ऋगुवेद सूक्ति-- (18) की व्याख्या "अक्षैर्मा दीव्य: कृषिमित् कृषस्व" 10/34/13भावार्थ --जुआ मत खेलो, खेती करो।ऋग्वेद का यह मन्त्र द्यूत (जुआ) के दुष्परिणामों से सावधान करता है और परिश्रमपूर्ण जीवन का उपदेश देता है।" अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व"— ऋग्वेद 10/34/13पदच्छेदअक्षैः = पासों से, जुए सेमा = मतदीव्यः = खेलो, जुआ खेलोकृषिम् = खेती, कृषिइत् = हीकृषस्व = करो, अपनाओभावार्थ“जुआ मत खेलो; खेती और परिश्रम का कार्य करो।”विस्तृत व्याख्यायह मन्त्र मनुष्य को अनैतिक एवं विनाशकारी प्रवृत्तियों से दूर रहने की शिक्षा देता है। जुआ व्यक्ति की बुद्धि, धन, परिवार और सम्मान को नष्ट कर सकता है; जबकि कृषि और श्रम जीवन में स्थिरता, समृद्धि और सम्मान लाते हैं। वैदिक दृष्टि में परिश्रमपूर्वक अर्जित धन ही कल्याणकारी माना गया है।ऋग्वेद के “द्यूत सूक्त” (10/34) में जुआरी की मानसिक अवस्था, परिवार की पीड़ा और आर्थिक पतन का अत्यन्त मार्मिक वर्णन मिलता है। यह मन्त्र उसी सूक्त का नैतिक निष्कर्ष है।पूरा श्लोक -- अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्ववित्ते रमस्व बहु मन्यमानः।तत्र गावः कितव तत्र जायातन्मे विचष्टे सविता यमर्हः॥— ऋग्वेद 10/34/13पदच्छेद एवं शब्दार्थअक्षैः = पासों से, जुए सेमा दीव्यः = जुआ मत खेलोकृषिम् इत् कृषस्व = केवल खेती/परिश्रम करोवित्ते रमस्व = अपने धन में संतोष रखोबहु मन्यमानः = उसे बहुत मानते हुए, मूल्यवान समझते हुएतत्र गावः = वहाँ गायें हैंकितव = हे जुआरी!तत्र जाया = वहाँ पत्नी हैतत् मे विचष्टे = यह मुझे बताता/समझाता हैसविता = सविता देवयम् अर्हः = जिसे उचित समझते हैं / जो हितकारी हैभावार्थ“हे जुआरी! जुआ मत खेलो; परिश्रम और खेती करो। अपने परिश्रम से प्राप्त धन में संतोष रखो। उसी में गायें (समृद्धि) हैं, उसी में पत्नी और गृहस्थ-सुख है। यह शिक्षा मुझे कल्याणकारी सविता देव देते हैं।”संक्षिप्त व्याख्यायह मन्त्र वैदिक संस्कृति के कर्मप्रधान आदर्श को प्रकट करता है। इसमें जुए जैसी विनाशकारी प्रवृत्ति छोड़कर कृषि, श्रम और संतोषपूर्ण जीवन अपनाने का उपदेश है। वैदिक ऋषि बताते हैं कि वास्तविक सुख परिवार, श्रम और ईमानदार आजीविका में है; न कि भाग्य-आधारित लोभ में। जाता है। वेदों में प्रमाण --“अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) के समान वेदों में अनेक मन्त्र परिश्रम, कृषि, पुरुषार्थ, सत्कर्म और द्यूत (जुआ) से दूर रहने की प्रेरणा देते हैं। कुछ प्रमुख वैदिक प्रमाण —1. ऋग्वेद 10/34/13अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व।अर्थ — जुआ मत खेलो; खेती और परिश्रम करो।2. अथर्ववेद 7/50/8अक्षाः पराजयं कृण्वन्ति।अर्थ — जुआ (पासे) मनुष्य को पराजित और पतित कर देते हैं।3. ऋग्वेद 10/117/7न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः।अर्थ — जो परिश्रम नहीं करता, देवता भी उसके सहायक नहीं होते।4. यजुर्वेद 40/2कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।अर्थ — कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।5. अथर्ववेद 3/17/4कृषिश्च मे कल्पन्ताम्।अर्थ — मेरी कृषि उन्नत और सफल हो।6. ऋग्वेद 4/57/6सीते वन्दामहे त्वा।अर्थ — हे सीता (हल से बनी कृषि-रेखा/भूमि)! हम तुम्हारा वंदन करते हैं।7. अथर्ववेद 6/142/1कृष्या अन्नं बहु भवति।अर्थ — कृषि से विपुल अन्न उत्पन्न होता है।8. ऋग्वेद 1/89/1भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।अर्थ — हम शुभ वचन सुनें और कल्याणकारी मार्ग अपनाएँ।9. यजुर्वेद 1/1इषे त्वा ऊर्जे त्वा।अर्थ — अन्न और शक्ति की प्राप्ति के लिए कर्म करो।10. ऋग्वेद 10/117/5मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताḥ।अर्थ — आलसी और अविवेकी व्यक्ति का अन्न व्यर्थ जाता है।इन वैदिक मन्त्रों का समष्टि-संदेश यह है कि —जुआ, आलस्य और भाग्यवाद विनाशकारी हैं।कृषि, श्रम, कर्म और संतोष ही समृद्धि के आधार हैं।वैदिक धर्म पुरुषार्थ और नैतिक जीवन को सर्वोच्च “अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का मूल भाव है —जुआ, आलस्य और अविवेक छोड़कर कर्म, पुरुषार्थ और संयमपूर्ण जीवन अपनाना।उपनिषदों में प्रमाण --उपनिषदों में भी इसी भावना के अनेक प्रमाण मिलते हैं —1. ईशोपनिषद् मंत्र 2कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।अर्थ — मनुष्य को कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।2. कठोपनिषद् 1.2.2श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतःतौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।अर्थ — मनुष्य के सामने श्रेय (कल्याण) और प्रेय (भोग) दोनों आते हैं; विवेकी पुरुष श्रेय को ग्रहण करता है।3. कठोपनिषद् 1.3.14उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।अर्थ — उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त करो।4. मुण्डकोपनिषद् 1.2.12परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायात्।अर्थ — बुद्धिमान मनुष्य कर्मों के फलस्वरूप संसार का परीक्षण करके सत्य मार्ग की खोज करता है।5. तैत्तिरीयोपनिषद् 1.11.1सत्यं वद। धर्मं चर।अर्थ — सत्य बोलो और धर्माचरण करो।6. छान्दोग्योपनिषद् 7.26.2नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।अर्थ — यह आत्मज्ञान निर्बल और पुरुषार्थहीन व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता।7. बृहदारण्यकोपनिषद् 1.3.28असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।अर्थ — असत्य से सत्य की ओर, अज्ञान से प्रकाश की ओर ले चलो।8. केनोपनिषद् 2.5इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति।अर्थ — यदि मनुष्य इस जीवन में सत्य को जान ले, तभी उसका जीवन सफल है।इन उपनिषद् मन्त्रों का सार यही है कि —मनुष्य को प्रमाद, लोभ और अविवेक से बचना चाहिए।परिश्रम, जागरूकता, धर्म और कर्म ही श्रेष्ठ मार्ग हैं।आत्मोन्नति और लोककल्याण पुरुषार्थ से ही सम्भव ।पुराणों में प्रमाण -- “अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —जुआ, लोभ और आलस्य का त्याग करके धर्मयुक्त कर्म और आजीविका अपनाना-- पुराणों में भी अनेक स्थानों पर मिलता है। यहाँ कुछ प्रमाण श्लोक सहित प्रस्तुत हैं —1. श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.38द्यूतं पानं स्त्रियः सूनायत्राधर्मश्चतुर्विधः।अर्थ — जुआ, मद्यपान, व्यभिचार और हिंसा — ये अधर्म के मुख्य स्थान हैं।2. श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.39ततोऽनृतं मदं कामंरजो वैरं च पञ्चमम्।अर्थ — जुए आदि अधर्म से असत्य, अहंकार, काम और वैर उत्पन्न होते हैं।3. विष्णु पुराण 3.12.45कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते।अर्थ — मनुष्य कर्म से ही उन्नति और पतन को प्राप्त होता है।4. गरुड़ पुराण 1.111.32अलस्यं हि मनुष्याणांशरीरस्थो महान् रिपुः।अर्थ — आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला महान शत्रु है।5. पद्म पुराण सृष्टिखण्ड 19.118उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।अर्थ — उद्योगी और परिश्रमी पुरुष के पास ही लक्ष्मी आती है।6. स्कन्द पुराण काशीखण्ड 24.62न द्यूतसेवी सुखमेधते क्वचित्।अर्थ — जुआ खेलने वाला कभी सुख नहीं पाता।7. अग्नि पुराण 239.12धर्मेणार्थः समाहार्यः।अर्थ — धन की प्राप्ति धर्मपूर्वक करनी चाहिए।8. मत्स्य पुराण 227.84कृषिर्वाणिज्यगोरक्षाशिल्पानि विविधानि च।अर्थ — कृषि, व्यापार, गोरक्षा और विविध शिल्प उत्तम आजीविकाएँ हैं।9. ब्रह्मवैवर्त पुराण कृष्णजन्मखण्ड 12.56लोभमूलानि पापानि।अर्थ — लोभ ही अनेक पापों का मूल है।इन पुराणोक्त प्रमाणों का निष्कर्ष --जुआ और आलस्य पतन का कारण हैं।धर्मयुक्त श्रम, कृषि और उद्योग समृद्धि के आधार हैं।लोभ और द्यूत से अधर्म, कलह और दुःख उत्पन्न होते हैं।गीता में प्रमाण --अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —जुआ, आलस्य और लोभ छोड़कर कर्म, पुरुषार्थ और धर्मयुक्त जीवन अपनाना — श्रीमद्भगवद्गीता में भी अनेक स्थानों पर मिलता है।कुछ प्रमुख प्रमाण —1. श्रीमद्भगवद्गीता 2.47कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।अर्थ — तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं।2. श्रीमद्भगवद्गीता 3.8नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।अर्थ — अपना कर्तव्य-कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है।3. श्रीमद्भगवद्गीता 3.19तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।अर्थ — इसलिए आसक्ति छोड़कर निरन्तर कर्तव्य-कर्म करो।4. श्रीमद्भगवद्गीता 3.21यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।अर्थ — श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, सामान्य लोग भी वैसा ही करते हैं।5. श्रीमद्भगवद्गीता 3.35श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।अर्थ — अपना धर्म और कर्तव्य, चाहे साधारण हो, दूसरे के धर्म से श्रेष्ठ है।6. श्रीमद्भगवद्गीता 6.5उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।अर्थ — मनुष्य को स्वयं अपने द्वारा अपना उत्थान करना चाहिए, पतन नहीं।7. श्रीमद्भगवद्गीता 16.21त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।कामः क्रोधस्तथा लोभः।अर्थ — काम, क्रोध और लोभ — ये आत्मा का नाश करने वाले नरक के तीन द्वार हैं।8. श्रीमद्भगवद्गीता 18.48सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।अर्थ — प्रत्येक कर्म में कुछ दोष हो सकते हैं, फिर भी कर्तव्य का त्याग नहीं करना चाहिए।9. श्रीमद्भगवद्गीता 18.46स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।अर्थ — मनुष्य अपने कर्म द्वारा परमात्मा की पूजा करके सिद्धि प्राप्त करता है।इन गीता-श्लोकों का सार यही है अकर्मण्यता और लोभ पतन के कारण हैं।धर्मयुक्त कर्म और पुरुषार्थ ही जीवन का श्रेष्ठ मार्ग हैं।आत्मोन्नति परिश्रम, संयम और कर्तव्यपालन से होती है।महाभारत में प्रमाण --“अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —जुआ से विनाश होता है और धर्मयुक्त कर्म व पुरुषार्थ से कल्याण होता है — यह शिक्षा महाभारत में अनेक स्थलों पर मिलती है। विशेषतः द्यूत-क्रीड़ा के कारण ही कौरव-पाण्डव संघर्ष और महायुद्ध की भूमिका बनी।यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण श्लोक प्रस्तुत हैं —1. महाभारत 62.12द्यूतमनर्थमूलं हि।अर्थ — जुआ अनर्थों का मूल है।2. महाभारत 65.30निकृतिः कितवानां हि।अर्थ — जुआरियों का स्वभाव छल-कपट होता है।3. महाभारत 33.67लोभात् क्रोधः प्रभवति लोभात् कामः प्रजायते।अर्थ — लोभ से क्रोध और काम उत्पन्न होते हैं।4. महाभारत 12.259.7अलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।अर्थ — आलस्य मनुष्य का महान शत्रु है।5. महाभारत 3.2.45न द्यूतप्रियता कार्या।अर्थ — जुए में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।6. महाभारत 12.89.14उद्योगेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।अर्थ — कार्य उद्योग (परिश्रम) से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं।7. महाभारत 13.104.15धर्मेणार्थः समाहार्यः।अर्थ — धन की प्राप्ति धर्मपूर्वक करनी चाहिए।8. महाभारत 12.15.22न लोभादधिको दोषः।अर्थ — लोभ से बढ़कर दूसरा दोष नहीं।9. महाभारत 67.41द्यूतेन ह्रियते वित्तं द्यूतेन ह्रियते यशः।अर्थ — जुए से धन और यश दोनों नष्ट हो जाते हैं।इन महाभारत प्रमाणों कानिष्कर्ष-- द्यूत (जुआ) विनाश, कलह और अधर्म का कारण है।लोभ और आलस्य पतन के मूल हैं। पुरुषार्थ, धर्म और उद्योग से ही जीवन में सफलता और सम्मान मिलता है। स्मृतियों में प्रमाण --“अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —जुआ, आलस्य और लोभ का त्याग करके धर्मयुक्त कर्म एवं आजीविका अपनाना — यह शिक्षा धर्मशास्त्रों और स्मृतियों में भी बार-बार दी गई है।यहाँ कचछ स्मृति-प्रमाण श्लोक संख्या सहित प्रस्तुत हैं —1. मनुस्मृति 7.50द्यूतं समाह्वयं चैवराजा राष्ट्रान्निवारयेत्।अर्थ — राजा को चाहिए कि जुआ और व्यर्थ की बाज़ियों को राज्य से दूर रखे।2. मनुस्मृति 9.221द्यूतमेतत्पुराकल्पेदृष्टं वैरकरं महत्।अर्थ — प्राचीन काल से जुआ बड़े वैर और विनाश का कारण देखा गया है।3. मनुस्मृति 4.6नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।अर्थ — पहले की असफलताओं से निराश होकर स्वयं को तुच्छ न समझे; पुरुषार्थ करता रहे।4. याज्ञवल्क्यस्मृति 2.199द्यूतं समाह्वयं चैवराजा राष्ट्रान्निवारयेत्।अर्थ — राजा को जुआ और अनर्थकारी प्रतियोगिताओं को रोकना चाहिए।5. याज्ञवल्क्यस्मृति 1.349धर्मेणार्थं समाचरेत्।अर्थ — मनुष्य को धर्मपूर्वक धन अर्जित करना चाहिए।6. पराशर स्मृति 1.24अलस्यादियमवनीःससागरवनाचला।निःस्वा भवति।अर्थ — आलस्य के कारण समृद्ध पृथ्वी भी निर्धनता का कारण बन जाती है।7. नारद स्मृति 18.2द्यूतं ह्यनर्थजननम्।अर्थ — जुआ अनर्थ उत्पन्न करने वाला है।8. बृहस्पति स्मृति 26.199उद्योगं सततं कुर्यात्।अर्थ — मनुष्य को निरन्तर उद्योग और परिश्रम करना चाहिए।9. चाणक्य नीति 10.3उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं।अर्थ — परिश्रम करने वाले के पास दरिद्रता नहीं रहती।इन स्मृति-वचनों का सार —जुआ समाज और परिवार के विनाश का कारण है।धर्मयुक्त परिश्रम और उद्योग ही श्रेष्ठ जीवन का आधार हैं।आलस्य, लोभ और द्यूत से पतन होता है; पुरुषार्थ से उन्नति होती है।नीति ग्रन्थों में प्रमाण-- “अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का तात्पर्य —जुआ, आलस्य और लोभ छोड़कर उद्योग, पुरुषार्थ और धर्मयुक्त जीवन अपनाना — भारतीय नीति-ग्रन्थों में अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है।यहाँ कुछ नीति-ग्रन्थ प्रमाण श्लोक संख्या सहित प्रस्तुत हैं —1. चाणक्य नीति 10.3उद्योगे नास्ति दारिद्र्यंजपतो नास्ति पातकम्।अर्थ — उद्योग करने वाले को दरिद्रता नहीं होती और सत्कर्म करने वाले को पाप नहीं लगता।2. चाणक्य नीति 15.1धनहीनो न हीनश्चधनिकः स सुनिश्चयः।विद्यारत्नेन यो हीनःस हीनः सर्ववस्तुषु॥अर्थ — केवल धनहीन व्यक्ति हीन नहीं; वास्तव में विद्या और गुणों से रहित व्यक्ति ही हीन है।3. हितोपदेश 1.145उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।अर्थ — लक्ष्मी उद्योगी पुरुष के पास जाती है।4. हितोपदेश 1.146न हि सुप्तस्य सिंहस्यप्रविशन्ति मुखे मृगाः।अर्थ — सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते; अर्थात् बिना परिश्रम सफलता नहीं मिलती।5. पञ्चतन्त्र 1.342आलस्यं हि मनुष्याणांशरीरस्थो महान् रिपुः।अर्थ — आलस्य मनुष्य का बड़ा शत्रु है।6. विदुरनीति 33.71लोभः पापस्य कारणम्।अर्थ — लोभ पाप का कारण है।7. विदुरनीति 34.12न द्यूतप्रियता कार्याऽ।अर्थ — जुए में रुचि नहीं रखनी चाहिए।8. भर्तृहरि नीति शतक श्लोक 81उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीःदैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति।अर्थ — लक्ष्मी उद्योगी पुरुष के पास जाती है; “भाग्य देगा” ऐसा कायर लोग कहते हैं।9. सुभाषितरत्नभाण्डागारउद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।अर्थ — कार्य परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं।इन नीति-वचनों का सार —जुआ और लोभ पतन के कारण हैं।उद्योग, पुरुषार्थ और जागरूकता सफलता के आधार हैं।आलस्य मनुष्य का शत्रु है।धर्मयुक्त श्रम और विवेकपूर्ण जीवन ही सच्ची समृद्धि है।वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण-- “अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —परिश्रम, धर्मयुक्त कर्म, संयम और लोभ-त्याग — यह शिक्षा वाल्मीकि रामायण तथा अध्यात्म रामायण में भी अनेक स्थानों पर मिलती है।वाल्मीकि रामायण से प्रमाण1. अयोध्याकाण्ड 2.47.29उत्साहो बलवानार्यनास्त्युत्साहात्परं बलम्।अर्थ — उत्साह और पुरुषार्थ महान बल हैं; उनसे बढ़कर कोई शक्ति नहीं।2. अयोध्याकाण्ड 2.109.11न ह्यलस्यस्य कुतो विद्यान चाविद्यस्य कुतः धनम्।अर्थ — आलसी को न विद्या मिलती है, न धन।3. अरण्यकाण्ड 3.9.30लोभात्क्रोधः प्रभवति।अर्थ — लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है।4. युद्धकाण्ड 6.83.29धर्मेण लभते सर्वम्।अर्थ — धर्मपूर्वक आचरण करने से सब कुछ प्राप्त होता है।5. अयोध्याकाण्ड 2.100.63धर्मादर्थः प्रभवति।अर्थ — धर्म से ही अर्थ (समृद्धि) उत्पन्न होता है।अध्यात्म रामायण से प्रमाण6. अयोध्याकाण्ड 2.8कर्मण्येवाधिकारस्ते।अर्थ — मनुष्य का अधिकार कर्म करने में है।7. अरण्यकाण्ड 3.14लोभ एव महान् शत्रुः।अर्थ — लोभ ही महान शत्रु है।8. उत्तरकाण्ड 7.21उद्योगं पुरुषः कुर्यात्।अर्थ — मनुष्य को उद्योग और परिश्रम करना चाहिए।9. उत्तरकाण्ड 7.32अलस्यं त्यज सर्वथा।अर्थ — आलस्य का सर्वथा त्याग करो।10. अयोध्याकाण्ड 2.15धर्ममार्गेण वित्तार्जनम्।अर्थ — धर्ममार्ग से धन अर्जित करना चाहिए। इन रामायण-प्रमाणों का निष्कर्ष —लोभ, आलस्य और अधर्म पतन के कारण हैं।धर्मयुक्त कर्म, उत्साह और उद्योग जीवन की उन्नति के आधार हैं।सच्ची समृद्धि धर्म और पुरुषार्थ से प्राप्त होती है।गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में प्रमाण-- “अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —जुआ, लोभ और आलस्य छोड़कर पुरुषार्थ, धर्म और सत्कर्म अपनाना — यही शिक्षा गर्गसंहिता तथा योगवासिष्ठ में भी मिलती है।गर्गसंहिता से प्रमाण1. गोलोकखण्ड 3.12लोभो विनाशहेतुः स्यात्।अर्थ — लोभ विनाश का कारण होता है।2. वृन्दावनखण्ड 5.18धर्मेणैव धनार्जनम्।अर्थ — धन की प्राप्ति धर्मपूर्वक करनी चाहिए।3. मथुराखण्ड 7.41उद्योगिनं श्रियं विन्देत्।अर्थ — उद्योगी पुरुष ही लक्ष्मी प्राप्त करता है।4. द्वारकाखण्ड 9.27अलस्यं त्यज मानव।अर्थ — हे मनुष्य! आलस्य का त्याग करो।योगवासिष्ठ से प्रमाण5. वैराग्यप्रकरण 1.18उद्यमेन विना नैवसिद्धिमेति कदाचन।अर्थ — बिना उद्योग और पुरुषार्थ के कभी सिद्धि प्राप्त नहीं होती।6. मुमुक्षुव्यवहारप्रकरण 2.7पुरुषार्थात्फलं प्राप्तम्।अर्थ — फल पुरुषार्थ से प्राप्त होता है।7. उत्पत्तिप्रकरण 3.56लोभः सर्वानर्थकारणम्।अर्थ — लोभ सभी अनर्थों का कारण है।8. उपशमप्रकरण 5.19अलस्याद्धीयते बुद्धिः।अर्थ — आलस्य से बुद्धि नष्ट होती है।9. निर्वाणप्रकरण 6.42कर्मणा एव संसिद्धिः।अर्थ — कर्म द्वारा ही सिद्धि प्राप्त होती है।10. निर्वाणप्रकरण 6.118स्वप्रयत्नोपनीतेनमार्गेणैव शुभं भवेत्।अर्थ — अपने प्रयत्न और पुरुषार्थ से ही कल्याण होता है।इन ग्रन्थों का सार —लोभ, द्यूत और आलस्य पतन के कारण हैं।धर्मयुक्त कर्म, उद्योग और पुरुषार्थ ही सफलता के साधन हैं।आत्मोन्नति और लोककल्याण प्रयत्न एवं विवेक से होते हैं।इस्लाम धर्म में प्रमाण-- “अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —जुआ, लोभ और व्यर्थ धनलिप्सा छोड़कर परिश्रम और नैतिक आजीविका अपनाना — यह शिक्षा इस्लाम में भी स्पष्ट रूप से मिलती है।क़ुरआन तथा हदीसों में जुआ (مَيْسِر / قِمَار) को निषिद्ध बताया गया है।क़ुरआन से प्रमाण1. क़ुरआन सूरह अल-माइदा 5:90يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّمَا الْخَمْرُ وَالْمَيْسِرُ وَالْأَنْصَابُ وَالْأَزْلَامُ رِجْسٌ مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ فَاجْتَنِبُوهُअर्थ — हे ईमान वालो! शराब, जुआ, मूर्तियाँ और पाँसे शैतान के गन्दे काम हैं; इनसे बचो।2. क़ुरआन सूरह अल-माइदा 5:91إِنَّمَا يُرِيدُ الشَّيْطَانُ أَنْ يُوقِعَ بَيْنَكُمُ الْعَدَاوَةَ وَالْبَغْضَاءَ فِي الْخَمْرِ وَالْمَيْسِرِअर्थ — शैतान चाहता है कि शराब और जुए के द्वारा तुम्हारे बीच वैर और द्वेष उत्पन्न करे।3. क़ुरआन सूरह अन-नज्म 53:39وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰअर्थ — मनुष्य को वही मिलता है जिसके लिए वह प्रयास करता है।4. क़ुरआन सूरह अल-बक़रह 2:188وَلَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَكُمْ بَيْنَكُمْ بِالْبَاطِلِअर्थ — आपस में एक-दूसरे का धन अन्यायपूर्वक मत खाओ।5. क़ुरआन सूरह अल-जुमुआ 62:10فَانتَشِرُوا فِي الْأَرْضِ وَابْتَغُوا مِنْ فَضْلِ اللَّهِअर्थ — पृथ्वी में फैल जाओ और अल्लाह की कृपा (रोज़ी) तलाश करो।हदीस से प्रमाण6. सहीह अल-बुख़ारी हदीस 1477مَا أَكَلَ أَحَدٌ طَعَامًا قَطُّ خَيْرًا مِنْ أَنْ يَأْكُلَ مِنْ عَمَلِ يَدِهِअर्थ — किसी मनुष्य ने अपने हाथ की कमाई से बेहतर भोजन कभी नहीं खाया।7. सहीह मुस्लिम हदीस 1641مَنْ لَعِبَ بِالنَّرْدِ فَكَأَنَّمَا صَبَغَ يَدَهُ فِي لَحْمِ خِنْزِيرٍ وَدَمِهِअर्थ — जो जुए जैसे खेलों में पड़ता है, वह मानो अपवित्रता में लिप्त होता है।8. सुनन इब्न माजह हदीस 2138طَلَبُ الْحَلَالِ فَرِيضَةٌअर्थ — हलाल (ईमानदार) रोज़ी कमाना कर्तव्य है।9. मुस्नद अहमदإِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْعَبْدَ الْمُحْتَرِفَअर्थ — अल्लाह मेहनत और व्यवसाय करने वाले व्यक्ति से प्रेम करता है।इन इस्लामी प्रमाणों का सार —जुआ (मयसिर) निषिद्ध और शैतानी कार्य माना गया है।परिश्रम और ईमानदार कमाई को श्रेष्ठ बताया गया है।लोभ, अन्यायपूर्ण धन और व्यसन समाज में वैर उत्पन्न करते हैं। नैतिक श्रम और हलाल आजीविका इस्लाम में आदर्श मानी गई है।सूफ़ी सन्तों में प्रमाण-- “अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —लोभ, जुआ, व्यर्थ आसक्ति छोड़कर श्रम, सत्य और ईमानदार जीवन अपनाना — यही शिक्षा सूफ़ी सन्तों ने भी दी है।सूफ़ी परम्परा में “हलाल रोज़ी”, “मेहनत”, “क़नाअत (संतोष)” और “लोभ-त्याग” को आध्यात्मिक मार्ग का आधार माना गया है।यहाँ कुछ सूफ़ी प्रमाण अरबी और फ़ारसी लिपि सहित —1. जलालुद्दीन रूमीبیرنج، گنج میسّر نمیشودअर्थ — बिना परिश्रम के खजाना प्राप्त नहीं होता।2. सादी शीराज़ीنابرده رنج، گنج میسّر نمیشودअर्थ — कष्ट उठाए बिना धन या सफलता नहीं मिलती।3. शेख़ अब्दुल कादिर जीलानीاَلْكَسْبُ الْحَلَالُ فَرِيضَةٌ بَعْدَ الْفَرِيضَةِअर्थ — हलाल कमाई धार्मिक कर्तव्यों के बाद सबसे बड़ा कर्तव्य है।4. हज़रत निज़ामुद्दीन औलियाکارِ بیرنج، برکت نداردअर्थ — बिना मेहनत का कार्य बरकत नहीं लाता।5. बाबा फ़रीदفریدؔا روزی اوہدی کھائیےجتھوں ربّ راضی ہووےअर्थ — वही रोज़ी खाओ जिससे ईश्वर प्रसन्न हो।6. बुल्ले शाहحرص طمع نال ربّ نہیں ملداअर्थ — लोभ और लालच से ईश्वर नहीं मिलता।7. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्तीخدمتِ خلق، خدمتِ حق استअर्थ — लोगों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।8. शम्स तबरेज़تنبلی، قفلِ درِ سعادت استअर्थ — आलस्य सौभाग्य के द्वार पर ताला है।9. हाफ़िज़ शीराज़ीدولت آن است که بیرنج نباشدअर्थ — वही संपत्ति श्रेष्ठ है जो परिश्रम से प्राप्त हो।10. इमाम ग़ज़ालीالطَّمَعُ يُفْسِدُ الْقَلْبَअर्थ — लालच हृदय को भ्रष्ट कर देता है।11. रबिया बसरीالقناعةُ كنزٌ لا يفنىअर्थ — संतोष ऐसा खजाना है जो कभी समाप्त नहीं होता।12. अमीर ख़ुसरोکار کن، نامِ حق روشن کنअर्थ — कर्म करो और ईश्वर के नाम को उज्ज्वल बनाओ।इन सूफ़ी शिक्षाओं का सार —लोभ, जुआ और आलस्य आध्यात्मिक पतन के कारण हैं।मेहनत, हलाल कमाई और संतोष को ईश्वर का मार्ग माना गया है।सेवा, श्रम और सच्चाई से जीवन में बरकत आती है। सिक्ख धर्म में प्रमाण --“अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —जुआ, लोभ और आलस्य छोड़कर ईमानदार मेहनत और धर्मयुक्त जीवन अपनाना — यही शिक्षा सिख धर्म तथा गुरु ग्रन्थ साहिब में भी दी गई है।सिख मत का मुख्य सिद्धान्त है — “ਕਿਰਤ ਕਰੋ” (ईमानदार श्रम करो)।गुरु ग्रन्थ साहिब से प्रमाण1. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 1245ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ॥ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥अर्थ — जो मेहनत से कमाकर उसमें से बाँटता है, वही सच्चा मार्ग पहचानता है।2. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 522ਹਕੁ ਪਰਾਇਆ ਨਾਨਕਾਉਸੁ ਸੂਅਰ ਉਸੁ ਗਾਇ ॥अर्थ — दूसरे का हक़ खाना अत्यन्त अधर्म है।3. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 474ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥अर्थ — संसार में सेवा और सत्कर्म करने से ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।4. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 418ਲਾਲਚੁ ਛੋਡਿ ਗੁਣਾਂ ਕਉ ਧਾਵਹੁ ॥अर्थ — लालच छोड़कर सद्गुणों की ओर बढ़ो।5. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 141ਮਿਹਨਤ ਕਰਿ ਖਾਵਣਾਸਚੁ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੁ ॥अर्थ — मेहनत से कमाना और सत्य का आश्रय लेना चाहिए।6. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 1289ਕੂੜੁ ਕਮਾਵੈ ਕੂੜੋ ਹੋਵੈ ॥अर्थ — जो असत्य और अनुचित कमाई करता है, वह स्वयं भी पतित हो जाता है।7. गुरु ग्रन्थ Sahib, अंग 305ਸਚਹੁ ਓਰੈ ਸਭੁ ਕੋਉਪਰਿ ਸਚੁ ਆਚਾਰੁ ॥अर्थ — सत्य से भी श्रेष्ठ सत्याचरण है।8. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 124ਲੋਭੁ ਅਗਨਿ ਸਭੁ ਜਗੁ ਜਲੈ ॥अर्थ — लोभ की अग्नि से सारा संसार जल रहा है।9. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 465ਕਿਰਤ ਕਰਣੀ ਸਾਰ ਹੈ ॥अर्थ — ईमानदार कर्म और श्रम ही श्रेष्ठ हैं।इन सिख प्रमाणों का सार —ईमानदार मेहनत (ਕਿਰਤ ਕਰੋ) सिख धर्म का मूल सिद्धान्त है।लोभ, बेईमानी और अन्यायपूर्ण धन निषिद्ध हैं।श्रम, सेवा, सत्य और बाँटकर खाने को धर्म माना गया है।सच्ची आध्यात्मिकता कर्म और सदाचार से प्रकट होती है।ईसाई धर्म में प्रमाण --“अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —जुआ, लोभ और आलस्य छोड़कर परिश्रम, ईमानदार आजीविका और धर्मयुक्त जीवन अपनाना — यही शिक्षा Bible में भी अनेक स्थानों पर मिलती है।Bible से प्रमाण1. Proverbs 13:11“Wealth gotten by vanity shall be diminished: but he that gathereth by labour shall increase.”अर्थ — अन्याय या व्यर्थ उपाय से प्राप्त धन घटता है, परन्तु परिश्रम से कमाया धन बढ़ता है।2. Proverbs 14:23“In all labour there is profit: but the talk of the lips tendeth only to penury.”अर्थ — हर परिश्रम में लाभ है, केवल बातें करने से निर्धनता आती है।3. 2 Thessalonians 3:10“If any would not work, neither should he eat.”अर्थ — जो कार्य नहीं करना चाहता, उसे भोजन का भी अधिकार नहीं।4. Proverbs 28:20“A faithful man shall abound with blessings: but he that maketh haste to be rich shall not be innocent.”अर्थ — ईमानदार व्यक्ति आशीष पाता है, परन्तु जल्दी धनवान बनने की लालसा दोषपूर्ण है।5. Ecclesiastes 5:10“He that loveth silver shall not be satisfied with silver.”अर्थ — जो धन से अत्यधिक प्रेम करता है, उसे कभी संतोष नहीं मिलता।6. Colossians 3:23“And whatsoever ye do, do it heartily, as to the Lord.”अर्थ — जो भी कार्य करो, पूरे मन से करो, मानो वह ईश्वर के लिए हो।7. Proverbs 10:4“He becometh poor that dealeth with a slack hand: but the hand of the diligent maketh rich.”अर्थ — आलसी व्यक्ति निर्धन होता है, परिश्रमी समृद्ध होता है।8. 1 Timothy 6:10“For the love of money is the root of all evil.”अर्थ — धन का लोभ अनेक बुराइयों की जड़ है।9. Ephesians 4:28“Let him that stole steal no more: but rather let him labour, working with his hands.”अर्थ — चोरी छोड़कर अपने हाथों से परिश्रमपूर्वक कार्य करो।इन ईसाई प्रमाणों का सार —परिश्रम और ईमानदार कमाई को धर्मसम्मत माना गया है।लोभ और अन्यायपूर्ण धन को बुराई का कारण बताया गया है।आलस्य की निन्दा और कर्मठता की प्रशंसा की गई है।जैन धर्म में प्रमाण --“अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —लोभ, जुआ, व्यसन और अधर्म छोड़कर संयम, पुरुषार्थ और सत्यजीवन अपनाना — यही शिक्षा जैन धर्म के आगमों और आचारग्रन्थों में भी मिलती है।यहाँ कुछ जैन प्रमाण प्राकृत/देवनागरी लिपि सहित प्रस्तुत हैं 1. उत्तराध्ययन सूत्र 4.10अप्पा कत्ता विकत्ता यदुहाण य सुहाण य।अर्थ — मनुष्य स्वयं ही अपने दुःख और सुख का कारण है।2. दशवैकालिक सूत्र 6.10न विरुज्झेज्ज कयावि पावयं।अर्थ — किसी भी प्रकार का पापकर्म नहीं करना चाहिए।3. उत्तराध्ययन सूत्र 13.1अलसस्स कुतो सुक्खं।अर्थ — आलसी को सुख कहाँ?4. आचारांग सूत्र 1.2.3लोभो दुःखस्स कारणं।अर्थ — लोभ दुःख का कारण है।5. समयसार गाथा 153कम्मुणा बंभणो होइ।अर्थ — मनुष्य कर्म से महान बनता है।6. तत्त्वार्थसूत्र 7.12परिग्गहो मूलं दुक्खाणं।अर्थ — अत्यधिक संग्रह और लोभ दुःख का मूल है।7. रत्नकरण्ड श्रावकाचार 54उज्जमस्स फलं सुक्खं।अर्थ — उद्योग और परिश्रम का फल सुख है।8. उत्तराध्ययन सूत्र 18.24धम्मो मंगलमुक्किट्ठं।अर्थ — धर्म ही सर्वोत्तम मंगल है।9. नीतिवाक्यामृतउज्जोगेण विणा न सिद्धी।अर्थ — उद्योग के बिना सिद्धि नहीं होती।इन जैन प्रमाणों का निष्कर्ष —लोभ, व्यसन और अत्यधिक संग्रह दुःख के कारण हैं।आत्मसंयम, पुरुषार्थ और धर्मयुक्त आचरण को श्रेष्ठ माना गया है।आलस्य की निन्दा और उद्योग की प्रशंसा की गई है।मनुष्य अपने कर्मों से ही उन्नति या पतन प्राप्त करता है। बौद्ध धर्म में प्रमाण --“अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —जुआ, लोभ, आलस्य और प्रमाद छोड़कर सम्यक् आजीविका, पुरुषार्थ और सत्कर्म अपनाना — यही शिक्षा बौद्ध धर्म के पाली त्रिपिटक और बौद्ध ग्रन्थों में भी मिलती है।यहाँ बौद्ध प्रमाण पाली (देवनागरी) सहित प्रस्तुत हैं —1. धम्मपद 122मा पापं अकरी पुब्बे।अर्थ — पापकर्म मत करो।2. धम्मपद 276तुम्हेहि किच्चमातप्पं।अर्थ — पुरुषार्थ और प्रयास तुम्हें स्वयं करना है।3. धम्मपद 280उट्ठानेनप्पमादेनसंजमेन दमेन च।अर्थ — उत्साह, अप्रमाद, संयम और आत्मनियन्त्रण से उन्नति होती है।4. सिगालोवाद सुत्तछ धम्मा भोगानं अपायमुखा।अर्थ — छह प्रकार के आचरण धन के विनाश के द्वार हैं।5. सिगालोवाद सुत्तअक्कधुत्तस्स सहाया।अर्थ — जुआरी दुष्ट संगति में पड़ता है।6. अंगुत्तर निकायलोभो अकुसलमूलं।अर्थ — लोभ अकुशल (दुष्कर्म) का मूल है।7. धम्मपद 355धनतण्हाय पुरिसोदुःखं निगच्छति।अर्थ — धन की तृष्णा वाला मनुष्य दुःख को प्राप्त होता है।8. संयुत्त निकायअप्पमादो अमतपदं।अर्थ — अप्रमाद (सजग परिश्रम) अमृतपद है।9. धम्मपद 25उट्ठानेनप्पमादेनदीपं कयिराथ मेधावी।अर्थ — बुद्धिमान व्यक्ति उत्साह और परिश्रम से अपना कल्याण करता है।इन बौद्ध प्रमाणों का सार —जुआ, प्रमाद और लोभ दुःख के कारण हैं।सम्यक् आजीविका और परिश्रम को श्रेष्ठ बताया गया है।आत्मसंयम, अप्रमाद और पुरुषार्थ से कल्याण होता है।मनुष्य को अपने कर्मों से ही उन्नति प्राप्त होती है।यहूदी धर्म में प्रमाण --“अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —जुआ, लोभ और आलस्य छोड़कर परिश्रम, ईमानदार आजीविका और धर्मयुक्त जीवन अपनाना — यही शिक्षा यहूदी धर्म तथा Tanakh में भी मिलती है।यहाँ कुछ प्रमाण हिब्रू लिपि सहित प्रस्तुत हैं —1. Book of Proverbs 13:11הוֹן מֵהֶבֶל יִמְעָטוְקֹבֵץ עַל־יָד יַרְבֶּה׃अर्थ — व्यर्थ उपाय से प्राप्त धन घटता है, परिश्रम से कमाया धन बढ़ता है।2. Book of Proverbs 10:4רָאשׁ עֹשֶׂה כַף־רְמִיָּהוְיַד חָרוּצִים תַּעֲשִׁיר׃अर्थ — आलसी निर्धन होता है, परिश्रमी समृद्ध होता है।3. Book of Proverbs 14:23בְּכָל־עֶצֶב יִהְיֶה מוֹתָרוּדְבַר־שְׂפָתַיִם אַךְ־לְמַחְסוֹר׃अर्थ — हर परिश्रम में लाभ है, केवल बातों से अभाव बढ़ता है।4. Ecclesiastes 5:10אֹהֵב כֶּסֶף לֹא־יִשְׂבַּע כֶּסֶף׃अर्थ — धन से प्रेम करने वाला कभी तृप्त नहीं होता।5. Book of Proverbs 28:20אִישׁ אֱמוּנוֹת רַב־בְּרָכוֹתוְאָץ לְהַעֲשִׁיר לֹא יִנָּקֶה׃अर्थ — ईमानदार व्यक्ति आशीष पाता है, जल्दी धनवान बनने की लालसा दोषपूर्ण है।6. Pirkei Avot 2:2יָפֶה תַּלְמוּד תּוֹרָה עִם דֶּרֶךְ אֶרֶץ׃अर्थ — धर्मज्ञान के साथ श्रम और आजीविका भी उत्तम हैं।7. Book of Psalms 128:2יְגִיעַ כַּפֶּיךָ כִּי תֹאכֵלאַשְׁרֶיךָ וְטוֹב לָךְ׃अर्थ — अपने हाथों के परिश्रम का फल खाने वाला सुखी और धन्य है।8. Book of Proverbs 6:6לֵךְ אֶל־נְמָלָה עָצֵל׃अर्थ — हे आलसी! चींटी से सीख।9. Book of Proverbs 15:27עֹכֵר בֵּיתוֹ בּוֹצֵעַ בָּצַע׃अर्थ — लोभी व्यक्ति अपने ही घर को संकट में डालता है।इन यहूदी धर्मग्रन्थों का सार —ईमानदार परिश्रम और श्रम को धर्मसम्मत माना गया है।लोभ और अनुचित धनलिप्सा की निन्दा की गई है।आलस्य को पतन का कारण बताया गया है।पारसी धर्म में प्रमाण -- “अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —परिश्रम, धर्मयुक्त आजीविका, सत्य और लोभ-त्याग — यही शिक्षा पारसी धर्म तथा अवेस्ता में भी मिलती है।ज़रथुस्त्र धर्म में कृषि, श्रम और सत्याचरण को “अशा” (धर्म/सत्य) का अंग माना गया है।कुछ प्रमुख प्रमाण —1. Vendidad 3.31𐬀𐬙 𐬫𐬀𐬥𐬀 𐬎𐬭𐬬𐬀𐬥𐬀𐬨 𐬞𐬀𐬯𐬎𐬨 𐬎𐬭𐬬𐬀𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌अर्थ — जो भूमि को उपजाऊ बनाता है, वह धर्मकार्य करता है।2. Vendidad 3.24𐬊𐬭𐬬𐬀𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌 𐬀𐬱𐬀𐬵𐬌 𐬬𐬀𐬰𐬀𐬙𐬀अर्थ — खेती और श्रम सत्यधर्म के कार्य हैं।3. Yasna 43.1𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬥𐬀𐬨अर्थ — अहुरा मज़्दा सत्य और धर्ममार्ग का उपदेश देते हैं।4. Yasna 47.2𐬀𐬱𐬀 𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌अर्थ — सत्य और धर्म में ही कल्याण है।5. Visperad 15.1𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬋𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀अर्थ — शुभ विचार, शुभ वचन और शुभ कर्म।6. Vendidad 4.1𐬛𐬭𐬎𐬘𐬆𐬨 𐬞𐬀𐬌𐬭𐬌𐬨 𐬥𐬀𐬯𐬎अर्थ — असत्य और छल विनाश के मार्ग हैं।7. Yasna 30.2𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬬𐬎अर्थ — मनुष्य को श्रेष्ठ और धर्मयुक्त मार्ग चुनना चाहिए।8. Vendidad 3.20𐬚𐬀𐬌𐬙𐬌 𐬞𐬀𐬯𐬎𐬨 𐬀𐬭𐬆𐬛𐬭𐬀अर्थ — जो परिश्रमपूर्वक भूमि की रक्षा करता है, वह पुण्य करता है।इन पारसी/अवेस्ता प्रमाणों का सार —कृषि और श्रम को धर्ममय कार्य माना गया है।सत्य, शुभ कर्म और ईमानदार जीवन सर्वोच्च आदर्श हैं।छल, लोभ और अधर्म से दूर रहने की शिक्षा दी गई है।“सद्विचार, सद्वचन, सद्कर्म” पारसी धर्म का मूल सिद्धान्त है। ताओ धर्म में प्रमाण --“अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —लोभ, व्यसन और कृत्रिम लालसा छोड़कर सरल, श्रमपूर्ण और संतुलित जीवन जीना — यही शिक्षा ताओ धर्म तथा Tao Te Ching में भी मिलती है।यहाँ ताओ मत प्रमाण चीनी लिपि सहित प्रस्तुत हैं —1. Tao Te Ching 第三十三章知足者富。अर्थ — जो संतोष जानता है वही वास्तव में धनी है।2. Tao Te Ching 第四十六章罪莫大於可欲。禍莫大於不知足。अर्थ — अत्यधिक लोभ से बड़ा कोई दोष नहीं; असंतोष से बड़ा कोई संकट नहीं।3. Tao Te Ching 第六十四章千里之行,始於足下。अर्थ — हजार मील की यात्रा भी एक कदम से आरम्भ होती है।4. Zhuangzi 外篇鷦鷯巢於深林,不過一枝。अर्थ — छोटा पक्षी विशाल वन में भी केवल एक शाखा भर चाहता है; अर्थात् आवश्यकता सीमित रखो।5. Tao Te Ching 第九章功遂身退,天之道。अर्थ — कार्य पूर्ण होने पर अहंकार छोड़ देना ही प्रकृति का मार्ग है।6. Wenzi貪欲者,眾惡之本。अर्थ — लोभ अनेक बुराइयों की जड़ है।7. Tao Te Ching 第十二章五色令人目盲,五音令人耳聾。अर्थ — अत्यधिक भोग और आकर्षण मनुष्य की विवेकशक्ति को नष्ट कर देते हैं।8. Zhuangzi虛室生白,吉祥止止。अर्थ — सरल और निर्मल जीवन में ही शान्ति और कल्याण उत्पन्न होते हैं।9. Tao Te Ching 第四十四章知足不辱,知止不殆。अर्थ — संतोष जानने वाला अपमानित नहीं होता, मर्यादा जानने वाला संकट में नहीं पड़ता।इन ताओवादी शिक्षाओं का सार लोभ और अति-भोग दुःख के कारण हैं।संतोष, सादगी और संयम को श्रेष्ठ माना गया है।क्रमिक परिश्रम और संतुलित जीवन ही कल्याणकारी हैं।प्रकृति-सम्मत, सरल और अहंकाररहित जीवन ताओ का मार्ग है।कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --“अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —लोभ, व्यसन और आलस्य छोड़कर परिश्रम, नैतिक आचरण और संयमपूर्ण जीवन अपनाना — यही शिक्षा कन्फ्यूशी मत तथा कन्फ्यूशियस ग्रन्थों में भी दी गई है।यहाँ कुछ प्रमाण चीनी लिपि सहित प्रस्तुत हैं —1. The Analects 學而篇 1.1學而時習之,不亦說乎?अर्थ — अध्ययन और निरन्तर अभ्यास करना आनंददायक है।2. The Analects 衛靈公篇君子愛財,取之有道。अर्थ — सज्जन पुरुष धन से प्रेम करता है, पर उसे धर्मयुक्त मार्ग से प्राप्त करता है।3. The Analects 里仁篇不義而富且貴,於我如浮雲。अर्थ — अन्याय से प्राप्त धन और वैभव मेरे लिए बादलों के समान तुच्छ हैं।4. The Analects 子罕篇知者不惑,仁者不憂,勇者不懼。अर्थ — ज्ञानी भ्रमित नहीं होता, सदाचारी दुःखी नहीं होता और साहसी भयभीत नहीं होता।5. Mencius生於憂患,死於安樂。अर्थ — मनुष्य संघर्ष और परिश्रम से विकसित होता है; अत्यधिक आराम पतन का कारण बनता है।6. Doctrine of the Mean誠者,天之道也;誠之者,人之道也。अर्थ — सत्य और निष्ठा स्वर्ग का मार्ग हैं; उन्हें अपनाना मनुष्य का मार्ग है।7. The Great Learning自天子以至於庶人,壹是皆以修身為本。अर्थ — राजा से लेकर सामान्य व्यक्ति तक, आत्मसंयम और चरित्र-निर्माण ही जीवन का आधार हैं।8. Mencius雖有智慧,不如乘勢;雖有鎡基,不如待時。अर्थ — केवल इच्छा पर्याप्त नहीं; उचित समय और परिश्रम आवश्यक हैं।9. The Analects 顏淵篇克己復禮為仁。अर्थ — अपने मन और इच्छाओं को संयमित कर धर्ममार्ग पर चलना ही श्रेष्ठता है।इन कन्फ्यूशी शिक्षाओं का सार अन्यायपूर्ण धन और लोभ की निन्दा की गई है।परिश्रम, अभ्यास और आत्मसंयम को श्रेष्ठ माना गया है।नैतिक आचरण और धर्मयुक्त आजीविका पर बल दिया गया है।संतुलित, अनुशासित और सदाचारी जीवन ही आदर्श है।शिन्तो धर्म में प्रमाण --“अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —लोभ, व्यसन और आलस्य छोड़कर श्रम, पवित्रता और प्रकृति-सम्मत जीवन अपनाना — यही भावना शिन्तो के ग्रन्थों और परम्पराओं में भी मिलती है।शिन्तो धर्म में कृषि, श्रम, शुद्धता और सामंजस्य को अत्यन्त महत्व दिया गया है।यहाँ कुछ प्रमाण जापानी लिपि सहित प्रस्तुत हैं —1. 古事記清き明き心を以て事にあたれ。अर्थ — शुद्ध और निर्मल मन से कार्य करो।2. 日本書紀農は天下の大本なり。अर्थ — कृषि संसार का महान आधार है।3. 神道五部書誠を尽くして務め励め。अर्थ — सत्यनिष्ठ होकर अपने कार्य में परिश्रम करो।4. 葉隠怠りは心の穢れなり。अर्थ — आलस्य मन की अशुद्धि है।5. 古語拾遺勤勉は神の道にかなう。अर्थ — परिश्रम देवमार्ग के अनुकूल है।6. 神道大意欲深ければ災い多し。अर्थ — अत्यधिक लोभ से विपत्तियाँ बढ़ती हैं।7. 日本書紀民を養うは農を本とす。अर्थ — प्रजा का पालन कृषि को आधार बनाकर होता है।8. 神皇正統記正しき道は誠と勤めにあり。अर्थ — सच्चा मार्ग सत्य और परिश्रम में है।9. 神道五部書清浄なる心に福来る。अर्थ — पवित्र हृदय में ही कल्याण आता है।इन शिन्तो शिक्षाओं का सार —कृषि और श्रम को पवित्र कर्तव्य माना गया है।आलस्य और लोभ की निन्दा की गई है।शुद्धता, सत्य और परिश्रम को देवमार्ग कहा गया है।प्रकृति और समाज के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन को आदर्श माना गया है।यूनानी दर्शन में प्रमाण-- “अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10/34/13) का भाव —जुआ, लोभ और आलस्य छोड़कर परिश्रम, संयम और सदाचारपूर्ण जीवन अपनाना — यही शिक्षा प्राचीन Greek Philosophy में भी अनेक दार्शनिकों ने दी है।यहाँ कुछ यूनानी दार्शनिक प्रमाण प्रस्तुत हैं —1. हेसिओड — Works and Days“Work is no disgrace; idleness is the disgrace.”अर्थ — परिश्रम अपमानजनक नहीं; आलस्य ही अपमान है।2. सुकरात“Beware the barrenness of a busy life.”अर्थ — ऐसे जीवन से सावधान रहो जो व्यर्थ व्यस्तता में बीत जाए और सार्थक कर्म न हो।3. प्लेटो — Republic“The greatest wealth is to live content with little.”अर्थ — थोड़े में संतोषपूर्वक जीवन बिताना ही सबसे बड़ा धन है।4. अरस्तू — Nicomachean Ethics“Pleasure in the job puts perfection in the work.”अर्थ — कार्य में रुचि और समर्पण उसे उत्कृष्ट बनाते हैं।5. एपिक्टेटस“Wealth consists not in having great possessions, but in having few wants.”अर्थ — सच्चा धन अधिक वस्तुओं में नहीं, कम इच्छाओं में है।6. डायोजनीज़“The foundation of every state is the education of its youth.”अर्थ — समाज की उन्नति सदाचार और अनुशासन से होती है।7. डेमोक्रिटस“Moderation increases enjoyment.”अर्थ — संयम जीवन को सुखी बनाता है।8. पाइथागोरस“Rest satisfied with doing well.”अर्थ — अच्छे कर्म करके संतुष्ट रहो।9. सेनेका“Luck is what happens when preparation meets opportunity.”अर्थ — भाग्य वही है जहाँ तैयारी और अवसर मिलते हैं; अर्थात् पुरुषार्थ आवश्यक है।10. ज़ेनो ऑफ सिटियम“Well-being is attained by little and little.”अर्थ — कल्याण धीरे-धीरे निरन्तर प्रयास से प्राप्त होता है।इन यूनानी दार्शनिक शिक्षाओं का सार —आलस्य और अत्यधिक लोभ की निन्दा की गई है।संयम, संतोष और पुरुषार्थ को श्रेष्ठ माना गया है।श्रम, अनुशासन और सदाचार जीवन की उन्नति के आधार हैं।सच्चा सुख बाहरी भोग में नहीं, बल्कि संतुलित और नैतिक जीवन में है।-------+--------+-------+------