आज से काफी दशक पहले यमलोक में भ्रमण करते हुए यमराज को यमलोक कि कार्यशैली में कुछ दिक्कतें दिखाई पड़ी , कि कैसे पृथ्वी लोक से आने वाली आत्माओं के आधे-अधूरे कागज़ हैं, पिता के नाम की वर्तनी हर कागज़ के साथ बदल जाती है, यमलोक में एंट्री फीस का भी कोई प्रावधान नहीं है, पृथ्वी लोक के पंडितों से ज़्यादा तो वहाँ के ढोंगी कमा लेते हैं और बचा-कुचा कर्मकांड से कमाया हुआ फंड यमलोक ट्रांसफर कर देते हैं, इस आधुनिक ज़माने में आज भी यमलोक में आउटडेटेड कंप्यूटिंग का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस सब को देख यमराज बड़ी चिंता में पड़ गए और मन ही मन उदास हो गए कि अब करें तो करें क्या, तभी उनके जूनियर चित्रगुप्त वहाँ प्रकट हुए और अपने बॉस को दुखी देख उनसे पूछते हैं-कि हे प्रभु आप किस व्यथा में हैं ? अपने इस तुच्छ सेवक को बताइए वह पुष्पक विमान की सी गति से उसका हल कर देगा। यमराज ने कुछ क्षण समय लिया और फिर बोले चित्रगुप्त यमलोक आउटडेटेशन जैसी बड़ी परेशानी झेल रहा है, मुझे तो समझ नहीं आता हम समय के साथ कैसे चल पाएंगे। चित्रगुप्त हल्की सी मुस्कान के साथ बोले अरे प्रभु ! बस इतनी सी बात इसका हल तो मेरे हाथ में पड़ी इस फाइल के अंदर रखे प्रपोज़ल में है। यमराज के चेहरे की चमक कुछ लौटी, उन्होंने बड़ी उत्सुकता से कहा, बताओ चित्रगुप्त क्या है इस प्रपोज़ल में। प्रभु इस फाइल में यमलोक की एक नई ब्रांच जो कि पृथ्वी पर होगी उसका प्रपोज़ल है। यमराज चौंके पर फिर भी उन्होंने अपने प्रश्न जारी रखे, पृथ्वी पर यमलोक की ब्रांच ये कैसे संभव है? चित्रगुप्त हवा में एक चुटकी बजाकर एक और फाइल को प्रकट करते हैं, ये देखिए प्रभु ये है आउटडेटेशन से बचने का तरीका। आज से करीब एक हफ्ते पहले मैंने पृथ्वी पर यमलोक के कुछ इंटर्न्स को बायोडाटा कलेक्ट करने भेजा था कि कौन पृथ्वीलोक पर हमारी सहायता कर सकता है यमलोक की नई ब्रांच खोलने के लिए वहाँ से ढेरों बायोडाटा आए, अधिक तो फर्स्ट फेज में ही रिजेक्ट हो गए पर हमने कर दिखाया प्रभु, हमें एक कैंडिडेट ऐसा मिला जिसकी टक्कर का कोई नहीं- ' एक आर्किटेक्ट नेता '। बताइए क्या तो लीला है ब्रह्मांड की, नेता दिया तो दिया पर उसके साथ वह आर्किटेक्ट भी, अब ना तो पृथ्वी लोक पर हमें हर सरकारी ऑफिस में बिल्डिंग के क्लियरेंस के लिए दर-दर भटकना पड़ेगा और नक्शा भी मुफ्त में बन जाएगा। यमराज ये सब सुनकर बेहद प्रसन्न हुए, उन्होंने कहा चित्रगुप्त तुम्हारा पाँच प्रतिशत इंक्रीमेंट पक्का है। चित्रगुप्त को तो कुछ ज़्यादा की दरकार थी पर बॉस के आगे तो क्या ही मुँह खोले। यमराज ने उस आर्किटेक्ट नेता से मीटिंग जल्दी से फिक्स कराने की बात करी, कहा उन्हें अतिशीघ्र यहाँ बुलाया जाए। कुछ ही घंटों बाद उस आर्किटेक्ट नेता का आगमन यमलोक में हुआ। यमलोक मे बोर्ड मीटिंग से पहले उन्हें एक प्रेजेंटेशन बनाने को कहा गया ताकि वह अपने विचार को सही तरीके से प्रस्तुत कर पाए। फिर क्या था, किसी सरकारी दफ्तर की तरह उन्हे इंतज़ार कराया गया- काफी इंतज़ार कराया गया,बहुत ज़्यादा इंतज़ार कराया गया, कुछ लंबी उबासीयों के बाद एक अप्सरा उनके समीप प्रकट हुई उन्हें बोर्ड रूम तक ले जाने के लिए। वहाँ यमराज अपने सिंहासन पर बैठे थे, चित्रगुप्त उनसे नीची कुर्सी पर और उनसे नीचे इत्यादि - इत्यादि बोर्ड मेंबर्स। यमराज ने आर्किटेक्ट नेता का स्वागत करते हुए उन्हें एक बड़ी सी स्क्रीन के पास लगी कुर्सी पर बैठने को कहा और अपने लैपटॉप से स्क्रीन कनेक्ट करके प्रेजेंटेशन को प्रस्तुत करने का आदेश दिया। आर्किटेक्ट नेता ने बड़ी उत्सुकता से प्रेजेंटेशन शुरू की- “ माननीय यमराज जी एवं सभी बोर्ड मेंबर्स को मेरा नमस्कार , आधुनिकीकरण के इस दौर में जहाँ ये ब्रह्मांड भागता हुआ सा दिखता है, वहाँ आज भी यमलोक किसी कछुए की सी चाल के साथ आगे बढ़ रहा है। पर ये सब अब जल्दी ही खत्म हो जाएगा क्योंकि मैं यहाँ आ चुका हूँ। ये है मेरा मास्टर प्लान - एक पाँच हजार एकड़ मे फैला 793 कर्मचारियों और उनके परिजनो को बसाने योग्य कब्जाई हुई कृषि भूमि पर बना आधुनिक यमलोक द्वितीय। इस कृषि भूमि को नॉन-सस्टेनेबल तरीकों से डेवलप कराया जाएगा। इसके पाँच सौ एकड़ में एक सौ मंज़िला इमारत जो कि केंद्रीय ऑफिस स्पेस होगी, जिसके चारों ओर हरियाली का खास ध्यान रखा जाएगा। यहाँ विश्व की सबसे स्वच्छ ऑक्सीजन, डक्ट द्वारा सीधा स्विट्ज़रलैंड की पहाड़ियों से पहुँचाई जाएगी। कर्मचारियों के मस्तिष्क सही तरीके से काम करें उसके लिए भोजन मिशेलिन के पाँच सितारा बावर्ची बनाएंगे। कर्मचारियों के मनोरंजन का भी बहुत ख्याल रखा जाएगा जैसे - स्विमिंग पूल, स्टेडियम, मल्टीप्लेक्स, कॉन्सर्ट हॉल जैसी मामूली सुविधाएं। इसी के साथ कर्मचारियों के लिए एक हाउसिंग सोसाइटी भी बनवाई जाएगी जो कर्मचारियों को उनके परिवारों के समीप रखेगी। इस यमलोक सिटी में उनके बच्चों के लिए वर्ल्ड क्लास स्कूल, कॉलेज फैसिलिटीज़ होंगी। जॉब ऑपर्चुनिटीज़ के लिए भी किसी परिजन को कोई तनाव नहीं लेना पड़ेगा क्योंकि यहाँ इस शहर में वह बैठ कर खाने के साथ, मौज उड़ा सकते है ,अब इतनी सारी सुविधाएं देंगे तो कुछ काम भी तो करना पड़ेगा। तो मृत्यु की प्रक्रिया को सरल बनाते हुए और पृथ्वी लोक से बोझ हटाते हुए वीकली टार्गेट्स को पूरा करने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ों की कटाई करी जाएगी ताकि ये आम इंसानी कीड़े जल्दी यमलोक सिधारें। सड़कों पर गड्ढे किए जाएंगे ताकि एक्सीडेंट की संभावना बढ़ सके। इसमें बिजली के तारों को नग्न अवस्था में छोड़ देना भी शामिल रहेगा। कुछ नेताओं और मज़बूत लोगों के भाई-भतीजों को भी समाज में छोड़ दिया जाएगा ताकि वो इत्मीनान से चलते हुए किसी स्वच्छ सरल इंसान की जान ले सके, उनकी बहन-बेटियों को छेड़ सके। पेपर लीक पर खूब ज़ोर दिया जाएगा ताकि युवाओ को भी मरने का समान्तर अवसर मिले, इस सब से मरण के दर में वृद्धि होगी ,अवैध हाउसिंग, प्रदूषण, गृहयुद्ध, जातीय लड़ाई जैसी कई संगीन तरकीबें हैं जो मेरे कर्मचारियों द्वारा आपको प्राप्त कराई जाएंगी। ये सब हमारी प्लैटिनम स्कीम 'रोटी, कपड़ा और मकान दूषित कराओ योजना' में सम्मिलित है। इस सब की लागत मात्र एक सौ एक डॉलर का शगुन है, बाकी सब जनता से ही मृत्यु टैक्स के नाम पर वसूल लिया जाएगा। बाकी आपके सुझाव के लिए I am open for considerations and negotiations धन्यवाद।” ये सब सुनने के बाद आर्किटेक्ट नेता को लगा होगा कि उसे तालियों के गर्जन को सहना पड़ेगा, उसके पास दो-चार अप्सराएं माला लेकर आएंगी, उसे उपहारों और मिठाइयों से भर दिया जाएगा। पर उसे सामना करना पड़ा क्रोध से लाल यमराज का , ये कैसे वचन बोले है तूने क्या समझा है तूने मुझको ये सब पाप है , इंसानो से उनके जीने का सहारा छीन लूँ ये वायु , ये जल , ये जीवन सब तो छीन लिया तूने बस यमलोक बनाने के लिए। चित्रगुप्त ,ये है तुम्हारा चुनाव ? इस पापी का वध मे अभी कर दूँ पर मै बाधित हूँ समय के कारण तेरा जीवन समाप्त होने मे अभी समय है ,नही तो मै क्षण भर भी तूझे यहाँ न खड़े होने देता । मेरा कार्य जीवो के प्राण यहाँ लाना है, उनके प्राणों को छीनने के लिए वजह बनाना मेरा कार्य नही। चला जा यहाँ से ,कही मैं समय की गरिमा न भूल जाऊँ। आर्किटेक्ट नेता को यमलोक से धक्के देकर भगा दिया गया। यमराज भी कुछ क्षण में शांत हो गए, उन्होंने आधुनिकीकरण के विचार को कहीं दूर फेंक दिया और चित्रगुप्त को कहा-जैसा चल रहा है चलने दो, पर उस नेता के सीने में जलती रही प्रतिशोध की आग। वह मन ही मन दोहराता रहा अपने अपमान को। फिर क्या था-वह पृथ्वी लोक पहुँचा। अब तो उसे पता था कि उसे मृत्यु की चिंता नहीं क्योंकि उस पर बहुत समय है। तो उसने अपने विचारों को हकीकत में बदलने के लिए अपना खून-पसीना एक कर दिया ताकि वह समय को और पीछे छोड़ अमर हो सके समस्त विश्व के विचारों में और शायद वह सफल भी हुआ अपने कार्य में, या नहीं भी इस प्रश्न का उत्तर मै आपके लिए छोड़ता हूँ। तो अपनी नज़र इधर-उधर दौड़ाइए क्या आपको दिखाई पड़ा यमलोक द्वितीय?