”
शिवपुर अब सोता नहीं था।
रात होते ही सड़कें खाली हो जातीं।
दुकानें जल्दी बंद होने लगी थीं।
लोग कहते थे—
“अंधेरा होने से पहले घर पहुँच जाओ…”
क्योंकि अब शहर में सिर्फ गैंग का डर नहीं था।
अब एक नाम का डर था।
अर्नब।
लेकिन जितना शहर उससे डर रहा था…
उतनी ही तेजी से कुछ लोग उसे पसंद भी करने लगे थे।
आजम बाजार में पहली बार वसूली बंद हुई थी।
लाल पुल इलाके में नशे के कई अड्डे खाली पड़े थे।
छोटे गुंडे या तो शहर छोड़ रहे थे…
या किसी नए सहारे की तलाश में थे।
और यही चीज़ सबसे ज्यादा खतरनाक थी।
क्योंकि डर जब उम्मीद बनने लगे…
तब आदमी राजा बन जाता है।
रात।
सुल्तान मिर्ज़ा का गोदाम।
कमरे में धुआँ भरा हुआ था।
सुल्तान चुपचाप बैठा था।
उसके सामने उसके मरे हुए आदमियों की तस्वीरें रखी थीं।
एक आदमी गुस्से में बोला—
“भाई, इजाजत दो… पूरा शहर छान मारेंगे!”
दूसरा बोला—
“उसकी लाश चौराहे पर टाँग देंगे!”
सुल्तान अब भी शांत था।
फिर उसने धीरे से पूछा—
“किसी ने उसका चेहरा साफ देखा?”
सब चुप।
“उसका घर?”
चुप्पी।
“परिवार?”
फिर भी कोई जवाब नहीं।
सुल्तान हल्का सा मुस्कुराया।
“मतलब…”
उसने सिगरेट बुझाई।
“…वो हमसे दो कदम आगे चल रहा है।”
कमरे में तनाव फैल गया।
तभी एक आदमी अंदर आया।
“भाई… खबर मिली है।”
“क्या?”
“पुराने मिल एरिया में उसका आदमी दिखा है।”
सुल्तान ने पहली बार सिर उठाया।
“कौन?”
“समर।”
कुछ सेकंड की खामोशी।
फिर सुल्तान धीरे से हँसा।
“हर शैतान…”
उसने कुर्सी से उठते हुए कहा—
“…किसी न किसी इंसान से जुड़ा होता है।”
उसी रात।
समर अपने छोटे से कमरे में अकेला बैठा था।
टेबल पर शराब की बोतल रखी थी।
उसके हाथ काँप रहे थे।
टीवी पर फैक्ट्री ब्लास्ट की खबर चल रही थी।
मरे हुए लोगों की तस्वीरें…
जलती लाशें…
चीखते लोग।
समर ने टीवी बंद कर दिया।
उसकी साँसें तेज थीं।
उसे पहली बार डर लग रहा था।
अर्नब से।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
ठक… ठक…
“कौन?”
कोई जवाब नहीं।
समर धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ा।
जैसे ही उसने दरवाजा खोला—
धड़ाम!!
तीन आदमी अंदर घुस आए।
सुल्तान के आदमी।
उन्होंने समर को पकड़कर दीवार पर दे मारा।
“कहाँ है अर्नब?!”
समर चिल्लाया—
“मुझे नहीं पता!”
एक आदमी ने उसके पेट में घूँसा मारा।
“झूठ बोलता है!”
उन्होंने कमरे की तलाशी शुरू कर दी।
तभी बाहर से कदमों की आवाज़ आई।
टक…
टक…
टक…
सब रुक गए।
कमरे के बाहर कोई खड़ा था।
धीरे-धीरे दरवाजा खुला।
अर्नब अंदर आया।
काले कपड़े।
चेहरे पर वही शांति।
लेकिन इस बार उसकी आँखें अलग थीं।
बहुत ज्यादा ठंडी।
एक आदमी हँसा—
“आ ही गया तू।”
अर्नब की नजर सीधे समर पर गई।
समर के होंठ फटे हुए थे।
चेहरे पर खून।
कुछ सेकंड तक अर्नब बस उसे देखता रहा।
फिर उसने धीरे से पूछा—
“किसने मारा?”
कमरे में अजीब सन्नाटा फैल गया।
एक आदमी बोला—
“अबे—”
धाँय!!
गोली उसके माथे के बीचोंबीच लगी।
बाकी दो घबरा गए।
“मारो साले को!”
धाँय! धाँय!
गोलियाँ चलीं।
लेकिन अर्नब पहले ही साइड हो चुका था।
वह बिजली की तेजी से आगे बढ़ा।
पहले आदमी का हाथ पकड़ा—
चक्!
कोहनी उल्टी दिशा में मुड़ गई।
आदमी दर्द से चीखा।
अर्नब ने उसकी गर्दन पकड़कर दीवार में दे मारी।
धड़ाम!!
दूसरा आदमी पिस्टल लोड कर ही रहा था कि—
अर्नब ने टेबल उठाकर उसके ऊपर फेंक दी।
आदमी गिर पड़ा।
अर्नब उसके ऊपर पहुँचा।
और बिना एक शब्द बोले…
उसका सिर फर्श पर पटकने लगा।
एक बार।
दो बार।
तीन बार।
जब तक चेहरा पहचान में आना बंद नहीं हो गया।
कमरे में सिर्फ समर की भारी साँसें बची थीं।
अर्नब धीरे-धीरे खड़ा हुआ।
उसके हाथ खून से लाल थे।
समर डरते हुए उसे देख रहा था।
पहली बार…
जैसे वो अपने दोस्त को नहीं पहचान रहा हो।
अर्नब ने उसकी तरफ देखा।
“चल।”
समर की आवाज़ काँपी।
“तू… तू क्या बनता जा रहा है?”
अर्नब कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर धीरे से बोला—
“जो इस शहर को चाहिए।”
उसी समय।
ACP कबीर अपनी जीप में बैठा उसी इलाके की तरफ बढ़ रहा था।
उसके फोन पर सूचना आई थी—
“पुराने मिल एरिया में गोलीबारी।”
कबीर की आँखों में चमक आई।
उसे एहसास हो चुका था।
आज…
वो पहली बार अर्नब के करीब पहुँचने वाला है।