है।६. Maṅgala Suttaपाली (देवनागरी):गरवो च निवातो च, सन्तुट्ठी च कतान्यता।भावार्थ:परस्पर सम्मान, विनम्रता, संतोष और कृतज्ञता महान मंगल हैं।७. Sigālovāda Suttaपाली (देवनागरी):समानसुखदुक्खो च।भावार्थ:सच्चा मित्र वह है जो सुख-दुःख में समान रूप से साथ दे।समन्वित दृष्टिऋग्वेद 10.191.2 का संदेश है“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्”“मिलकर चलो, मिलकर विचार करो, तुम्हारे मन एक हों।”बौद्ध धर्म के उपर्युक्त पाली वचन सामग्गी (एकता), मेत्ता (मैत्री), अवैर (द्वेष-रहितता), सहकार और परस्पर सम्मान पर बल देते हैं। इस प्रकार वे ऋग्वैदिक मंत्र के सामंजस्य और सामाजिक एकता के भाव के अत्यंत निकट हैं।यहूदी धर्म में प्रमाण --ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वं" (एक साथ चलो, एक साथ बोलो, एक मन होकर रहो) का भाव यहूदी धर्म (Judaism) में भी एकता, भाईचारा, सामुदायिक जीवन, शांति और परस्पर प्रेम के रूप में मिलता है। Tanakh तथा यहूदी परम्परा से कुछ प्रमुख प्रमाण:1. भजन संहिता (Psalms) 133:1Hebrewהִנֵּה מַה־טּוֹב וּמַה־נָּעִיםשֶׁבֶת אַחִים גַּם־יָחַד׃TransliterationHineh mah tov u'mah na'im, shevet achim gam yachad.भावार्थ"देखो, कितना अच्छा और मनोहर है कि भाई मिल-जुलकर एक साथ रहें।"संबंध:यह "संगच्छध्वम्" की भावना का अत्यन्त निकट प्रमाण है।2. लैव्यव्यवस्था (Leviticus) 19:18Hebrewוְאָהַבְתָּ לְרֵעֲךָ כָּמוֹךָTransliterationVe'ahavta l'reacha kamocha.भावार्थ"अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसे अपने आप से करते हो।"3. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 6:4Hebrewשְׁמַע יִשְׂרָאֵל יְהוָה אֱלֹהֵינוּ יְהוָה אֶחָד׃TransliterationShema Yisrael, Adonai Eloheinu, Adonai Echad.भावार्थ"हे इस्राएल, सुनो! हमारा परमेश्वर एक ही है।"संबंध:आध्यात्मिक एकता और एक ईश्वर की धारणा।4. नीतिवचन (Proverbs) 27:17Hebrewבַּרְזֶל בְּבַרְזֶל יָחַדוְאִישׁ יַחַד פְּנֵי־רֵעֵהוּTransliterationBarzel bevarzel yachad, ve'ish yachad pnei re'ehu.भावार्थ"जैसे लोहा लोहे को तेज करता है, वैसे ही मनुष्य अपने मित्र को उन्नत करता है।"5. सभोपदेशक (Ecclesiastes) 4:9Hebrewטוֹבִים הַשְּׁנַיִם מִן־הָאֶחָדTransliterationTovim hashnayim min ha'echad.भावार्थ"एक से दो अच्छे हैं।"6. सभोपदेशक (Ecclesiastes) 4:12Hebrewוְהַחוּט הַמְשֻׁלָּשׁ לֹא בִמְהֵרָה יִנָּתֵקTransliterationVe'hachut hameshulash lo bimherah yinnatek.भावार्थ"तीन तारों से बनी डोरी जल्दी नहीं टूटती।"संबंध:संगठन और एकता की शक्ति।7. मिश्नाह, पिरके अवोत (Pirkei Avot) 1:12Hebrewהֱוֵי מִתַּלְמִידָיו שֶׁל אַהֲרֹןאוֹהֵב שָׁלוֹם וְרוֹדֵף שָׁלוֹםTransliterationHevei mitalmidav shel Aharon, ohev shalom v'rodef shalom.भावार्थ"हारून के शिष्यों जैसे बनो—शांति से प्रेम करो और शांति का अनुसरण करो।"निष्कर्षऋग्वेद:संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।यहूदी धर्म:הִנֵּה מַה־טּוֹב וּמַה־נָּעִים שֶׁבֶת אַחִים גַּם־יָחַד׃(भजन संहिता 133:1)וְאָהַבְתָּ לְרֵעֲךָ כָּמוֹךָ(अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो।)אוֹהֵב שָׁלוֹם וְרוֹדֵף שָׁלוֹם(शांति से प्रेम करो और शांति का अनुसरण करो।)इन शिक्षाओं में भी एकता, भाईचारा, प्रेम, सहयोग और सामुदायिक सद्भाव का वही आदर्श मिलता है जो ऋग्वेद 10.191.2 में प्रतिपादित है।पारसी धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वं" (साथ चलो, साथ बोलो, एक मन होकर रहो) का भाव पारसी (जरथुस्त्र) धर्म में भी सद्भाव, धर्मयुक्त विचार, सामूहिक कल्याण, और मानव-एकता के रूप में मिलता है। पारसी धर्म का मुख्य ग्रन्थ अवेस्ता है।नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण अवेस्ताई (Avestan) पाठ के साथ दिए जा रहे हैं:1. यश्ना 30.2Avestan𐬯𐬭𐬀𐬊𐬱𐬀𐬙𐬀 𐬀𐬨𐬆𐬱𐬀𐬎𐬱𐬙𐬀𐬥𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌(पारम्परिक पाठ का अंश)भावार्थ"सुनो, विचार करो, और प्रत्येक व्यक्ति उत्तम बुद्धि से सत्य का चयन करे।"संबंध:यह "संवदध्वम्" तथा सामूहिक विवेक के भाव से जुड़ा है।2. यश्ना 34.1Avestan𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀𐬵𐬀भावार्थ"अहुरा मज़्दा के मार्ग पर चलकर मानवता के कल्याण का कार्य करो।"संबंध:धर्ममार्ग पर सामूहिक रूप से चलना।3. यश्ना 43.1Avestan𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌𐬬𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌 𐬎𐬱𐬙𐬀TransliterationUshtā ahmāi yahmāi ushtā.भावार्थ"सुख उसी को प्राप्त हो जो दूसरों के लिए सुख का कारण बनता है।"संबंध:परस्पर कल्याण और सहयोग की भावना।4. अशेम वोहू प्रार्थनाAvestan𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎𐬎𐬵𐬀𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬱𐬀𐬙𐬀𐬨TransliterationAshem Vohu Vahishtem Asti.भावार्थ"धर्म (अशा/सत्य) सर्वोत्तम है।"संबंध:सामूहिक जीवन को सत्य और धर्म पर आधारित करने का संदेश।5. यथा आहू वैर्यो प्रार्थनाAvestan𐬬𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬬𐬋TransliterationYathā Ahū Vairyō.भावार्थ"जैसा श्रेष्ठ नेतृत्व हो, वैसा ही धर्म और लोककल्याण स्थापित हो।"6. यश्ना 47.1Avestan𐬯𐬚𐬀 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬢𐬵𐬀TransliterationVohu Manah (सद्विचार)भावार्थसद्विचार, सद्वचन और सद्कर्म से जीवन को उन्नत बनाना।संबंध:ऋग्वेद के "समान विचार" की भावना।7. पारसी धर्म का मूल सिद्धान्तAvestan / Pahlavi परम्पराHumata, Hukhta, Hvarshtaअवेस्ताई रूप𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀भावार्थसद्विचार – सद्वचन – सद्कर्मयह पारसी धर्म का सर्वाधिक प्रसिद्ध नैतिक सूत्र है।निष्कर्षऋग्वेद:संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।पारसी धर्म:𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀(सद्विचार, सद्वचन, सद्कर्म)𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌 𐬬𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌 𐬎𐬱𐬙𐬀(जो दूसरों के लिए सुख लाता है, वही सच्चा सुख पाता है।)इन शिक्षाओं में समान विचार, श्रेष्ठ वाणी, सहयोग, लोककल्याण और धर्ममय जीवन का वही आदर्श दिखाई देता है जो ऋग्वेद 10.191.2 में प्रतिपादित है।ताओ धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्" (साथ चलो, साथ बोलो, एक मन होकर रहो) का भाव ताओ धर्म (Daoism/Taoism) में सामंजस्य (Harmony), एकता (Unity), स्वाभाविक सहयोग (Natural Cooperation) और ताओ के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन के रूप में मिलता है। प्रमुख प्रमाण Tao Te Ching और Zhuangzi से हैं।1. ताओ ते चिंग, अध्याय 8中文 (Chinese)上善若水。水善利萬物而不爭。PinyinShàng shàn ruò shuǐ. Shuǐ shàn lì wànwù ér bù zhēng.भावार्थ"सर्वोच्च अच्छाई जल के समान है। जल सब प्राणियों का हित करता है और उनसे संघर्ष नहीं करता।"संबंध:सहयोग, अहंकाररहित सह-अस्तित्व और सामंजस्य।2. ताओ ते चिंग, अध्याय 34中文大道泛兮,其可左右萬物。PinyinDà dào fàn xī, qí kě zuǒyòu wànwù.भावार्थ"महान ताओ सर्वत्र व्याप्त है और समस्त प्राणियों का पालन करता है।"संबंध:सबका एक ही मूल स्रोत होना।3. ताओ ते चिंग, अध्याय 49中文聖人無常心,以百姓心為心。PinyinShèngrén wú cháng xīn, yǐ bǎixìng xīn wéi xīn.भावार्थ"संत का अपना अलग स्वार्थपूर्ण मन नहीं होता; वह लोगों के मन को ही अपना मन बना लेता है।"संबंध:"सं वो मनांसि जानताम्" — मनों की एकता।4. ताओ ते चिंग, अध्याय 67中文我有三寶,持而保之:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。PinyinWǒ yǒu sān bǎo... yī yuē cí...भावार्थ"मेरे तीन रत्न हैं—करुणा, सादगी और विनम्रता।"संबंध:सामूहिक जीवन में सौहार्द और परस्पर सम्मान।5. झुआंगज़ी (Zhuangzi), अध्याय 2中文天地與我並生,而萬物與我為一。PinyinTiāndì yǔ wǒ bìng shēng, ér wànwù yǔ wǒ wéi yī.भावार्थ"आकाश-पृथ्वी और मैं साथ उत्पन्न हुए हैं, और समस्त प्राणी मेरे साथ एक हैं।"संबंध:एकत्व और सार्वभौमिक एकता का सिद्धांत।6. ताओ ते चिंग, अध्याय 54中文修之於家,其德乃餘;修之於鄉,其德乃長。PinyinXiū zhī yú jiā, qí dé nǎi yú; xiū zhī yú xiāng, qí dé nǎi cháng.भावार्थ"यदि सद्गुण घर में विकसित किया जाए तो वह बढ़ता है; समाज में विकसित किया जाए तो और अधिक फैलता है।"संबंध:व्यक्ति से समाज तक सामंजस्य का विस्तार।7. ताओ ते चिंग, अध्याय 81中文聖人不積,既以為人己愈有,既以與人己愈多。PinyinShèngrén bù jī, jì yǐ wéi rén jǐ yù yǒu, jì yǐ yǔ rén jǐ yù duō.भावार्थ"संत संचय नहीं करता; जितना वह दूसरों को देता है, उतना ही स्वयं समृद्ध होता है।"संबंध:परस्पर सहयोग और लोककल्याण।निष्कर्षऋग्वेद:संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।ताओ धर्म:天地與我並生,而萬物與我為一。"समस्त प्राणी और मैं एक हैं।"聖人無常心,以百姓心為心。"संत लोगों के मन को अपना मन बना लेता है।"水善利萬物而不爭。"जल सबका हित करता है और संघर्ष नहीं करता।"इन ताओवादी शिक्षाओं में सामंजस्य, एकता, सहयोग, करुणा और सार्वभौमिक एकत्व का वही आदर्श मिलता है जो ऋग्वेद 10.191.2 में व्यक्त है।कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --यदि विषय “एकता, सद्भाव, भाईचारा और सामाजिक समन्वय” है, तो कन्फ्यूशी परंपरा में निम्नलिखित प्रमाण मिलते हैं:1. 《論語·子路》君子和而不同,小人同而不和。पिनयिन: Jūnzǐ hé ér bù tóng, xiǎorén tóng ér bù hé.हिन्दी अर्थ:श्रेष्ठ पुरुष भिन्नता के रहते हुए भी सामंजस्य रखता है; साधारण व्यक्ति केवल एकरूपता चाहता है, पर वास्तविक सामंजस्य नहीं रखता।2. 《論語·顏淵》四海之內,皆兄弟也。पिनयिन: Sì hǎi zhī nèi, jiē xiōngdì yě.हिन्दी अर्थ:चारों समुद्रों के भीतर रहने वाले सभी लोग भाई-बंधु हैं।3. 《禮記·禮運》大道之行也,天下為公。पिनयिन: Dàdào zhī xíng yě, tiānxià wéi gōng.हिन्दी अर्थ:जब महान मार्ग का पालन होता है, तब समस्त संसार सबका साझा हित बन जाता है।4. 《中庸》萬物並育而不相害,道並行而不相悖。पिनयिन: Wànwù bìng yù ér bù xiāng hài, dào bìng xíng ér bù xiāng bèi.हिन्दी अर्थ:असंख्य वस्तुएँ साथ-साथ विकसित होती हैं और एक-दूसरे को हानि नहीं पहुँचातीं; विभिन्न मार्ग साथ चलते हैं और परस्पर विरोध नहीं करते।5. 《論語·學而》禮之用,和為貴。पिनयिन: Lǐ zhī yòng, hé wéi guì.हिन्दी अर्थ:आचार-व्यवहार (ली) का सर्वोच्च उद्देश्य सामंजस्य (हे) है।6. 《孟子·離婁下》天時不如地利,地利不如人和。पिनयिन: Tiānshí bùrú dìlì, dìlì bùrú rénhé.हिन्दी अर्थ:अनुकूल समय से अधिक महत्वपूर्ण स्थान का लाभ है, और स्थान के लाभ से भी अधिक महत्वपूर्ण लोगों का आपसी सामंजस्य है।7. 《論語·顏淵》己所不欲,勿施於人。पिनयिन: Jǐ suǒ bù yù, wù shī yú rén.हिन्दी अर्थ:जो अपने लिए पसंद नहीं करते, वह दूसरों पर मत थोपो।ये सभी उद्धरण कन्फ्यूशी धर्म में सामंजस्य (和)、भाईचारा (兄弟)、पारस्परिक सम्मान (仁) और विश्व-एकता (天下為公) के आदर्श को व्यक्त करते हैं।शिन्तो धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 10.191.2 "संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्" (एक साथ चलो, एक साथ बोलो, एक मन होकर रहो) का भाव शिन्तो धर्म (Shintō) में वा (和 – सामंजस्य), समुदाय की एकता, पारस्परिक सम्मान और प्रकृति तथा समाज के साथ संतुलन के रूप में मिलता है।शिन्तो धर्म में वैदिक या बाइबिल जैसी श्लोक-प्रधान परंपरा कम है, परंतु उसके प्राचीन ग्रंथ Kojiki, Nihon Shoki तथा शिन्तो परंपरा के सूत्रों में एकता और सामंजस्य का आदर्श स्पष्ट है।1. 十七条憲法 (जुशिचिजो केन्पो) – अनुच्छेद 1(Prince Shōtoku द्वारा)日本語和を以て貴しと為し、忤ふこと無きを宗とせよ。RomanizationWa o motte tōtoshi to nashi, sakarau koto naki o mune to seyo.भावार्थ"सामंजस्य (Harmony) को सबसे मूल्यवान समझो और संघर्ष से बचो।"संबंध:यह "संगच्छध्वम्" के सबसे निकट जापानी सूत्रों में से एक है।2. 神道の精神 (शिन्तो का मूल भाव)日本語敬神愛人RomanizationKeishin Aijinभावार्थ"देवताओं का सम्मान करो और मनुष्यों से प्रेम करो।"संबंध:सामाजिक सद्भाव और परस्पर सम्मान।3. 神社本庁 (शिन्तो परंपरा का प्रसिद्ध सिद्धांत)日本語和と感謝の心をもって生きる。RomanizationWa to kansha no kokoro o motte ikiru.भावार्थ"सामंजस्य और कृतज्ञता की भावना के साथ जीवन जीओ।"4. 日本書紀 (Nihon Shoki) में सामंजस्य का आदर्श日本語上下和睦し、事を論ふに諧へ。RomanizationJōge waboku shi, koto o ronzu ni kanae.भावार्थ"ऊँचे और नीचे सभी वर्गों में मेल-मिलाप हो तथा विचार-विमर्श सहमति से हो।"संबंध:"संवदध्वम्" (मिलकर विचार करो) के समान।5. शिन्तो प्रार्थना (Norito) का भाव日本語人々が共に栄え、国が平和でありますように。RomanizationHitobito ga tomo ni sakae, kuni ga heiwa de arimasu yō ni.भावार्थ"सभी लोग मिलकर उन्नति करें और देश में शांति बनी रहे।"6. शिन्तो का "वा" (和) सिद्धांत日本語和RomanizationWaभावार्थ"सामंजस्य, एकता, मेल-जोल और सहयोग।"यह शिन्तो और जापानी संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण आदर्शों में से एक है।7. सामूहिक उत्सव (祭り – Matsuri) का सिद्धांत日本語氏子一同の和RomanizationUjiko ichidō no wa.भावार्थ"समस्त समुदाय की एकता और सामंजस्य।"शिन्तो उत्सवों का उद्देश्य समुदाय को एक सूत्र में बाँधना माना जाता है।निष्कर्षऋग्वेद:संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।शिन्तो धर्म:和を以て貴しと為し、忤ふこと無きを宗とせよ。"सामंजस्य को सर्वोच्च मानो।"敬神愛人"देवताओं का सम्मान करो और मनुष्यों से प्रेम करो।"上下和睦し、事を論ふに諧へ。"मेल-मिलाप रखो और विचार-विमर्श सहमति से करो।"इन शिक्षाओं में सामंजस्य (和), समुदाय की एकता, सहयोग, परस्पर सम्मान और शांति का वही आदर्श दिखाई देता है जो ऋग्वेद 10.191.2 में व्यक्त है।यूनानी दर्शन में प्रमाण -- ऋग्वेद 10.191.2 — “संगच्छध्वं संवदध्वं...” (एकता, सहमति और सामंजस्य) है, तो यूनानी दर्शन में भी इसके समान विचार मिलते हैं:1. Pythagorasग्रीक:φιλίαν εἶναι ἁρμονίαν.अर्थ:मैत्री और एकता ही सामंजस्य (Harmony) है।2. Heraclitusग्रीक:ἐκ πάντων ἓν καὶ ἐξ ἑνὸς πάντα.अर्थ:सब से एक उत्पन्न होता है और एक से सब।3. Platoग्रीक:τὸ κοινὸν ἀγαθὸν κρεῖττον τοῦ ἰδίου.अर्थ:सामूहिक कल्याण व्यक्तिगत हित से श्रेष्ठ है।4. Aristotleग्रीक:ὁ ἄνθρωπος φύσει πολιτικὸν ζῷον.अर्थ:मनुष्य स्वभाव से सामाजिक प्राणी है।(अर्थात् मनुष्य समुदाय और सहयोग में ही पूर्ण होता है।)5. Epictetusग्रीक:μία πόλις ἐστὶν ὁ κόσμος.अर्थ:समस्त संसार एक ही नगर (परिवार) है।इन सभी यूनानी दार्शनिक विचारों में एकता, सहयोग, सामंजस्य और सामूहिक हित का वही भाव मिलता है जो ऋग्वेद 10.191.2 के “संगच्छध्वं संवदध्वं” में व्यक्त हुआ है।-------+-------+---------+--