शिवपुर।
एक ऐसा शहर…
जहाँ रातें गोलियों की आवाज़ से शुरू होती थीं और लाशों पर खत्म।
यहाँ लोग नाम से नहीं, गिरोह से पहचाने जाते थे।
कानून सिर्फ दीवारों पर टंगे पोस्टरों में जिंदा था।
असल सत्ता उन लोगों के हाथ में थी जिनके पास बंदूक, पैसा और डर था।
और उन सबमें सबसे बड़ा नाम था — राजू भाई।
आजम बाज़ार उसका इलाका था।
वहाँ बिना उसकी मर्जी के पत्ता तक नहीं हिलता था।
शाम के करीब सात बजे।
पूरा आजम बाज़ार रोशनी से जगमगा रहा था।
दुकानदार ग्राहकों को बुला रहे थे…
ठेलों से उठती मसालों की खुशबू हवा में फैली हुई थी।
तभी दूर से एक सफेद स्कॉर्पियो बाज़ार में दाखिल हुई।
गाड़ी को देखते ही कई दुकानदारों के चेहरे उतर गए।
कुछ ने तुरंत अपनी दराज़ों से पैसे निकाल लिए।
स्कॉर्पियो रुकते ही चार आदमी नीचे उतरे।
किसी ने कुछ नहीं पूछा।
वे सीधे दुकानों पर गए…
और लोग बिना बहस किए पैसे उनके हाथ में थमाने लगे।
इसी बीच एक पुलिस वाला दौड़ता हुआ आया।
वह गाड़ी के पास रुका…
झुककर हाथ जोड़ दिए।
“प्रणाम भाई…”
गाड़ी के अंदर बैठे आदमी ने सिर्फ हाथ से जाने का इशारा किया।
पुलिस वाला सिर झुकाकर वहाँ से चला गया।
पास ही चाय की दुकान पर बैठा एक लड़का ये सब बहुत ध्यान से देख रहा था।
उसकी उम्र मुश्किल से बाईस-तेईस साल होगी।
चेहरे पर अजीब सी शांति थी…
लेकिन आँखों में कुछ खतरनाक।
उसने चाय का आखिरी घूंट पिया…
और स्कॉर्पियो को जाते हुए देखता रहा।
फिर धीरे से उठकर वहाँ से चला गया।
कुछ दिन बाद।
शिवपुर की एक पुरानी बिल्डिंग।
ऊपर की मंज़िल से चीखने की आवाज़ें आ रही थीं।
वही लड़का बिल्डिंग के बाहर पहुँचा।
जैसे ही वह अंदर जाने लगा, दो आदमियों ने उसे रोक लिया।
“कहाँ घुस रहा है?”
“मुझे भाई से मिलना है।”
वह बिना डरे आगे बढ़ा।
तभी एक आदमी ने उसका कॉलर पकड़ लिया।
“रुक… पहले पूछ के आता हूँ।”
वह ऊपर चला गया।
छत पर पहले से कई लोग मौजूद थे।
बीच में दो आदमी घुटनों के बल बैठे थे।
उनके चेहरे सूजे हुए थे… कपड़े खून से लथपथ।
उनके सामने खड़ा था — राजू भाई।
मोटा शरीर… सोने की चेन… हाथ में लोहे की रॉड।
वह एक आदमी को मारते हुए चिल्लाया—
“राजू भाई के खिलाफ जाएगा बे?!”
उसकी आवाज़ सुनकर बाकी सब खामोश खड़े थे।
तभी नीचे से आया आदमी बोला—
“भाई, आपसे मिलने कोई आया है।”
राजू भाई ने सिगरेट का कश लिया।
“ऊपर भेज।”
कुछ सेकंड बाद वही लड़का छत पर आया।
राजू भाई ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
“कौन है तू?”
“अर्नब।”
“क्या काम है?”
अर्नब की आवाज़ बिल्कुल शांत थी।
“मुझे… आप जैसा भाई बनना है।”
एक पल की खामोशी…
फिर पूरी छत हँसी से गूंज उठी।
“साला कल का लौंडा भाई बनेगा!”
“अबे पहले मूँछ तो आ जाए!”
सब उसका मजाक उड़ा रहे थे।
लेकिन अर्नब के चेहरे पर कोई फर्क नहीं पड़ा।
राजू भाई उसके पास आया।
“राजू भाई जैसा बनना है?”
“हाँ।”
“खून कर सकता है?”
अर्नब ने बिना पलक झपकाए कहा—
“कर सकता हूँ।”
राजू भाई मुस्कुराया।
उसने पास रखी टेबल की तरफ इशारा किया।
टेबल पर कई हथियार पड़े थे—
तलवार… चाकू… पिस्टल… बेसबॉल बैट।
राजू भाई ने घुटनों पर बैठे आदमी की तरफ उंगली की।
“कोई भी हथियार उठा… और इसे मार दे।”
छत पर सन्नाटा छा गया।
सबकी निगाहें अर्नब पर टिक गईं।
अर्नब धीरे-धीरे टेबल की तरफ बढ़ा।
उसने एक चाकू उठाया।
फिर उस घायल आदमी की तरफ चलने लगा।
राजू भाई उसके बिल्कुल पास खड़ा था…
चेहरे पर मज़ाक उड़ाती मुस्कान।
अर्नब उस आदमी के सामने रुका।
उसने चाकू उठाया…
जैसे उसका गला काटने वाला हो।
लेकिन अगले ही पल—
चाकू बिजली की तेजी से घूमता है…
और सीधा राजू भाई के गले में धँस जाता है।
“ख… ख…”
राजू भाई की आँखें फट जाती हैं।
पूरा छत सन्न रह जाता है।
एक आदमी चीखते हुए अर्नब की तरफ भागता है।
अर्नब झटके से राजू भाई के गले से चाकू निकालता है—
और उसी आदमी के पेट में घोंप देता है।
दूसरा आदमी गन निकालने ही वाला था कि—
अर्नब चाकू उसकी तरफ फेंकता है।
चाकू सीधा उसकी आँख में जाकर धँस जाता है।
“मारो साले को!!”
छत पर भगदड़ मच जाती है।
उसी पल अर्नब अपनी कमर से पिस्टल निकालता है।
वही पिस्टल…
जो उसने चाकू उठाते वक्त चुपके से छिपाई थी।
धाँय!!
गेट पर खड़ा आदमी गोली लगते ही नीचे गिर जाता है।
अब पूरी छत पर सिर्फ चीखें… गोलियों की आवाज़… और खून था।
और उन सबके बीच—
अर्नब बिल्कुल शांत खड़ा था।
जैसे…
यह सब पहले से तय था।