कुंती को वह खेल अकस्मात ही सूझा था।
टंडन मेम साहब उस समय अपने ग्राहकों के साथ गोल कमरे में रहीं और कुंती गोल कमरे के उपकक्ष में।
दिन में दीर्घावधि के लिए जब भी बेबी सोती, टंडन मेम साहब कुंती को अपने गोल कमरे के उपकक्ष में अक्सर बुला लेतीं।
गोल कमरे में जब भी ग्राहक रहते, कुंती स्वछंद महसूस करती। उन कुछेक पलों के लिए टंडन मेम साहब कुंती पर अपना अंकुश ढीला छोड़ देतीं और कुंती का आकाश और काल कुंती के पास लौट आता।
अवधि एक समान न रह कर घटती- बढ़ती रहती क्योंकि अपने ग्राहकों के साथ टंडन मेम साहब का हिसाब अजीब जमा- माफ़ी का रहता।
अपनी पुराकालीन कलाकृतियों की कालावधि व कौतुक-क्षमता टंडन मेमसाहब अपने ग्राहकों की समृद्धि व बुद्धि के अनुपात से निर्धारित करतीं। एक ही चीज़ के दाम एक ग्राहक को तीन सौ रुपए बतातीं तो दूसरे ग्राहक को तीन हज़ार। एक ही प्रश्न का उत्तर एक ग्राहक को संक्षिप्त मिलता तो दूसरे को विस्तृत।
गोल कमरा यदि टंडन मेम साहब का शोरूम था तो यह उपकक्ष उस की नेपथ्यशाला।
गोल कमरे में प्रदर्शित वस्तुओं की चिकनाई- रगड़ाई तो इस उपकक्ष में सम्पादित होती ही, साथ-ही-साथ नए आए अंगड़-बंगड़ की काया भी यहीं पलटी जाती।
किसी बेडौल टूम- छल्ले को रेती से काट कर टंडन मेम साहब इधर चिपकातीं तो दूसरे मटियाले ठीकरे को पोत कर उधर नाथतीं।
तरह- तरह की छोटी- बड़ी, गोल- चौकोर चीज़ो को अपने हाथ के छल- बल से, अलग- अलग ढंग से,टंडन मेम साहब सजातीं- संवारती और चीज़ें बदल- बदल जातीं।
कुंती उस दिन एक हलाकू फूलदान पर पूरी दोपहर काम करती रही थी।
फूलदान टोंटीदार था और टोंटियों के रूप में उन दो घोड़ों की आकृति घनी रगड़ के बाद ही स्पष्ट हुई थी।
घोड़ों को देखते ही कुंती अपनी हलाकानी भूल कर विस्मय से भर गई।
घोड़े बहुत सुंदर थे। फूलदान के फलक पर कंचाए गए दूसरे नक्काशीदार घोड़ों से ये घोड़े मेल ज़रूर खाते थे परंतु ये घोड़े फूलदान का अंश नहीं थे। अपना अलग अस्तित्व रखते थे।
कुंती ने घोड़े समीप से निहारने चाहे। घोड़े अपने बल पर फूलदान को कुंती की पकड़ में रोके रखने में असमर्थ रहे और फूलदान उन से विलग हो कर नीचे कालीन पर गिर गया।
कुंती ने लपक कर हानि आंकी।
हानि मरम्मत के अयोग्य न थी।
मज़बूत गोंद ने अपनी कारीगरी दिखाई और घोड़े पहले की तरह फूलदान के संग जा चिपके।
कुंती को वह खेल उसी पल सूझा। उस के हाथों में उस खुजली का सूत्रपात उसी पल हुआ, जिस के अंतर्गत उसे गोल कमरे में रखी सभी वस्तुओं को खंडित कर छितराना, और फिर उन्हें पुनर्स्थापित करना अत्यावश्यक लगने लगा।
उपकक्ष में रखे सभी औज़ार, सभी चूरे व सभी घोल कुंती के देखे और जाने रहे।
उन्हीं को साम्य रख कुंती गोल कमरे से अपना अहेर उपकक्ष में खिसका लाती और सही अवसर मिलते ही उस के अंगों को उस के मुख्य सांचे से पृथक कर खूब हंसती। फिर जब वह संतुष्ट हो जाती तो उन्हें पुनर्गठित कर संतोषजनक अवस्था में गोल कमरे में वापस पहुंचा आती।
“हमारी बेटी बहुत होशियार है, मेम साहब,” दो वर्ष पहले कुंती जब अपने गांव के घर में अपनी मां व तीन छोटी बहनों को तथा अपने गांव के स्कूल में अपनी छठी कक्षा की किताबों व सहेलियों को हमेशा के लिए छोड़ कर इस शहर में इस नौकरी के लिए लिवाई गई थी, तो उस के चपरासी बप्पा ने इन्हीं शब्दों के साथ कुंती को टंडन मेमसाहब से मिलाया था, “यह बेबी का काम संभाल लेगी, मेम साहब। उधर गांव में इस का बहुत नाम रहा। स्कूल की हर कक्षा में इसे हमेशा पूरे- पूरे नंबर ही मिले, कभी आधा नंबर भी कम नहीं रहा….”
“तुम्हारा नाम क्या है,?” उस की ओर देख कर टंडन मेमसाहब किसी परी की मानिंद मंद- मंद मुस्करायीं थीं।
“शकुंंतला।मगर आप मुझे कुंती के नाम से पुकार सकती हैं। शकुंतला मेरा स्कूल - नेम था।
तुम बहुत होशियार हो, शकुंतला, टंडन मेमसाहब ठगा कर हंस दी थीं, मैं तुम्हें कुंती नहीं कहुंगी । तुम्हें तुम्हारे स्कूल- नेम, शकुंतला के नाम ही से पुकारूगीं…..
मैं पानी पीना चाहती हूं, मेम साहब।
तुम्हें तो भूख भी लगी होगी, शकुंतला।
कुंती ने स्वीकृति में सिर हिलाया था। उस के गांव से यह शहर बहुत दूर रहा था और अम्मा ने पूरी- भाजी की जो पोटली उस के संग रखी थी, वह रास्ते में ही चुक गई थी।
बावर्ची इस समय डाक्टर साहब का खाना बना रहा है, शकुंतला। तुम्हें खाने के लिए अभी इंतज़ार करना पड़ेगा। यहां सब लोग डाक्टर साहब के खा लेने के बाद ही अपना खाना खाते हैं। सामने रसोई है। तुम बावर्ची से कहना, मैं ने तुम्हें भेजा है। तुम्हें तुम्हारे पानी के लिए। “
पानी पी कर कुंती टंडन मेमसाहब के पास लौटी थी तो उन्हों ने बदरंग थाली एक कटे हुए नींबू के साथ उसे थमा दी थी।
बेबी इस समय सो रही है, टंडन मेमसाहब का चेहरा रूखा हो आया था, तब तक तुम इसे नींबू से रगड़ कर खूब चमकाओ। देखें तुम्हारा काम कैसा है?
कुंती ने अनिच्छा से थाली पर नींबू रगड़ना शुरू कर दिया था।टंडन मेमसाहब एक किताब पकड़कर कुंती के काम का निरीक्षण करतीं रहीं थीं।
थोड़ी देर बाद बेबी वहां आ पहुंची थी।
उस समय वह तीन- साढ़े तीन साल की रही होगी।
बेबी के हाथ में एक टूटी गुड़िया थी जिस से उस ने आते ही टंडन मेमसाहब के सिर पर वार किया था।
क्या हुआ, बेबी? अस्त- व्यस्त हो आए अपने बाल टंडन मेम साहब ने संवारे थे।
ऊ….ऊ….ऊ, बेबी ने अपना प्रहार दोहराया था।
क्या है? ताव खाकर टंडन मेमसाहब ने बेबी को एक ज़ोरदार चपत लगायी थी।
बेबी ने गुड़िया ज़मीन पर पटकी थी और हू- हू- हू के साथ ज़मीन पर लोटने लगी थी।
इतने में बाहर एक घंटी बजी थी और बावर्ची रसोई से निकल कर बाहर की ओर लपक लिया था।
आगंतुक टंडन साहब थे, बेबी के रोने की आवाज़ उन तक पहुंच ली थी और वह सीधे यहीं चले आए थे।
उन्हें देखते ही टंडन मेम साहब बेबी को मनाने लगीं, बेबी, मेरी लाडली बेबी। तुम्हें आज ही तुम्हारे पपा नई गुड़िया दिला देंगे।
आज क्या हुआ? उन के चेहरे पर चिड़चिड़ाहट थी।
इस की पुरानी गुड़िया ने आज इसे बहुत सताया है, टंडन मेमसाहब ने हंसी छोड़ी।
शट अप। बहुत शर्म की बात है। तुम एक बच्ची को नहीं संभाल सकती….
आए एम सौरी, आंखों में आ रहे आंसू टंडन मेमसाहब ने पीछे धकेलने चाहे, आज आप जल्दी कैसे आ गए? क्या तीन बजे फिर कोई मीटिंग है?
मेरी मीटिंग मेरा हैड-एक है। तुम अपने काम से मतलब रखो। मैं अपना काम निपटाना जानता हूं।
आप खाना खाइए, अपनी झेंप मिटाने के लिए टंडन मेम साहब फिर हंस दीं, मैं अभी बेबी के पास रहूंगी…..
कुंती के आने पर टंडन मेमसाहब ने अपनी ज़िम्मेदारी कुंती की ओर सरका दी।
अब बेबी का रिबन खुलता अथवा बेबी के खेलने वाले भवन- समूह की कोई दीवार अथवा खिड़की गुम होती, उस की गुड़िया की फ़्राक या बालों की चमक मलिन पड़ती अथवा उस के हाथों से कोई चीज़ छूट कर गिरती या टूटती तो बेबी उद्वेलित हो कर उपद्रव करती सो करती, साथ में टंडन मेमसाहब भी उसे विपत्ति संकेत देने लगतीं।
बेबी की प्रत्येक तरंग, प्रत्येक मौज व प्रत्येक सनक को पूरी करने में कुंती पूरी ताकत लगा कर ग्रहण करने का प्रयास करती,फिर भी कहीं न कहीं चूक हो ही जाती और बेबी की तुनकमिज़ाजी के साथ-साथ उसे टंडन मेम साहब की फटफटकार भी सहनी पड़ती।
मैं यहां नहीं रहना चाहती, कुंती अपने बप्पा से कई बार कहती, मुझे यहां कुछ भी अच्छा नहीं लगता। मुझे गांव छोड़ आइए। मैं गांव में रहूंगी।
गांव मे क्या धरा है? कुंती के बप्पा उसे हर बार डांट देते, दो- चार साल यहां और काम कर लेगी तो तेरे ब्याह का अच्छा जुगाड़ बन जाएगा।इधर साहब लोग कुछ मदद कर देंगे और उधर लड़का भी सही व कमाऊ मिल जाएगा।
कुंती का रोग- संचार जबड़े से शुरू हुआ।
ऐसा जकड़ा गया मानो वहां कोई ताला पड़ गया था।
मांसपेशियों में जो आकस्मिक जकड़न आ बैठी थी, सो अलग। और सांस थी कि लगता था,अभी उखड़ी कि उखड़ी।
हिम्मत बांध कर कुंती ने पलंग पर सो रही बेबी को जगाया।
साधारण परिस्थिति रही होती तो बेबी को नींद के आवाह- क्षेत्र से बाहर आने में काफ़ी समय लग जाता, परंतु जब बेबी ने कुंती के शरीर को तेज़ हिचकोलों से ऐंठते व मुड़ते देखा तो वह तत्क्षण मां को बुला लाई।
टंडन मेमसाहब ने तत्काल पिछले बरामदे की घंटी दबाई।
घंटी बंगले के सर्वेंट क्वार्टर से सो रहे कुंती के बप्पा को शीघ्र ही वहां लिवा लाई।
इसे अस्पताल ले चलिए,कुंती की दुर्दशा उस के बप्पा से देखी न गई, इसे यों कांपते हुए हम ने पहले कभी नहीं देखा। इसे कुछ हो गया तो इस की मां और बहनें रो-रो कर प्राण दे देंगी। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए टंडन मेेमसाहब पति को वहीं बुला लाईं।
“यह टेटनस का केस मालूम देता है, सधे हुए हाथों से कुंती का निरीक्षण करने के बाद वह बोले, बुखार बहुत तेज़ है और हाथ में अंगूठे के पास एक पंक्चर वूंड है। खरोंच गहरी है और छिलन संगीन। कांटे जैसी कोई नुुकीली चीज़ धंस कर अंदर टूट गई है। बचाने के लिए क्यूरेर व औक्सीजन भी चाहिए। अस्पताल ले जाना होगा…..
अस्पताल में कुंती के पहुंचते ही उसे क्यूरेर का इंजेक्शन दिया गया, जिस ने शनैः-शनैः कुंती की मांसपेशियों की सिकुड़न, ऐंठन व थरथराहट रोक दी। उसी के चलते वेंटिलेटर की
पौज़िटिव प्रैशर मशीन उस के फेफड़ों में लगातार हवा भी पहुंचाने लगी और कुंती के प्र
केहाथ के घाव वाले स्थान पर चीर दिया गया।