अकथ - भाग 4 silent script द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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अकथ - भाग 4

‎सुबह की पहली किरण के साथ ही अवनी के सर में एक अजीब सा दर्द था। भारी मन से उसने फोन उठाया और अपने बॉस का नंबर डायल किया।


‎"हेलो सर, मुझे आज एक दिन की छुट्टी चाहिए थी। मेरी तबीयत ठीक नहीं है," अवनी ने ढीली आवाज़ में कहा।


‎उधर से बॉस की कड़क आवाज़ आई, "क्या? छुट्टी? अवनी, ऑफिस में पहले ही काम का पहाड़ खड़ा है और तुमने कल की जरूरी फाइल भी अभी तक नहीं भेजी है। आज तो तुम्हें आना ही पड़ेगा।"


‎"लेकिन सर, प्लीज... बस आज आज की बात है," अवनी ने मिन्नत की।


‎बॉस का पारा चढ़ गया, "देखो अवनी, अगर इतनी ही छुट्टी लेनी है तो हमेशा के लिए ले लो। कल से ऑफिस आना ही बंद कर दो!"


‎अवनी ने कड़े शब्दों में कहा, "हाँ सर, बिल्कुल सही कहा आपने। मुझे यह काम बहुत पहले ही कर देना चाहिए था। मैं अभी अपना इस्तीफा भेज रही हूँ!"
‎बिना बॉस का जवाब सुने, अवनी ने फोन काट दिया।


‎बॉस से बहस करने और नौकरी छोड़ने के बाद, अवनी का दिमाग फटा जा रहा था। गुस्से में इस्तीफा तो दे दिया था, लेकिन अब अपनी अंधी माँ की जिम्मेदारी का ख्याल उसे अंदर ही अंदर डरा रहा था। इसी घबराहट में उसके कदम शहर के एक जाने-माने थेरेपिस्ट के क्लिनिक की तरफ बढ़ गए।


‎केबिन के अंदर कदम रखते ही हल्की खुशबू और शांत माहौल ने अवनी को थोड़ा सुकून दिया। वह सामने रखी आरामदायक कुर्सी पर बैठ गई।


‎सामने बैठे करीब 48 साल के डॉक्टर मेहरा ने अपना चश्मा ठीक करते हुए अवनी के चेहरे के तनाव को पढ़ा और मुस्कुराकर कहा, "हाँ अवनी, बताओ... क्या परेशानी है?


‎अवनी ने पहले ही सोच रखा था कि वह एक्सीडेंट वाली बात डॉक्टर को बिल्कुल नहीं बताएगी। उसने बात छुपाने के लिए एक झूठा बहाना बनाने की कोशिश की,

"वो... डॉक्टर साहब, असल में ऑफिस में काम का बहुत प्रेशर है। बॉस से भी आज लड़ाई हो गई और मैंने जॉब छोड़ दी। बस इसी वजह से कई दिनों से नींद नहीं आ रही और अजीब-अजीब से ख्याल आते हैं।"


‎डॉक्टर मेहरा ने पेन को टेबल पर रखा और बोले, "अवनी,  काम का प्रेशर और नौकरी छूटना तुम्हें परेशान जरूर कर सकता है, लेकिन तुम्हारी आँखों में जो खौफ है, वह किसी बहुत बड़े सदमे का है। तुम मुझसे झूठ बोल रही हो।"


‎ये सुनकर अवनी डर गई। डॉक्टर मेहरा ने कहा,
‎ "देखो अवनी, चिंता मत करो। अगर तुम यह सोचकर सच नहीं बोल पा रही हो कि मैं तुम्हारी प्रॉब्लम को जज करूँगा या तुम्हें गलत समझूँगा, तो तुम बिल्कुल गलत हो। मेरे पास रोज़ ऐसे बहुत से लोग आते हैं जिनकी परेशानियाँ चाहे कितनी भी अजीब या डरावनी हों, मेरा काम उन्हें जज करना नहीं, ठीक करना है। जो भी चीज़ तुम्हें अंदर से खा रही है, उसे बाहर निकालना बहुत ज़रूरी है।"


‎डॉक्टर की बातों के भरोसे ने अवनी के सब्र का बांध तोड़ दिया। उसकी आँखों से आँसू छलक आए।
‎उसने रोते हुए कहा, "डॉक्टर... मेरे अंदर एक ऐसा सच दबा है जो जिसे मैं चाहकर भी किसी से कह नहीं सकती, बयां नहीं कर सकती।"


‎डॉक्टर मेहरा ने उसे पानी का ग्लास दिया और कहा, "तुम्हें कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है अवनी। बस शांत हो जाओ।"


‎डॉक्टर मेहरा ने अवनी को बिना बताए हिप्नोथेरेपी  शुरू कर दी ताकि वह बिना डरे सच का सामना कर सके। उन्होंने अपनी घड़ी की टिक-टिक और एक गहरी, शांत आवाज़ में अवनी को अपनी आँखें बंद करने को कहा।

अवनी को नहीं पता था कि यह क्या है, लेकिन जैसे ही उसने अपनी आँखें बंद कीं, उसका दिमाग एक गहरे ट्रांस में चला गया।


‎और तभी... 
‎जो यादें डर की वजह से धुंधली थीं, वो शीशे की तरह साफ़ हो गईं। अवनी को धीरे-धीरे सब याद आने लगा।


उसने देखा कि जब वह गरीब बच्चा बेंच ...की तरफ जा रहा था। तब सड़क के दूसरी तरफ खड़ा एक आदमी सीधे बच्चे की तरफ हाथ से इशारा कर रहा था!

और ठीक उसी पल, सामने से आती कार ने बच्चे को देखकर अपनी स्पीड और बढ़ा दी थी। वह कोई हादसा नहीं था, वह एक सोची-समझी साज़िश थी!