आखिर कातिल कौन..?! softrebel द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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आखिर कातिल कौन..?!

_"कहल जाला नीमन घर बर खोजत खोजत बाप के एड़ी खिया जाला।
बाकि अब से कहल जाई की बाप के एड़ी दू बार खियाला 
एक बार नीमन घर बर खोजे मे तऽ दोसर नीमन घर बर मे घटियावल बेटी के न्याय दियावे मे...बाकि ना नीमन घरे मिलेला ना ही मुअल बेटी के न्याय..।"

"हं ठीके नू कहलू कर्मा बोह...एड़ी केतनो खिया जाए बाकि नीमन घर बर ससुरार मिलल अब मुश्किल बा जइसे मुश्किल बा नासपिटा न्यायालय से पिड़ित के न्याय मिलल..खैर हमनी के का..! जेकर बेटी गइल उऽ जाने आ जेकर बेटा पे आरोप लागल बा उ जाने...।"

_"हं हं.. हमनी के का चलऽ जात हइहव..काम बहुते है घरे।
अच्छा सुन्हू न..कौनो खबर मिले त बतबहु..!"
ठीक ठीक।"
दो औरतें घर के बाहर गली में बैठ आपस में बातें कर रही थी और पास से गुजरता हुआ सूर्यकांत...चेहरे पर उदासी लिए..,सिर को झुकाए हुए..,पसीने से लतपथ हुए अपने गमछी से माथे को पोंछ ते हुए...हाथों में निराशा के कागजात लिए अपनी घर की ओर जा रहा था।
जैसे ही वह अपने घर की दहलीज लांघने को कदम बढ़ाता है तभी पड़ोस की एक दादी अम्मा उससे पूछती है.."का भइल बाबू कौन बात बनल..?"
सूर्यकांत के निराश नैनो में जैसे उम्मीद की कोई किरण कौंधी हो वह जैसे ही अम्मा की ओर देखता है उसकी दृष्टि धुंधली हो जाती है जैसे भारी बरसात में किसी चार पहिए गाड़ी का शीशा..।
वह शायद अब अपने आस पड़ोस के चेहरे को भी पहचान नहीं पा रहा था। सिर नीचे कर घर की दहलीज लांघ भीतर चला गया।
गली में देर रात तक बैठ बैठ कर गांव वाले खूब इस बात पर चर्चा करतें।
खुद ही जज बन जाते खुद ही फैसला सुना देते दूसरे गांव की सीमाओं को लांघे लोग तो कह रहे थे लड़की दो नंबर की होगी...किन्तु उसके गांव वाले इस बात को मानने से इनकार कर देते।
कोई कहता जुग जमाना खराब है किसी का कोई भरोसा नहीं
तो कोई कहता हर आत्महत्या करने वाले का कातिल जरूर होता है।
सच क्या है कोई नहीं जानता पर सुबह से लेकर देर रात 11 12 बजे तक ये गांव वाले रोज इसी पर चर्चा करते।
ऐसा नहीं था कि ये पहली घटना है।
बात बस इतनी सी है कि अभी ये घटना नई नई है, जैसे ही इस समाज को नया तेल मसाला मिलेगा चटोरे की तरह उस ओर भागने लगते है और पुरानी कहानियों को यहीं पूर्ण विराम दे देते है।
ये विडंबना नहीं समाज की यही प्रवृत्ति है।
मुझे ये सब देख जरा भी आश्चर्य नहीं होता। न ही आश्चर्य हुआ उस निर्मम घटना की खबर सुन के।
क्योंकि मैने जितना इस समाज को जाना है यहां श्री राम से पति अयोध्या सी नगरी और कौशल्या सी सास बेहद कम है ।
यदि है तो उस धोबी से शुभ चिंतक अयोध्यावासी से समाज।
क्या इस बात में भी कोई शक है,
कि पहली संतान बेटी हो जाने पर दूसरी भी बेटी रहे तो भ्रूण हत्या नहीं होता..?! 
या इस बात में भी शक है कि बेटों की चाह में जन्म ले लेती है अनचाही खरपतवार सी बेटिया..? 
और क्या इसे भी झुठला देंगे आप की
मेरी बेटियां ही मेरा बेटा है कहने वाले लोग भी निरंतर प्रयासरत रहते है बेटे के लिए बुढ़ापे तक..कभी ओझा कभी वैध तो कभी काजी..मौलाना!?
क्या इस बात में भी दोहरापन है कि हाशिए पर बैठी स्त्रियां ही दूसरों को सहने की हिदायत देती है।
ये जो आज मौन बैठी है स्त्रियां इनका दमन न हुआ हो ये जरूरी तो नहीं..?
क्या शतप्रतिशत झुठला सकते है इस बात को कि आज भी कुछ गांवों की माटी में खोट नहीं..?
कि वही माटी अधिकतर ऐसे सपूतों को जन्म देती है, जो बड़े होकर दमनकारी पुरुष बन जाते हैं…
क्या आज भी ऐसे पुरुष नहीं है जो घर के फैसलों में स्त्रियों के योगदान को निम्न रखते है?
अपने समक्ष उनकी बातों को निराधार साबित कर देते है..!
क्या ऐसे घर और पुरुष नहीं है आज भी जो स्त्रियों की बात सुनने तक को तैयार नहीं होते..?
क्या ये सच नहीं कि
जब तक उनकी संताने ढाल बन कर खड़े न हो जाए उनके विरुद्ध
तब तक वह अपनी पत्नियों पर हाथ उठाते रहे हैं..?
क्या ये सच नहीं कि स्त्रियों के प्रति अति सुरक्षा के नाम पर विकलांग नहीं बना रहे है पुरुष..?
यदि ऐसा नहीं है..! तो स्वयं सूर्यकांत की बेटी सुनैना के न्याय के उसके ससुराल वाले आज खड़े क्यों नहीं है..?
क्यों नहीं है आज संकट के समय में साथ वो तमाम बाराती जिनका सेवा सत्कार आज से 12 वर्ष पूर्व किया था सूर्यकांत के परिवार वालों ने..?
सच..! 
सच तो मात्र ये है कि ससुराल चाहे कितना भी रघुकुल सा हो होगा तो अयोध्या जैसा ही..! 
सच तो ये भी है कि यदि उनका बेटा दोषी हो फिर भी ससुराल वालों का झुकाव सदैव उनके बेटे की ओर ही रहता है ।
अर्थात आप अपनी बेटी को जिन बारातियों के साथ विदा करते है उनमें से कोई भी उसका अपना नहीं होता स्वयं अगुआ भी नहीं।
यदि अपने होते तो वह सभी स्त्रियां अवश्य आगे आई होती आज जिनके पति उनके साथ दुर्व्यवहार करते है, उनके अधिकारों का हनन करते है ।
उनके निजी फैसले लेने का अधिकार भी यहां तक कि स्वयं ये पुरुष और ससुराल वाले ही तय करते है...वो सभी स्त्रियां आज अवश्य आगे आई होती।
पर इस केस को केवल एक नजर से देखना भी तो प्रयाप्त नहीं..!? क्या कातिल केवल उसका पति होगा..?
क्या स्वयं सूर्यकांत नहीं हो सकता..?
बेटियों के आत्महत्या के बाद अनेकों बार पीड़िता के माता पिता ने अपने दामाद और ससुराल वालों पे झूठा दहेज case लगाया है..! क्या ये बात सच नहीं है..?
और आज दहेज का विरोध करता ये बाप जो अपनी बेटी का दाह संस्कार नहीं कर रहा...उस दिन पाणिग्रहण कैसे कर दिया जब पहली बार दहेज की नींव रखी गई थी इस रिश्ते के लिए .?
तब क्यों नहीं किया विरोध..?
आज छाती पीट पीट कर रोती हुई मां चाची इसकी...छत पर सिसकता भाई...उस दिन विरोध क्यों नहीं किया जब इन 12 वर्षों के अंतराल में पहली बार प्रताड़ित की गई थी उनकी बहन बेटी..?
बुआ दादी बहन इन्होंने तब विरोध क्यों नहीं किया जब पहली बार गर्भ में ही मार दिया गया था उसके अजन्मी बच्ची को..?
सच तो ये है कि ये समाज सहने की हिदायत देता है 
बेटी का बाप कैसे भी करके अपनी जिम्मेदारियों से छुटकारा चाहता है
परिवार चाहे बेटी का हो या ससुराल का बेटे और बेटी में फर्क करना बखूबी जानते है।
मायके लौटी बेटी को...आज न्याय की मांग कर रहे मायके वाले सब कुछ जानते परखते हुए भी उस दलदल में अपनी बेटी को धकेलते रहते है ।
सच बस इतना सा ही है कि कातिल केवल एक नहीं...यदि यह आत्महत्या भी है तो भी इसका कातिल समस्त समाज है गांव जवार गोतिया पाटीदार संग ससुराल मायके और अगुआ रिश्तेदार भी है।
सच तो बस इतना सा है कि जन्मते ही बेटी अनाथ होती है...इस लिए अपने माथे की छत स्वयं बनाए अन्यथा न्याय की भीख मांगते मांगते आपके पार्थिव शरीर में एक दिन कीड़े लग जाएंगे किंतु कोई अपना आपका दाह संस्कार तक नहीं करेगा।
और कैसा न्याय जी..? कातिल एक हो तब न्याय मिले न जिसका कातिल समस्त समाज हो उसको न्याय दिला पाना इस अंधे कानून के वश का तो नहीं।
उसको न्याय केवल ईश्वर के दरवाजे पर ही मिलेगा जब इनकी खुद की बहन बेटी जलाई काटी मारी जाएंगी..और दहशत वाली बात तो ये है कि न्यायालय की सजा केवल एक बार होती है किन्तु ईश्वर तब तक सजा देते रहते है जब तक पिछली गलतियों से ये मानव कुछ सीख न जाए इनमें सुधार न हो जाए...ये जो आज मौन है...ये जो कल सहने की हिदायत दे रहे थे..वो जो कल तक सब जानते हुए बारह वर्षों तक चुप रहे...वो जो उसके साथ घटने वाले तमाम घटनाओं के प्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से भागीदार रहे है उन सब के कर्म ऊपर संचित हो चुके होंगे...जिसे भुगतने के लिए इस समाज को तैयार रहना पड़ेगा...अन्यथा पीड़ा अत्यंत कष्टदाई होगा..।
ध्यान रहे यदि ये कोई पहली घटना नहीं...तो आखिरी भी नहीं होगी...।