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[कहानी का धमाकेदार प्रोमो]
"मुंबई की तंग गलियों की 'आशादीप चॉल' में रहने वाली 18 साल की मासूम नयनतारा, जिसकी बड़ी-बड़ी काली आँखें दुनिया के हर फरेब से अनजान थीं। लेकिन एक काली शाम ने उसकी जिंदगी का रुख हमेशा के लिए बदल दिया।
जब कर्ज वसूलने के लिए मुंबई के सबसे खौफनाक और ताकतवर 'अग्निहोत्री ब्रदर्स' (रुद्र, भीम, अर्जुन और नकुल) उसके दरवाजे पर आए, तो पैसों के बदले नयनतारा के बेबस पिता ने एक ऐसा सौदा किया जिसने उसकी रूह कंपा दी— 'मैं पैसे तो नहीं दे सकता... लेकिन... मेरी बेटी...'
क्या यह सिर्फ एक मजबूर लड़की की बर्बादी की शुरुआत है, या फिर इस डार्क रोमांस के खेल में नयनतारा इन चारों बेरहम भाइयों की तकदीर बदल देगी?" अभी अपनी लाइब्रेरी में जोड़ें (Add to Library) और इस खतरनाक सफर का हिस्सा बनें!
अध्याय 1: गुनाह का सौदा
नयनतारा की दुनिया हमेशा से छोटी और सिमटी हुई थी। 18 साल की, दुबली-पतली काया, 5 फुट 3 इंच की औसत ऊंचाई, गेहुंआ रंग, और हमेशा चमकती बड़ी-बड़ी काली आंखें जो दुनिया की हर बुराई से अनजान थीं। उसके बाल कमर तक आते थे, रेशमी और काले, जिन्हें अक्सर वो एक चोटी में बांधे रखती थी। उसकी मासूमियत ऐसी थी कि सड़क पर चलता कोई भी उसे देखकर एक पल के लिए रुक जाता। वह मुंबई के उन पुराने, तंग मोहल्लों में से एक में रहती थी जहाँ सूरज की रोशनी भी मुश्किल से पहुँचती थी, 'आशादीप चॉल' - एक विडंबनापूर्ण नाम, क्योंकि आशा की कोई किरण वहाँ मुश्किल से ही टिक पाती थी।
हाल ही में, उसकी मां, सुमित्रा देवी, एक लंबी बीमारी से जूझते हुए चल बसी थीं। उनकी मौत ने नयनतारा और उसके पिता, माधव राव, के बीच एक अजीब सी खामोशी भर दी थी। माधव राव, एक मिल मजदूर, अपनी पत्नी के इलाज के लिए बड़े-बड़े कर्जों में डूब गए थे। नयनतारा ने अभी-अभी अपनी 12वीं की परीक्षा पूरी की थी, और उसके सपनों में आगे की पढ़ाई और एक अच्छी नौकरी थी, ताकि वह अपने पिता का सहारा बन सके।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
आज शाम चॉल में अजीब सी हलचल थी। कुछ भारी-भरकम, काले रंग की गाड़ियाँ चॉल के संकरे रास्ते पर आकर रुकीं, जिससे बच्चों के खेल और पड़ोसियों की बातचीत अचानक थम गई। उनमें से चार लोग बाहर निकले। उनकी मौजूदगी से हवा में एक अजीब सा तनाव फैल गया, जैसे शहर का अंधेरा और गहरा गया हो।
यह थे अग्निहोत्री भाई।
सबसे बड़ा, रुद्र अग्निहोत्री, लगभग 32 साल का, 6 फुट 2 इंच लंबा, गठीला बदन। उसकी आँखें कोयले सी काली और इतनी तीखी थीं कि उनसे नज़र मिलाना भी मुश्किल था। उसके चेहरे पर हमेशा एक हल्की सी क्रूर मुस्कान रहती थी, जो उसके खतरनाक इरादों को छुपाती थी। वह भाइयों में सबसे शांत और सबसे कैलकुलेटिव था, लेकिन जब वह क्रोधित होता, तो शहर थर्रा उठता।
दूसरा, भीम अग्निहोत्री, 30 साल का, 6 फुट 4 इंच का विशाल शरीर, जिसने भी उसे देखा, वह उसकी ताक़त और हैवानियत से वाकिफ था। उसकी आँखें अक्सर लाल रहती थीं, मानो हर पल किसी लड़ाई के लिए तैयार हो। वह सबसे impulsive और सबसे brutal था, लेकिन उसके भीतर कहीं एक वफादारी का ज्वालामुखी भी धधक रहा था।
तीसरा, अर्जुन अग्निहोत्री, 28 साल का, 6 फुट का, आकर्षक और बेहद स्टाइलिश। महंगे सूट और ब्रांडेड घड़ियाँ, वह किसी हॉलीवुड फिल्म के हीरो जैसा दिखता था। लेकिन उसकी चमकती आँखों में एक शातिरपन छुपा था, और उसकी बातों में जहर। वह भाइयों में सबसे चालाक और manipultive था, और अक्सर अपने आकर्षण का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करता था।
और सबसे छोटा, नकुल अग्निहोत्री, 25 साल का, 5 फुट 11 इंच लंबा, भाइयों में सबसे कम उम्र का लेकिन कम खतरनाक नहीं। वह अक्सर शांत और रहस्यमयी रहता था, उसकी आँखें हमेशा कुछ ढूंढती रहती थीं। वह एक तरह का tech-wiz था, और भाइयों के लिए सूचनाओं और नेटवर्क का काम संभालता था। उसमें एक अजीब सा जुनून और तीव्रता थी, जो उसे बाकियों से अलग बनाती थी।
मुंबई शहर इन चारों भाइयों से कांपता था। उनके नाम पर हज़ारों अवैध धंधे चलते थे, और उनकी एक झलक भी किसी को मौत के करीब लाने के लिए काफी थी। उनके लिए पैसा पानी जैसा था, और सत्ता उनकी गुलाम।
आज वे माधव राव के दरवाजे पर थे।
दरवाजे पर एक जोरदार दस्तक हुई। नयनतारा जो अपनी टूटी कुर्सी पर बैठी एक पुरानी किताब पढ़ रही थी, चौंक गई। उसके पिता ने दरवाजा खोला, और जैसे ही उनकी नज़र अग्निहोत्री भाइयों पर पड़ी, उनका चेहरा पीला पड़ गया।
“माधव राव,” रुद्र की आवाज़ कड़क थी, “तुम्हारे ऊपर हमारा बहुत बकाया है। अब सूद समेत चुकाने का वक्त आ गया है।”
माधव राव हकलाए, “साहब, मैं... मैं कोशिश कर रहा हूँ... बस थोड़ा और वक्त...”
“वक्त?” भीम की भारी आवाज़ गूँजी, “वक्त ख़त्म हो चुका है, माधव। अब तुम्हें कुछ और देना होगा।”
नयनतारा दरवाजे के पीछे खड़ी सब सुन रही थी। उसने कभी अपने पिता को इतना डरा हुआ नहीं देखा था। तभी अर्जुन की नज़र दरवाजे के पीछे से झांकती नयनतारा पर पड़ी। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आई, एक ऐसी चमक जिसे नयनतारा ने पहले कभी नहीं देखा था। उसके चेहरे पर एक शिकार को देखने वाली मुस्कान आ गई।
“क्या बात है, माधव राव,” अर्जुन ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मिठास थी जो खौफनाक थी, “यह कौन है? तुम्हारी बेटी? बहुत खूबसूरत है।”
नयनतारा सहम गई। उसकी आँखों में आंसू भर आए। उसे नहीं पता था कि उसकी मासूमियत पर अब किस तरह के साये मंडराने वाले हैं। उसके पिता ने एक बार फिर उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में एक गहरा दर्द था, और फिर एक फैसला। एक ऐसा फैसला जो उसकी पूरी दुनिया को पलट देने वाला था।
“साहब,” माधव राव ने बड़ी मुश्किल से कहा, उसकी आवाज़ में निराशा और हार थी, “मैं पैसे तो नहीं दे सकता... लेकिन... मेरी बेटी...”
नयनतारा की दुनिया एक पल में ढह गई। उसे नहीं पता था कि इस डार्क रोमांस के खेल में वह सिर्फ एक मोहरा बनने जा रही है, या कुछ और…
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"क्या मोड़ आया है कहानी में! अर्जुन की नजरें नयनतारा पर टिक गई हैं, अब आगे क्या होगा? क्या नयनतारा अग्निहोत्री भाइयों के चंगुल में फंसकर रह जाएगी या उसकी किस्मत में कुछ और लिखा है? Like
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