हवा में अब स्थिरता नहीं थी वो काँप रही थी जैसे दो अदृश्य ताकतें एक-दूसरे को धकेल रही हों मंडल के भीतर जलते दीपक कभी तेज़ हो जाते, कभी धीमे और हर बार उनके साथ पेड़ की दरारें भी गहरी होती जातीं
तांत्रिक ने अपनी जगह नहीं छोड़ी उसके दोनों शिष्य मंत्र की गति बढ़ा चुके थे उनके स्वर अब एक लय में बंध गए थेतेज़, स्थिर और भारी
“ॐ भैरवाय नमः… ॐ भैरवाय नमः…”
मंडल की रेखाएँ हल्की चमकने लगीं।
बाहर खड़ा दूसरा तांत्रिक बस देख रहा था… उसके चेहरे पर अब भी वही शांत मुस्कान थी। जैसे ये सब पहले से तय हो।
आरव ने धीरे से कबीर की तरफ देखा
आरव- ये सीधा हमला क्यों नहीं कर रहा?
कबीर- क्योंकि इसे जरूरत नहीं है इसका काम वो कर रहा है
उसने पेड़ की तरफ इशारा किया पेड़ के अंदर फंसी हुई वो आकृति अब पूरी तरह तड़प रही थी उसका आधा शरीर बाहर आने की कोशिश में खिंच रहा था लेकिन मंडल की सीमा उसे रोक रही थी मीरा ने धीमे स्वर में कहा।
मीरा- ये दोनों इसे अपनी तरफ खींच रहे हैं
आरव- एक इसे मुक्त करना चाहता है और दूसरा बाँधे रखना
उसी समय बाहर खड़े तांत्रिक ने धीरे से अपनी जेब से कुछ निकाला एक छोटा सा हड्डी का टुकड़ा जिस पर काले धागे लिपटे हुए थे उसने उसे अपने हाथ में घुमाया और आँखें बंद कर लीं।
अगले ही पल पेड़ के अंदर की आकृति ने एक भयानक चीख मारी मंडल के दीपक एक साथ झिलमिला उठे
तांत्रिक ने तुरंत मंत्र की दिशा बदली
तांत्रिक- ऊँ क्लीं… स्तंभय…!
उसकी आवाज में अब आदेश था मंडल की रेखाएँ और तेज़ चमकने लगीं जैसे किसी ने उन्हें भीतर से जला दिया हो।
लेकिन असर पूरी तरह नहीं हुआ आकृति अब और बाहर आ गई थी उसका चेहरा अब साफ दिख रहा था
विकृत जला हुआ और आँखें पूरी तरह खाली निशा ने डरकर आँखें बंद कर लीं।
निशा- ये ये इंसान नहीं है
कबीर ने धीरे से कहा
कबीर- था कभी
बाहर खड़ा तांत्रिक अब धीरे-धीरे आगे बढ़ा लेकिन मंडल से कुछ दूरी पर रुक गया
उसने आँखें खोलीं
अजनबी तांत्रिक- इसे रोको मत ये मेरी साधना है
तांत्रिक ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया
तांत्रिक- साधना नहीं विकृति है
अजनबी तांत्रिक हल्का हँसा
अजनबी तांत्रिक- फर्क सिर्फ नजर का होता है।
आरव ने पहली बार सीधे उससे कहा।
आरव- तुमने इसे क्यों बाँधा?
कुछ सेकंड के लिए खामोशी छा गई।
फिर उसने जवाब दिया।
अजनबी तांत्रिक- क्योंकि ये भागता नहीं लड़ता है।
मीरा ने धीरे से कहा
मीरा- तुम इसे इस्तेमाल कर रहे हो
अजनबी तांत्रिक- हर शक्ति इस्तेमाल के लिए होती है।
तभी पेड़ के अंदर की आकृति अचानक शांत हो गई एकदम स्थिर सब कुछ एक पल के लिए रुक गया
फिर उसने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया इस बार उसकी नजर रोहित पर नहीं सीधे मंडल के भीतर खड़े तांत्रिक पर थी कबीर ने तुरंत समझ लिया।
कबीर- ये अब target बदल चुका है
अचानक आकृति ने पूरी ताकत से आगे झटका मारा मंडल की एक रेखा टूट गई एक दीपक बुझ गया मीरा चिल्लाई
मीरा- लाइन टूट गई!
हवा में दबाव अचानक बढ़ गया तांत्रिक ने बिना समय गंवाए अपने हाथ से राख उठाई और टूटी हुई जगह पर फेंकी।
तांत्रिक- स्थिर!
रेखा फिर से जुड़ गई लेकिन अब कमजोर थी बाहर खड़ा तांत्रिक अब मुस्कुरा नहीं रहा था उसकी आँखों में हल्की तीव्रता आ गई थी
अजनबी तांत्रिक- ज्यादा देर नहीं रोक पाओगे।
तांत्रिक- उतनी देर काफी है
आरव ने तुरंत फैसला लिया
आरव- कबीर मीरा हमें मदद करनी होगी
कबीर ने बिना सवाल किए सिर हिलाया
कबीर- बस यही इंतजार था
मीरा ने अपनी थैली से गंगाजल की छोटी बोतल निकाली
मीरा- हम क्या करें?
तांत्रिक ने पहली बार उनकी तरफ देखा
तांत्रिक- जो भी करो मंडल के अंदर मत आना।
आरव- और अगर ये बाहर आ गया?
तांत्रिक की आवाज धीमी लेकिन सख्त थी
तांत्रिक- तब कोई नहीं बचेगा
उसी समय पेड़ की दरार पूरी तरह फट गई एक जोरदार आवाज के साथ आकृति का लगभग पूरा शरीर बाहर निकल आया मंडल काँप उठा दीपक फिर से झिलमिलाने लगे और इस बार वो चीज़ आधी नहीं लगभग पूरी तरह मुक्त हो चुकी थी अजनबी तांत्रिक ने धीरे से कहा
अजनबी तांत्रिक- अब खेल शुरू हुआ है
आरव ने अपनी पकड़ मजबूत की
आरव- नहीं अब खत्म होगा
लेकिन अंदर कहीं उसे भी एहसास हो चुका था ये लड़ाई अब उसके बस की नहीं रही और अगले कुछ पल सब कुछ तय करने वाले थे