दी किंग ऑफ अंडरवर्ल्ड - 5 devil द्वारा क्राइम कहानी में हिंदी पीडीएफ

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दी किंग ऑफ अंडरवर्ल्ड - 5

अब शिवपुर दो हिस्सों में बँट चुका था।
कुछ लोग अर्नब को राक्षस कह रहे थे।
कुछ लोग मसीहा।
क्योंकि जिन गलियों में राजू भाई के आदमी रोज वसूली करते थे…
वहाँ अब सन्नाटा था।
दुकानदार पहली बार बिना डर दुकान खोल रहे थे।
लेकिन डर खत्म नहीं हुआ था।
डर ने बस नया चेहरा पहन लिया था।
रात 2 बजे।
शिवपुर का “लाल पुल” इलाका।
यह शहर का सबसे गंदा हिस्सा था।
नशा… जुआ… सुपारी… सब यहीं चलता था।
और आज रात यहाँ एक बड़ी डील होने वाली थी।
सुल्तान मिर्ज़ा के आदमी हथियारों की खेप लेने आने वाले थे।
पुरानी फैक्ट्री के अंदर करीब पंद्रह लोग मौजूद थे।
टेबल पर AK-47 और पैसों से भरे बैग रखे थे।
“सामान पूरा है?”
“हाँ।”
“पैसे?”
“पहले माल चेक होगा।”
तभी…
फैक्ट्री की सारी लाइट अचानक बंद हो गई।
पूरा हॉल अंधेरे में डूब गया।
“अबे क्या हुआ?!”
“जनरेटर चालू करो!”
अचानक ऊपर कहीं से आवाज़ आई—
टक…
टक…
टक…
जैसे कोई लोहे पर धीरे-धीरे चल रहा हो।
सभी ने हथियार निकाल लिए।
एक आदमी चिल्लाया—
“कौन है बे?!”
अंधेरे में सिर्फ साँसों की आवाज़ थी।
फिर…
धाँय!!
गोली चली।
एक आदमी की खोपड़ी उड़ गई।
“घेरो उसे!!”
धाँय! धाँय! धाँय!!
चारों तरफ गोलियाँ चलने लगीं।
लेकिन सामने कोई नहीं था।
अंधेरा…
और मौत।
एक आदमी डरते हुए बोला—
“भ… भाई ये इंसान नहीं है…”
तभी उसके पीछे कोई खड़ा हुआ।
उसने पलटकर देखा—
अर्नब।
चेहरे पर खून के छींटे।
आँखें बिल्कुल ठंडी।
उस आदमी के कुछ समझने से पहले—
चक्!
चाकू सीधे उसके गले में उतर गया।
खून उसके मुँह से बहने लगा।
अर्नब ने उसे धीरे से नीचे गिराया।
फिर अंधेरे में गायब हो गया।
बाकी लोग अब घबरा चुके थे।
“बाहर निकलो!!”
“भागो!!”
लेकिन जैसे ही दो आदमी गेट तक पहुँचे—
धड़ाम!!
बाहर खड़ी SUV में विस्फोट हो गया।
आग की लपटें पूरी फैक्ट्री में फैल गईं।
अब लोग चीख रहे थे।
भाग रहे थे।
मर रहे थे।
और उन सबके बीच…
अर्नब धीरे-धीरे चलता हुआ आगे बढ़ रहा था।
जैसे मौत खुद चल रही हो।
एक आदमी ने पीछे से हमला किया।
अर्नब झुका…
उसका हाथ पकड़ा…
और पूरी ताकत से मशीन पर दे मारा।
चर्रररर!!
मशीन में हाथ फँसते ही आदमी दर्द से चीख उठा।
अर्नब उसके कान के पास झुका।
“गलत जगह काम कर ली।”
फिर मशीन चालू कर दी।
आदमी की चीख पूरी फैक्ट्री में गूँज उठी।
बाकी लोग डर से जड़ हो चुके थे।
तभी ऊपर लगे स्पीकर से आवाज़ आई—
“सुल्तान को बोलना…”
सबने ऊपर देखा।
अर्नब आग के बीच खड़ा था।
“शिवपुर अब बदल रहा है।”
उसकी आँखों में आग की परछाईं चमक रही थी।
“…और जो नहीं बदलेगा।”
उसने बंदूक उठाई।
धाँय!!
एक और आदमी गिर पड़ा।
“वो जिंदा नहीं बचेगा।”
अगली सुबह।
पूरा शहर फैक्ट्री ब्लास्ट की खबर से दहल चुका था।
टीवी चैनल चीख रहे थे—
“15 लोगों की मौत!”
“क्या शिवपुर में गैंग वॉर शुरू हो चुकी है?”
“पुलिस अब तक नाकाम!”
पुलिस मुख्यालय।
ACP कबीर राठौड़ जलती फैक्ट्री की तस्वीरें देख रहा था।
एक constable बोला—
“सर… कोई normal criminal ऐसा नहीं कर सकता।”
कबीर ने धीरे से जवाब दिया—
“हाँ।”
“तो फिर?”
कबीर की आँखें स्क्रीन पर टिक गईं।
“ये आदमी डर को हथियार बना रहा है।”
उसने अर्नब की धुंधली फोटो उठाई।
“और सबसे खतरनाक बात पता है क्या है?”
“क्या सर?”
कबीर की आवाज़ भारी हो गई।
“उसे इसमें मज़ा आने लगा है।”
कमरे में खामोशी फैल गई।
उसी समय।
शहर से दूर।
एक पुराने चर्च के पीछे।
अर्नब अकेला बैठा था।
उसके हाथ पर गोली का हल्का जख्म था।
समर बाइक लेकर वहाँ पहुँचा।
उसने चारों तरफ की खबरें देख ली थीं।
“तू पागल हो चुका है।”
अर्नब चुप रहा।
समर गुस्से में बोला—
“पंद्रह लोग मार दिए तूने!”
“सत्रह।”
समर सन्न रह गया।
अर्नब ने शांत आवाज़ में कहा—
“दो बाहर भी थे।”
कुछ सेकंड तक सिर्फ हवा की आवाज़ रही।
समर धीरे से बोला—
“तू आखिर चाहता क्या है?”
अर्नब की नजर दूर शहर पर थी।
शिवपुर की चमकती लाइट्स…
अंधेरे में डूबा शहर।
फिर उसने धीरे से कहा—
“जब डर बहुत पुराना हो जाए…”
उसकी आँखों में अजीब सन्नाटा उतर आया।
“…तो उसे खत्म नहीं करते।”
वो हल्का सा मुस्कुराया।
“उससे बड़ा डर बना देते हैं।”