काली रात - 1 Raj Bhande द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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काली रात - 1

नंदनगढ का सूरज हमेशा की तरह ढल रहा था, लेकिन आज की शाम कुछ अलग थी. सूरज की किरणें जैसे हवेली की दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थीं, मानो वे भी अंदर जाने से डरती हों.
आर्यन ने अपनी पुरानी जीप को हवेली के मुख्य द्वार से कुछ दूर रोका. उसके सामने' राय निवास' खडा था. यह हवेली नहीं, बल्कि एक विशाल पत्थर का ताबूत लग रही थी. चारों तरफ फैली घनी झाडियाँ और बेलें ऐसे लिपट रही थीं जैसे वे इस इमारत को दुनिया की नजरों से छिपाकर रखना चाहती हों.
आर्यन ने अपनी जैकेट का कॉलर ऊपर किया और कैमरा बैग कंधे पर लटकाया. उसने एक गहरी सांस ली. एक लेखक के तौर पर उसने दुनिया भर की डरावनी जगहों पर शोध किया था, लेकिन इस बार का अहसास कुछ अलग था. उसके सीने में दिल की धडकनें तेज हो रही थीं—एक ऐसी धडकन जो उत्सुकता से ज्यादा डर से उपजी थी.
बस एक रात, उसने खुद से कहा, अपनी आवाज की गूंज को सुनकर वह चौंक गया. हवेली के गलियारों में उसकी आवाज ऐसे टकराई जैसे कोई दूसरा व्यक्ति भी उसके साथ उसे दोहरा रहा हो.
वह भारी लोहे का दरवाजा, जो दशकों से जंग की चादर ओढे था, आर्यन के हाथों का दबाव झेलते ही एक कानफोडू चीख के साथ खुल गया. अंदर का दृश्य चौंकाने वाला था. धूल की मोटी परतें फर्नीचर को ढक चुकी थीं. बीचों- बीच एक विशाल झूमर लटका था, जो आधी टूटी हुई जंजीर से हवा में झूल रहा था, जबकि बाहर हवा का नामो- निशान नहीं था.
आर्यन ने टॉर्च जलाई. रोशनी की एक पतली लकीर अंधेरे को चीरती हुई आगे बढी. तभी उसे अपने पैरों के नीचे कुछ महसूस हुआ. उसने टॉर्च नीचे की ओर की—वहाँ फर्श पर एक पुरानी तस्वीर पडी थी. तस्वीर में एक परिवार था, लेकिन हैरानी की बात यह थी कि उस तस्वीर में सभी के चेहरों को किसी नुकीली चीज से खुरच कर मिटा दिया गया था.
तभी, ऊपर की मंजिल से एक मंद सी आवाज आई. खट. खट. खट.
यह आवाज किसी के चलने की थी. आर्यन की सांसें थम गईं. उसने ऊपर की ओर देखा. अंधेरे में उसे कुछ दिखाई नहीं दिया, लेकिन उसे महसूस हुआ कि सीढियों के उस पार से कोई उसे देख रहा है. कोई ऐसी चीज, जिसे इंसानी आँखों का मोहताज होने की जरूरत नहीं थी.
उसने अपना कैमरा उठाया और एक फोटो ली. फ्लैश की तेज रोशनी एक पल के लिए पूरे हॉल को जगमगा गई. उसी पल, आर्यन के कैमरे की स्क्रीन पर जो दिखा, उसने उसके रोंगटे खडे कर दिए. कैमरे की डिस्प्ले में, सीढियों के सबसे ऊपरी पायदान पर एक साया खडा था. उसका चेहरा धुंधला था, लेकिन उसके हाथों की उंगलियाँ इतनी लंबी और नुकीली थीं कि वे लोहे की रेलिंग को भी भेद रही थीं.
आर्यन पीछे मुडा और भागने की कोशिश की, लेकिन भारी दरवाजा अपने आप जोर से बंद हो गया.
धडाम!
हवेली अब बंद हो चुकी थी. अब वह अकेला नहीं था.

दरवाजे के बंद होने की गूंज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि हवेली के अंदर का तापमान अचानक कई डिग्री गिर गया. आर्यन की सांसें अब धुएं के रूप में बाहर निकल रही थीं. उसने अपना बैग नीचे रखा और कांपते हाथों से टॉर्च की रोशनी सीढियों की ओर घुमाई, लेकिन वहां अब कोई नहीं था. सिर्फ पुरानी लकडी की सीढियां और उन पर जमी मोटी धूल थी, जिस पर किसी के भी कदम के निशान नहीं थे.
यह सब मेरा वहम है, आर्यन ने खुद को सांत्वना देने की कोशिश की, लेकिन उसके शब्दों में स्पष्ट थरथराहट थी. एक लेखक होने के नाते, वह तर्क (logic) में विश्वास रखता था, लेकिन इस वक्त उसका तर्क उसे धोखा दे रहा था.
उसने अपने बैग से डायरी निकाली और लिखना शुरू किया, रात के बारह: पंद्रह बजे. मुख्य दरवाजा खुद- ब- खुद बंद हो गया. कोई हलचल नहीं, लेकिन हवा में भारीपन है. जैसे दीवारें साँस ले रही हों।
तभी, उसके बगल की दीवार पर लगे एक विशाल तैल चित्र (oil painting) से उसे एक फुसफुसाहट सुनाई दी. वह एक पुरानी पेंटिंग थी, जिसमें नंदनगढ के राजा विक्रमादित्य को शिकार करते हुए दिखाया गया था. आर्यन ने अपना कान दीवार के पास लगाया.
इन्हें बाहर मत जाने देना. जो आया है, उसे यहीं रहना होगा.
आवाज इतनी स्पष्ट थी कि आर्यन पीछे की ओर उछल पडा. उसकी टॉर्च फर्श पर गिर गई. अंधेरा और गहरा हो गया. उसने जल्दी से टॉर्च उठाई और पेंटिंग की ओर देखा. उसे लगा जैसे पेंटिंग में बने राजा की आँखें अब उसकी तरफ देख रही थीं. पेंटिंग का रंग धीरे- धीरे उड रहा था और उसकी जगह दीवार पर कुछ काले धब्बे उभरने लगे थे—बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी ने गीली दीवार पर खून से निशान बनाए हों.
आर्यन ने टॉर्च की रोशनी उन निशानों पर डाली. वे अरबी और संस्कृत के मिश्रित शब्द थे, जो दीवारों पर किसी पुराने श्राप की तरह खुदे हुए थे. उसे याद आया कि गाँव के बुजुर्ग बताते थे कि राजा विक्रमादित्य ने काला जादू सीखने के लिए अपनी ही प्रजा की बलि दी थी.
उसे महसूस हुआ कि हवेली उसे एक जाल में फंसा रही है. जैसे- जैसे वह अंदर की ओर बढ रहा था, गलियारे छोटे होते जा रहे थे. दीवारें धीरे- धीरे एक- दूसरे के करीब आ रही थीं.
नहीं, यह दीवारें हिल नहीं सकतीं, आर्यन ने खुद को चिल्लाकर कहा. उसने भागने के लिए पीछे मुडकर देखा, तो वहां कोई दरवाजा नहीं था. सिर्फ एक लंबी, अंतहीन काली सुरंग थी.
तभी, ठीक उसके कान के पीछे एक बर्फीली सांस महसूस हुई. एक धीमी, भारी आवाज ने कहा, तुमने हमें बुलाने की हिम्मत कैसे की, लेखक?
आर्यन के रोंगटे खडे हो गए. उसने बिना पीछे मुडे अपना कैमरा पीछे की ओर घुमाया और अंधाधुंध फ्लैश बटन दबाया.
फ्लैश. फ्लैश. फ्लैश.
हर फ्लैश की रोशनी में, उसे अपने ठीक पीछे एक ऐसा चेहरा दिखा, जिसकी त्वचा गल चुकी थी और जिसकी आँखों की जगह सिर्फ काले गहरे गड्ढे थे. वह कोई साया नहीं था; वह उस हवेली का सबसे पुराना और खूंखार पहरेदार था—वह' दीवारों में चुना हुआ' आत्मा.
आर्यन घबराकर सामने की ओर दौडा, लेकिन उसे नहीं पता था कि वह हवेली के तहखाने की तरफ जा रहा है, जहाँ वह राज दफन थे जिन्हें कभी नहीं खोला जाना चाहिए था.

आर्यन की दौड तहखाने की सीढियों के अंत पर जाकर रुकी. नीचे का वातावरण ऊपर के हॉल से भी अधिक दमघोंटू था. यहाँ हवा में लोहे और जंग की तीखी गंध थी. उसने अपनी टॉर्च घुमाई—दीवारों पर जंजीरें लटकी थीं और फर्श पर पुरानी हड्डियाँ बिखरी पडी थीं.
अचानक, उसकी नजर एक पत्थर की वेदी (altar) पर पडी, जिसके ऊपर एक पुरानी पीतल की संदूक रखी थी. संदूक पर वही शाही मोहर थी जो आर्यन के पूर्वजों की अंगूठी पर होती थी.
आर्यन के पैर लडखडा गए. वह जो अंगूठी बचपन से अपने पास रखे हुए था, उसे उसने अपनी उंगली से निकाला और संदूक की आकृति से मिलाया. वे दोनों एक ही थे.
यह कैसे हो सकता है? आर्यन बुदबुदाया. उसके दादाजी ने हमेशा कहा था कि यह अंगूठी उन्हें एक पुरानी हवेली के मलबे से मिली थी, जिसे वे अपनी जागीर मानते थे. पर क्या वह जागीर' राय निवास' थी? क्या वह सच में राजा विक्रमादित्य का वंशज था?
जैसे ही उसने संदूक को छूने के लिए हाथ आगे बढाया, तहखाने का तापमान और गिर गया. उसकी टॉर्च की रोशनी अचानक टिमटिमाने लगी. अंधेरे से वही बर्फीली आवाज दोबारा गूंजी, लेकिन इस बार उसमें एक अजीब सी कडवाहट थी:
तुम्हारे पूर्वज ने हमें यहाँ धोखे से फँसाया था, आर्यन. उन्होंने अपनी अमरता के लिए हमारे प्राण लिए थे. अब तुम यहाँ आए हो. अपनी विरासत का रिण चुकाने के लिए।
आर्यन के पैरों के नीचे की जमीन कांपने लगी. दीवारें अब अंदर की ओर नहीं आ रही थीं, बल्कि वे पिघल रही थीं—जैसे कि वे किसी जीवित मांस से बनी हों. संदूक के पास से एक काला धुआं उठा और एक मानव आकृति में बदलने लगा. वह राजा विक्रमादित्य की आत्मा थी, लेकिन वह पहले से कहीं अधिक भयावह लग रही थी.
मैं. मैं नहीं जानता था! आर्यन चिल्लाया.
आत्मा ने अपने लंबे हाथ फैलाए और आर्यन की गर्दन को बिना छुए ही जकड लिया. आर्यन को महसूस हुआ कि उसके फेफडों से हवा निकल रही है. उसे धुंधला सा दिखाई देने लगा. तभी, उसने अपना कैमरा फर्श पर गिरते हुए देखा. कैमरे की स्क्रीन अभी भी जल रही थी और उसमें एक ऐसा दृश्य दिखाई दे रहा था जो आर्यन को असल दुनिया में नहीं दिख रहा था—दीवारों के पीछे छिपे हुए' रक्षा मंत्र'
उसने समझ लिया कि कैमरा केवल फोटो नहीं खींच रहा था, बल्कि वह उन गुप्त संकेतों को भी दिखा रहा था जो नंगी आँखों से नहीं देखे जा सकते थे.
आर्यन ने अपनी आखिरी बची हुई ताकत से कैमरे के फ्लैश को सीधे आत्मा की आँखों पर केंद्रित किया और उसे' पूरी पावर' पर छोड दिया.
कडक.
एक नीली रोशनी का विस्फोट हुआ. पूरा तहखाना गूँज उठा. आत्मा चीखती हुई पीछे हटी, लेकिन उसने आर्यन को छोडने से पहले एक कडवी बात कही, तुमने मुझे नहीं हराया, आर्यन. तुमने केवल मेरा दरवाजा खोला है. अब तुम यहाँ से कभी नहीं जा पाओगे, क्योंकि तुम भी अब इसी दीवारों का हिस्सा बनने के लिए अभिशप्त हो।
आर्यन बेसुध होकर फर्श पर गिर गया. जब उसने आँखें खोलीं, तो उसने पाया कि तहखाना अब शांत था, लेकिन उसके हाथ से खून निकल रहा था. वह खून फर्श पर गिरकर उन निशानों के साथ मिल गया जो कभी मिटाए नहीं जा सकते थे.
उसने अपना हाथ देखा—उसकी उंगलियों के निशान अब काले पड रहे थे, जैसे कि कोई जहर उसके शरीर में धीरे- धीरे फैल रहा हो.
आपने कहानी को आगे बढाने के लिए संकेत दिया है. चलिए, इन दो विकल्पों में से दूसरे विकल्प को चुनते हैं, जहाँ आर्यन को एक अनपेक्षित साथी मिलता है जो उसे इस भूलभुलैया से निकलने का मार्ग दिखा सकता है.
अध्याय चार: एक धुंधली उम्मीद
आर्यन का शरीर कांप रहा था. उसके हाथों के निशान काले पडते जा रहे थे, और उसे महसूस हो रहा था जैसे कोई अदृश्य जंजीर उसे तहखाने की ठंडी जमीन से खींचकर कहीं ले जा रही हो. तभी, तहखाने के एक कोने में, जहाँ टॉर्च की रोशनी पहुँच नहीं पा रही थी, उसे एक छोटी सी मोमबत्ती जलती हुई दिखाई दी.
वह अकेला नहीं था.
अंधेरे के बीच से एक बूढी महिला धीरे- धीरे बाहर आई. उसने फटे हुए कपडे पहने थे और उसकी आँखें सफेद थीं, जैसे वह देख न सकती हो. लेकिन उसकी चाल में एक अजीब सी सतर्कता थी. उसने आर्यन के करीब आकर अपना हाथ बढाया और उसके माथे को छुआ.
तुमने उसे जगा दिया है, बालक, उसकी आवाज सूखी पत्तियों के सरसराहट जैसी थी. राजा विक्रमादित्य केवल ईंटों और पत्थरों में नहीं, बल्कि तुम्हारे खून के हर कतरे में कैद था. तुमने उसे आजाद कर दिया।
आर्यन ने हाफते हुए पूछा, आप कौन हैं? और मुझे यहाँ से कैसे निकलना है? मुझे मरना नहीं है!
बूढी औरत ने एक कडवी मुस्कान के साथ कहा, मेरा नाम सावित्री है. मैं यहाँ पिछले पचास सालों से उस आत्मा की पहरेदारी कर रही हूँ जिसे तुम्हारे पूर्वजों ने यहाँ दफनाया था. मैं उसे पूरी तरह आजाद होने से रोकती रही हूँ, लेकिन तुम्हारी उस' रोशनी' (कैमरे के फ्लैश) ने सुरक्षा घेरे को तोड दिया है।
उसने अपनी झोली से एक पुरानी तांबे की चाबी निकाली. वह चाबी किसी धातु की नहीं, बल्कि हड्डियों को घिसकर बनाई गई लगती थी.
यह हवेली एक दर्पण है, आर्यन. तुम यहाँ जो देख रहे हो, वह सिर्फ तुम्हारा डर है. अगर तुम्हें यहाँ से जिंदा निकलना है, तो तुम्हें अपनी ही परछाईं को मारना होगा. तहखाने के पीछे एक गुप्त कक्ष है, जहाँ राजा का असली सिंहासन है. वहीं पर उसकी आत्मा की नाभि है. अगर तुम उस तांबे की चाबी को वहां के मंत्रों के साथ जोड सको, तो यह श्राप टूट सकता है. लेकिन याद रखना.
उसने आर्यन के हाथ में चाबी थमाई और उसकी आँखों में झाँका.
वहां तक पहुँचने के लिए तुम्हें यह स्वीकार करना होगा कि जो तुमने अब तक देखा है, वह सच है. अगर तुमने जरा भी संदेह किया, तो ये दीवारें तुम्हें हमेशा के लिए निगल लेंगी।
तभी, पूरे तहखाने में एक भयानक गडगडाहट हुई. छत से पत्थर गिरने लगे. राजा की रूह की हंसी चारों ओर गूंजने लगी—एक ऐसी हंसी जिसमें नफरत और जीत का शोर था. आर्यन ने महसूस किया कि उसके आसपास की दीवारें अब और भी तेजी से बंद हो रही थीं.
सावित्री गायब हो चुकी थी. अब आर्यन के पास केवल वह चाबी थी और आगे का रास्ता जो तहखाने के और गहरे अंधेरे में जा रहा था.
आर्यन ने अपनी सांसें थाम लीं. उसने चाबी को कसकर पकडा और गुप्त कक्ष की ओर बढने लगा. जैसे- जैसे वह गलियारे में आगे बढा, टॉर्च की रोशनी में उसे कुछ हिलता हुआ महसूस हुआ.
अचानक, उसकी अपनी परछाईं दीवार से अलग होकर एक स्वतंत्र आकृति में बदल गई! वह ठीक आर्यन के जैसी दिखती थी, लेकिन उसकी हरकतें अजीब थीं. उसने अपना सिर एक झटके से टेढा किया और एक काली, स्याह मुस्कान बिखेरी.
तुम मुझे नहीं मार सकते, परछाईं ने आर्यन की ही आवाज में कहा. क्योंकि मैं तुम्हारा डर हूँ. मैं तुम्हारी वह सारी घबराहट हूँ जिसे तुम अपनी लेखनी के पीछे छिपाते आए हो।
आर्यन ने घबराकर पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन उसके पीछे भी ऐसी ही कई आकृतियाँ उभर आईं. वे उसके पूर्वजों की रूहें थीं, जो राजा विक्रमादित्य के श्राप के कारण यहाँ बंदी थीं. वे आर्यन के चारों ओर एक घेरा बनाने लगीं. उनके हाथ हवा में ऐसे कांप रहे थे जैसे वे उसे नोचना चाहते हों.
आर्यन ने महसूस किया कि उसकी परछाईं अब उसके करीब आ रही थी. उसने अपना कैमरा ऊपर उठाया, लेकिन इस बार फ्लैश का कोई असर नहीं हुआ. परछाईं ने कैमरा छीनकर फर्श पर पटक दिया.
कडक! कैमरा चकनाचूर हो गया. अब आर्यन के पास कोई सुरक्षा नहीं थी.
उसने देखा कि उसके हाथ अब पूरी तरह काले पड चुके थे. उसे लगा कि वह अपनी चेतना खो रहा है. तभी उसे सावित्री की कही बात याद आई: तुम्हें अपनी ही परछाईं को मारना होगा।
उसने समझा—यह शारीरिक लडाई नहीं थी. ये परछाइयाँ उसे चुनौती दे रही थीं. अगर वह डर गया, तो वे ताकतवर हो जाएंगी. अगर उसने अपने डर को स्वीकार कर लिया, तो उनकी शक्ति खत्म हो जाएगी.
आर्यन ने अपनी आंखें बंद कर लीं. उसने उन रूहों की चीखों को अनसुना किया. उसने अपनी पुरानी यादों, अपने अकेलेपन और अपनी असुरक्षा को गहराई से महसूस किया. उसने धीरे से कहा, तुम मेरी परछाईं हो, मेरी कमजोरी नहीं. तुम मेरी कहानी का हिस्सा हो, मेरा अंत नहीं।
जैसे ही उसने ये शब्द कहे, आसपास का वातावरण स्थिर हो गया. रूहों का शोर एक फुसफुसाहट में बदल गया. आर्यन ने धीरे से आँखें खोलीं. परछाइयाँ अब धुंधली पड रही थीं. उसने चाबी को एक हथियार की तरह सामने रखा और एक संकल्प के साथ आगे बढा.
अंधेरा उसके लिए अब डरावना नहीं था, बल्कि एक कैनवास जैसा था जिस पर वह अपनी कहानी का अंत लिखने जा रहा था. वह अंत में उस द्वार के सामने खडा था जिसके पीछे राजा विक्रमादित्य का असली सिंहासन और वह श्राप छिपा था जिसने सदियों से नंदनगढ को जकड रखा था.

आर्यन ने अपनी सांसें थाम लीं. उसने चाबी को कसकर पकडा और गुप्त कक्ष की ओर बढने लगा. जैसे- जैसे वह गलियारे में आगे बढा, टॉर्च की रोशनी में उसे कुछ हिलता हुआ महसूस हुआ.
अचानक, उसकी अपनी परछाईं दीवार से अलग होकर एक स्वतंत्र आकृति में बदल गई! वह ठीक आर्यन के जैसी दिखती थी, लेकिन उसकी हरकतें अजीब थीं. उसने अपना सिर एक झटके से टेढा किया और एक काली, स्याह मुस्कान बिखेरी.
तुम मुझे नहीं मार सकते, परछाईं ने आर्यन की ही आवाज में कहा. क्योंकि मैं तुम्हारा डर हूँ. मैं तुम्हारी वह सारी घबराहट हूँ जिसे तुम अपनी लेखनी के पीछे छिपाते आए हो।
आर्यन ने घबराकर पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन उसके पीछे भी ऐसी ही कई आकृतियाँ उभर आईं. वे उसके पूर्वजों की रूहें थीं, जो राजा विक्रमादित्य के श्राप के कारण यहाँ बंदी थीं. वे आर्यन के चारों ओर एक घेरा बनाने लगीं. उनके हाथ हवा में ऐसे कांप रहे थे जैसे वे उसे नोचना चाहते हों.
आर्यन ने महसूस किया कि उसकी परछाईं अब उसके करीब आ रही थी. उसने अपना कैमरा ऊपर उठाया, लेकिन इस बार फ्लैश का कोई असर नहीं हुआ. परछाईं ने कैमरा छीनकर फर्श पर पटक दिया.
कडक! कैमरा चकनाचूर हो गया. अब आर्यन के पास कोई सुरक्षा नहीं थी.
उसने देखा कि उसके हाथ अब पूरी तरह काले पड चुके थे. उसे लगा कि वह अपनी चेतना खो रहा है. तभी उसे सावित्री की कही बात याद आई: तुम्हें अपनी ही परछाईं को मारना होगा।
उसने समझा—यह शारीरिक लडाई नहीं थी. ये परछाइयाँ उसे चुनौती दे रही थीं. अगर वह डर गया, तो वे ताकतवर हो जाएंगी. अगर उसने अपने डर को स्वीकार कर लिया, तो उनकी शक्ति खत्म हो जाएगी.
आर्यन ने अपनी आंखें बंद कर लीं. उसने उन रूहों की चीखों को अनसुना किया. उसने अपनी पुरानी यादों, अपने अकेलेपन और अपनी असुरक्षा को गहराई से महसूस किया. उसने धीरे से कहा, तुम मेरी परछाईं हो, मेरी कमजोरी नहीं. तुम मेरी कहानी का हिस्सा हो, मेरा अंत नहीं।
जैसे ही उसने ये शब्द कहे, आसपास का वातावरण स्थिर हो गया. रूहों का शोर एक फुसफुसाहट में बदल गया. आर्यन ने धीरे से आँखें खोलीं. परछाइयाँ अब धुंधली पड रही थीं. उसने चाबी को एक हथियार की तरह सामने रखा और एक संकल्प के साथ आगे बढा.
अंधेरा उसके लिए अब डरावना नहीं था, बल्कि एक कैनवास जैसा था जिस पर वह अपनी कहानी का अंत लिखने जा रहा था. वह अंत में उस द्वार के सामने खडा था जिसके पीछे राजा विक्रमादित्य का असली सिंहासन और वह श्राप छिपा था जिसने सदियों से नंदनगढ को जकड रखा था.
आर्यन ने एक लंबी सांस ली और उस विशाल, नक्काशीदार लकडी के दरवाजे को जोर से धक्का दिया. दरवाजा धीरे से खुला और आर्यन अंदर कदम रखते ही ठिठक गया.
सामने कोई सिंहासन नहीं था. न ही कोई राजा विक्रमादित्य था.
वह कमरा एक बहुत ही आधुनिक, सफेद रंग का' डिजिटल स्टूडियो' जैसा दिख रहा था. चारों तरफ ढेर सारे मॉनिटर लगे थे, जिन पर अलग- अलग एंगल से उसी पुरानी हवेली के फुटेज चल रहे थे. बीच में एक कुर्सी थी, जिस पर वही बूढी महिला, सावित्री, बैठी थी. लेकिन अब उसके चेहरे पर वह झुर्रियां नहीं थीं, और वह कोई बूढी औरत नहीं लग रही थी. उसने हाथ में एक रिमोट पकडा था.
आर्यन के होश उड गए. यह. यह क्या है? वो रूहें? वो राजा?
सावित्री ने एक गहरी, शांत मुस्कान के साथ आर्यन की ओर देखा. वो सब तुम्हारे दिमाग की उपज थी, आर्यन. एक लेखक के तौर पर, तुम अपनी कल्पनाओं के कितने करीब आ सकते हो, यही हमारा शोध था।
सावित्री ने रिमोट का बटन दबाया. कमरे की दीवारों पर जो चित्र दिख रहे थे, वे वास्तव में आर्यन के ही अब तक के लिखे हुए पन्नों के डिजिटल स्कैन थे.
नंदनगढ की यह हवेली केवल एक' सोशल एक्सपेरिमेंट' लैब है. हम यहाँ मनोवैज्ञानिक डरावनी कहानियों के लेखकों को लाते हैं, उन्हें एकांत में छोडते हैं, और देखते हैं कि उनका अवचेतन मन (subconscious mind) Kiss तरह की कहानियाँ बुनता है. तुम्हारे कैमरे में जो' साये' दिख रहे थे, वे असल में हम यहाँ प्रोजेक्टर के जरिए दिखा रहे थे, ताकि तुम अपनी कहानी को पूरी ईमानदारी से जी सको।
आर्यन का सिर चकराने लगा. वह जमीन पर बैठ गया. क्या वह सब सच नहीं था? क्या वो डर, वो काला पडना, वो आवाजें—सब एक नाटक था?
लेकिन मेरे हाथ. आर्यन ने अपने हाथ देखे. वे अब सामान्य थे. कोई कालापन नहीं था. मैंने वो सब महसूस किया था!
सावित्री ने आगे बढकर उसके कंधे पर हाथ रखा. वह' हाइपोनोटिक सजेस्टिबिलिटी' थी. तुम्हारे कमरे में विशेष सुगंध (aromatherapy) और कम आवृत्ति वाली ध्वनि (low- frequency sound) छोडी गई थी, जिससे तुम वही देखने लगे जो तुम डरते थे. तुम एक लेखक हो, आर्यन. तुम अपनी कहानी के खुद कैदी थे।
आर्यन ने कमरे के कोने में रखे आईने में खुद को देखा. आईने में उसका चेहरा बहुत थका हुआ और भ्रमित लग रहा था. लेकिन तभी, आईने के उस पार, उसे एक परछाईं दिखाई दी—जो उसके पीछे खडी थी. वह सावित्री की परछाईं नहीं थी, वह वही राजा विक्रमादित्य था, जिसकी उंगलियां उसकी गर्दन तक पहुँच रही थीं.
आर्यन की चीख निकल गई, लेकिन कमरे में मौजूद सावित्री ने उसे अनसुना कर दिया. उसने उसे देखा भी नहीं.
सावित्री मुस्कुराते हुए बोली, तुम्हारे शोध का अंत बहुत शानदार रहा, आर्यन. तुम्हारी कहानी पूरी हो गई. अब तुम जा सकते हो।
आर्यन बाहर की ओर भागा. वह उस मुख्य द्वार से बाहर निकला, अपनी जीप में बैठा और नंदनगढ से बहुत दूर चला गया. लेकिन जब उसने पीछे मुडकर हवेली की ओर देखा, तो उसे लगा कि हवेली की खिडकी पर सावित्री नहीं, बल्कि वही राजा विक्रमादित्य खडा था, और उसने उसे एक रहस्यमयी मुस्कान दी.
आर्यन को समझ में नहीं आया कि क्या वह सच में बाहर निकल आया था, या उसका भ्रम अभी भी जारी था.
क्या वह वाकई मुक्त था, या उसने अपनी कहानी का अंत खुद नहीं, बल्कि किसी और के इशारों पर लिखा था?

आर्यन अपनी जीप तेजी से दौडा रहा था. नंदनगढ पीछे छूट चुका था, लेकिन उसका दिल अभी भी उसी हवेली के तहखाने की तरह धडक रहा था. उसे लगा कि वह आजाद हो गया है, लेकिन सडक की दोनों ओर के पेड जैसे उसे घूर रहे थे.
वह अपने शहर पहुँचा, जहाँ उसकी दुनिया हमेशा सुरक्षित रही थी. उसने अपनी फ्लैट की चाबी निकाली और अंदर दाखिल हुआ. सब कुछ वैसा ही था—उसकी किताबें, उसका अधूरा काम, उसकी कॉफी का मग. लेकिन कुछ बदला हुआ था.
उसने अपने लैपटॉप को ऑन किया ताकि वह उस अनुभव को' काल्पनिक कहानी' के रूप में लिख सके. उसने टाइप करना शुरू किया: हवेली का वह डिजिटल लैब, सावित्री की वह ठंडी मुस्कान.
तभी, उसके लैपटॉप की स्क्रीन पर कुछ टाइप होने लगा. वह टाइपिंग आर्यन नहीं कर रहा था. अक्षर अपने आप स्क्रीन पर उभर रहे थे:
तुमने सोचा तुम बाहर निकल आए, आर्यन? क्या तुम भूल गए कि हर कहानी का एक लेखक होता है, और तुम यहाँ सिर्फ एक पात्र हो?
आर्यन का दम घुटने लगा. उसने लैपटॉप बंद करने की कोशिश की, लेकिन स्क्रीन जलती रही. अचानक, उसके कमरे की बत्तियाँ बुझ गईं. अंधेरे में, उसे कमरे की दीवारों पर वही अरबी और संस्कृत के निशान उभरते हुए दिखाई दिए जो उसने उस तहखाने में देखे थे.
वह बाथरूम की ओर भागा, अपनी आँखों पर ठंडा पानी डालने के लिए. उसने आईने में देखा—उसकी आँखों का रंग बदल रहा था. वे अब वैसी ही लाल हो रही थीं जैसी उसने उस' साये' की देखी थीं. उसने अपना गला पकडा और देखा कि उसकी त्वचा पर वे काले निशान फिर से उभर आए थे.
अचानक, बाथरूम का दरवाजा धीरे से खुला. कमरे के अंधेरे से सावित्री की वही ठंडी आवाज आई:
आर्यन, हम कभी नहीं छोडते. तुमने उस कहानी को पूरा नहीं किया; तुमने बस एक नया पन्ना खोला है।
आर्यन आईने के पीछे देख नहीं सकता था, लेकिन आईने में उसे दिखाई दिया कि उसके पीछे कोई खडा है. वह सावित्री नहीं थी. वह वह चेहरा था जिसे उसने सबसे पहले कैमरे की फोटो में देखा था—बिना त्वचा वाला, जलती हुई आँखों वाला वह पहरेदार.
उसने आर्यन के कान के पास अपना लंबा, ठंडा हाथ रखा और फुसफुसाया, कहानी लिखना खत्म करो, लेखक. अब कहानी को जिया जाए।
आर्यन की चीख उसके फ्लैट की चारदीवारी में दब कर रह गई. अगले दिन, आर्यन के फ्लैट का दरवाजा खुला मिला. कमरे में उसका लैपटॉप चालू था, जिस पर एक ही वाक्य बार- बार लिखा जा रहा था:
मैं अभी भी हवेली में हूँ।
और कमरे के बीचों- बीच, फर्श पर, वह पुरानी पीतल की चाबी पडी थी, जिसे वह हवेली में ही छोड आया था.

निश्चित रूप से. अब हम' अमावस्या का साया' के अगले भाग की ओर बढते हैं, जहाँ आर्यन की वास्तविकता को तोडने वाला वह" डिजिटल भ्रम" (Lab illusion) नहीं, बल्कि* वास्तविक डरावनी घटनाएँ* हैं.

आर्यन के फ्लैट में सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी धडकनें किसी बाहरी शोर की तरह सुनाई दे रही थीं. उसने लैपटॉप बंद कर दिया था, लेकिन कमरा अभी भी अंधेरे में डूबा था. बाहर की स्ट्रीट लाइट की रोशनी खिडकी के पर्दे से छनकर आ रही थी, जो फर्श पर लकीरों की तरह पड रही थी.
उसने खुद से कहा, वह एक लैब नहीं थी. वह सिर्फ एक पुराना मकान था। उसने अपनी तर्कशक्ति को फिर से इकट्ठा करने की कोशिश की. जो कुछ उसने तहखाने में देखा—वह' डिजिटल स्क्रीन' नहीं थी, वह सचमुच की एक पुरानी, सडी हुई जगह थी.
आर्यन उठा और रसोई की ओर गया. उसे पानी चाहिए था, प्यास से उसका गला सूख रहा था. जैसे ही उसने नल खोला, पानी की जगह एक गाढा, काला पदार्थ बाहर आने लगा. उसने झटके से हाथ पीछे खींच लिया. वह कोई' डिजिटल प्रोजेक्शन' नहीं था; वह गंध थी—सडी हुई मिट्टी और पुरानी कब्रों की बदबू.
तभी, उसके पीछे की दीवार से उसे खुरचने की आवाज आई. कच. कच. कच.
यह किसी चूहे के दौडने की आवाज नहीं थी. यह नाखून थे, जो पत्थर को खुरच रहे थे. आर्यन धीरे- धीरे मुडा. उसने टॉर्च जलाई, लेकिन रोशन