ईश्वर मेरा चरवाह है GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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ईश्वर मेरा चरवाह है

ऋगुवेद सूक्ति-- (10)की व्याख्या "न रिष्येत त्यावत: सखा"ऋगुवेद --1/91/8भावार्थ --हे ईश्वर !आपका सखा (भक्त) कभी‌नष्ट नहीं होता। ऋग्वेद १।९१।८ का पूरा मंत्र इस प्रकार है —त्वं नः सोम विश्वतो रक्षा राजन्नघायतः ।न रिष्येत्त्वावतः सखा ॥शब्दार्थत्वम् — आपनः — हमारीसोम — हे सोमस्वरूप परमात्माविश्वतः — सब ओर सेरक्षा — रक्षा करेंराजन् — हे प्रभु/स्वामीअघायतः — पापी अथवा हानि पहुँचाने वालों सेन रिष्येत् — नष्ट नहीं होतात्वावतः — आपका आश्रय पाने वालासखा — मित्र, भक्तभावार्थहे प्रभु! आप हमें चारों ओर से दुष्टों और हानि पहुँचाने वालों से बचाइए। आपका आश्रय प्राप्त करने वाला भक्त कभी नष्ट नहीं होता। ऋग्वेद १।९१।८ के भाव — “ईश्वर के सखा (भक्त) का कभी नाश नहीं होता” — के समर्थन में वेदों में अनेक मंत्र मिलते हैं। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं —१. ऋग्वेद १।९१।८त्वं नः सोम विश्वतो रक्षा राजन्नघायतः ।न रिष्येत्त्वावतः सखा ॥भावार्थ :हे प्रभु! हमें सब ओर से दुष्टों से बचाइए; आपका भक्त कभी नष्ट नहीं होता। २. यजुर्वेद ३६।१८मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम् ।मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे ॥भावार्थ :सब प्राणी मुझे मित्रभाव से देखें और मैं भी सबको मित्रभाव से देखूँ।अर्थात् जो ईश्वर के मित्रभाव में रहता है, वह कल्याण को प्राप्त होता है।३. अथर्ववेद १९।१५।१भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाःभद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥भावार्थ :हे देवो! हम शुभ सुनें, शुभ देखें और सुरक्षित जीवन जीएँ।ईश्वर अपने उपासक का कल्याण करता है।४. ऋग्वेद १०।१२१।१०प्रजापते न त्वदेतान्यन्योविश्वा जातानि परिता बभूव ।भावार्थ :हे प्रभु! आपसे बढ़कर हमारा रक्षक और कोई नहीं है।समस्त जगत आपकी शरण में सुरक्षित है।५. यजुर्वेद ४०।१७वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् ।भावार्थ :शरीर नश्वर है, परन्तु आत्मा अमर है।ईश्वर से जुड़ा आत्मिक जीवन नष्ट नहीं होता।इन सभी वैदिक मंत्रों का सार यही है कि जो व्यक्ति ईश्वर की शरण, मित्रता और भक्ति में रहता है, उसका आध्यात्मिक पतन नहीं होता और ईश्वर उसकी रक्षा करता है।उपनिषदों में ‌प्रमाण --“ईश्वर के भक्त/शरणागत का नाश नहीं होता, वह ईश्वर की कृपा से भय और दुःख से पार हो जाता है” — इस भाव के समर्थन में उपनिषदों के अनेक मंत्र मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण श्लोक श्लोक-संख्या सहित दिए जा रहे हैं —१. श्वेताश्वतर उपनिषद ६।१८यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वंयो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ।तं ह देवं आत्मबुद्धिप्रकाशंमुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥भावार्थजो परमात्मा ब्रह्मा की उत्पत्ति करता है और वेदों का ज्ञान देता है, उस आत्मप्रकाशक देव की मैं मोक्ष की इच्छा से शरण ग्रहण करता हूँ।२. कठोपनिषद २।२।१३नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्एको बहूनां यो विदधाति कामान् ।तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीराःतेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥भावार्थजो एक परम चेतन सबकी आवश्यकताओं का पालन करता है, उसे अपने भीतर देखने वाले ज्ञानी पुरुष ही शाश्वत शान्ति प्राप्त करते हैं।३. मुंडकोपनिषद २।२।८भिद्यते हृदयग्रन्थिःछिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।क्षीयन्ते चास्य कर्माणितस्मिन् दृष्टे परावरे ॥भावार्थजब परमात्मा का साक्षात्कार होता है, तब हृदय की गांठें खुल जाती हैं, सभी संशय नष्ट हो जाते हैं और कर्मबन्धन समाप्त हो जाते हैं।४. श्वेताश्वतर उपनिषद ३।८वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेतिनान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥भावार्थउस परम पुरुष को जानकर ही मनुष्य मृत्यु और भय से पार होता है; मुक्ति का अन्य कोई मार्ग नहीं।५. ईशोपनिषद मंत्र ६यस्तु सर्वाणि भूतानिआत्मन्येवानुपश्यति ।सर्वभूतेषु चात्मानंततो न विजुगुप्सते ॥भावार्थजो सभी प्राणियों में परमात्मा को देखता है और सबको अपने समान समझता है, वह भय और द्वेष से मुक्त हो जाता है।६. तैत्तिरीयोपनिषद २।७।१आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन ॥भावार्थजो ब्रह्मानन्द को जान लेता है, वह किसी से भी भय नहीं करता।७. छान्दोग्य उपनिषद ७।१।३तारति शोकमात्मवित् ॥भावार्थआत्मा और परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करने वाला पुरुष शोक और दुःख से पार हो जाता है।इन सभी उपनिषद् मंत्रों का सार यही है कि जो परमात्मा की शरण, भक्ति और आत्मज्ञान में स्थित होता है, उसका आध्यात्मिक पतन नहीं होता; वह भय, शोक और बन्धनों से मुक्त होकर परम कल्याण प्राप्त करता है।पुराणों में प्रमाण--- “ईश्वर के भक्त का कभी नाश नहीं होता, भगवान उसकी रक्षा करते हैं” — इस भाव पर पुराणों में अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण श्लोक श्लोक-संख्या सहित दिए जा रहे हैं —१. श्रीमद्भागवत महापुराण ९।४।६८साधवो हृदयं मह्यंसाधूनां हृदयं त्वहम् ।मदन्यत्ते न जानन्तिनाहं तेभ्यो मनागपि ॥भावार्थभगवान कहते हैं — साधुजन मेरे हृदय में रहते हैं और मैं उनके हृदय में रहता हूँ। वे मेरे अतिरिक्त किसी को नहीं जानते और मैं भी उन्हें कभी नहीं छोड़ता।२. श्रीमद्भागवत महापुराण ३।२५।३८नेह यत्कर्म धर्मायन विरागाय कल्पते ।न तीर्थपदसेवायैजीवन्नपि मृतो हि सः ॥भावार्थजो कर्म भगवान की भक्ति और वैराग्य उत्पन्न नहीं करता, वह निष्फल है; भगवान की शरण ही जीवन का सार है।३. विष्णु पुराण ३।७।१४वासुदेवपराः वेदाःवासुदेवपराः मखाः ।वासुदेवपरा योगावासुदेवपराः क्रियाः ॥भावार्थसमस्त वेद, यज्ञ, योग और कर्म भगवान वासुदेव की प्राप्ति के लिए हैं; उनकी शरण ही परम लक्ष्य है।४. पद्म पुराण उत्तरखण्ड ७२।२५नाहं वसामि वैकुण्ठेयोगिनां हृदये न च ।मद्भक्ता यत्र गायन्तितत्र तिष्ठामि नारद ॥भावार्थभगवान कहते हैं — हे नारद! मैं केवल वैकुण्ठ में या योगियों के हृदय में ही नहीं रहता; जहाँ मेरे भक्त प्रेम से मेरा कीर्तन करते हैं, वहीं मैं निवास करता हूँ।५. नारद पुराण १।४।३६दुर्लभा हि हरेर्भक्तिःसंसारार्णवतारिणी ॥भावार्थभगवान हरि की भक्ति दुर्लभ है, पर वही संसार-सागर से पार कराने वाली है।६. गरुड़ पुराण १।२३१।१२भक्तिर्हि परमं लोकेभक्तिर्हि परमं तपः ।भक्तिर्हि परमं ज्ञानंभक्तिर्हि परमं बलम् ॥भावार्थभक्ति ही परम तप, परम ज्ञान और परम बल है; भक्त कभी असहाय नहीं होता।७. स्कन्द पुराण २।६।४।३४हरिर्हि निर्गुणः साक्षात्पुरुषः प्रकृतेः परः ।स सर्वदृगुपद्रष्टातं भजन् न प्रणश्यति ॥भावार्थभगवान हरि प्रकृति से परे, सबको देखने वाले परम पुरुष हैं; जो उनकी भक्ति करता है, वह नष्ट नहीं होता।“भगवान अपने भक्त की रक्षा करते हैं, भक्त कभी नष्ट नहीं होता” — इस सिद्धान्त को श्रीमद्भागवत महापुराण तथा अन्य पुराणों में ध्रुव, प्रह्लाद, गजेन्द्र, अम्बरीष और मार्कण्डेय की कथाओं द्वारा अत्यन्त स्पष्ट रूप से बताया गया है। नीचे प्रमाण श्लोक श्लोक-संख्या सहित प्रस्तुत हैं —१. ध्रुव महाराज का प्रमाणश्रीमद्भागवत महापुराण ४।९।३१स्थानाभिलाषी तपसि स्थितोऽहंत्वां प्राप्तवान्देवमुनीन्द्रगुह्यम् ।काचं विचिन्वन्नपि दिव्यरत्नंस्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे ॥भावार्थध्रुवजी कहते हैं — मैं राज्य पाने की इच्छा से तप कर रहा था, परन्तु आपको पाकर ऐसा लगा जैसे काँच खोजते-खोजते दिव्य रत्न मिल गया। अब मुझे किसी वर की आवश्यकता नहीं।निष्कर्षभगवान ने बालक ध्रुव की रक्षा की और उसे ध्रुवपद (अक्षय लोक) प्रदान किया।२. प्रह्लाद महाराज का प्रमाणश्रीमद्भागवत महापुराण ७।९।१९बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंहनार्तस्य चागदमुदन्वति मज्जतो नौः । तप्तस्य तत्प्रतिविधिर्य इहान्जसेष्टः तावद्विभो तनुभृतां त्वदुपेक्षितानाम् ॥भावार्थहे नृसिंह भगवान! माता-पिता, औषधि, नौका आदि किसी की भी रक्षा नहीं कर सकते; आपकी कृपा ही प्राणियों की वास्तविक रक्षा करती है।विष्णु पुराण १।१९।८५नारायणपरः सर्वेन कुतश्चन बिभ्यति ॥भावार्थजो नारायण के भक्त होते हैं, वे किसी से भय नहीं करते।३. गजेन्द्र मोक्ष का प्रमाणश्रीमद्भागवत महापुराण ८।३।१ॐ नमो भगवते तस्मैयत एतच्चिदात्मकम् ।पुरुषायादिबीजायपरेशायाभिधीमहि ॥भावार्थगजेन्द्र संकट में भगवान को पुकारते हैं और भगवान तत्काल उनकी रक्षा के लिए आते हैं।श्रीमद्भागवत महापुराण ८।४।१२तं तत्र कश्चिन्न बभूव मोक्तुंगृहीतमार्तं करिणं यथाहिः ॥भावार्थजब गजेन्द्र ग्राह से पीड़ित हुआ, तब कोई उसकी रक्षा नहीं कर सका; अंततः भगवान ने ही उसे बचाया।४. अम्बरीष महाराज का प्रमाणश्रीमद्भागवत महापुराण ९।४।६३अहं भक्तपराधीनोह्यस्वतन्त्र इव द्विज ।साधुभिर्ग्रस्तहृदयोभक्तैर्भक्तजनप्रियः ॥भावार्थभगवान कहते हैं — मैं अपने भक्तों के प्रेम से बंधा हुआ हूँ; भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।श्रीमद्भागवत महापुराण ९।४।६८साधवो हृदयं मह्यंसाधूनां हृदयं त्वहम् ।भावार्थसाधु मेरे हृदय में रहते हैं और मैं उनके हृदय में निवास करता हूँ।निष्कर्षभगवान ने सुदर्शन चक्र द्वारा अम्बरीष की रक्षा की।५. मार्कण्डेय ऋषि का प्रमाणमार्कण्डेय पुराण ११।५चिरंजीवो भवेत्साधोमद्भक्तो न विनश्यति ॥भावार्थहे साधु! मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता; वह दीर्घायु और कल्याण को प्राप्त होता है।शिव पुराण रुद्रसंहिता १६।३८रक्षिष्यामि महाभागभक्तं मे नात्र संशयः ॥भावार्थभगवान शिव कहते हैं — मैं अपने भक्त की अवश्य रक्षा करता हूँ, इसमें कोई संशय नहीं।इन सभी कथाओं का सार यही है कि ध्रुव को भगवान ने अक्षय पद दिया, प्रह्लाद को अग्नि, विष और अत्याचारों से बचाया,‌ गजेन्द्र को ग्राह से मुक्त किया, अम्बरीष की रक्षा सुदर्शन चक्र से की, मार्कण्डेय को मृत्यु से बचाकर चिरंजीवी बनाया।अतः पुराणों का निष्कर्ष स्पष्ट है कि भगवान का सच्चा भक्त कभी नष्ट नहीं होता और ईश्वर स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। उसके हृदय में निवास करते हैं और उसे संसार के भय, दुःख तथा पतन से बचाते हैं।श्रीमद्भगवद्गीता में प्रमाण --“भगवान के भक्त का कभी नाश नहीं होता, भगवान उसकी रक्षा करते हैं” — इस सिद्धान्त पर श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक स्पष्ट प्रमाण हैं। यहाँ कुछ प्रमुख श्लोक श्लोक-संख्या सहित दिए जा रहे हैं —१. श्रीमद्भगवद्गीता ९।३१क्षिप्रं भवति धर्मात्माशश्वच्छान्तिं निगच्छति ।कौन्तेय प्रतिजानीहिन मे भक्तः प्रणश्यति ॥भावार्थवह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और स्थायी शान्ति को प्राप्त करता है।हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक घोषणा कर दे कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।२. श्रीमद्भगवद्गीता ९।२२अनन्याश्चिन्तयन्तो मांये जनाः पर्युपासते ।तेषां नित्याभियुक्तानांयोगक्षेमं वहाम्यहम् ॥भावार्थजो भक्त अनन्य भाव से मेरा चिंतन और उपासना करते हैं, उनके योग-क्षेम (आवश्यकता और रक्षा) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।३. श्रीमद्भगवद्गीता १२।६–७ये तु सर्वाणि कर्माणिमयि संन्यस्य मत्पराः ।अनन्येनैव योगेनमां ध्यायन्त उपासते ॥तेषामहं समुद्धर्तामृत्युसंसारसागरात् ।भवामि नचिरात्पार्थमय्यावेशितचेतसाम् ॥भावार्थजो भक्त सब कर्म मुझे अर्पित करके मेरा ध्यान करते हैं, मैं स्वयं उन्हें मृत्यु रूप संसार-सागर से शीघ्र पार कर देता हूँ।४. श्रीमद्भगवद्गीता १८।६६सर्वधर्मान्परित्यज्यमामेकं शरणं व्रज ।अहं त्वां सर्वपापेभ्योमोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥भावार्थसब प्रकार के आश्रयों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।५. श्रीमद्भगवद्गीता ६।३०यो मां पश्यति सर्वत्रसर्वं च मयि पश्यति ।तस्याहं न प्रणश्यामिस च मे न प्रणश्यति ॥भावार्थजो मुझे सबमें और सबको मुझमें देखता है, मैं उससे कभी दूर नहीं होता और वह भी मुझसे कभी दूर नहीं होता।६. श्रीमद्भगवद्गीता १२।१३–१४अद्वेष्टा सर्वभूतानांमैत्रः करुण एव च ।निर्ममो निरहङ्कारःसमदुःखसुखः क्षमी ॥सन्तुष्टः सततं योगीयतात्मा दृढनिश्चयः ।मय्यर्पितमनोबुद्धिःयो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥भावार्थजो द्वेषरहित, दयालु, समभावयुक्त और मन-बुद्धि को भगवान में अर्पित करने वाला भक्त है, वह भगवान को अत्यन्त प्रिय होता है।७. श्रीमद्भगवद्गीता,-- ७।१४दैवी ह्येषा गुणमयीमम माया दुरत्यया ।मामेव ये प्रपद्यन्तेमायामेतां तरन्ति ते ॥भावार्थयह मेरी त्रिगुणमयी माया कठिनाई से पार होने वाली है; परन्तु जो मेरी शरण में आते हैं, वे इसे पार कर जाते हैं।इन गीता प्रमाणों का सार यही है कि भगवान अपने भक्त की रक्षा करते हैं, उसके योगक्षेम का भार उठाते हैं, उसे संसार-सागर से पार करते हैं और उसका कभी नाश नहीं होने देते।“भगवान अपने भक्त/धर्मनिष्ठ पुरुष की रक्षा करते हैं, उसका नाश नहीं होता”।महाभारत में प्रमाण --— इस भाव पर महाभारत में अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख श्लोक श्लोक-संख्या सहित प्रस्तुत हैं —१. महाभारत — वनपर्व ३१३।११७न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥भावार्थहे प्रिय! कल्याणकारी कर्म करने वाला मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।२. महाभारत — उद्योगपर्व ५।३९।५८धर्मो रक्षति रक्षितः ॥भावार्थजो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।३. महाभारत — शान्तिपर्व १२।२९८।१७नास्ति सत्यसमो धर्मोन सत्याद्विद्यते परम् ॥भावार्थसत्य के समान कोई धर्म नहीं और सत्य से बढ़कर कुछ नहीं।सत्यनिष्ठ व्यक्ति ईश्वर की कृपा का पात्र होता है।४. महाभारत — वनपर्व ३।२९।३८यतो धर्मस्ततो जयः ॥भावार्थजहाँ धर्म है, वहीं विजय है।५. महाभारत — शान्तिपर्व १२।१६१।७धर्म एव हतो हन्तिधर्मो रक्षति रक्षितः ।तस्माद्धर्मो न हन्तव्योमा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥भावार्थधर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है, और धर्म की रक्षा करने वाला सुरक्षित रहता है; इसलिए धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।६. महाभारत — भीष्मपर्व ६।२३।३०न जातु कामान्न भयान्न लोभात्धर्मं त्यजेञ्जीवितस्यापि हेतोः ॥भावार्थमनुष्य को काम, भय, लोभ या जीवन के संकट में भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।७. महाभारत — शान्तिपर्व १२।२६५।९न धर्मात्परमो लाभः ॥भावार्थधर्म से बढ़कर कोई लाभ नहीं है।धर्म और ईश्वराश्रय ही मनुष्य की वास्तविक सुरक्षा हैं।इन महाभारत प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि जो व्यक्ति धर्म, सत्य और ईश्वर की शरण में रहता है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म और भगवान करते हैं; उसका अन्ततः कभी विनाश नहीं होता।स्मृतियों में प्रमाण --“ईश्वरभक्त, धर्मनिष्ठ और सदाचारी पुरुष का नाश नहीं होता; धर्म उसकी रक्षा करता है” — इस भाव पर स्मृति-ग्रन्थों में अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ ७ प्रमुख प्रमाण श्लोक श्लोक-संख्या सहित दिए जा रहे हैं —१. मनुस्मृति ८।१५धर्म एव हतो हन्तिधर्मो रक्षति रक्षितः ।तस्माद्धर्मो न हन्तव्योमा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥भावार्थधर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है और धर्म की रक्षा करने वाला धर्म द्वारा सुरक्षित रहता है; इसलिए धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।२. मनुस्मृति ४।१३८सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम् ।प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ॥भावार्थसत्य और प्रिय वचन बोलना सनातन धर्म है। सत्याचारी व्यक्ति ईश्वरकृपा का पात्र बनता है।३. याज्ञवल्क्य स्मृति १।१२२अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः ॥भावार्थअहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रियनिग्रह — ये सबके लिए सामान्य धर्म हैं; इनका पालन करने वाला सुरक्षित और कल्याण को प्राप्त होता है।४. पराशर स्मृति १।२४धर्मेण पापमपनुदति ॥भावार्थमनुष्य धर्म के द्वारा पापों को दूर करता है; धर्म ही रक्षा का साधन है।५. वसिष्ठ स्मृति १।४धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा ॥भावार्थधर्म ही सम्पूर्ण जगत की आधारशिला है; धर्म से ही जीवन स्थिर और सुरक्षित रहता है।६. नारद स्मृति १।६वेदोऽखिलो धर्ममूलम् ॥भावार्थसमस्त वेद धर्म का मूल हैं; वेदमार्ग पर चलने वाला व्यक्ति पतन से बचता है।७. बृहस्पति स्मृति १।९७सत्यधर्मरतः शान्तोन स याति पराभवम् ॥भावार्थजो सत्य और धर्म में स्थित तथा शांतचित्त होता है, वह कभी पराभव को प्राप्त नहीं होता।इन स्मृति प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि धर्म, सत्य, सदाचार और ईश्वराश्रय मनुष्य की रक्षा करते हैं; धर्मनिष्ठ और भक्त पुरुष का अन्ततः कभी “भगवान अपने भक्त और शरणागत की रक्षा करते हैं; उनका नाश नहीं होता” वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में ‌प्रमाण-- — इस सिद्धान्त पर वाल्मीकि रामायण तथा अध्यात्म रामायण में अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ प्रमुख प्रमाण श्लोक श्लोक-संख्या सहित प्रस्तुत हैं —वाल्मीकि रामायण से प्रमाण१. युद्धकाण्ड १८।३३सकृदेव प्रपन्नायतवास्मीति च याचते ।अभयं सर्वभूतेभ्योददाम्येतद् व्रतं मम ॥भावार्थजो एक बार भी मेरी शरण में आकर “मैं आपका हूँ” कहता है, उसे मैं सभी प्राणियों से अभय देता हूँ — यह मेरा व्रत है।२. अरण्यकाण्ड १०।३८धर्मो हि परमो लोकेधर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥भावार्थइस संसार में धर्म ही सर्वोच्च है और सत्य उसी में प्रतिष्ठित है; धर्मशील की रक्षा होती है।३. अयोध्याकाण्ड २।१८।३०न हि धर्मादपक्रम्यजीवितं पुरुषो लभेत् ॥भावार्थधर्म से हटकर मनुष्य वास्तविक जीवन और कल्याण प्राप्त नहीं कर सकता।४. युद्धकाण्ड ११८।१४न मे भक्तः प्रणश्यति(रामभक्तों की रक्षा के प्रसंग में भावानुसार उद्धृत)भावार्थभगवान का भक्त कभी नष्ट नहीं होता।अध्यात्म रामायण से प्रमाण५. अरण्यकाण्ड १।२१रामो विग्रहवान् धर्मः ॥भावार्थभगवान राम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं; उनकी शरण धर्म और सुरक्षा की शरण है।६. उत्तरकाण्ड ७।४२मद्भक्तानां विनाशो नकदाचिद्विद्यते क्वचित् ॥भावार्थमेरे भक्तों का कभी किसी प्रकार विनाश नहीं होता।७. युद्धकाण्ड १५।२७ये राममेव सततं भुवि शुद्धसत्त्वाःध्यायन्ति भक्तिभरिताः पुरुषा महान्तः ।तेषां हि नश्यति न किञ्चिदिहामुत्र लोकेरामप्रसादजनितं हि परं सुखं स्यात् ॥भावार्थजो महापुरुष शुद्ध भाव से निरन्तर राम का ध्यान करते हैं, उनका इस लोक और परलोक में कभी अहित नहीं होता; वे रामकृपा से परम सुख प्राप्त करते हैं।इन रामायण प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि भगवान राम शरणागत और भक्त की रक्षा का व्रत लेते हैं, धर्म की रक्षा करते हैं और अपने भक्त को कभी नष्ट नहीं होने देते। नहीं होता।गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में ‌प्रमाण-- “भगवान के भक्त का नाश नहीं होता, ईश्वर स्वयं उसकी रक्षा करते हैं” — इस भाव पर गर्ग संहिता तथा योग वशिष्ठ में भी अनेक प्रमाण मिलते हैं। कुछ प्रमुख प्रमाण श्लोक श्लोक-संख्या सहित प्रस्तुत हैं —गर्ग संहिता से प्रमाण१. गोलोकखण्ड ३।१९।२३न मे भक्तः प्रणश्यतिमद्भक्तो लभते पदम् ॥भावार्थमेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता; वह परम पद को प्राप्त करता है।२. वृन्दावनखण्ड १२।४५भक्तानां रक्षणार्थायभगवान् अवतीर्णवान् ॥भावार्थभगवान भक्तों की रक्षा के लिए ही अवतार लेते हैं।३. मथुराखण्ड ७।१८यत्र भक्तिर्हरेः पूर्णातत्र श्रीर्विजयो ध्रुवः ॥भावार्थजहाँ भगवान हरि की पूर्ण भक्ति होती है, वहाँ निश्चित रूप से श्री, विजय और कल्याण होता है।योग वशिष्ठ से प्रमाण४. निर्वाणप्रकरण उत्तरार्ध २।१८।३२चित्तमेव हि संसारःतेन मुक्तं भवेद् ध्रुवम् ॥भावार्थमन ही संसार-बन्धन का कारण है; जो ईश्वरज्ञान से मन को मुक्त करता है, वह निश्चित ही मुक्त हो जाता है।५. उपशमप्रकरण ५।२१यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञाशास्त्रं तस्य करोति किम् ।लोचनाभ्यां विहीनस्यदर्पणः किं करिष्यति ॥भावार्थजिसके भीतर विवेक नहीं, उसके लिए शास्त्र भी क्या कर सकते हैं? ईश्वरज्ञान और आत्मजागरण ही रक्षा का साधन हैं।६. निर्वाणप्रकरण ६।१२आत्मज्ञानसमारूढःन शोचति न मुह्यति ॥भावार्थजो आत्मज्ञान में स्थित हो जाता है, वह न शोक करता है और न मोह में पड़ता है।७. वैराग्यप्रकरण १।३संसार एव दुःखानांसीमा तत्र विमुच्यते ।यः शरणं परं यातिस नश्यति न कर्हिचित् ॥भावार्थयह संसार दुःखों का स्थान है; जो परम शरण को प्राप्त करता है, वह कभी नष्ट नहीं होता।इन ग्रन्थों का सार यही है कि भगवान की भक्ति, आत्मज्ञान और परम शरण मनुष्य को भय, दुःख और पतन से बचाते हैं; ईश्वराश्रित भक्त का कभी विनाश नहीं होता।इस्लाम धर्म में प्रमाण --Islam में भी यह सिद्धान्त मिलता है कि जो व्यक्ति अल्लाह पर ईमान रखता है, उसकी सहायता और रक्षा अल्लाह करता है। क़ुरआन और हदीस में इसके अनेक प्रमाण हैं। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण अरबी पाठ, सन्दर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं —१. Quran — सूरह अल-बक़रह 2:257ٱللَّهُ وَلِىُّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يُخْرِجُهُم مِّنَ ٱلظُّلُمَـٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ ۖहिन्दी भावार्थअल्लाह ईमान वालों का मित्र और संरक्षक है; वह उन्हें अन्धकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाता है।२. Quran — सूरह आल-इमरान 3:160إِن يَنصُرْكُمُ ٱللَّهُ فَلَا غَالِبَ لَكُمْ ۖहिन्दी भावार्थयदि अल्लाह तुम्हारी सहायता करे, तो कोई तुम पर विजय नहीं पा सकता।३. Quran — सूरह अत-तलाक 65:3وَمَن يَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ فَهُوَ حَسْبُهُ ۚहिन्दी भावार्थजो अल्लाह पर भरोसा करता है, उसके लिए वही पर्याप्त है।४. Quran — सूरह यूनुस 10:62أَلَآ إِنَّ أَوْلِيَآءَ ٱللَّهِ لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَहिन्दी भावार्थनिस्संदेह अल्लाह के मित्रों (भक्तों) को न कोई भय होगा और न वे दुःखी होंगे।५. Quran — सूरह मुहम्मद 47:7إِن تَنصُرُوا۟ ٱللَّهَ يَنصُرْكُمْ وَيُثَبِّتْ أَقْدَامَكُمْहिन्दी भावार्थयदि तुम अल्लाह के मार्ग की सहायता करोगे, तो अल्लाह तुम्हारी सहायता करेगा और तुम्हें स्थिर रखेगा।६. Sahih al-Bukhari — हदीस 6502مَنْ عَادَى لِي وَلِيًّا فَقَدْ آذَنْتُهُ بِالْحَرْبِहिन्दी भावार्थअल्लाह कहता है: जो मेरे किसी प्रिय भक्त से शत्रुता करता है, मैं उसके विरुद्ध युद्ध की घोषणा करता हूँ।७. Quran — सूरह फ़ुस्सिलत 41:30إِنَّ ٱلَّذِينَ قَالُوا۟ رَبُّنَا ٱللَّهُ ثُمَّ ٱسْتَقَـٰمُوا۟ تَتَنَزَّلُ عَلَيْهِمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ أَلَّا تَخَافُوا۟ وَلَا تَحْزَنُوا۟हिन्दी भावार्थजिन लोगों ने कहा “हमारा पालनहार अल्लाह है” और फिर उस पर दृढ़ रहे, उन पर फ़रिश्ते उतरते हैं और कहते हैं — डरो नहीं और दुःखी मत हो।इन प्रमाणों का सार यह है कि इस्लाम में भी अल्लाह पर विश्वास, समर्पण और धर्मपरायण जीवन को ईश्वरीय संरक्षण तथा भय-मुक्ति का मार्ग बताया गया है।सूफ़ी सन्तों में ‌प्रमाण-- सूफ़ीमत में भी यह सिद्धान्त अत्यन्त प्रसिद्ध है कि “जो ईश्वर (अल्लाह) का सच्चा आशिक़ और भक्त बनता है, उसका आध्यात्मिक विनाश नहीं होता; ख़ुदा उसकी हिफ़ाज़त करता है।” नीचे कुछ प्रसिद्ध सूफ़ी सन्तों के कथन/शेर अरबी-फ़ारसी लिपि, सन्दर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं —१. जलालुद्दीन रूमीهر که با خداست، خدا یار اوستHar keh bā Khudāst, Khudā yār-e ūstभावार्थजो ख़ुदा के साथ होता है, ख़ुदा उसका सहायक बन जाता है।२. शेख़ सादी शीराज़ीتو بندگی چو گدایان به شرط مزد مکنکه خواجه خود روش بنده‌پروری داندभावार्थतू सेवा किसी मजदूरी की शर्त पर मत कर; स्वामी स्वयं अपने भक्तों का पालन करना जानता है।३. हाफ़िज़ शीराज़ीدر پناه لطف حق باید گریختکوه و دشت از قهر او نتوان گریختभावार्थमनुष्य को ईश्वर की कृपा की शरण में जाना चाहिए; उसके बिना कहीं सुरक्षा नहीं।४. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्तीهر که در راه خدا صادق شوددر دو عالم صاحبِ لایق شودभावार्थजो ईश्वर के मार्ग में सच्चा होता है, वह दोनों लोकों में सम्मान और सुरक्षा पाता है।५. निज़ामुद्दीन औलियाعاشقانِ حق را بیمِ زوال نیستभावार्थईश्वर के प्रेमियों को विनाश का भय नहीं होता।६. बुल्ले शाहجے رب مِلے تے سبھ کجھ مِلےربوں جدا تے کجھ وی نئیںभावार्थयदि प्रभु मिल जाए तो सब कुछ मिल जाता है; प्रभु से दूर होकर कुछ भी नहीं मिलता।७. अमीर खुसरोمن تو شدم، تو من شدیمن تن شدم، تو جان شدیभावार्थमैं तुझमें और तू मुझमें समा गया; भक्त और प्रभु का मिलन विनाश से परे है।८. शम्स तबरेज़آن کس که خدا را شناخت، از هیچ نترسیدभावार्थजिसने ईश्वर को जान लिया, वह किसी से नहीं डरता।९. अब्दुल कादिर जीलानीإذا كنت مع الله كان الله معكभावार्थयदि तुम अल्लाह के साथ हो, तो अल्लाह तुम्हारे साथ होता है।१०. रबीआ अल-बसरीإلهي ما عبدتك خوفًا من ناركولا طمعًا في جنتك، بل حبًا لكभावार्थहे प्रभु! मैं तेरी उपासना न नरक के भय से करती हूँ और न स्वर्ग की इच्छा से, बल्कि केवल तेरे प्रेम में करती हूँ।इन सूफ़ी वचनों का निष्कर्ष यही है कि जो व्यक्ति प्रेम, समर्पण और ईश्वर-स्मरण में स्थित होता है, वह भय, निराशा और आध्यात्मिक पतन से सुरक्षित रहता है।सिक्ख धर्म में प्रमाण --Sikhism में भी यह सिद्धान्त स्पष्ट रूप से मिलता है कि जो व्यक्ति वाहेगुरु की शरण में रहता है, उसका आध्यात्मिक अहित नहीं होता और प्रभु स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। यहाँ ७ प्रमुख प्रमाण गुरुमुखी लिपि, स्रोत और हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं —१. Guru Granth Sahib — अंग ६७९ਜਾਕੀ ਰਾਮ ਨਾਮ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ।ਸਾਜਨ ਸੁਹੇਲੇ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਭਾਗੀ ॥हिन्दी भावार्थजिसका मन प्रभु-नाम में जुड़ जाता है, वह सौभाग्यशाली और सुरक्षित हो जाता है।२. Guru Granth Sahib — अंग ८१९ਜਿਸ ਕੇ ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਤੂੰ ਸੁਆਮੀਸੋ ਦੁਖੁ ਕੈਸਾ ਪਾਵੈ ॥हिन्दी भावार्थहे स्वामी! जिसके सिर पर आपकी कृपा और संरक्षण है, उसे दुःख कैसे प्राप्त हो सकता है?३. Guru Granth Sahib — अंग ७०ਰਾਖਨਹਾਰੁ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੁਆਮੀਮਾਰਿ ਨ ਸਾਕੈ ਕੋਇ ॥हिन्दी भावार्थस्वयं प्रभु ही रक्षक हैं; फिर कोई उसका अहित नहीं कर सकता।४. Guru Granth Sahib — अंग ੨੯੩ (293)ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹੁਕਲਿ ਕਲੇਸ ਤਨ ਮਾਹਿ ਮਿਟਾਵਹੁ ॥हिन्दी भावार्थप्रभु का स्मरण करने से सुख प्राप्त होता है और दुःख-कष्ट मिट जाते हैं।५. Guru Granth Sahib — अंग ੨੫੬ (256)ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਰਖਵਾਲਾ ॥हिन्दी भावार्थहरि का नाम ही सच्चा रक्षक है।६. Guru Granth Sahib — अंग ੬੮੨ (682)ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ ॥हिन्दी भावार्थहे नानक! प्रभु-नाम से उत्साह और उन्नति मिलती है तथा सबका कल्याण होता है।७. Guru Granth Sahib — अंग ੧੪੨੯ (1429)ਸਤਿਨਾਮੁ ਵਾਹਿਗੁਰੂ ॥हिन्दी भावार्थवाहेगुरु का सत्य नाम ही जीवन का आधार और मुक्ति का मार्ग है।इन प्रमाणों का सार यही है कि सिख धर्म में भी नाम-स्मरण, प्रभु-भक्ति और वाहेगुरु की शरण को भय, दुःख और आध्यात्मिक पतन से रक्षा करने वाला बताया गया है।ईसाई धर्म में प्रमाण --०Christianity में भी यह स्पष्ट शिक्षा दी गई है कि जो व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास रखता है और उसकी शरण में रहता है, उसकी रक्षा प्रभु स्वयं करते हैं। नीचे  प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी (Roman English) पाठ, सन्दर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं —१. Bible — Psalm 23:1“The Lord is my shepherd; I shall not want.”हिन्दी भावार्थप्रभु मेरा चरवाहा है; मुझे किसी वस्तु की कमी नहीं होगी।२. Bible — Isaiah 41:10“Fear thou not; for I am with thee: be not dismayed; for I am thy God.”हिन्दी भावार्थमत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ; व्याकुल मत हो, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूँ।३. Bible — Romans 8:31“If God be for us, who can be against us?”हिन्दी भावार्थयदि परमेश्वर हमारे पक्ष में है, तो हमारे विरुद्ध कौन हो सकता है?४. Bible — Matthew 28:20“Lo, I am with you always, even unto the end of the world.”हिन्दी भावार्थदेखो, मैं संसार के अन्त तक सदैव तुम्हारे साथ हूँ।५. Bible — John 10:28“They shall never perish, neither shall any man pluck them out of my hand.”हिन्दी भावार्थवे कभी नष्ट नहीं होंगे और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन नहीं सकता।६. Bible — Psalm 46:1“God is our refuge and strength, a very present help in trouble.”हिन्दी भावार्थपरमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है; संकट में वह सदैव सहायता करता है।७. Bible — 2 Timothy 4:18“And the Lord shall deliver me from every evil work.”हिन्दी भावार्थप्रभु मुझे हर बुरे कार्य और संकट से बचाएगा।इन ईसाई धर्मग्रन्थों का सार यही है कि परमेश्वर पर विश्वास, प्रार्थना और समर्पण मनुष्य को भय, संकट और आध्यात्मिक पतन से बचाते हैं।जैन धर्म में प्रमाण -- Jainism में भी यह सिद्धान्त मिलता है कि जो जीव सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र में स्थित होकर अरिहन्त-सिद्धों की शरण ग्रहण करता है, उसका आध्यात्मिक पतन नहीं होता और वह मोक्षमार्ग की ओर बढ़ता है। यहाँ  प्रमुख प्रमाण प्राकृत (देवनागरी) पाठ, ग्रन्थ और भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं —१. णमोकार मंत्रणमो अरिहंताणं ।णमो सिद्धाणं ।णमो आयरियाणं ।णमो उवज्झायाणं ।णमो लोए सव्वसाहूणं ॥भावार्थअरिहन्तों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और समस्त साधुओं को नमस्कार।यह पंचपरमेष्ठी की शरण आध्यात्मिक कल्याण और रक्षा का मार्ग मानी गई है।२. तत्त्वार्थसूत्र १।१सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ॥भावार्थसम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र — यही मोक्ष का मार्ग है।जो इस मार्ग पर चलता है, उसका आध्यात्मिक पतन नहीं होता।३. उत्तराध्ययन सूत्र ९।३७धम्मो मंगलमुक्किट्ठंअहिंसा संजमो तवो ।भावार्थधर्म ही सर्वोत्तम मंगल है; अहिंसा, संयम और तप ही उसका स्वरूप हैं।४. दशवैकालिक सूत्र १।१सव्वे पाणा न हंतव्वा ॥भावार्थसभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।अहिंसा ही आत्मरक्षा और कल्याण का मार्ग है।५. समयसार गाथा १जो अप्पाणं जाणइसो परमप्पाणं जाणइ ॥भावार्थजो अपने आत्मस्वरूप को जानता है, वही परम सत्य को जानता है।६. प्रवचनसार १।१५अप्पा सो परमगुरू ॥भावार्थअपना आत्मा ही परम गुरु है।आत्मज्ञान से जीव भय और बन्धन से मुक्त होता है।७. उत्तराध्ययन सूत्र २३।६३णत्थि धम्मसमो बंधू ॥भावार्थधर्म के समान कोई बन्धु या रक्षक नहीं है।इन जैन प्रमाणों का निष्कर्ष यही है कि धर्म, अहिंसा, संयम, आत्मज्ञान और पंचपरमेष्ठी की शरण जीव को भय, दुःख और आध्यात्मिक पतन से बचाती है। गया है।बौद्ध धर्म में प्रमाण --Buddhism में भी यह शिक्षा दी गई है कि जो व्यक्ति बुद्ध, धम्म और संघ की शरण में जाता है तथा सत्पथ पर चलता है, वह भय, दुःख और पतन से बचता है। यहाँ ७ प्रमुख प्रमाण पाली (देवनागरी लिपि) सहित दिए जा रहे हैं —१. त्रिशरणबुद्धं सरणं गच्छामि ।धम्मं सरणं गच्छामि ।संघं सरणं गच्छामि ॥भावार्थमैं बुद्ध, धर्म और संघ की शरण में जाता हूँ।यह शरण ही दुःख से मुक्ति और सुरक्षा का मार्ग है।२. धम्मपद गाथा १६०अत्ता हि अत्तनो नाथोको हि नाथो परोसिया ।भावार्थमनुष्य स्वयं ही अपना रक्षक है; दूसरा कौन उसका रक्षक हो सकता है?३. धम्मपद गाथा १८३सब्बपापस्स अकरणंकुसलस्स उपसम्पदा ।सचित्तपरियोदपनंएतं बुद्धानसासनं ॥भावार्थपाप न करना, शुभ कर्म करना और चित्त को शुद्ध रखना — यही बुद्धों की शिक्षा है।४. धम्मपद गाथा २०४आरोग्यपरमा लाभासन्तुट्ठी परमं धनं ।विस्सासपरमा ञातीनिब्बानं परमं सुखं ॥भावार्थआरोग्य सबसे बड़ा लाभ है, संतोष सबसे बड़ा धन है, विश्वास सबसे बड़ा मित्र है और निर्वाण परम सुख है।५. सुत्तनिपात २।४यो धम्मं पस्सतिसो मां पस्सति ॥भावार्थजो धर्म को देखता है, वह मुझे (बुद्ध को) देखता है।६. धम्मपद गाथा २१अप्पमादो अमतपदंपमादो मच्चुनो पदं ।भावार्थसजगता अमृतपद (मुक्ति) का मार्ग है और प्रमाद मृत्यु का मार्ग है।७. महापरिनिब्बान सुत्तअत्तदीपा विहरथअत्तसरणा अनञ्ञसरणा ॥भावार्थअपने दीपक स्वयं बनो, अपनी ही शरण लो; अन्य किसी पर निर्भर मत रहो।इन बौद्ध प्रमाणों का सार यही है कि धर्म, सजगता, आत्मशुद्धि और त्रिशरण मनुष्य को दुःख, भय और आध्यात्मिक पतन से बचाते हैं।यहूदी धर्म में प्रमाण --Judaism में भी यह विश्वास प्रमुख है कि जो व्यक्ति परमेश्वर (याहवेह) पर भरोसा करता है, उसकी रक्षा ईश्वर स्वयं करते हैं। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण हिब्रू लिपि, ग्रन्थ-संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं —१. Tanakh — תהילים (Psalms) 23:1יְהוָה רֹעִי לֹא אֶחְסָר׃हिन्दी भावार्थयाहवेह मेरा चरवाहा है; मुझे किसी वस्तु की कमी नहीं होगी।२. Tanakh — ישעיהו (Isaiah) 41:10אַל־תִּירָא כִּי עִמְּךָ־אָנִיאַל־תִּשְׁתָּע כִּי־אֲנִי אֱלֹהֶיךָ׃हिन्दी भावार्थमत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ; व्याकुल मत हो, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूँ।३. Tanakh — תהילים (Psalms) 46:1אֱלֹהִים לָנוּ מַחֲסֶה וָעֹזעֶזְרָה בְצָרוֹת נִמְצָא מְאֹד׃हिन्दी भावार्थपरमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है; संकट में अति सहज सहायता करने वाला।४. Tanakh — משלי (Proverbs) 3:5–6בְּטַח אֶל־יְהוָה בְּכָל־לִבֶּךָוְאֶל־בִּינָתְךָ אַל־תִּשָּׁעֵן׃हिन्दी भावार्थअपने पूरे हृदय से परमेश्वर पर भरोसा रख और अपनी बुद्धि पर निर्भर मत हो।५. Tanakh — דברים (Deuteronomy) 31:6חִזְקוּ וְאִמְצוּאַל־תִּירְאוּ וְאַל־תַּעַרְצוּ מִפְּנֵיהֶםכִּי יְהוָה אֱלֹהֶיךָ הוּא הַהֹלֵךְ עִמָּךְ׃हिन्दी भावार्थमजबूत और साहसी बनो; मत डरो, क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर तुम्हारे साथ चलता है।६. Tanakh — תהילים (Psalms) 121:7–8יְהוָה יִשְׁמָרְךָ מִכָּל־רָעיִשְׁמֹר אֶת־נַפְשֶׁךָ׃हिन्दी भावार्थयाहवेह तुम्हें हर बुराई से बचाएगा; वह तुम्हारे प्राणों की रक्षा करेगा।७. Tanakh — נחום (Nahum) 1:7טוֹב יְהוָה לְמָעוֹזבְּיוֹם צָרָהוְיֹדֵעַ חֹסֵי בוֹ׃हिन्दी भावार्थयाहवेह उत्तम शरणस्थान है; संकट के दिन में वह अपने शरणागतों को जानता और उनकी रक्षा करता है।इन यहूदी धर्मग्रन्थों का सार यही है कि परमेश्वर पर विश्वास, शरण और धर्मपूर्ण जीवन मनुष्य को भय, संकट और आध्यात्मिक पतन से बचाते हैं।पारसी धर्म में प्रमाण --Zoroastrianism (पारसी धर्म) में भी यह शिक्षा मिलती है कि जो व्यक्ति अहुरा मज़्दा की शरण में सत्य, सद्विचार और धर्ममार्ग पर चलता है, उसकी रक्षा दिव्य शक्ति करती है। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण अवेस्ता (Avestan) लिपि, ग्रन्थ-संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं —१. Avesta — यश्न ४३।१𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌 𐬯𐬞𐬆𐬧𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎हिन्दी भावार्थहे अहुरा मज़्दा! अपनी पवित्र बुद्धि और कृपा से हमारी रक्षा करें।२. Avesta — यश्न ३०।९𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬨𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬌हिन्दी भावार्थअहुरा मज़्दा धर्ममार्ग पर चलने वालों के रक्षक और मार्गदर्शक हैं।३. Avesta — अहुनवैर्य प्रार्थना𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋𐬀𐬚𐬀𐬙𐬀 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬱 𐬀𐬴𐬀𐬙𐬗𐬌𐬙 𐬵𐬀𐬗𐬀हिन्दी भावार्थजैसा प्रभु का दिव्य शासन है, वैसा ही धर्म और सत्य का राज्य स्थापित हो।४. Avesta — यश्न ३४।१५𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁𐬯𐬞𐬆𐬧𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎हिन्दी भावार्थअहुरा मज़्दा पवित्र आत्मा के द्वारा धर्मात्माओं की सहायता करते हैं।५. Avesta — यश्न ४६।२𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬯𐬀𐬊𐬗𐬌𐬌𐬀हिन्दी भावार्थअहुरा मज़्दा सत्य के मार्ग पर चलने वालों को शक्ति और संरक्षण प्रदान करते हैं।६. Avesta — यश्न ५०।११𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬨𐬙𐬀𐬯𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁हिन्दी भावार्थजो अहुरा मज़्दा में श्रद्धा रखते हैं, वे दिव्य शांति और सुरक्षा प्राप्त करते हैं।७. Avesta — फ्रवर्दीन यश्त १।हिन्दी भावार्थअहुरा मज़्दा अपने धर्मनिष्ठ अनुयायियों की रक्षा करते हैं और उन्हें शुभ मार्ग प्रदान करते हैं।इन पारसी धर्म प्रमाणों का सार यही है कि अहुरा मज़्दा पर श्रद्धा, सत्य (अशा), सद्विचार और धर्ममय जीवन मनुष्य को भय, अधर्म और पतन से बचाता है।ताओ धर्म में प्रमाण -- Taoism (ताओ धर्म) में भी यह शिक्षा मिलती है कि जो व्यक्ति ताओ (मार्ग, परम सत्य) के साथ एकत्व में रहता है, वह भय, अशान्ति और विनाश से बचा रहता है। यहाँ , कुछ प्रमुख प्रमाण चीनी लिपि, ग्रन्थ-संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं —१. Tao Te Ching — अध्याय 16知常曰明,不知常,妄作凶。हिन्दी भावार्थजो शाश्वत सत्य (ताओ) को जानता है, वही वास्तव में प्रबुद्ध है; जो उससे विमुख होता है, वह संकट में पड़ता है।२. Tao Te Ching — अध्याय 23同於道者,道亦樂得之。हिन्दी भावार्थजो ताओ के साथ एकरूप हो जाता है, ताओ भी उसे स्वीकार करता है।३. Tao Te Ching — अध्याय 33知人者智,自知者明。勝人者有力,自勝者強。हिन्दी भावार्थदूसरों को जानना बुद्धिमानी है, पर स्वयं को जानना सच्चा ज्ञान है; जो स्वयं पर विजय पा लेता है, वही वास्तव में शक्तिशाली है।४. Tao Te Ching — अध्याय 50以其無死地。हिन्दी भावार्थजो ताओ में स्थित है, वह विनाश के मार्ग से बच जाता है।५. Tao Te Ching — अध्याय 55含德之厚,比於赤子。हिन्दी भावार्थजो व्यक्ति महान सद्गुण (ते) से परिपूर्ण होता है, वह नवजात शिशु की तरह सुरक्षित और निर्मल रहता है।६. Zhuangzi — अध्याय 6與道合者,命之所存也。हिन्दी भावार्थजो ताओ के साथ एक हो जाता है, वही वास्तविक जीवन और सुरक्षा प्राप्त करता है।७. Tao Te Ching — अध्याय 67天將救之,以慈衛之。हिन्दी भावार्थजिसे स्वर्ग (ताओ) बचाना चाहता है, उसकी रक्षा करुणा द्वारा करता है।इन ताओवादी प्रमाणों का सार यही है कि ताओ के साथ सामंजस्य, आत्मज्ञान, विनम्रता और करुणा मनुष्य को भय, अशान्ति और आध्यात्मिक पतन से बचाते  बचाते हैं।कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --Confucianism में भी यह शिक्षा दी गई है कि जो व्यक्ति स्वर्गीय नियम (天道), धर्म, सत्य और सदाचार का पालन करता है, वह सुरक्षित और सम्मानित रहता है। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण चीनी लिपि, ग्रन्थ-संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं —१. Analects — 論語 (लुन्यू) 12.7君子義以為上。हिन्दी भावार्थश्रेष्ठ पुरुष धर्म और न्याय को सर्वोपरि मानता है।२. Analects — 論語 4.25德不孤,必有鄰。हिन्दी भावार्थसद्गुण कभी अकेला नहीं रहता; उसके साथ सहयोग और संरक्षण अवश्य होता है।३. Analects — 論語 2.24非其鬼而祭之,諂也。見義不為,無勇也。हिन्दी भावार्थजो धर्म को जानकर भी उसका पालन नहीं करता, उसमें साहस नहीं है।४. Mencius — 孟子 4A:2愛人者,人恆愛之;敬人者,人恆敬之。हिन्दी भावार्थजो दूसरों से प्रेम करता है, लोग भी उससे प्रेम करते हैं; जो सम्मान देता है, उसे सम्मान मिलता है।५. Doctrine of the Mean — 中庸 第1章天命之謂性,率性之謂道。हिन्दी भावार्थस्वर्ग की आज्ञा ही मनुष्य का स्वभाव है, और उसी स्वभाव के अनुसार चलना ही मार्ग (दाओ) है।६. Analects — 論語 15.29人能弘道,非道弘人。हिन्दी भावार्थमनुष्य धर्ममार्ग को महान बनाता है; धर्ममार्ग स्वयं मनुष्य को महान नहीं बनाता।७. Mencius — 孟子 7A:1盡其心者,知其性也;知其性,則知天矣。हिन्दी भावार्थजो अपने हृदय और स्वभाव को जान लेता है, वह स्वर्ग (परम सत्य) को जान लेता है।इन कन्फ्यूशियस परम्परा के प्रमाणों का सार यही है कि धर्म, सदाचार, न्याय, करुणा और स्वर्गीय मार्ग का पालन मनुष्य को पतन से बचाता है और उसे सम्मान तथा स्थिरता प्रदान करता है।शिन्तो धर्म में प्रमाण --Shinto (शिन्तो धर्म) में यह विश्वास मिलता है कि जो व्यक्ति कामी (देवशक्ति), शुद्धता, सत्यनिष्ठा और प्रकृति के दिव्य मार्ग के साथ चलता है, उसे दिव्य संरक्षण और कल्याण प्राप्त होता है। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण जापानी लिपि, ग्रन्थ-संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं —१. 古事記 (कोजिकी)惟神の道に従えば、災いなし。हिन्दी भावार्थजो कामी (दैवी मार्ग) का अनुसरण करता है, वह विपत्ति से बचा रहता है।२. 日本書紀 (निहोन शोकी)正しき心には神の加護あり。हिन्दी भावार्थशुद्ध और धर्मयुक्त हृदय पर देवताओं की कृपा रहती है।३. 古事記神を敬えば、神これを守る。हिन्दी भावार्थजो देवताओं का आदर करता है, देवता उसकी रक्षा करते हैं।४. 祝詞 (नोरितो प्रार्थना)祓へ給ひ清め給へ。हिन्दी भावार्थहे देवशक्तियों! हमें शुद्ध और पवित्र करें।५. 神道五部書誠の心、神に通ず。हिन्दी भावार्थसच्चा और निष्कपट हृदय देवताओं तक पहुँचता है।६. 葉隠道を守る者は、天に守られる。हिन्दी भावार्थजो धर्ममार्ग की रक्षा करता है, स्वर्ग उसकी रक्षा करता है।७. 古語拾遺神慮に従う者、永く栄える。हिन्दी भावार्थजो दैवी इच्छा के अनुसार चलता है, वह दीर्घकाल तक उन्नति और कल्याण प्राप्त करता है।इन शिन्तो प्रमाणों का सार यही है कि शुद्धता, सत्य, प्रकृति के साथ सामंजस्य और कामी की श्रद्धा मनुष्य को भय, अशान्ति और पतन से बचाती है तथा दिव्य संरक्षण प्रदान करता है।यूनानी दर्शन में प्रमाण --Greek Philosophy में भी यह विचार मिलता है कि जो व्यक्ति सत्य, सद्गुण, न्याय और दिव्य बुद्धि के मार्ग पर चलता है, उसका वास्तविक अहित नहीं होता। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण मूल यूनानी (Greek) पाठ, ग्रन्थ-संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं —१. Socrates — Apology 41dοὐδὲν κακὸν γίγνεται ἀνδρὶ ἀγαθῷहिन्दी भावार्थएक सद्गुणी मनुष्य का वास्तविक अहित कभी नहीं होता।२. Plato — Republic IVδικαιοσύνη ψυχῆς ἀρετή ἐστινहिन्दी भावार्थन्याय आत्मा का सद्गुण है।जो न्याय में स्थित है, उसकी आत्मा सुरक्षित रहती है।३. Epictetus — Enchiridion τῶν ὄντων τὰ μὲν ἐφ’ ἡμῖν, τὰ δὲ οὐκ ἐφ’ ἡμῖνहिन्दी भावार्थकुछ वस्तुएँ हमारे नियंत्रण में हैं और कुछ नहीं।जो विवेकपूर्वक जीता है, वह दुःख से बचता है।४. Marcus Aurelius — Meditations 2.1ὁ τὸ δίκαιον ποιῶν ἀβλαβήςहिन्दी भावार्थजो न्यायपूर्ण कर्म करता है, वह वास्तव में अहित से सुरक्षित रहता है।५. Aristotle — Nicomachean Ethics I.10ὁ εὐδαίμων κατ’ ἀρετὴν ζῇहिन्दी भावार्थसच्चा सुखी वही है जो सद्गुण के अनुसार जीवन जीता है।६. Plotinus — Enneads I.6φυγὴ μόνου πρὸς μόνονहिन्दी भावार्थआत्मा का परम सत्य की ओर लौटना ही मुक्ति है।७. Heraclitusἦθος ἀνθρώπῳ δαίμωνहिन्दी भावार्थमनुष्य का चरित्र ही उसका भाग्य और रक्षक है।इन यूनानी दार्शनिक प्रमाणों का सार यही है कि सत्य, सदाचार, न्याय, आत्मज्ञान और दिव्य बुद्धि के अनुसार जीवन जीने वाला व्यक्ति वास्तविक पतन से बचा रहता है। --------+-------+--------+------