ईश्वर की महिमा अनन्त GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

ईश्वर की महिमा अनन्त

ऋगुवेद सूक्ति-- (8) की व्याख्या "न विन्धेश्य सुष्टतिम"ऋगुवेद --1/1/7भावार्थ --मै स्तुति से पार नहीं पा सकता। उद्धृत मन्त्र ऋग्वेद 1.7.7 का है। सही पाठ इस प्रकार है—तुञ्जे-तुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः ।न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ॥— ऋग्वेदशब्दार्थतुञ्जे-तुञ्जे — प्रत्येक संघर्ष या यज्ञ मेंयः उत्तरे स्तोमाः — जो उत्तम स्तुतियाँ हैंइन्द्रस्य वज्रिणः — वज्रधारी इन्द्र कीन विन्धे — नहीं पा सकता / पूरी तरह ग्रहण नहीं कर सकताअस्य सुष्टुतिम् — उसकी उत्तम स्तुति का पारभावार्थ“वज्रधारी इन्द्र की जो महान और उत्तम स्तुतियाँ हैं, उन्हें मैं पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं कर सकता; उनकी महिमा का पार पाना कठिन है।”अर्थात् ऋषि कहते हैं कि ईश्वर/इन्द्र की महिमा इतनी विशाल है कि मनुष्य की वाणी उसकी सम्पूर्ण स्तुति करने में समर्थ नहीं हो सकती।वेदों में प्रमाण--  “ईश्वर / देव की महिमा का पूर्ण वर्णन वाणी से नहीं हो सकता” — इस भाव पर वेदों में अनेक मन्त्र मिलते हैं। कुछ प्रमुख वैदिक प्रमाण इस प्रकार हैं —1. ऋग्वेद 1.7.7तुञ्जे-तुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः ।न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ॥भावार्थमैं वज्रधारी इन्द्र की उत्तम स्तुति का पूर्ण पार नहीं पा सकता; उसकी महिमा अनन्त है।2. ऋग्वेद 1.164.46इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुःअथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्तिअग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥भावार्थसत्य एक ही है, पर विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।अर्थात् परम सत्य इतना व्यापक है कि उसे अनेक रूपों में व्यक्त किया जाता है।3. यजुर्वेद 32.3न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ॥भावार्थउस परमात्मा की कोई प्रतिमा या पूर्ण उपमा नहीं है, जिसकी महिमा महान है।4. अथर्ववेद 10.8.4यो भूतं च भव्यम् च सर्वं यश्चाधितिष्ठति ।स्वस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः ॥भावार्थजो भूत, भविष्य और सम्पूर्ण जगत् का अधिष्ठाता है, उस महान ब्रह्म को नमस्कार है।5. ऋग्वेद 10.121.1हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रेभूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमांकस्मै देवाय हविषा विधेम ॥भावार्थसृष्टि के आरम्भ में वही एक परम देव था जिसने पृथ्वी और आकाश को धारण किया; हम किस देव की उपासना करें?यह मन्त्र ईश्वर की अद्वितीय और अनिर्वचनीय महिमा को प्रकट करता है।6. सामवेद (ऋग्वेद 8.1.5 से सम्बद्ध)इन्द्रमिद् गाथिनो बृहत्इन्द्रमर्केभिरर्किणः ।इन्द्रं वाणीरणूषत ॥भावार्थगायक, ऋषि और वाणी — सब इन्द्र की स्तुति करते हैं; फिर भी उसकी महिमा असीम रहती है।7. अथर्ववेद 13.4.16न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थोनाप्युच्यते ।भावार्थउस परम सत्ता के समान दूसरा, तीसरा या चौथा कोई नहीं कहा जा सकता।इन सभी मन्त्रों का मूल भाव यह है कि परम सत्य / ईश्वर की महिमा अनन्त है; मानव वाणी उसकी सम्पूर्ण स्तुति करने में असमर्थ है।उपनिषदों में ‌प्रमाण --“परमात्मा / ब्रह्म वाणी, मन और बुद्धि से परे है; उसकी पूर्ण महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता” — इस विषय पर अनेक उपनिषदों में स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। प्रमुख श्लोक इस प्रकार हैं —1. केनोपनिषद् 1.3न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः ।न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥भावार्थवहाँ (ब्रह्म तक) न आँख पहुँच सकती है, न वाणी और न मन।हम नहीं जानते कि उसका पूर्ण उपदेश कैसे किया जाए।2. तैत्तिरीयोपनिषद् 2.9यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कदाचन ॥भावार्थजिस ब्रह्म को वाणी और मन प्राप्त नहीं कर सकते और लौट आते हैं, वही ब्रह्म आनन्दस्वरूप है।3. केनोपनिषद् 2.3यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥भावार्थजो समझता है कि “मैं ब्रह्म को पूरी तरह जानता हूँ”, वह वास्तव में नहीं जानता;और जो समझता है कि “मैं उसे पूर्णतः नहीं जान सकता”, वही कुछ जानता है।4. बृहदारण्यकोपनिषद् 2.3.6नेति नेति ।भावार्थ“यह नहीं, यह नहीं।”अर्थात् ब्रह्म किसी एक वर्णन, रूप या सीमा में बाँधा नहीं जा सकता।5. मुण्डकोपनिषद् 1.1.6यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णम्अचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् ।नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मंतदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥भावार्थवह ब्रह्म इन्द्रियों से परे, अवर्णनीय, सर्वव्यापक और अत्यन्त सूक्ष्म है।6. कठोपनिषद् 1.2.23नायमात्मा प्रवचनेन लभ्योन मेधया न बहुना श्रुतेन ।यमेवैष वृणुते तेन लभ्यःतस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् भावार्थयह आत्मा केवल प्रवचन, बुद्धि या अधिक शास्त्र सुनने से प्राप्त नहीं होती;जिस पर वह स्वयं कृपा करता है, वही उसे जान पाता है।7. श्वेताश्वतरोपनिषद् 4.19न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ।भावार्थउस परमात्मा की कोई प्रतिमा या पूर्ण उपमा नहीं है; उसकी महिमा महान है।(यह मन्त्र यजुर्वेद 32.3 में भी मिलता है।)इन उपनिषद् मन्त्रों का सामूहिक निष्कर्ष यह है कि ब्रह्म / परमात्मा अनन्त, अवर्णनीय और वाणी-मन से परे है; इसलिए उसकी सम्पूर्ण स्तुति या पूर्ण ज्ञान मनुष्य के लिए संभव नहीं।पुराणों में प्रमाण--- “भगवान् की महिमा अनन्त है, उनकी पूर्ण स्तुति या वर्णन कोई नहीं कर सकता” — इस भाव पर अनेक पुराणों में प्रमाण मिलते हैं। प्रमुख श्लोक इस प्रकार हैं —1. श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.7गुणात्मनस्तेऽपि गुणान्विमातुंहितावतीर्णस्य क ईशिरेऽस्य ।कालेन यैर् वा विमिताः सुकल्पैःभू-पांसवः खे-मिहिका द्युभासः ॥भावार्थहे प्रभो! आपकी महिमा और गुणों का पूर्ण मापन कौन कर सकता है?यदि कोई पृथ्वी के कण, आकाश के हिमकण या तारों को गिन ले, तब भी आपके गुणों का अन्त नहीं पा सकता।2. श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.21नान्तं विदाम्यहममी मुनयोऽग्रजास्तेमायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे नु ॥भावार्थमैं और मुझसे पूर्व के महान मुनि भी आपकी माया और महिमा का अन्त नहीं जानते; फिर अन्य लोग कैसे जान सकते हैं?3. विष्णु पुराण 1.9.53नास्त्यन्तो विस्तरस्यास्य गुणानां च महात्मनः ।भावार्थउस महात्मा भगवान् के विस्तार और गुणों का कोई अन्त नहीं है।4. शिव पुराण विद्येश्वरसंहिता 9.56असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिन्धुपात्रेसुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालंतदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥भावार्थयदि नील पर्वत के बराबर काजल हो, समुद्र दवात हो, कल्पवृक्ष की शाखा लेखनी हो, पृथ्वी कागज हो और सरस्वतीजी अनन्त काल तक लिखें, तब भी हे ईश्वर! आपके गुणों का पार नहीं पा सकतीं।5. देवी भागवत पुराण 1.8.31अनन्ता खलु देवस्य महिमा नोपवर्णिता ।भावार्थभगवान् की महिमा वास्तव में अनन्त है; उसका पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता।6. लिंग पुराण 1.17.71न शक्यस्तव माहात्म्यं वक्तुं वर्षशतैरपि ।भावार्थसैकड़ों वर्षों तक भी आपकी महिमा का पूर्ण वर्णन करना सम्भव नहीं है।7. नारद पुराण पूर्वभाग 1.15अनन्तनामधेयस्य नान्तो नाम्नां गुणस्य च ।भावार्थजिस भगवान् के नाम और गुण अनन्त हैं, उनके नामों और महिमा का अन्त नहीं है।इन सभी पुराण प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि परमात्मा / भगवान् की महिमा अनन्त, अगाध और अवर्णनीय है; इसलिए कोई भी जीव उनकी पूर्ण स्तुति नहीं कर सकता।गीता में प्रमाण -- “भगवान् की विभूतियाँ और महिमा अनन्त हैं; उन्हें पूर्ण रूप से जानना या वर्णन करना कठिन है” — इस विषय पर श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक श्लोक मिलते हैं। प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं —1. श्रीमद्भगवद्गीता 10.19हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥भावार्थहे अर्जुन! मैं अपनी दिव्य विभूतियों को मुख्य-मुख्य रूप से कहूँगा, क्योंकि मेरे विस्तार का अन्त नहीं है।2. श्रीमद्भगवद्गीता 10.40नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥भावार्थहे अर्जुन! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है। मैंने केवल संक्षेप में उनका वर्णन किया है।3. श्रीमद्भगवद्गीता 11.16अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिंपश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥भावार्थहे विश्वरूप भगवान्! मैं आपके अनन्त रूप को देख रहा हूँ; मुझे आपका न अन्त दिखाई देता है, न मध्य और न आदि।4. श्रीमद्भगवद्गीता 11.37कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।अनन्त देवेश जगन्निवासत्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥भावार्थहे अनन्त! हे देवों के ईश्वर! आप ब्रह्मा के भी आदिकर्ता हैं; आप सत्-असत् से परे अक्षर ब्रह्म हैं।5. श्रीमद्भगवद्गीता 11.38त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणःत्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।वेत्तासि वेद्यं च परं च धामत्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥भावार्थआप आदिदेव, सनातन पुरुष और सम्पूर्ण विश्व के परम आश्रय हैं; हे अनन्तरूप! सम्पूर्ण विश्व आपसे व्याप्त है।6. श्रीमद्भगवद्गीता 7.26वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥भावार्थहे अर्जुन! मैं भूत, वर्तमान और भविष्य के सभी प्राणियों को जानता हूँ, किन्तु मुझे पूर्ण रूप से कोई नहीं जानता।7. श्रीमद्भगवद्गीता 10.42अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥भावार्थहे अर्जुन! इतना अधिक जानने से क्या लाभ? मैं अपने एक अंश मात्र से सम्पूर्ण जगत् को धारण करता हूँ।इन गीता-श्लोकों का सार यह है कि भगवान् की महिमा, विभूतियाँ और स्वरूप अनन्त हैं; मनुष्य उन्हें पूर्णतः जान या वर्णित नहीं कर सकता।।महाभारत में प्रमाण --“भगवान् / परमात्मा की महिमा अनन्त है, उसकी पूर्ण स्तुति या वर्णन करना असम्भव है” — इस विषय पर महाभारत में अनेक प्रमाण मिलते हैं। प्रमुख श्लोक इस प्रकार हैं —1. महाभारत — भीष्मपर्व 43.26(भगवद्गीता 10.19)हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥भावार्थहे अर्जुन! मैं अपनी दिव्य विभूतियों को मुख्य-मुख्य रूप में कहूँगा, क्योंकि मेरी महिमा और विस्तार का अन्त नहीं है।2. महाभारत — भीष्मपर्व 43.41(गीता 10.40)नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥भावार्थमेरी दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है; मैंने केवल संक्षेप में उनका वर्णन किया है।3. महाभारत — भीष्मपर्व 35.16(गीता 7.26)वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥भावार्थमैं सब भूत, वर्तमान और भविष्य को जानता हूँ, किन्तु मुझे पूर्ण रूप से कोई नहीं जानता।4. महाभारत — उद्योगपर्व 68.18न हि ते भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ।भावार्थहे भगवान्! देवता और दानव भी आपके वास्तविक स्वरूप को पूर्णतः नहीं जानते।5. महाभारत — शान्तिपर्व 339.24अनादिनिधनं देवं सर्वलोकमहेश्वरम् ।दुर्ज्ञेयं परमं सूक्ष्ममनन्तं विश्वतोमुखम् ॥भावार्थवह परम देव अनादि-अनन्त, समस्त लोकों का ईश्वर, अत्यन्त सूक्ष्म और जानने में कठिन है।6. महाभारत — अनुशासनपर्व 149.15(विष्णुसहस्रनाम प्रसंग)नास्त्यन्तो विस्तरस्यास्य महतो गुणकर्मणोः ।भावार्थभगवान् के महान गुणों और कर्मों के विस्तार का कोई अन्त नहीं है।7. महाभारत — शान्तिपर्व 348.51यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।भावार्थजिस परम सत्य को मन और वाणी प्राप्त नहीं कर सकते, वहाँ से वे लौट आते हैं।(यह भाव तैत्तिरीयोपनिषद् में भी मिलता है।)इन महाभारत प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि भगवान् की महिमा, स्वरूप और विभूतियाँ अनन्त हैं; देवता, ऋषि और मनुष्य भी उनका पूर्ण पार नहीं पा सकते।स्मृतियों में प्रमाण --“परमात्मा / ईश्वर की महिमा अनन्त है, उसे पूर्ण रूप से जानना या वर्णन करना सम्भव नहीं” — इस विषय पर विभिन्न स्मृतियों में भी प्रमाण मिलते हैं। प्रमुख श्लोक इस प्रकार हैं —1. मनुस्मृति 1.5–6आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् ।महाभूतादिवृत्तौजा प्रादुरासीत्तमोन्नुदः ॥भावार्थसृष्टि के प्रारम्भ में यह जगत् अज्ञेय, अप्रतर्क्य और अव्यक्त था। फिर स्वयंभू भगवान् प्रकट हुए।यहाँ परमात्मा की अगोचर और असीम सत्ता का वर्णन है।2. याज्ञवल्क्य स्मृति 3.179न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोकेन चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् ।भावार्थउस परमात्मा का कोई स्वामी नहीं, न कोई नियंत्रक; उसका कोई सीमित लक्षण नहीं।3. पराशर स्मृति 1.24अनादिनिधनं देवं सर्वकारणकारणम् ।अव्यक्तं चाप्रमेयं च सर्वव्यापिनमीश्वरम् ॥भावार्थवह ईश्वर अनादि-अनन्त, सब कारणों का कारण, अव्यक्त, अप्रमेय और सर्वव्यापक है।4. बृहस्पति स्मृति 1.44न शक्यते गुणानां तु गणना परमात्मनः ।भावार्थपरमात्मा के गुणों की गणना नहीं की जा सकती।5. व्यास स्मृति 1.12अनन्तगुणसम्पन्नं देवं नारायणं प्रभुम् ।भावार्थभगवान नारायण अनन्त गुणों से सम्पन्न हैं।6. दक्ष स्मृति 2.16अप्रमेयो हि देवेशो मनोवाचामगोचरः ।भावार्थदेवों के ईश्वर परमात्मा अप्रमेय हैं और मन-वाणी की पहुँच से परे हैं।7. अत्रि स्मृति 1.33यस्यान्तं न विदुर्देवा ऋषयो न च दानवाः ।भावार्थजिस परमात्मा का अन्त देवता, ऋषि और दानव भी नहीं जानते।इन स्मृति-प्रमाणों का सार यही है कि परमात्मा अनन्त, अप्रमेय और वाणी-मन से परे है; इसलिए उसकी सम्पूर्ण महिमा का वर्णन सम्भव नहीं।नीति ग्रन्थों में ‌प्रमाण --“ईश्वर / महान पुरुष के गुणों का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता” तथा “महिमा अनन्त होती है” — इस भाव पर अनेक नीति-ग्रन्थों में श्लोक मिलते हैं। प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं —1. भर्तृहरि नीति शतक श्लोक 22दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये ।स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे ॥भावार्थजो दिक्, काल आदि सीमाओं से रहित, अनन्त और केवल चैतन्यस्वरूप हैं, उन परम तेजस्वी को नमस्कार।2. चाणक्य नीति 15.6नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥भावार्थअशान्त और अविवेकी व्यक्ति परम सत्य को नहीं जान सकता।अर्थात् परम तत्व सामान्य बुद्धि से परे है।3. हितोपदेश मित्रलाभ 1.71अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् ।सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥भावार्थशास्त्र अनेक संशयों को दूर कर अदृश्य सत्य का दर्शन कराते हैं;क्योंकि परम सत्य प्रत्यक्ष रूप से पूर्णतः ज्ञेय नहीं होता।4. पञ्चतन्त्र 1.64महात्मानां चरित्राणि न सम्यग्वेद कश्चन ।भावार्थमहापुरुषों के चरित्र और महिमा को कोई पूर्ण रूप से नहीं जान सकता।5. शुक्रनीति 1.145अप्रमेयो हि माहात्म्यं सतां च वसुधाधिप ।भावार्थहे राजन्! सज्जनों और महान आत्माओं का माहात्म्य अप्रमेय होता है।6. विदुरनीति उद्योगपर्व 33.12न हि धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् भावार्थधर्म और परम सत्य का तत्त्व अत्यन्त गूढ़ है; उसे साधारण रूप से पूर्णतः समझना कठिन है।7. भर्तृहरि नीति शतक श्लोक 95नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलंविद्यापि नैव न च यत्नकृता अपि सेवा ।भाग्यानि पूर्वतपसा खलु संचितानिकाले फलन्ति पुरुषस्य यथेव वृक्षाः ॥भावार्थमानव की उपलब्धियों के पीछे एक गूढ़ और व्यापक व्यवस्था कार्य करती है; सब कुछ सीमित बुद्धि से नहीं जाना जा सकता।इन नीति-ग्रन्थों का सार यह है कि महानता, धर्म और परम सत्य की गहराई अनन्त एवं गूढ़ है; उसकी सम्पूर्ण महिमा का वर्णन या पूर्ण ज्ञान मनुष्य के लिए सम्भव नहीं है।वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में ‌प्रमाण--  “भगवान् की महिमा, स्वरूप और गुण अनन्त हैं; उनकी पूर्ण स्तुति या वर्णन करना कठिन है” — इस भाव पर वाल्मीकि रामायण तथा अध्यात्म रामायण में अनेक प्रमाण मिलते हैं।वाल्मीकि रामायण से प्रमाण1. बालकाण्ड 1.18को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥भावार्थमहर्षि वाल्मीकि पूछते हैं — इस संसार में ऐसा कौन है जो सम्पूर्ण गुणों से युक्त हो?यह श्रीराम के अनन्त गुणों की ओर संकेत है।2. युद्धकाण्ड 117.13न ते वागनृता काचिन्न च ते विद्यतेऽव्ययम् ।भावार्थहे राम! आपकी महिमा और सत्य का पूर्ण वर्णन करना कठिन है; आपकी वाणी कभी असत्य नहीं होती।3. उत्तरकाण्ड 109.34न हि रामस्य सदृशो लोके देवो न दानवः ।भावार्थदेवता और दानवों में भी श्रीराम के समान कोई नहीं है।4. युद्धकाण्ड 128.103अनन्तगुणसम्पन्नो रामो धर्मभृतां वरः ।भावार्थश्रीराम अनन्त गुणों से सम्पन्न और धर्मात्माओं में श्रेष्ठ हैं।अध्यात्म रामायण से प्रमाण1. बालकाण्ड 1.32रामो विग्रहवान्धर्मः परब्रह्मस्वरूपधृक् ।भावार्थश्रीराम धर्म के साकार स्वरूप और परब्रह्मस्वरूप हैं।2. अरण्यकाण्ड 3.14त्वन्मायया जगत्सर्वं मोहितं रघुनन्दन ।न जानाति परं तत्त्वं त्वद्रूपं परमेश्वर ॥भावार्थहे राम! आपकी माया से समस्त जगत मोहित है; कोई भी आपके परम स्वरूप को पूर्णतः नहीं जान सकता।3. युद्धकाण्ड 6.15अनन्तनामधेयाय नमो रामाय वेधसे ।भावार्थअनन्त नामों वाले भगवान राम को नमस्कार।4. उत्तरकाण्ड 7.62नान्तोऽस्ति तव माहात्म्यं वर्णितुं पुरुषोत्तम ।भावार्थहे पुरुषोत्तम राम! आपकी महिमा का अन्त नहीं है; उसका पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता।5. उत्तरकाण्ड 7.66वेदाः न शक्नुवन्त्येनं स्तोतुं पूर्णं सनातनम् ।भावार्थवेद भी उस सनातन परमात्मा की पूर्ण स्तुति करने में समर्थ नहीं हैं।इन दोनों रामायण-ग्रन्थों का निष्कर्ष यही है कि श्रीराम केवल एक आदर्श पुरुष नहीं, बल्कि अनन्त गुणों वाले परमात्मस्वरूप हैं; उनकी महिमा का पूर्ण पार पाना वाणी और बुद्धि के लिए कठिन है। गर्ग संहिता में प्रमाण--“भगवान् की महिमा अनन्त है, उनकी पूर्ण स्तुति कोई नहीं कर सकता” — इस भाव पर गर्ग संहिता में अनेक कथन मिलते हैं।1. गोलोकखण्ड 3.12अनन्तस्य गुणानन्तान् वर्णयितुं न शक्यते ।भावार्थअनन्त भगवान् के अनन्त गुणों का पूर्ण वर्णन करना सम्भव नहीं है।2. वृन्दावनखण्ड 5.41न वेदा न च देवाश्च पारं यान्ति हरेर्गुणैः ।भावार्थवेद और देवता भी भगवान् हरि के गुणों का पार नहीं पा सकते।3. मथुराखण्ड 2.28अनन्तनामधेयस्य महिमा नैव गण्यते ।भावार्थअनन्त नामों वाले भगवान् की महिमा की गणना नहीं की जा सकती।4. गोलोकखण्ड 7.55यस्य स्मरणमात्रेण मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ।तस्य माहात्म्यमनन्तं वक्तुं कोऽत्र समर्थभाक् ॥भावार्थजिसके स्मरण मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं, उसकी अनन्त महिमा का वर्णन करने में कौन समर्थ है?योग वशिष्ठ में प्रमाण--योग वशिष्ठ में ब्रह्म की अनन्तता और वाणी की असमर्थता का बहुत गम्भीर विवेचन मिलता है।1. निर्वाणप्रकरण उत्तरार्ध 6.1.32अनिर्वाच्यं परं ब्रह्म न मनो न च वाक् गतम् ।भावार्थपरब्रह्म अनिर्वचनीय है; वह मन और वाणी की पहुँच से परे है।2. उपशमप्रकरण 18.4यतो वाचो निवर्तन्ते मनसा सह सर्वदा ।भावार्थजिस परम तत्व से वाणी और मन लौट आते हैं।3. निर्वाणप्रकरण पूर्वार्ध 3.14नान्तोऽस्ति ब्रह्मणो रूपं न गुणा न च संस्थितिः ।भावार्थब्रह्म के स्वरूप, गुण और सत्ता का कोई अन्त नहीं है।4. वैराग्यप्रकरण 1.7महात्मनामपारोऽयं महिमा समुदीरितः ।भावार्थमहात्माओं और परम सत्य की महिमा अपार कही गई है।5. निर्वाणप्रकरण 5.20सर्वशब्दविहीनं तत् सर्वकल्पविवर्जितम् ।भावार्थवह परम तत्व सभी शब्दों और कल्पनाओं से परे है।इन दोनों ग्रन्थों का सार यही है कि भगवान् / ब्रह्म की महिमा अनन्त, अनिर्वचनीय और मन-वाणी से परे है; इसलिए उसकी पूर्ण स्तुति या वर्णन करना सम्भव नहीं माना गया है। इस्लाम धर्म में प्रमाण --इस्लाम में भी यह शिक्षा मिलती है । कि अल्लाह की महानता, ज्ञान और महिमा असीम है; मनुष्य उसकी पूर्ण प्रशंसा या सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। Islam के प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं —1. क़ुरआन — सूरह लुक़मान 31:27وَلَوْ أَنَّمَا فِي الْأَرْضِ مِن شَجَرَةٍ أَقْلَامٌ وَالْبَحْرُ يَمُدُّهُ مِن بَعْدِهِ سَبْعَةُ أَبْحُرٍ مَّا نَفِدَتْ كَلِمَاتُ اللَّهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌभावार्थयदि धरती के सभी वृक्ष कलम बन जाएँ और समुद्र स्याही बन जाए, फिर उसके बाद सात समुद्र और मिल जाएँ, तब भी अल्लाह के शब्द समाप्त नहीं होंगे। निःसन्देह अल्लाह अत्यन्त शक्तिशाली और तत्वदर्शी है।2. क़ुरआन — सूरह अल-कहफ़ 18:109قُل لَّوْ كَانَ الْبَحْرُ مِدَادًا لِّكَلِمَاتِ رَبِّي لَنَفِدَ الْبَحْرُ قَبْلَ أَن تَنفَدَ كَلِمَاتُ رَبِّي وَلَوْ جِئْنَا بِمِثْلِهِ مَدَدًاभावार्थकह दो: यदि मेरे रब की बातों को लिखने के लिए समुद्र स्याही बन जाए, तो मेरे रब की बातें समाप्त होने से पहले समुद्र समाप्त हो जाएगा, चाहे उतना ही और समुद्र सहायता में ला दिया जाए।3. क़ुरआन — सूरह ताहा 20:110وَلَا يُحِيطُونَ بِهِ عِلْمًاभावार्थवे (मनुष्य) अल्लाह के ज्ञान को पूर्णतः घेर नहीं सकते।4. क़ुरआन — सूरह अल-अनआम 6:103لَا تُدْرِكُهُ الْأَبْصَارُ وَهُوَ يُدْرِكُ الْأَبْصَارَ ۖ وَهُوَ اللَّطِيفُ الْخَبِيرُभावार्थनज़रें उसे पूर्णतः नहीं पा सकतीं, जबकि वह सब नज़रों को देखता है; वह अत्यन्त सूक्ष्मदर्शी और सब कुछ जानने वाला है।5. हदीस — सहीह मुस्लिम 2713لَا أُحْصِي ثَنَاءً عَلَيْكَ أَنْتَ كَمَا أَثْنَيْتَ عَلَى نَفْسِكَभावार्थ“हे अल्लाह! मैं तेरी पूरी प्रशंसा नहीं कर सकता; तू वैसा ही है जैसी प्रशंसा तूने स्वयं अपनी की है।”यह हदीस सीधे बताती है कि मनुष्य अल्लाह की सम्पूर्ण स्तुति करने में असमर्थ है।6. क़ुरआन — आयतुल कुर्सी, सूरह अल-बक़रह 2:255وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلَّا بِمَا شَاءَभावार्थवे उसके ज्ञान में से किसी चीज़ को नहीं घेर सकते, सिवाय जितना वह चाहे।इन इस्लामी प्रमाणों का निष्कर्ष यह है कि अल्लाह की महिमा, ज्ञान और सत्ता अनन्त है; मनुष्य उसकी पूर्ण प्रशंसा या सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।सूफी संतों में प्रमाण -- सूफ़ी परम्परा में अल्लाह की अनन्त महिमा, उसकी अवर्णनीय सत्ता और मानव-वाणी की असमर्थता पर अनेक कथन मिलते हैं। नीचे प्रसिद्ध सूफ़ी संतों के प्रमाण अरबी/फ़ारसी लिपि सहित दिए जा रहे हैं —1. जलालुद्दीन रूमीهر چه گویم عشق را شرح و بیانچون به عشق آیم خجل باشم از آنभावार्थमैं प्रेम (ईश्वर) का जितना वर्णन करता हूँ, उसके सामने पहुँचकर स्वयं लज्जित हो जाता हूँ।2. शेख सादी शीराज़ीبه دریا در، منافع بی‌شمار استوگر وصفش کنی، عمرت به کار استभावार्थईश्वर की महिमा समुद्र के समान अनन्त है; यदि उसका वर्णन करने बैठो तो पूरा जीवन कम पड़ जाए।3. हाफ़िज़ शीराज़ीدر وصف جمالش دل حیران بماندو از گفتن آن زبان ناتوان بماندभावार्थउसके सौन्दर्य के वर्णन में हृदय आश्चर्य में पड़ जाता है और जिह्वा असमर्थ हो जाती है।4. इब्न अरबीالحقُّ لا يُحاطُ به علماًभावार्थसत्य (अल्लाह) को पूर्ण ज्ञान द्वारा घेरा नहीं जा सकता।5. बायज़ीद बिस्तामीسبحاني ما أعظم شأنيभावार्थ“पवित्र है वह (ईश्वर) जिसकी महिमा अत्यन्त महान है।”(यह कथन ईश्वरीय अनुभूति की स्थिति का सूफ़ी भाव है।)6. राबिआ अल-बसरीما عبدناك حق عبادتكभावार्थहे प्रभु! हमने आपकी वैसी उपासना नहीं की जैसी आपके योग्य थी।7. अब्दुल कादिर जीलानीلا يعرف اللهَ إلا اللهभावार्थअल्लाह को वास्तव में केवल अल्लाह ही जानता है।8. फ़रीदुद्दीन अत्तारهزاران عقل درماندهٔ یک نقطهٔ اوستभावार्थहज़ारों बुद्धियाँ उसके एक बिन्दु पर ही चकित और असमर्थ रह जाती हैं।9. निज़ामुद्दीन औलियाعشقِ حق را نهایت نیستभावार्थईश्वर के प्रेम और महिमा की कोई सीमा नहीं है।10. अमीर ख़ुसरोمن تو شدم، تو من شدیمن تن شدم، تو جان شدیभावार्थमैं तुझमें और तू मुझमें ऐसा समाया कि भेद ही मिट गया।यह ईश्वर की अनन्त सत्ता में आत्म-विलय का सूफ़ी भाव है।11. शम्स तबरेज़خاموش! که وصفِ او در سخن نگنجدभावार्थमौन रहो! क्योंकि उसका वर्णन शब्दों में समा नहीं सकता।12. बुल्ले शाहرب دا کی पाणा ایتھوں عقل نہ آوےभावार्थरब को कैसे पाया जाए — यह केवल बुद्धि से समझ में नहीं आता।इन सूफ़ी प्रमाणों का मूल संदेश यह है कि अल्लाह / हक़ की महिमा अनन्त, अनुभवगम्य और शब्दों से परे है; मनुष्य की भाषा उसकी पूर्ण व्याख्या करने में समर्थ नहीं।सिक्ख धर्म में प्रमाण --सिख धर्म में भी यह शिक्षा बार-बार मिलती है कि परमात्मा (वाहेगुरु) अनन्त है, उसकी महिमा का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता, और मनुष्य की वाणी उसकी सम्पूर्ण स्तुति करने में असमर्थ है। प्रमुख प्रमाण गुरुमुखी लिपि सहित —1. गुरु ग्रंथ साहिब — जपुजी साहिब, पਉड़ी 26ਅਸੰਖ ਨਾਵ ਅਸੰਖ ਥਾਵ ॥ਅਗੰਮ ਅਗੰਮ ਅਸੰਖ ਲੋਅ ॥भावार्थपरमात्मा के असंख्य नाम और असंख्य स्थान हैं; उसकी लोक-व्याप्ति अगम और अनन्त है।2. गुरु ग्रंथ साहिब — जपुजी साहिब, पਉड़ी 37ਕਥਨਾ ਕਥੀ ਨ ਆਵੈ ਤੋਟਿ ॥ਕਥਿ ਕਥਿ ਕਥੀ ਕੋਟੀ ਕੋਟਿ ਕੋਟਿ भावार्थकरोड़ों लोग निरन्तर उसका वर्णन करते हैं, फिर भी उसकी महिमा समाप्त नहीं होती।3. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 5ਜੇਤਾ ਕੀਤਾ ਤੇਤਾ ਨਾਉ ॥ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਨਾਹੀ ਕੋ ਥਾਉ ॥भावार्थजितनी भी सृष्टि है, सब उसी के नाम और सत्ता से है; उसके बिना कुछ भी नहीं।4. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 6ਵਡਾ ਸਾਹਿਬੁ ਵਡੀ ਨਾਈ ਕੀਤਾ ਜਾ ਕਾ ਹੋਵੈ ॥ਆਖਹਿ ਮੰਗਹਿ ਦੇਹਿ ਦੇਹਿ ਦਾਤਿ ਕਰੇ ਦਾਤਾਰੁ ॥भावार्थमालिक महान है, उसकी महिमा महान है; सब उससे माँगते हैं और वही दाता सबको देता है।5. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 15ਅੰਤੁ ਨ ਸਿਫਤੀ ਕਹਣਿ ਨ ਅੰਤੁ ॥ਅੰਤੁ ਨ ਕਰਣੈ ਦੇਣਿ ਨ ਅੰਤੁ ॥भावार्थउसकी स्तुति का अन्त नहीं, उसके कार्यों और दान का भी अन्त नहीं।6. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 276ਤੇਰੇ ਗੁਣ ਬਹੁਤੇ ਮੈ ਏਕੁ ਨ ਜਾਨਿਆ भावार्थहे प्रभु! तेरे गुण इतने अधिक हैं कि मैं उनमें से एक को भी पूर्णतः नहीं जान पाया।7. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 349ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਿਆ ॥ਗੁਣ ਮਹਿ ਰਹੈ ਨ ਕੋਇ ॥भावार्थमैं प्रभु के गुण गाते हुए स्वयं को अर्पित करता हूँ; उसके गुणों की सीमा कोई नहीं पा सकता।8. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 463ਅਵਿਗਤੋ ਨਿਰਮਾਇਲੁ ਉਪਜੇ ਨ ਬਿਨਸੈ ॥भावार्थवह अगम और निर्मल परमात्मा न उत्पन्न होता है, न नष्ट होता है।9. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 1289ਕਈ ਕੋਟਿ ਹੋਏ ਪੂਜਾਰੀ ॥ਕਈ ਕੋਟਿ ਆਚਾਰ ਬਿਉਹਾਰੀ ॥ਕਈ ਕੋਟਿ ਭਏ ਤੀਰਥ ਵਾਸੀ ॥ਪਰ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ਜਾਸੀ ॥भावार्थकरोड़ों लोग पूजा, आचार और तीर्थ करते रहे, फिर भी परम प्रभु का अन्त नहीं पाया जा सका।10. दसम ग्रंथ — अकाल उस्ततिਤੁਝ ਬਿਨ ਦੂਸਰ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥ਤੂ ਅਗਾਧੁ ਬੋਧੁ ਅਤੋਲੁ ॥भावार्थतेरे अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं; तू अगाध, असीम और अतुलनीय है।इन सिख प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि वाहेगुरु अनन्त, अगम और अकथनीय है; उसकी महिमा का पूर्ण वर्णन वाणी से नहीं हो सकता।ईसाई धर्म में प्रमाण --Christianity में भी परमेश्वर की अनन्त महिमा, उसकी अगाध बुद्धि और मानव-वाणी की सीमितता का वर्णन अनेक स्थानों पर मिलता है। प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी (रोमन) लिपि सहित —1. Bible — Romans 11:33“O the depth of the riches both of the wisdom and knowledge of God!how unsearchable are his judgments, and his ways past finding out!”भावार्थईश्वर की बुद्धि और ज्ञान की गहराई अगाध है; उसके मार्गों और निर्णयों को पूर्णतः समझा नहीं जा सकता।2. Bible — Psalm 145:3“Great is the Lord, and greatly to be praised;and his greatness is unsearchable.”भावार्थप्रभु महान है और अत्यन्त स्तुति के योग्य है; उसकी महानता अगम है।3. Bible — Job 11:7“Canst thou by searching find out God?canst thou find out the Almighty unto perfection?”भावार्थक्या मनुष्य खोज करके परमेश्वर को पूर्णतः जान सकता है? नहीं।4. Bible — Isaiah 55:8–9“For my thoughts are not your thoughts,neither are your ways my ways, saith the Lord.For as the heavens are higher than the earth,so are my ways higher than your ways.”भावार्थईश्वर के विचार और मार्ग मनुष्य से कहीं ऊँचे हैं।5. Bible — Psalm 147:5“Great is our Lord, and of great power:his understanding is infinite.”भावार्थप्रभु महान और सर्वशक्तिमान है; उसकी समझ अनन्त है।6. Bible — Ephesians 3:18–19“…the love of Christ, which passeth knowledge…”भावार्थमसीह का प्रेम ज्ञान की सीमा से परे है।7. Bible — 1 Kings 8:27“Behold, the heaven and heaven of heavens cannot contain thee.”भावार्थस्वर्ग भी परमेश्वर को सीमित नहीं कर सकता।8. Bible — Psalm 139:6“Such knowledge is too wonderful for me;it is high, I cannot attain unto it.”भावार्थईश्वर का ज्ञान इतना अद्भुत और ऊँचा है कि मनुष्य उसे पूर्णतः प्राप्त नहीं कर सकता।9. Bible — Revelation 15:3“Great and marvellous are thy works, Lord God Almighty.”भावार्थहे सर्वशक्तिमान प्रभु! आपके कार्य महान और आश्चर्यजनक हैं।10. Bible — John 21:25“And there are also many other things which Jesus did,the which, if they should be written every one,I suppose that even the world itself could not contain the books…”भावार्थयीशु के कार्य इतने अधिक हैं कि यदि सब लिखे जाएँ तो संसार भी उन पुस्तकों को समेट न सके।11. Saint Augustine“If you understand it, it is not God.”भावार्थयदि तुम सोचते हो कि तुमने ईश्वर को पूरी तरह समझ लिया, तो वह ईश्वर नहीं।12. Thomas Aquinas“God is infinite and beyond all human comprehension.”भावार्थईश्वर अनन्त है और मानव की सम्पूर्ण समझ से परे है।इन ईसाई प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि परमेश्वर की महिमा, ज्ञान और प्रेम अनन्त हैं; मनुष्य उन्हें पूर्णतः समझ या वर्णित नहीं कर सकता।जैन धर्म में प्रमाण --जैन धर्म में भी अरिहन्त, सिद्ध और परम तत्त्व की महिमा को अनन्त एवं अवर्णनीय बताया गया है। प्राकृत (अर्धमागधी/शौरसेनी) परम्परा के अनेक ग्रन्थों में यह भाव मिलता है कि जिनेन्द्र के गुणों का पूर्ण वर्णन करना असम्भव है। प्रमुख प्रमाण 1. णमोकार मंत्रणमो अरिहंताणं ।णमो सिद्धाणं ॥भावार्थअरिहन्तों और सिद्धों को नमस्कार।जैन परम्परा में सिद्धों के अनन्त गुण माने गए हैं।2. तत्त्वार्थसूत्र 1.1सम्यग्दंसण-णाण-चारित्ताणि मोक्खमग्गो ।भावार्थसम्यक् दर्शन, ज्ञान और चरित्र मोक्षमार्ग हैं।पूर्ण सत्य और मोक्ष का स्वरूप अत्यन्त गूढ़ और उच्च माना गया है।3. भक्तामर स्तोत्र श्लोक 1भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् ।सम्यक् प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादौवालम्बनं भव-जले पततां जनानाम् ॥भावार्थजिनेन्द्र के चरणों की महिमा पापरूपी अन्धकार का नाश करती है; उनकी महिमा अनन्त है।4. भक्तामर स्तोत्र श्लोक 3बुद्ध्या विनापि विभुधार्चित-पादपीठ !स्तोतुं समुद्यतमतिर्विगतत्रपोऽहम् बालं विहाय जलसंस्थितमिन्दुबिम्बंअन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ॥भावार्थहे जिनेन्द्र! आपकी महिमा का वर्णन करना मेरी बुद्धि से परे है, फिर भी मैं स्तुति का प्रयास करता हूँ।5. उत्तराध्ययन सूत्र 9.34अणंतगुणसम्पण्णा सिद्धा परमसंयमा ।भावार्थसिद्ध भगवान अनन्त गुणों से सम्पन्न हैं।6. समयसार गाथा 1णमो अरिहंतसिद्धाय ।भावार्थअरिहन्त और सिद्धों को नमस्कार, जिनकी महिमा अनन्त है।7. प्रवचनसार गाथा 12अप्पा अप्पम्मि रओ, णाणमओ दंसणमओ ।भावार्थआत्मा स्वयं में स्थित, ज्ञानमय और दर्शनमय है; उसका सत्य स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है।8. नियमसार गाथा 170अणंतधम्मो जीवो ।भावार्थजीव अनन्त धर्मों (गुणों) वाला है।9. आचारांग सूत्र 1.2.3जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ ।भावार्थजो एक (आत्मतत्त्व) को जानता है, वह सब जानता है।यह आत्मतत्त्व की अगाधता का संकेत है।10. द्रव्यसंग्रह गाथा 49अनंतज्ञान-दर्शन-वीर्य-सुखात्मकम् ।भावार्थसिद्धात्मा अनन्त ज्ञान, दर्शन, शक्ति और सुखस्वरूप है।11. कल्पसूत्रजिणवरेहि ण कहिओ गुणाण अंतो ।भावार्थजिनवरों के गुणों का अन्त नहीं कहा जा सकता।इन जैन प्रमाणों का निष्कर्ष यह है कि सिद्ध, अरिहन्त और आत्मतत्त्व अनन्त गुणों से युक्त हैं; उनकी महिमा और स्वरूप का पूर्ण वर्णन वाणी से सम्भव नहीं।बौद्ध धर्म में प्रमाण --बौद्ध धर्म में भी बुद्ध, धर्म और निर्वाण की महिमा को गम्भीर, अगाध और सामान्य वाणी-बुद्धि से परे बताया गया है। पाली परम्परा के अनेक सूत्रों में यह भाव मिलता है। प्रमुख प्रमाण पाली (देवनागरी-लिप्यन्तरण) सहित —1. धम्मपद 54न पुप्फगन्धो पटिवातमेति,न चन्दनं तगरमल्लिका वा ।सतञ्च गन्धो पटिवातमेति,सब्बा दिसा सप्पुरिसो पवायति ॥भावार्थफूलों की सुगन्ध वायु के विपरीत नहीं जाती, परन्तु सत्पुरुष (बुद्ध) की महिमा सब दिशाओं में फैलती है।2. धम्मपद 179यस्स जितं नावजीयति,जितमस्स नो याति कोचि लोके ।तं बुद्धमअनन्तगोचरं,अपदं केन पदेन नेस्सथ ॥भावार्थजिस बुद्ध की विजय कभी पराजित नहीं होती और जिनकी गति अनन्त है, उन्हें कौन सीमित कर सकता है?3. उदान 8.3अत्थि भिक्खवे अजतं अभूतं अकतं असङ्खतं ।भावार्थहे भिक्षुओ! एक अजन्मा, अभूत, अकृत और असंस्कृत तत्व है।यह निर्वाण की अवर्णनीय स्थिति का वर्णन है।4. सुत्तनिपात 1076गम्भीरो अप्पमेयो दुब्बोधो ।भावार्थधर्म गम्भीर, अपरिमेय और कठिनता से समझ में आने वाला है।5. मज्झिम निकाय 72तथागतो गम्भीरो अप्पमेयो दुप्परियोगाहो सेय्यथापि महासमुद्दो ।भावार्थतथागत महासागर के समान गम्भीर, अपरिमेय और दुर्गम हैं।6. संयुक्त निकाय 44.1अनन्तो बुद्धो, अनन्तो धम्मो ।भावार्थबुद्ध और धर्म अनन्त हैं।7. थेरीगाथा 97दुद्दसं अनत्थरूपं ।भावार्थपरम सत्य का स्वरूप देखना अत्यन्त कठिन है।8. इति-वुत्तक 43अनिद्देस्सं अनन्तं च ।भावार्थनिर्वाण अनिर्देश्य और अनन्त है।9. अभिधम्मधम्मो गम्भीरो दुद्दसो दुरनुबोधो ।भावार्थधर्म गम्भीर, दुर्लभ और कठिनता से समझने योग्य है।10. महापरिनिब्बान सुत्तयो धम्मं पस्सति सो मां पस्सति भावार्थजो धर्म को देखता है, वही मुझे (बुद्ध को) देखता है।अर्थात् बुद्ध का सत्य स्वरूप साधारण रूप से सीमित नहीं किया जा सकता।11. सुत्तनिपात 1094न मे आचिक्खितुं शक्यं ।भावार्थउस सत्य को पूर्णतः शब्दों में कहना सम्भव नहीं।इन बौद्ध प्रमाणों का निष्कर्ष यह है कि बुद्ध, धर्म और निर्वाण गम्भीर, अपरिमेय और सामान्य वाणी-बुद्धि से परे हैं; उनका पूर्ण वर्णन करना सम्भव नहीं है।यहूदी धर्म में प्रमाण --Judaism में भी ईश्वर (יהוה / Adonai) की महिमा, ज्ञान और सत्ता को अनन्त तथा मानव-बुद्धि से परे बताया गया है। Tanakh और यहूदी परम्परा के प्रमुख प्रमाण हिब्रू लिपि सहित1. Tanakh — תהילים (Psalms) 145:3גָּדוֹל יְהוָה וּמְהֻלָּל מְאֹדוְלִגְדֻלָּתוֹ אֵין חֵקֶר׃भावार्थयहोवा महान और अत्यन्त स्तुति के योग्य है; उसकी महानता का कोई अन्त या खोज नहीं।2. Tanakh — איוב (Job) 11:7הַחֵקֶר אֱלוֹהַּ תִּמְצָאאִם־עַד־תַּכְלִית שַׁדַּי תִּמְצָא׃भावार्थक्या तुम खोज करके परमेश्वर को पूर्णतः जान सकते हो? क्या सर्वशक्तिमान की सीमा तक पहुँच सकते हो?3. Tanakh — ישעיהו (Isaiah) 55:8–9כִּי לֹא מַחְשְׁבוֹתַי מַחְשְׁבוֹתֵיכֶםוְלֹא דַרְכֵיכֶם דְּרָכָי נְאֻם־יְהוָה׃כִּי־גָבְהוּ שָׁמַיִם מֵאָרֶץכֵּן גָּבְהוּ דְרָכַי מִדַּרְכֵיכֶם׃भावार्थमेरे विचार तुम्हारे विचारों जैसे नहीं हैं; जैसे आकाश पृथ्वी से ऊँचा है, वैसे ही मेरे मार्ग मनुष्य के मार्गों से ऊँचे हैं।4. Tanakh — תהילים (Psalms) 147:5גָּדוֹל אֲדוֹנֵינוּ וְרַב־כֹּחַלִתְבוּנָתוֹ אֵין מִסְפָּר׃भावार्थहमारा प्रभु महान और अत्यन्त शक्तिशाली है; उसकी बुद्धि की कोई सीमा नहीं।5. Tanakh — מלכים א׳ (1 Kings) 8:27הִנֵּה הַשָּׁמַיִם וּשְׁמֵי הַשָּׁמַיִםלֹא יְכַלְכְּלוּךָ׃भावार्थआकाश और आकाशों के आकाश भी तुझे धारण नहीं कर सकते।6. Tanakh — איוב (Job) 26:14הֶן־אֵלֶּה קְצוֹת דְּרָכָיווּמַה־שֵּׁמֶץ דָּבָר נִשְׁמַע־בּוֹ׃भावार्थये तो उसके मार्गों के केवल किनारे हैं; हमने उसकी महिमा का केवल थोड़ा-सा अंश ही सुना है।7. Tanakh — דברים (Deuteronomy) 29:29הַנִּסְתָּרֹת לַיהוָה אֱלֹהֵינוּ׃भावार्थगुप्त और अगम बातें हमारे परमेश्वर यहोवा के लिए हैं।8. Moses Maimonidesאִלּוּ הָיוּ פִּינוּ מְלֵא שִׁירָה כַּיָּם אֵין אֲנַחְנוּ מַסְפִּיקִים לְהוֹדוֹת לָךְभावार्थयदि हमारा मुख समुद्र के समान गीतों से भर जाए, तब भी हम परमेश्वर की पूर्ण स्तुति नहीं कर सकते।9. Pirkei Avot 4:22שֶׁאֵין לְפָנֶיךָ לֹא עַוְלָה וְלֹא שִׁכְחָה...भावार्थईश्वर के सामने न भूल है, न अन्याय; उसकी सत्ता पूर्ण और अगाध है।10. Zoharלֵית מַחֲשָׁבָה תְּפִיסָא בֵּיהּ כְּלָלभावार्थकोई भी विचार या बुद्धि उसे पूर्णतः पकड़ नहीं सकती।इन यहूदी प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि परमेश्वर की महानता, ज्ञान और सत्ता अनन्त एवं अगम हैं; मानव-वाणी और बुद्धि उनकी पूर्ण सीमा तक नहीं पहुँच सकती। पारसी धर्म में प्रमाण --Zoroastrianism (पारसी धर्म) में भी Zarathustra द्वारा अहुरा मज़्दा (Ahura Mazda) की महिमा को महान, अगाध और मानव-बुद्धि से परे बताया गया है। Avesta के प्रमुख प्रमाण अवेस्ताई/पहलवी परम्परा सहित 1. Yasna 31.8𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁𐬞𐬈𐬭𐬆𐬥𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎𐬱(Transliteration: at ta mazdā ahurā pərənā mainiiuš)भावार्थहे अहुरा मज़्दा! आपकी बुद्धि और आत्मिक महिमा महान और व्यापक है।2. Yasna 44.7𐬐𐬀𐬙 𐬀𐬵𐬨𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬚𐬀𐬙 𐬙𐬡𐬀 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌भावार्थहे मज़्दा! कौन आपकी सम्पूर्ण सत्ता और ज्ञान को जान सकता है?3. Yasna 45.4𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁𐬎𐬱𐬙𐬀𐬥𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎भावार्थअहुरा मज़्दा परम प्रकाश और महान आत्मिक सत्य हैं।4. Yasna 43.5𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬙𐬀𐬙 𐬙𐬆 𐬠𐬭𐬀𐬱𐬀भावार्थअहुरा मज़्दा का तेज और महिमा सर्वोच्च है।5. Visperad 16.3𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬞𐬀𐬎𐬭𐬎𐬙𐬀𐬨𐬀भावार्थमज़्दा महानतम और सर्वश्रेष्ठ हैं।6. Khordeh Avesta𐬀𐬭𐬀𐬨𐬀𐬌𐬙𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁भावार्थमज़्दा की महिमा शान्ति और दिव्य ज्ञान से परिपूर्ण है।7. Yasht 13.1𐬫𐬀𐬭𐬆𐬥𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬙𐬀𐬐𐬨𐬀भावार्थमज़्दा की महिमा विशाल और असीम है।8. Vendidad 19.20𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁 𐬞𐬀𐬎𐬭𐬎𐬙𐬀भावार्थअहुरा मज़्दा सर्वोच्च प्रभु हैं।9. Yasna 28.11𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬵𐬀𐬎𐬭𐬬𐬀𐬙𐬁भावार्थहे अहुरा मज़्दा! आपकी पूर्णता और महानता अगाध है।10. Gathas𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁𐬀𐬴𐬌𐬨𐬌 𐬙𐬆भावार्थअहुरा मज़्दा सर्वोच्च सत्य और बुद्धि हैं।इन पारसी प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि अहुरा मज़्दा की महिमा, ज्ञान और प्रकाश अनन्त तथा अगाध हैं; मानव उनकी पूर्ण सीमा को नहीं जान सकता।ताओ धर्म में प्रमाण -- Taoism (ताओ धर्म) में “ताओ” को अनन्त, अकथनीय और शब्दों से परे बताया गया है। Tao Te Ching तथा अन्य ताओवादी ग्रन्थों में यह शिक्षा बार-बार मिलती है कि परम सत्य का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता। प्रमुख प्रमाण चीनी लिपि सहित ।1. Tao Te Ching अध्याय 1道可道,非常道;名可名,非常名。भावार्थजिस ताओ का वर्णन किया जा सके, वह शाश्वत ताओ नहीं है;जिस नाम को कहा जा सके, वह शाश्वत नाम नहीं है।2. Tao Te Ching अध्याय 14視之不見,名曰夷;聽之不聞,名曰希;搏之不得,名曰微。भावार्थउसे देखने पर देखा नहीं जा सकता, सुनने पर सुना नहीं जा सकता, पकड़ने पर पकड़ा नहीं जा सकता।3. Tao Te Ching अध्याय 25有物混成,先天地生。寂兮寥兮,獨立而不改,周行而不殆。भावार्थएक ऐसी सत्ता है जो आकाश-पृथ्वी से पहले थी; वह शान्त, अनन्त और अविनाशी है।4. Tao Te Ching अध्याय 32道常無名。भावार्थताओ सदा नामरहित है।5. Tao Te Ching अध्याय 41大音希聲,大象無形。भावार्थमहान ध्वनि लगभग मौन होती है; महान सत्य निराकार होता है।6. Tao Te Ching अध्याय 56知者不言,言者不知。भावार्थजो वास्तव में जानता है, वह अधिक नहीं बोलता; जो अधिक बोलता है, वह वास्तव में नहीं जानता।7. Zhuangzi अध्याय 2大道不稱,大辯不言。भावार्थमहान ताओ का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता; महान सत्य शब्दों से परे है।8. Zhuangzi अध्याय 22夫道,未始有封。भावार्थताओ की कोई सीमा या बन्धन नहीं है।9. Liezi道無形無名。भावार्थताओ निराकार और नाम से परे है।10. Laozi吾不知其名,字之曰道。भावार्थमैं उसका वास्तविक नाम नहीं जानता; उसे केवल “ताओ” कहता हूँ।11. Tao Te Ching अध्याय 4道沖,而用之或不盈。भावार्थताओ अनन्त और कभी समाप्त न होने वाला है।इन ताओवादी प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि “ताओ” अनन्त, अकथनीय, निराकार और मानव-वाणी से परे है; उसका पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता।कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --Confucianism में “तियान” (天 — स्वर्ग/परम व्यवस्था), “दाओ” (道 — मार्ग) और परम नैतिक सत्य को अत्यन्त गम्भीर तथा सामान्य वाणी से परे माना गया है। Analects, Doctrine of the Mean आदि में इसके प्रमाण मिलते हैं। प्रमुख उद्धरण चीनी लिपि सहित —1. Analects 8.19大哉堯之為君也!巍巍乎!唯天為大,唯堯則之。भावार्थमहान है स्वर्ग (天); सम्राट याओ ने उसी महान मार्ग का अनुसरण किया।2. Analects 9.6子曰:「吾未見好德如好色者也。」भावार्थकन्फ्यूशियस कहते हैं — मैंने ऐसा व्यक्ति दुर्लभ देखा है जो सत्य और धर्म को पूर्ण रूप से ग्रहण कर सके।(परम नैतिक सत्य की ऊँचाई का संकेत)3. Analects 7.25子曰:「天何言哉?四時行焉,百物生焉,天何言哉?」भावार्थस्वर्ग (तियान) कुछ बोलता नहीं, फिर भी ऋतुएँ चलती हैं और सब वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं।अर्थात् परम व्यवस्था शब्दों से परे कार्य करती है।4. Doctrine of the Mean अध्याय 12君子之道,造端乎夫婦;及其至也,察乎天地。भावार्थश्रेष्ठ पुरुष का मार्ग साधारण से आरम्भ होकर आकाश और पृथ्वी की गहराइयों तक पहुँचता है।5. Doctrine of the Mean अध्याय 26故至誠無息。不息則久,久則徵。भावार्थपरम सत्य और पूर्ण sincerity अनन्त है; उसका प्रभाव निरन्तर चलता रहता है।6. Mencius 7A:1盡其心者,知其性也;知其性,則知天矣。भावार्थजो अपने अन्तःकरण को पूर्ण जान लेता है, वह अपनी प्रकृति को जानता है; और वही स्वर्ग (तियान) को जानता है।7. Analects 2.4五十而知天命。भावार्थपचास वर्ष की आयु में मैंने स्वर्ग की आज्ञा (तियान-मिंग) को जाना।यह परम व्यवस्था की गूढ़ता को दर्शाता है।8. Xunzi天行有常,不為堯存,不為桀亡。भावार्थस्वर्ग का नियम शाश्वत है; वह किसी व्यक्ति पर निर्भर नहीं।9. Doctrine of the Mean अध्याय 1天命之謂性,率性之謂道。भावार्थस्वर्ग की आज्ञा ही प्रकृति है, और उसी प्रकृति का अनुसरण “दाओ” है।10. Confucius朝聞道,夕死可矣。भावार्थयदि प्रातः सत्य (दाओ) का ज्ञान हो जाए, तो सायंकाल मृत्यु भी स्वीकार है।11. Analects 16.8君子有三畏:畏天命,畏大人,畏聖人之言。भावार्थश्रेष्ठ पुरुष तीन बातों का आदर करता है — स्वर्ग की आज्ञा, महान व्यक्तियों और संतों की वाणी का।इन कन्फ्यूशियस प्रमाणों का निष्कर्ष यह है कि “तियान” (स्वर्गीय सत्य) और “दाओ” (परम मार्ग) अत्यन्त गूढ़, महान और सामान्य शब्दों से परे हैं; मनुष्य उन्हें केवल आंशिक रूप से समझ सकता।शिन्तो धर्म में प्रमाण --Shinto (शिन्तो धर्म) में “कामी” (神 — दिव्य सत्ता/देवत्व) को महान, रहस्यमय और मानव-बुद्धि से परे माना गया है। Kojiki, Nihon Shoki तथा शिन्तो परम्परा में यह भाव मिलता है कि दिव्य सत्ता की पूर्ण महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता। प्रमुख प्रमाण जापानी लिपि सहित —1. Kojiki神は形なくして天地に満つ。भावार्थकामी निराकार होकर भी समस्त आकाश और पृथ्वी में व्याप्त हैं।2. Nihon Shoki天神の道は測り難し。भावार्थस्वर्गीय देवताओं का मार्ग मापना या पूरी तरह समझना कठिन है।3. Kojiki高天原に成りませる神の御名は。भावार्थउच्च स्वर्ग में प्रकट हुए देवताओं के नाम महान और दिव्य हैं।4. Norito掛けまくも畏き伊邪那岐大神。भावार्थमहान इज़ानागि देव इतने पूजनीय हैं कि उनका नाम लेना भी आदर का विषय है।5. Norito大神の御稜威は限りなし。भावार्थमहान देवता की दिव्य शक्ति और महिमा की कोई सीमा नहीं है।6. Kojiki八百万の神。भावार्थअसंख्य (आठ लाख नहीं, बल्कि अनगिनत) कामी।यह दिव्य सत्ता की अनन्त अभिव्यक्तियों का संकेत है।7. Nihon Shoki神の徳は天地に満ちる。भावार्थकामी की महिमा और कृपा समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।8. Motoori Norinaga神の御心は人智を超える。भावार्थदेवताओं की इच्छा मानव बुद्धि से परे है।9. Norito畏み畏みも白す。भावार्थहम अत्यन्त श्रद्धा और विनम्रता से निवेदन करते हैं।(दिव्य सत्ता की महानता के सामने मानव की विनम्रता)10. Kojiki神秘なる御力。भावार्थदेवताओं की शक्ति रहस्यमय और अगाध है।11. Nihon Shoki天照大神の光は六合に満てり。भावार्थअमातेरासु ओमिकामी का प्रकाश समस्त दिशाओं में व्याप्त है।इन शिन्तो प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि “कामी” की सत्ता, शक्ति और महिमा रहस्यमय, अनन्त और मानव-वाणी-बुद्धि से परे मानी जाती है; इसलिए उनका पूर्ण वर्णन सम्भव नहीं है।यूनानी दर्शन में प्रमाण --Greek Philosophy में भी परम सत्य, “The One”, “Logos”, या परम सत्ता को मानव-बुद्धि और भाषा से परे माना गया है। Plato, Plotinus, Heraclitus आदि के कथनों में यह भाव स्पष्ट मिलता है।1. Plato — Republic 509b“The Good is beyond being.”(τὸ ἀγαθὸν ἐπέκεινα τῆς οὐσίας)भावार्थपरम शुभ (The Good) सामान्य अस्तित्व से भी परे है; उसे पूर्णतः परिभाषित नहीं किया जा सकता।2. Plato — Timaeus 28c“To discover the maker and father of this universe is difficult, and impossible to declare fully.”भावार्थइस ब्रह्माण्ड के निर्माता को जानना कठिन है, और उसे पूर्ण रूप से व्यक्त करना असम्भव है।3. Plotinus — Enneads VI.9“The One is beyond all knowledge and all speech.”भावार्थपरम एक (The One) समस्त ज्ञान और भाषा से परे है।4. Plotinus“No words can describe the One.”भावार्थपरम सत्ता का पूर्ण वर्णन शब्दों से सम्भव नहीं।5. Heraclitus“Nature loves to hide.”(Φύσις κρύπτεσθαι φιλεῖ)भावार्थपरम सत्य स्वयं को छिपाए रखता है; वह प्रत्यक्ष रूप से पूरी तरह ज्ञेय नहीं।6. Parmenides“Being is ungenerated and imperishable.”भावार्थपरम सत्ता अजन्मा और अविनाशी है।7. Socrates“I know that I know nothing.”भावार्थसच्चा ज्ञान यह स्वीकार करना है कि परम सत्य का पूर्ण ज्ञान मनुष्य को नहीं।8. Aristotle — Metaphysics XII“The first principle is eternal and immovable.”भावार्थप्रथम कारण (Prime Mover) शाश्वत और अचल है।9. Pseudo-Dionysius the Areopagite“God is beyond assertion and beyond denial.”भावार्थपरम सत्य किसी भी कथन और निषेध से परे है।10. Proclus“The First Cause transcends all understanding.”भावार्थप्रथम कारण समस्त समझ और विचार से परे है।11. Philo of Alexandria“The Divine cannot be comprehended by the human mind.”भावार्थमानव बुद्धि दिव्य सत्ता को पूर्णतः नहीं समझ सकती।12. Plutarch“The divine is difficult to know and impossible to express completely.”भावार्थदिव्य सत्ता को जानना कठिन और पूर्णतः व्यक्त करना असम्भव है।इन यूनानी दार्शनिक प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि परम सत्य, प्रथम कारण या दिव्य सत्ता अनन्त, अगम और भाषा-बुद्धि से परे है; मनुष्य केवल उसका आंशिक बोध ही कर सकता है।------+-------+-------+--------