जब आत्मसम्मान को व्यवस्थित तरीके से तोड़ा जाता है
हर बच्चा इस दुनिया में संभावनाओं के साथ जन्म लेता है, हीनभावना के साथ नहीं। उसे यह विश्वास सिखाया जाता है कि वह कुछ कर सकता है, और यह डर भी कि वह कभी कुछ नहीं कर पाएगा। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि उसे बचपन में किस तरह का माहौल मिला। जिस प्रकार एक पौधा रोज़ पानी मिलने पर हरा-भरा होता है, उसी प्रकार बच्चे का आत्मसम्मान भी प्रेम, प्रोत्साहन और सम्मान से विकसित होता है। लेकिन यदि उसी पौधे को रोज़ जड़ से काटा जाए, उसकी शाखाएँ तोड़ी जाएँ और उसे यह बताया जाए कि वह कभी फल नहीं दे सकता, तो एक समय बाद वह सचमुच मुरझाने लगता है।
उस लड़के के साथ भी यही हुआ।
जब भी उससे कोई गलती होती, उसे यह नहीं समझाया जाता कि गलती कहाँ हुई और उसे कैसे सुधारा जा सकता है। इसके बजाय उसे यह महसूस कराया जाता कि समस्या उसके व्यवहार में नहीं, बल्कि उसी के व्यक्तित्व में है। उसे बार-बार बताया जाता कि वह निकम्मा है, उससे कुछ नहीं होगा, वह जीवन में कभी सफल नहीं हो पाएगा। कभी उसे नालायक कहा जाता, कभी उसकी तुलना दूसरों से की जाती और कभी उसके भविष्य को लेकर अपमानजनक भविष्यवाणियाँ की जातीं।
कई लोगों को यह सब सामान्य लग सकता है। भारतीय समाज में ऐसे वाक्य अक्सर “सुधारने” या “प्रेरित करने” के नाम पर बोले जाते हैं। लेकिन मनोविज्ञान कुछ और कहता है। एक बच्चा अपने बारे में जो धारणा बनाता है, उसका सबसे बड़ा स्रोत उसके माता-पिता होते हैं। वह दुनिया को उनकी आँखों से देखना सीखता है। जब वही लोग लगातार उसे यह बताने लगें कि वह अयोग्य है, तो धीरे-धीरे उसका अचेतन मन इस झूठ को सच मानने लगता है।
समय के साथ उस लड़के ने भी स्वयं को उसी दृष्टि से देखना शुरू कर दिया। वह किसी भी काम को शुरू करने से पहले उसकी असफलता की कल्पना कर लेता था। उसे लगता था कि कोशिश करने का कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि अंत में वह असफल ही होने वाला है। उसने अपने भीतर एक अदृश्य अदालत बसा ली थी जहाँ हर निर्णय से पहले वह स्वयं को दोषी घोषित कर देता था।
यही वह अवस्था थी जहाँ उसका सबसे बड़ा दुश्मन कोई और नहीं, बल्कि उसका अपना मन बनता जा रहा था।
घर का वातावरण भी ऐसा था जहाँ उसे लगातार मूल्यांकन का सामना करना पड़ता था। वह कैसे बैठता है, कैसे बोलता है, किससे मित्रता करता है, क्या खाता है, कहाँ जाता है—लगभग हर बात किसी टिप्पणी या आलोचना का कारण बन सकती थी। धीरे-धीरे उसने सहज रहना छोड़ दिया। अब वह हर काम करने से पहले सोचता कि कहीं कोई गलती न हो जाए। कहीं कोई नाराज़ न हो जाए। कहीं फिर से अपमान न झेलना पड़े।
जो बच्चे लगातार आलोचना के वातावरण में बड़े होते हैं, वे अक्सर पूर्णतावादी या अत्यधिक भयभीत बन जाते हैं। उन्हें लगता है कि गलती करना अपराध है। वे जोखिम लेने से बचने लगते हैं, क्योंकि उनके लिए गलती का अर्थ केवल असफलता नहीं होता; उसका अर्थ अपमान, तिरस्कार और शर्मिंदगी भी होता है।
उस लड़के ने भी धीरे-धीरे यही सीख लिया था।
अंधविश्वास और नियंत्रण का नया अध्याय
जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया, घर का वातावरण बदलने के बजाय और अधिक जटिल होता गया। अब केवल गुस्सा और कठोरता ही समस्या नहीं थे। उनके साथ नियंत्रण की एक नई परत भी जुड़ गई थी। घर में ऐसे नियम बनने लगे जिनका तर्क से कोई स्पष्ट संबंध नहीं था, लेकिन उनका पालन न करना किसी अपराध जैसा माना जाता था।
किस दिशा में बैठकर पढ़ना है, किस कमरे में कौन-सा काम करना है, किस समय क्या करना है, क्या शुभ है और क्या अशुभ—इन बातों ने धीरे-धीरे सामान्य जीवन पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया। यदि किसी नियम का उल्लंघन हो जाता, चाहे अनजाने में ही क्यों न हो, तो प्रतिक्रिया असामान्य रूप से कठोर होती।
समस्या केवल नियमों की नहीं थी। समस्या यह थी कि उनके साथ भय जुड़ा हुआ था।
बचपन में जब किसी व्यक्ति को बार-बार यह महसूस कराया जाए कि छोटी-सी गलती भी बड़ी विपत्ति का कारण बन सकती है, तो उसका मस्तिष्क तर्क की बजाय डर के आधार पर काम करने लगता है। वह दुनिया को संभावनाओं की जगह खतरों से भरी जगह मानने लगता है। धीरे-धीरे वह हर निर्णय को लेकर असामान्य रूप से चिंतित रहने लगता है।
उस लड़के के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह छोटी-छोटी बातों को लेकर आवश्यकता से अधिक सोचने लगा। निर्णय लेना कठिन लगने लगा। उसे लगता कि यदि उसने गलत चुनाव कर लिया तो परिणाम विनाशकारी होंगे। उसकी चिंता धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बनती जा रही थी।
सार्वजनिक अपमान और शर्म का जन्म
हर किशोर चाहता है कि उसे सम्मान मिले। वह चाहता है कि उसके मित्र उसे स्वीकार करें, उसकी बात को महत्व दें और उसे एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में देखें। लेकिन उस लड़के के लिए यह अनुभव दुर्लभ था।
कई बार उसे दोस्तों के सामने डाँटा गया। कई बार रिश्तेदारों के सामने उसकी आलोचना की गई। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ बनीं जहाँ उसे सार्वजनिक रूप से छोटा महसूस कराया गया। जो लोग ऐसा करते हैं, वे अक्सर मानते हैं कि इससे बच्चा सुधर जाएगा। लेकिन वास्तविकता बिल्कुल विपरीत होती है।
सार्वजनिक अपमान सुधार नहीं लाता; वह शर्म पैदा करता है।
और अत्यधिक शर्म आत्मसम्मान को भीतर से खा जाती है।
धीरे-धीरे उस लड़के को लोगों से मिलने में असहजता होने लगी। उसे लगता कि लोग उसकी कमियों पर ध्यान देंगे। उसका मूल्यांकन करेंगे। उसका मज़ाक उड़ाएँगे। चाहे वास्तविकता कुछ भी रही हो, उसके मन में यह भय इतना गहरा हो चुका था कि उसने लोगों से दूरी बनानी शुरू कर दी।
शुरुआत में उसने केवल कुछ लोगों से दूरी बनाई। फिर अधिकांश लोगों से। और अंततः लगभग सभी से।
जब मित्रों के फोन आते, तो वह उठाने से बचता। घर में मेहमान आते, तो वह अपने कमरे में चला जाता। बाहर जाने का मन नहीं करता। किसी समारोह में शामिल होना बोझ लगने लगा। धीरे-धीरे उसका संसार सिकुड़ता गया।
और जब किसी इंसान का संसार सिकुड़ने लगता है, तो उसका दर्द और बड़ा दिखाई देने लगता है।
क्योंकि अब उसे बाँटने वाला कोई नहीं होता।
उसकी परेशानियों को चुनौती देने वाला कोई नहीं होता।
उसके विचारों को संतुलित करने वाला कोई नहीं होता।
और यही वह समय था जब उसका अकेलापन धीरे-धीरे अवसाद की जमीन तैयार कर रहा था।
उसे तब नहीं पता था कि आने वाले वर्षों में यही अकेलापन उसे एक ऐसे अंधेरे में धकेल देगा जहाँ से बाहर निकलने में उसे लगभग एक दशक लग जाएगा।...