तनुदा का अपहरण - प्रस्तावना Dr. Suryapal Singh द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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तनुदा का अपहरण - प्रस्तावना

नाटक ?
 तकनीकी दृष्टि से नाटकों से अधिक सक्षम माध्यम आज उपलब्ध हैं। महान वृत्तान्तों के साथ स्थानीय चटकीले रंग, संयोजन-विखण्डन, रडार छवि- संस्कृति, अतियथार्थता के बीच नाटकों का स्थान कहाँ है ? इतिहास और साहित्य का अन्त बताने वाले मानवता का भी अन्त घोषित कर चुके हैं। लोग कहते हैं यथार्थ ने कहानी का अन्त कर दिया है। यह सब वैसे ही लगता है जैसे कोई जनपद साक्षर घोषित हो जाता है पर उसमें घुरहू, निबरे के अँगूठाटेक वंशज आराम से घूमते हैं। घटनाएँ घट जाती हैं पर उनकी व्याख्याओं का अन्त नहीं होता है। वर्तमान ही भूत भविष्य को समझने की दृष्टि देता है। पुरानी घटनाएँ भी वर्तमान के सन्दर्भ में ही जीवंत होती हैं। घटनाओं का अर्थ ग्रहीता पर निर्भर है। यदि ऐसा न हो तो घटनाओं का भिन्न-भिन्न अर्थ लोग न ग्रहण कर सकें।
 समाज घटनाहीन कभी नहीं होगा बल्कि तीव्रगति के कारण अननुमेय घटनाएँ भी घट सकती हैं। आपदा प्रबन्धन जीवन का अंग बनेगा। भूतकाल भी घटना विहीन नहीं था। अभिव्यक्ति पर निरन्तर संकट रहे हैं, आज भी हैं। अभिव्यक्ति, संवेदना और आत्मगौरव के रहते भाषा बचेगी। षब्द और संवेदना का अन्त नहीं होगा। नाटक भी रहेगा ही।
 इधर रंगकर्मी कहते रहते हैं कि नाटक नहीं हैं। अच्छे नाटक लिखे नहीं जा रहे हैं। यह बात सच नहीं है। नाटक लिखे जा रहे हैं। अच्छे नाटक भी लिखे जा रहे हैं। अच्छे नाटकों की तलाश, उनपर काम करने की प्रवृत्ति घटी है। ‘उपयोग करो और फेंक दो’ संस्कृति के साथ तात्कालिकता हावी होती जा रही है। शब्दों को पढ़ना, उन्हें समझना, उनके अनुरूप अभिनय करना श्रम साध्य कर्म है। रंगकर्मियों के बीच एक षब्द का प्रयोग बढ़ गया है- इम्प्रोवाइजेशन जिसका अर्थ ही है तात्कालिक काम चलाऊ प्रबन्ध। जब नाटककर्मी काम चलाऊपन पर उतर जाएगा तो नाटयाभिनय कितना गहरे उतरेगा, इसे सोचा जा सकता है। अपने श्रम को बचाने के लिए रंगकर्मी कहता रहता है कि अच्छे नाटक नहीं हैं, मैंने किसी तरह कोई जुगाड़ किया है। कितने उत्तम जुगाड़ से मैं आपके सामने उपस्थित हुआ हूँ ? अच्छे रंगकर्मी शब्दों के भावों में उतरते हैं। नाटक का मर्म भी तभी उभर कर आता है। रंगकर्मी को कभी-कभी तात्कालिक प्रबन्ध करना पड़ता है। इसे मैं अच्छी तरह अनुभव करता हूँ पर यही उद्देश्य बन जाए यह उचित नहीं है।
 इधर कुछ वर्षों से कहानी, कविता के नाटयाभिनय अधिक प्रचलित हुए हैं पर यहाँ भी कामचलाऊपन और गम्भीर प्रयास में अन्तर करना होगा। एक ओर हम रचना के पाठ, पुनःपाठ पर बल दे रहे हैं दूसरी ओर नाट्याभिनय में शब्दों पर ध्यान न देना कहीं भी संगत नहीं है। सरल मार्ग पर चलने की प्रवृत्ति बढ़ी है पर अधिक प्रभावी अभिनय के लिए गहन प्रयास करने की आवश्यकता होती है। इसमें आंगिक अभिनय के साथ ही शब्द साधना महत्त्वपूर्ण है। नाटक एक स्वतंत्र विधा है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के साथ, उसके बीच एवं पूरक के रूप में नाटक की उपस्थिति है। स्थानीयता से उभर नाटक वैश्विकता को आत्मसात करता है, अपनी पूरी धमक के साथ। विविधता का पोषक है नाटक। मानवीय अस्तित्व के साथ ही नाटक जुड़ा है। नाटक लोकभावना, वृत्ति एवं जीवन का प्रतिबिम्ब ही नहीं लोक चेतना का वाहक है। कितने नाटक किन रूपों में दुनिया में कहाँ-कहाँ होते हैं ? इसकी गणना करना अत्यन्त कठिन है।  
 नाटक में टेक-रिटेक का अवसर नहीं है। इसीलिए थोड़ी कठिन विधा है। दर्शक सीधे आपके सामने हैं। उत्तम अभिनय पर तुरन्त तालियाँ भी बजती हैं और खराब प्रदर्शन पर निशेधात्मक टिप्पणियाँ भी। यही नाटक का आनन्द भी है। चौराहे-गली से लेकर वातानुकूलित प्रेक्षागृहों तक नाटक किए जा रहे हैं। नुक्कड़, मंचीय नाटक, आँगन मंच, एकल प्रदर्शनों से नाटकों की परिधि और गहनता का विस्तार ही हुआ है। लोक नाट्य की तो पूरी एक परम्परा ही है।
 वैश्विकता का दबाव, एक धु्रवीय विश्व की स्थिति, मानवीय अधिकारों, जीविका का संकट, ग़रीब-अमीर की बढ़ती खाई, लोकतंत्र का माफिया तंत्र में बदलाव, बाहुबल, मुद्रा, दिमाग़ का गठजोड़, समाजहित पर स्वहित का आधिपत्य वतर्मान समाज को कस रहे हैं पर दूसरी अन्तर्धारा भी दिखती है जहाँ व्यक्ति लँगड़ाते ही सही खड़े होने का प्रयास करता है, सबल शोषक की पहचान करने लगा है, विश्व की शक्तिशाली शक्तियों के ग़लत निर्णयों के सामने खड़ा हो रहा है, स्वाभिमान रैलियाँ निकालकर अपनी उपस्थिति का एहसास करा रहा है। मानव गरिमा अँगड़ाई लेती है तो उस पर चोट भी अधिक की जाती है। आज का समाज वही नहीं है जो पचास वर्ष पहले था। गति के साथ जटिलता भी बढ़ी है। करवटें लेता भविष्य में
 ठूँठ में भी कोंपलों की आशा लिए चल रहा है। साहित्य के साधक को इनके अन्दर धँसना होता है। नाटककार परिवेश के द्वन्द्व को उभारने का प्रयास करता है। वह औषधि नहीं देता। वह रोग का निदान करने लायक बना देता है, व्यक्ति औषधि खोज लेता है, उसे दिशा मिलती है। संग्रह के इन नाटकों में जन समस्याओं का उभार देखा जा सकता है। सही प्रश्न सामने उभर कर आते हैं। वे सही उत्तर की ओर इंगित करते हैं। इन नाटकों में आप ज्वलन्त प्रश्नों से रूबरू होंगे।
 ‘तनुदा का अपहरण’ मेरा दूसरा नाट्य संकलन है। इसके पूर्व ‘गीत गाने दो मुझे’ 1996 में पूर्वापर द्वारा ही प्रकाशित हुआ था। इस संकलन में ‘तनुदा का अपहरण’, टिंकू हाज़िर हो, ‘दियना जलाओ,’ ‘पागल’, ‘दराज़’ एकांकी हैं। ‘फुटपाथिया’ ‘घर’, ‘आज़ादी की पौध’ पूर्ण नाटक हैं। ‘परतों के बीच’ जिसकी प्रथमावृत्ति 1975 में हुई थी द्वितीय आवृत्ति इस संकलन में संगृहीत है। रंगकर्मी बहुत दिनों से इसकी माँग कर रहे थे।
 संविकास की ओर से गोण्डा में 2002 से प्रतिवर्ष नाट्यपर्व का आयोजन किया जा रहा है। इनमें से ‘पागल,’ ‘दराज़’ ‘आज़ादी की पौध’ को छोड़कर सभी नाटकों का मंचन रीतेश श्रीवास्तव, देवव्रत सिंह, शहनवाजुद्दीन खाँ, शैलेश श्रीवास्तव, सुनील सोनी, प्रदीप शर्मा, अभिशेक सामन्त, अशोक पाण्डेय, प्रियव्रत, मीनाक्षी, शिप्रा, बबिता ने अथक प्रयास कर सम्पन्न किया। सभी बच्चे अपने जीवन में प्रगति करें, यही कामना है।
 कम्प्यूटर पर अक्षर संयोजन में प्रमोद कुमार सिंह एवं विजय शंकर श्रीवास्तव का योगदान अप्रतिम रहा। रघुवंशी प्रिंटर्स का निरन्तर सहयोग प्रेरणा देता है। सभी के उत्तम भविश्य की शुभ कामना करते हुए यह संकलन सामान्य जन को समर्पित कर रहा हूँ।

दिनांकः 2 फरवरी 2006 
   (डा0 सूर्यपाल सिंह)
 वसन्त पंचमी निकट प्रधान डाकघर 
      सिविल लाइन्स गोण्डा,
         271 001 

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तनु दा का अपहरण
    
पात्र-

 तनु - युवा जननेता
 जुत्शी - तनु का सहयोगी
 कत्ती - गाँव का युवक/प्रदर्शनकारी
 डेविड - कारखाने के प्रबन्ध तंत्र का सदस्य
 उदीप - कारखाने का जनसम्पर्क अधिकारी

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