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दरवाज़ा खुला था, पर उड़ने की हिम्मत मर चुकी थी - 1


अनुशासन के नाम पर बचपन का कत्ल

दुनिया में कुछ घाव ऐसे होते हैं जो दिखाई नहीं देते। उनसे खून नहीं बहता, उनके लिए कोई पट्टी नहीं बंधती और न ही डॉक्टर की रिपोर्ट में उनका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। फिर भी वे इंसान को भीतर से इस कदर तोड़ देते हैं कि वह जीते-जी एक खामोश खंडहर बन जाता है। ऐसे घाव मन पर लगते हैं, और मन के घावों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि समाज अक्सर उन्हें घाव मानने से भी इंकार कर देता है। लोग टूटे हुए हाथ-पैर को देखकर सहानुभूति जता देते हैं, लेकिन टूटी हुई आत्मा को अक्सर आलस्य, कमजोरी या नालायकी का नाम दे दिया जाता है।

हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग हैं जो बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखाई देते हैं। वे मुस्कुराते हैं, बातचीत करते हैं, सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं और देखने वालों को लगता है कि उनका जीवन ठीक चल रहा है। लेकिन उनके भीतर एक ऐसी लड़ाई चल रही होती है जिसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं होता। उनके चेहरे पर मुस्कान होती है, पर मन में वर्षों का दर्द दफ्न होता है। वे ज़िंदा होते हैं, लेकिन जीवन को महसूस नहीं कर पाते। यह कहानी ऐसे ही एक युवक की है—एक ऐसे युवक की, जिसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी गरीबी नहीं थी, संसाधनों की कमी नहीं थी, बल्कि वह वातावरण था जिसमें उसका व्यक्तित्व धीरे-धीरे टूटता चला गया।

इस कहानी को समझने के लिए पहले एक छोटी-सी कल्पना कीजिए।

एक कमरे की खिड़की के पास एक पुराना लकड़ी का पिंजरा रखा था। उसमें एक छोटी चिड़िया रहती थी। सालों से वह उसी पिंजरे में बंद थी। पिंजरे का मालिक रोज़ उसे दाना-पानी देता, और वह बस अंदर बैठकर बाहर की दुनिया को देखती रहती। वह अक्सर सोचती कि काश यह कैद खत्म हो जाए और वह खुले आसमान में पंख फैलाए।

एक दिन, मालिक पिंजरे का दरवाजा ठीक से बंद करना भूल गया। हवा के एक झोंके से पिंजरे का दरवाजा खुल गया। सामने खुली खिड़की थी और खिड़की के पार अनंत, खूबसूरत नीला आसमान।

उसने देखा। आज उसकी आज़ादी उसके ठीक सामने थी। कोई रोक-टोक नहीं थी। उसने पिंजरे के मुहाने पर आकर बाहर झाँका। लेकिन जैसे ही उसने सामने फैले असीम आसमान को देखा, अचानक उसके दिल में एक अजीब सा डर बैठ गया।

वह सोचने लगी— “क्या मैं इतनी दूर उड़ पाऊँगी? अगर रास्ते में कोई बाज मिल गया तो? अगर मुझे दाना न मिला तो? अगर मैं इस दुनिया में अपने दम पर जीवित न रह सकी तो? मैं तो इस छोटे पिंजरे की आदी हो चुकी हूँ।”

वह कई घंटों तक खुले दरवाजे को देखती रही। उसके पंखों में जान तो थी, लेकिन सालों की गुलामी ने उसके मन के हौसले को तोड़ दिया था। सच ही तो था—दरवाजा तो खुला था, पर उड़ने की हिम्मत मर चुकी थी। उसने धीरे से कदम पीछे हटाए और वापस पिंजरे के कोने में जाकर बैठ गई। दरवाज़ा खुला था, लेकिन उड़ने की हिम्मत मर चुकी थी।

यह केवल एक चिड़िया की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की कहानी है जिन्हें बचपन से इस तरह तोड़ा जाता है कि वे अपनी ही क्षमताओं पर विश्वास खो देते हैं। अवसर सामने होने पर भी वे कदम नहीं उठा पाते, क्योंकि उनके भीतर का आत्मविश्वास बहुत पहले मर चुका होता है। उस युवक का जीवन भी कुछ ऐसा ही था।

बाहरी दुनिया की नज़र में उसके पास किसी चीज़ की कमी नहीं थी। अच्छा घर था, पहनने के लिए कपड़े थे, खाने-पीने की व्यवस्था थी। लोगों को लगता था कि वह भाग्यशाली है। लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि मनुष्य केवल भौतिक सुविधाओं से खुश नहीं रह सकता। शरीर को भोजन चाहिए, लेकिन आत्मा को सम्मान चाहिए। इंसान को केवल छत नहीं चाहिए, उसे सुरक्षा का एहसास भी चाहिए। उसे यह महसूस होना चाहिए कि वह प्रेम और स्वीकार्यता के योग्य है।

दुर्भाग्य से उसे यह सब कभी नहीं मिला।

उसके घर में लगभग रोज़ तनाव का वातावरण रहता था। छोटी-छोटी बातें बड़े विवादों में बदल जातीं। ऊँची आवाज़ें, गाली-गलौज और कभी-कभी हिंसा तक की नौबत आ जाती। वह बच्चा कोने में खड़ा यह सब देखता रहता। कोई उससे नहीं पूछता था कि वह कैसा महसूस कर रहा है। कोई यह जानने की कोशिश नहीं करता था कि इन घटनाओं का उसके मन पर क्या असर पड़ रहा है। लेकिन उसका मस्तिष्क सब कुछ रिकॉर्ड कर रहा था।

मनोविज्ञान बताता है कि बचपन का मस्तिष्क बेहद संवेदनशील होता है। जिस वातावरण में बच्चा बड़ा होता है, वही उसके व्यक्तित्व की नींव बनता है। यदि उसे सुरक्षा और प्रेम मिले तो उसका आत्मविश्वास विकसित होता है। लेकिन यदि वह लगातार भय और असुरक्षा में जीए, तो उसका पूरा तंत्रिका तंत्र खतरे के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। ऐसे बच्चे अक्सर हर समय चौकन्ने रहते हैं। उन्हें अचानक आवाज़ सुनकर घबराहट हो सकती है। किसी का ऊँचे स्वर में बोलना उन्हें असामान्य रूप से बेचैन कर सकता है। उनका मस्तिष्क हमेशा इस संभावना के लिए तैयार रहता है कि कहीं कोई खतरा छिपा हुआ है।

धीरे-धीरे उस लड़के के साथ भी यही होने लगा। उसे कभी पता नहीं होता था कि घर का माहौल कब बिगड़ जाएगा, कब कौन नाराज़ हो जाएगा और कब शांति अचानक टूट जाएगी। इस अनिश्चितता ने उसके भीतर सुरक्षा की भावना को जड़ से हिला दिया। घर, जो हर बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित स्थान होना चाहिए, उसके लिए तनाव और भय का पर्याय बनता जा रहा था।

यहीं से उसकी कहानी का वह अध्याय शुरू हुआ जिसमें अनुशासन और भय का अंतर मिटने लगा। उसे समझाया कम जाता था, डाँटा अधिक जाता था। उसकी बात सुनी कम जाती थी, चुप अधिक कराया जाता था। धीरे-धीरे उसने बोलना कम कर दिया। फिर प्रश्न पूछना भी कम कर दिया। और एक दिन ऐसा आया जब उसने अपने मन की बात कहना लगभग बंद कर दिया, क्योंकि उसने सीख लिया था कि उसकी आवाज़ की कोई कीमत नहीं है।